भैया आजाद की स्मृति में
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भैया आजाद की स्मृति में

Written byArchiveArchive
Oct 3, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 03 Oct 2016 12:21:16

 भैया आजाद की स्मृति मे
पाञ्चजन्य ने सन् 1968 में क्रांतिकारियों पर केन्द्रित चार विशेषांकों की शंृखला प्रकाशित की थी। दिवंगत श्री वचनेश त्रिपाठी के संपादन में निकले इन अंकों में देशभर के क्रांतिकारियों की शौर्यगाथाएं थीं। पाञ्चजन्य पाठकों के लिए इन क्रांतिकारियों की शौर्यगाथाओं को नियमित रूप से प्रकाशित कर रहा है। प्रस्तुत है 29 अप्रैल ,1968 के अंक में प्रकाशित चंद्रशेखर आजाद की साथी रहीं दीदी सुशीला का आलेख:-

दीदी सुशीला
सब उत्तरी भारत की पुलिस चंद्रशेखर आजाद के नाम से ही कंपित हो उठती थी, एक दिन हम में से एक साथी ने उनसे कह दिया, ''भैया, आप तो मोटे होते जा रहे हैं। सरकार को आपकी कलाई के लिए शायद कोई विशेष हथकड़ी तैयार करानी पड़े।'' इतना कहना था कि भैया का चेहरा लाल हो गया। उन्होंने तमक कर उत्तर दिया- आजाद की कलाई में हथकड़ी लगना अब बिल्कुल असंभव है। एक बार सरकार लगा चुकी। अब तो शरीर के टुकड़े-टुकड़े हो जाएंगे, लेकिन जीवित रहते पुलिस बंदी नहीं बना सकती।
भैया जैसे वीर व्यक्ति के लिए सब कुछ संभव था और अंत तक उन्होंने अपनी ही बात रखी। प्रयाग में जिस दिन 27 फरवरी, 1931 को भैया ने पुलिस से अंतिम संग्राम किया था, उसके 12 घंटे पूर्व मैं उनके पास थी। एक विशेष कार्य से दिल्ली चली आई थी। उन दिनों भगतसिंह को फांसी की सजा सुनाई जा चुकी थी और उन पर दूसरे षड्यंत्र का मुकदमा चल रहा था। वकीलों की राय हुई कि यदि इस समय षड्यंत्र का कोई दूसरा साधारण अभियुक्त, जो फरार हो अपने को अदालत में पेश कर दे तो मुकदमा और आगे खींचा जा सकता है। मैंने अपने को इसके लिए उपयुक्त समझा, लेकिन पार्टी के नेता की आज्ञा लेना परमावश्यक था। और इसलिए मुझे उनके पास प्रयाग जाना पड़ा। उन्होंने मेरे प्रस्ताव को स्वीकार नहीं किया। उन्होंने मुझे और दुर्गा भाभी को गांधी जी के पास एक प्रस्ताव देकर भेजा था कि यदि गांधी जी भगतसिंह व दत्त की फांसी को मंसूख करा सकें और चलने वाले मुकदमों को वापस करा सकें तो आजाद अपनी पार्टी सहित अपने को गांधी जी के हाथों में सौंप सकते हैं। फिर वे चाहे जो कुछ करें। भैया पार्टी भंग करने के लिए तैयार हो गये थे। गांधी-इरविन वार्ता में ऐसी शर्तें रखना गांधी जी ने न उचित ही समझा और न संभव ही, इसीलिए उन्होंने उत्तर दिया कि वे कोई गारंटी नहीं दे सकते हैं। एक पार्टी के लिए बड़े प्रश्नों पर होने वाले समझौते को नहीं अटकाया जा सकता।
