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पाकिस्तानी कलाकार और बॉलीवुडकारोबार आगे, देश पीछे

Written byArchiveArchive
Oct 10, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 10 Oct 2016 15:11:49

भारत में पकिस्तानी कलाकारों का आना और यहां काम करके शोहरत और दौलत कमाने का सिलसिला यूं तो काफी पुराना है। यदि कुछ अपवादों को छोड़ दें तो भारत ने एक उदारवादी, सभ्य और आदर्श देश होने के कारण पाकिस्तानी कलाकारों का खुले दिल से स्वागत किया, उन्हें सिर आंखों पर बिठाया। यही कारण रहा कि पाकिस्तान के गुलाम अली, मेहंदी हसन, नुसरत फतेह अली खान और रेशमा जैसे गायक-गायिका पाकिस्तान से कहीं ज्यादा भारत में लोकप्रिय हुए। हालांकि पाकिस्तान की नापाक हरकतों के कारण कई बार  हमारे रिश्ते काफी तल्ख हुए। इसके बावजूद भारत ने पाकिस्तानी कलाकारों को अपने यहां आने से नहीं रोका। जबकि पाकिस्तान ने अक्सर अधिकांश भारतीय कलाकारों के साथ शत्रु जैसा बर्ताव किया।  यहां तक कि उसने कुल मिलाकर 40 वर्ष से अधिक समय तक भारतीय फिल्मों पर  प्रतिबंध लगाए रखा। यह सब देख हमारे देश के कुछ कलाकार और संगठन पाकिस्तानी कलाकारों पर भी भारत में प्रतिबंध लगाने की मांग समय-समय पर उठाते रहे, लेकिन भारत ने शिष्टाचार निभाते हुए पाक कलाकारों पर प्रतिबंध नहीं लगाया। यही कारण है कि पाक कलाकार बरसों से भारत आकर प्रसिद्धि और पैसा कमाते रहे हैं। लेकिन जब 18 सितंबर को उरी में पाक पोषित आतंकवादियों के कायराना हमले के कारण हमारे 19 जवान शहीद हो गए तो देश का बच्चा-बच्चा आक्रोशित हो उठा। ऐसे में पाक से अपने शहीदों की शहादत का बदला लेने के साथ यह मांग भी दूर-दूर से उठने लगी कि भारत में पाकिस्तानी कलाकारों पर तुरंत प्रतिबंध लगा देना चाहिए।
हालांकि भारत सरकार ने पाकिस्तानी कलाकारों पर अभी तक कोई प्रतिबंध नहीं लगाया है, लेकिन जन-आक्रोश और देश के अधिकांश लोगों की भावना को देखते हुए 'इंडियन मोशन पिक्चर्स प्रोडयूसर्स एसोसिएशन'(इम्पा) ने इन कलाकारों के भारतीय फिल्मों में काम करने पर प्रतिबंध लगा दिया। यहां तक कि जी टेलीविजन नेटवर्क और ऐसल ग्रुप के अध्यक्ष डॉ. सुभाष चंद्रा ने भी अपने जिंदगी चैनल पर प्रसारित हो रहे पाकिस्तान के तमाम धारावाहिकों को बंद कर दिया। सुभाष चंद्रा ने दो वर्ष पहले ही पाक के साथ देश के लोगों के रिश्ते मजबूत करने के उद्देश्य से, जिंदगी चैनल का उद्घाटन करते हुए इस पर पाक के कई मशहूर धारावाहिकों का प्रसारण आरंभ किया था। इस वजह से फवाद खान और माहिरा खान जैसे कई पाकिस्तानी कलाकारों को भारत में अच्छी-खासी लोकप्रियता मिली। फवाद और माहिरा के साथ कुछ और अन्य पाकिस्तानी कलाकारों को भारतीय फिल्मकारों ने अपनी फिल्मों में नायक, नायिका के रूप में काम दिया है। इससे पड़ोस के ये साधारण से कलाकार रातोंरात सितारे बन गए। जो पाकिस्तान में कौडि़यों के लिए तरसते थे, वे भारत में लाखों, करोड़ों कमाने लगे। लेकिन इन लोगों ने पठानकोट या उरी हमले की निन्दा नहीं की, जबकि फवाद खान ने पेरिस में हुए आतंकवादी हमले की ट्वीट करके निंदा की थी। पाकिस्तानी कलाकारों की असलियत सामने आने के बाद भी महेश भट्ट, श्याम बेनेगल, करण जौहर, सपा नेता अबू आजमी सहित कुछ और लोग भी इनके पक्ष में आए और उन्होंने आवाज उठाई कि इन कलाकारों पर प्रतिबंध लगाने से क्या आतंकवाद रुक जाएगा?
लेकिन जब सलमान खान जैसे बड़े सितारे ने पाकिस्तानी कलाकारों की वकालत की तो और भी दु:ख हुआ। सलमान का कहना था- ''ये कलाकार हैं आतंकवादी नहीं, इन्हें सरकार वीजा देती है तभी यहां आते हैं।'' और तो और इस मामले में अभिनेता ओम पुरी भी कूद पड़े। एक टीवी चैनल पर सेना को लेकर अभद्र टिप्पणी करते हुए पुरी ने कहा कि किसी ने इन जवानों को सेना में शामिल होने के लिए मजबूर नहीं किया था। लोगों से पूछना चाहिए कि क्या भारत और पाकिस्तान को इस्रायल और फिलिस्तीन बन जाना चाहिए?
सलमान और भट्ट का सच
दरअसल सलमान खान और महेश भट्ट जैसे लोग पाकिस्तान में अपनी कमाई को बरकरार  रखने  के लिए उसके कलाकारों का बचाव कर रहे हैं। सलमान की पिछली दो फिल्मों 'सुलतान' और 'बजरंगी भाईजान' ने पाकिस्तान में जबरदस्त कमाई की थी। 'सुलतान' तो पाक में 30 करोड़ रुपए की कमाई कर वहां की अब तक की सबसे ज्यादा कमाऊ फिल्म बन गई है। 'बजरंगी भाईजान' ने भी पाक में 23 करोड़ 32 लाख रुपए बटोेरे। ऐसे में सलमान यदि वहां के कलाकारों का विरोध करते तो पाक में उनकी यह दुकान बंद हो जाती। यह भी दिलचस्प है कि पाकिस्तान में सलमान के साथ आमिर, शाहरुख और सैफ अली खान की फिल्में ही सर्वाधिक पसंद की जाती हैं। सैफ ने भी पाकिस्तानी कलाकारों का पक्ष लिया है। जबकि आमिर और शाहरुख चुप्पी साधे हुए हैं। शाहरुख तो इन कलाकारों का विरोध इसलिए भी नहीं कर सकते, क्योंकि जनवरी में प्रदर्शित होने वाली उनकी फिल्म 'रईस' में माहिरा खान हैं। महेश भट्ट पिछले कुछ बरसों से पाक कलाकारों की एक पूरी फौज को भारतीय सिनेमा में काम देने के साथ हमेशा उनकी तारीफ में कसीदे काढ़ते रहते हैं। असल में भट्ट पाकिस्तान के कराची में होने वाले कराची फिल्म फेस्टिवल के ब्रांड अम्बेसडर हैं और जब भी यह फिल्म समारोह कराची में आयोजित हुआ तो भट्ट वहां हर बार गए। उनकी कई फिल्में कराची के इस समारोह में  दिखाई जाती हैं। यहां तक कि वे पाकिस्तान के साथ मिलकर एक फिल्म 'नजर' भी बना चुके हैं। तो भला वे भी पाक के साथ अपने मधुर संबंध क्यों बिगाड़ें? जबकि करन जौहर इसलिए मजबूर दिखते हैं क्योंकि उनकी फिल्म 'ए दिल है मुश्किल' में फवाद खान हैं और यह फिल्म इसी महीने दीवाली पर प्रदर्शित होने वाली है। करन ने अपनी एक और फिल्म के लिए फवाद को मोटी रकम देकर अनुबंधित किया है।
उरी हमले और इसके जवाब में भारतीय सेना द्वारा पाक में किए गए सर्जिकल स्ट्राइक के बाद जब महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना ने राजनीतिक स्तर पर और देश के कोने-कोने से भावनात्मक रिश्तों पर लाखों करोड़ों लोगों ने फवाद खान, माहिरा खान, अली जाफर, राहत फतेह अली खान, वीना मलिक और आतिफ असलम जैसे पाक कलाकारों को तुरंत वापस पाकिस्तान भेजने और भारत में प्रतिबंधित करने की मांग उठी तो कुछ लोगों ने कहा कि इसमें भला फवाद का क्या कसूर है? वह उरी हमले का विरोध इसलिए नहीं कर रहा कि वह डरता है कि इसका विरोध करने के बाद जब वह अपने वतन जाएगा तो वहां के लोग उसे छोड़ेंगे नहीं। लेकिन फवाद के बोल भी कम बिगड़े हुए नहीं हैं। इसलिए इन पर प्रतिबंध लगना चाहिए।  