गांधी जी के इस उत्तर से हमें कुछ निराशा तो हुई, लेकिन हमने प्रयत्न जारी रखे। उसी समय हमारे ऊपर एक अनभ्र वज्रपात हुआ। भैया पुलिस के एक बड़े दल के साथ अकेले संग्राम करते-करते जूझ गये।
चंद्रशेखर आजाद का, जिनको मैं भैया कहती थी और वे मुझे दीदी कहा करते थे, जन्म एक गरीब परिवार में हुआ था। जब उनकी शिक्षा अपरिपक्व अवस्था में ही थी, उसी समय बनारस में एक हड़ताल के संबंध में उनको पकड़ लिया गया। जेल के अंदर उनके साथ अमानुषिक व्यवहार किया गया। उनको निर्वस्त्र करके बेंत से पीटा गया तब तक जब तक कि वे बेहोश नहीं हो गये। उसी घटना से उनके जीवन ने एक पलटा खाया और वे क्रांतिकारी बन गये। उन्हें केवल एक धुन सवार रहा करती थी कि किस प्रकार देश से अंग्रेजों को निकाला जाए। वे किसान-मजदूरों का राज्य अवश्य चाहते थे लेकिन उसके आगे की बात उन्होंने कभी सोची ही नहीं।
महान चरित्र
उनके व्यक्तित्व, त्याग, लगन और चरित्र ने हर उस व्यक्ति को प्रभावित किया जो उनके संपर्क में एक बार भी आ गया। यह सच है कि वे हर छोटे-मोटे क्रांतिकारी पर विश्वास कर लेते थे, जिसकी वजह से उन्हें कई बार मुसीबतों का सामना करना पड़ा और अंत में विश्वासघात के ही कारण उन्हें अपने प्राणों का उत्सर्ग करना पड़ा। वे अनुशासन को पूरी तरह से मानने वाले थे। उनके अनुशासन का स्तर इतना ऊंचा था कि प्राय: साथियों को बड़ी कठिनाई का सामना करना पड़ता था। उनका चरित्र दहकते हुए अंगारे के समान ज्योतिर्मय और शुभ्र ज्योत्स्ना के समान उज्ज्वल था। स्त्री जाति का वे बड़ा सम्मान करते थे। उन दिनों एक अंग्रेज संपादक क्रांतिकारियों के विरुद्ध बहुत लिखा करता था। इस पर एक साथी ने कहा कि उस संपादक को मार दिया जाए। उसने एक योजना भी पेश की कि वह संपादक सपत्नीक अमुक समय पर मोटर से गुजरता है। उनको खत्म कर दिया जाए। इस पर भैया क्रुद्ध होकर बोले, ''स्त्रियों और बच्चों पर हाथ उठाना, क्या यही क्रांतिकारियों का धर्म है''? साथी चुप रह गया और अपनी भूल स्वीकार की।
जहां उनमें कठोरता थी, वहीं कोमलता भी थी। उनका रहन-सहन सादा था। खाना तो बिलकुल रूखा-सूखा पसंद करते थे। उन्हें खिचड़ी बहुत पसंद थी क्योंकि इसमें कम से कम खटपट पड़ती थी। सोते साथियों को जगाकर वे योजनाओं पर विचार करने लगते थे। मैंने कभी-कभी उनसे शिकायत की तो वे मुझे ताना दिया करते थे कि यह नमक सत्याग्रह नहीं कि झंडा उठाया, नारे लगाये और जेल चले गये। ये क्रांतिकारियों की योजनाएं हैं। इन पर काफी विचार करना पड़ता है। जनता का पैसा वे धरोहर समझते थे। अपने ऊपर उन्होंने कभी 5 पैसे भी खर्च नहीं किए। वे प्राय: तीसरे दर्जे में सफर किया करते थे। जब उनसे कहा गया कि खतरे से बचने के लिए वे दूसरे दर्जे में सफर किया करें तो उन्होंने कहा कि जनता आज विश्वास करती है कि आजाद पैसा बर्बाद नहीं करेगा। कल हम दूसरे दर्जे में चलेंगे और जनता देखेगी तो उसका विश्वास उठ जायेगा।