सांस्कृतिक संबंधों का मतलब नहीं
पाकिस्तान ने भारतीय फिल्मों पर लगातार कई बरसों तक प्रतिबंध लगाए रखा, लेकिन भारत ने पाकिस्तान की फिल्मों पर अपने यहां कभी भी प्रतिबंध नहीं लगाया। हां, कभी सेंसर बोर्ड ने किसी खास फिल्म को किसी विशेष कारण से प्रतिबंधित किया हो तो वह अलग बात है।  पाकिस्तान में तो सरकारी स्तर पर नीतिगत फैसलों के तहत भारतीय फिल्में प्रतिबंधित रही हैं। इन फिल्मों में भाग मिल्खा भाग, रांझना, एक था टाइगर, खिलाड़ी 786, तेरे बिन लादेन, दिल्ली बैली और ढिशूम जैसी कई फिल्मों के बाद अब 'एम एस धोनी-द अनटोल्ड स्टोरी' का नाम भी जुड़ गया है।
पाक के कट्टरपंथियों ने अपने देश की ही एक फिल्म 'बॉम्बे वाला' का 1961 में इसलिए विरोध किया कि इस फिल्म के नाम में भारत के एक शहर का नाम था। 1965 के बाद तो वहां भारतीय फिल्मों पर ऐसा प्रतिबंध लगा जो समय के साथ और मजबूत (कड़ा) होता गया। लेकिन परवेज मुशर्रफ ने पाकिस्तान के लोगों में भारतीय फिल्मों के प्रति तड़प देख 2006 में अपने यहां भारतीय फिल्मों के आयात को मंजूरी दे दी।
 जब पाकिस्तान में भारत की फिल्मों पर प्रतिबंध था तब भी वहां की सलमा आगा, सोमी अली और जेबा बख्तियार जैसी कई अभिनेत्रियां हमारी हिंदी फिल्मों में बिना किसी रोक और भेदभाव के काम करती रहीं। पाक के कलाकार यहां जब भी आए हमने उनकी खूब मेहमाननवाजी की, वे जहां रहें, जहां घूमें, आराम से रहें, जबकि हमारे देश के अधिकांश महान कलाकारों को पाक ने कभी अपने यहां आमंत्रित ही नहीं किया। यदि कुछ कलाकार वहां गए तो उन पर पाक शक करता रहा। इस बात की एक बड़ी मिसाल मशहूर गायक जगजीत सिंह के उस दर्द से भी मिलती है, जो उन्होंने अप्रैल 2004 में तत्कालीन उपप्रधानमंत्री लालकृष्ण आडवाणी को सुनाया था। जगजीत सिंह के साथ गायक अभिजीत भी थे और इन दोनों ने तब पाक के गायकों को भारत में प्रतिबंधित करने की मांग भी रखी थी। जगजीत ने कहा था कि पाकिस्तान ने हमारी लता मंगेशकर और आशा भोंसले जैसी शिखर गायिकाओं को भी अपने यहां कभी आमंत्रित नहीं किया, जबकि वहां के गायक आए दिन भारत आकर धन और प्रसिद्धि दोनों कमा रहे हैं। उन्होंने पाकिस्तान को लेकर जो अपने व्यक्तिगत अनुभव सुनाए थे वे तो और भी चौंकाने वाले थे। उन्होंने कहा था कि वे भारतीय दूतावास के आमंत्रण पर 1980 में सिर्फ एक बार पाकिस्तान गए थे। 15 दिन तक वहां रहे। मैं जब तक वहां रहा तब तक आईएसआई का एक एजेंट मुझ पर नजर रखता रहा।
यह सारा घटनाक्रम यहीं दर्शाता है कि पाकिस्तान हमारे कलाकारों की कितनी कद्र करता है और हम उसके कलाकारों को इज्जत के साथ 'ये दौलत भी ले लो' और ये शोहरत भी ले लो करते रहते हैं। क्या कलाकारों को सरहद में न बांधने की जिम्मेदारी हमारी ही है?  वे गालियों के साथ गोलियां बरसाएं और हम शान्ति-शान्ति की माला जपते रहें? क्या यह मुमकिन है?  
-प्रदीप सरदाना

 (लेखक प्रख्यात फिल्म पत्रकार हैं) 

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