प्रत्युत्पन्न मति
एक बार भैया कानपुर स्टेशन पर उतरे, वहां पर एक मशहूर गुप्तचर मौजूद था जिसने भैया को देख लिया। हम लोगों ने सोचा कि आंख बचाकर निकल सकें तो अच्छा है, लेकिन यह संभव नहीं था। उसी समय भैया को एक नई सूझ सूझी। वे सीधे उस गुप्तचर के पास पहुंचे और कंधे पर हाथ रखकर बोले, ''देखो फिजूल की बात मत करो। तुम अपना काम करो और मैं अपना।'' बेचारा गुप्तचर बुत की तरह वहां ही खड़ा रहा और भैया उसी की साइकिल पर सवार हो नौ दो ग्यारह हो गए। एक बार इसी तरह प्रयाग में रात को एक गुप्तचर ने भैया का पीछा किया। पानी बरस रहा था। रात के बारह बज गये, लेकिन भैया लौट कर नहीं आये। हम लोगों को बड़ी चिंता हुई। रात के डेढ़ बजे भैया आये। उन्होंने सारी कहानी बताई और आखिर में यह भी बताया कि गुप्तचर से छुटकारा कैसे मिला। जब देखा कि वह पीछा नहीं छोड़ रहा तो पिस्तौल का ही सहारा लेना पड़ा, जिसको देखते ही वह वापस चला गया।
भैया को कलापूर्ण चित्रों से अनोखा प्रेम था। हम लोग जब भगतसिंह को छुड़ाने के लिए लाहौर गये तो हमने मुल्तान रोड पर एक कोठी किराये पर भी ली थी और उसको वैसे ही सजाया था जैसे कि उसमें कोई संभ्रांत परिवार रहता हो। उसमें सोफा, गलीचे, गुलदस्ते सभी कुछ रखा गया था। हमारा एक तैलचित्र भी था। उसको देखकर भैया ने उत्तर दिया कि इसको सामने रख कर निशानेबाजी करूंगा। यह था उनका कला प्रेम। उनकी निशानेबाजी
अचूक थी।
हां, तो जिस कार्य के लिए हम लोग लाहौर गये थे वह कार्य पूरा न हो सका, बल्कि हमको बहुत नुकसान पहुंचा। हमारी भगतसिंह को छुड़ाने की योजना सर्वथा असफल रही। पहले तो रावी तट पर इस योजना के प्रमुख संचालक भगवतीचरण भाई बम विस्फोट में मारे गये। दूसरे मुल्तान रोड की कोठी में भी विस्फोट हो गया और लोगों को वहां से भागना पड़ा।
भाई भगवतीचरण
हमारे भैया के संस्मरण अधूरे रह जाएंगे, यदि मैं अपने दूसरे भाई भगवतीचरण के संबंध में कुछ नहीं कहूंगी। भगवतीचरण एक मंजे हुए राजनीतिक क्रांतिकारी थे। विभिन्न क्रांतियों का उन्होंने गहन अध्ययन किया था और सबसे बड़ी बात यह थी कि वे आजाद भैया के सब कुछ थे। जब आजाद पार्टी में आये थे तो उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई थी और उन्होंने कहा था कि अब कार्य करने में मजा आयेगा। आजाद जैसा वीर हमें मिल गया है।
इसी प्रकार जब रावी तट पर उनके प्राण छूटे तो उनकी अंतिम अभिलाषा यही थी कि उनके मरने से योजना पर कोई प्रभाव न पड़े, लेकिन यह हम लोगों के हाथ की बात नहीं थी। विस्फोट का समाचार फैल गया था, पुलिस सतर्क हो चुकी थी। भगवती चरण जी की मृत्यु से भैया को गहरा धक्का लगा। यह क्षति कभी भी पूरी नहीं की जा सकी।     ल्ल 

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