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राष्ट्र सेविका समिति के 80 वर्ष पर विशेष – समिति के साथ लंबी यात्रा

Written byArchiveArchive
Oct 3, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 03 Oct 2016 15:04:06

 

समिति के साथ मेरा पहला संपर्क 1939 में हुआ था। मेरे पिता भास्कर राव मेढ़े स्वदेशी प्रेमी थे और उनसे ही मैंने यह सोच प्राप्त की थी। नागपुर में बसने के बाद मुझे इसी विचारधारा से जुड़े लोगों से मिलने का मौका मिला और मैं समिति से जुड़ गई। नागपुर के महाल इलाके में हिंदू मुलुंची शाला में मैंने पहली शाखा में हिस्सा लिया था। यही स्थान समिति की गतिविधियों का केंद्र भी था। उस समय समिति का कार्य प्रमिलाताई परांजपे, कुसुमताई परांजपे और उनकी माता लक्ष्मीबाई परांजपे जैसी दिग्गज हस्तियां संचालित करती थीं। लक्ष्मीबाई परांजपे को सब काकू पुकारते थे। इन्हीं दिग्गज प्रतिभाओं ने औपचारिक और अनौपचारिक विमर्श के जरिए हमारी सोच को नया आधार और पोषण दिया था।
इसी दौरान मुझे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के डॉ़ एल़ वी़ परांजपे को देखने-सुनने का मौका भी मिला, जिन्हें डॉ़ हेडगेवार ने तब सरसंघचालक की जिम्मेदारी दी थी जब वह 'जंगल सत्याग्रह' से जुड़े थे। इनके अतिरिक्त बाबासाहेब आप्टे एवं अन्य को भी मैंने जाना। उस समय संघ का कोई कार्यालय नहीं था, इसलिए बाबासाहेब आप्टे हमारे घर के ऊपर वाले कमरे में रहते थे जहां पूजनीय डॉक्टर जी एवं अन्य वरिष्ठ अधिकारी उनसे अनेक मुद्दों पर चर्चा करने के लिए आते थे।
मैं उस समय मात्र 10-11 वर्ष की थी और वहां उनकी बातों की गंभीरता एवं गहनता को समझना मेरी समझ से बाहर होता था, परंतु मैं इतना जरूर सोचती थी कि वह सब देश के लिए कुछ अच्छा कार्य करते हैं।

इस विषय में मुझे व्यावहारिक ज्ञान मेरी मौसी श्रीमती लक्ष्मीबाई उपनाम अक्का महाशब्दे ने दिया। साथ ही प्रमिलाताई परांजपे की माता, पिता एवं भाई भी इस मायने में मेरे शिक्षक साबित हुए। वहां बालशास्त्री हरदास भी आते थे। वह बहुत ज्ञानी एवं प्रकांड वक्ता थे। इसलिए वहां अनेकानेक विषयों पर विमर्श होता था। हालांकि मैं उन सबको समझ नहीं पाती थी, परंतु गहराई से प्रभावित जरूर होती थी। मैं एक स्मृति उत्सव में मौसी जी केलकर से मिली थी और उनके सरल, प्रतिभाशाली एवं सीधे-सादे व्यक्तित्व का मुझ पर गहरा असर पड़ा और समिति के कायार्ें से पूरी तरह जुड़ने का वह बड़ा प्रस्थान बिंदु साबित हुआ।

 संभवत: 1943-44 के दौरान स्वातंत्र्य वीर सावरकर हिंदू मुलिंची शाला की हमारी शाखा में आए थे। हम सेविकाओं ने उन्हें 'गार्ड ऑफ ऑनर' दिया। उन्होंने कहा कि समिति का कार्य वर्षा की उन बूंदों की तरह है जो जमीन में गहराई तक जाती हैं और उसे उर्वर बनाने में मदद करती हैं। यह समिति के कायार्ें का अनोखा आकलन था। यही सच भी था। गुरुजी डॉ़ श्यामा प्रसाद मुखर्जी को भी हमारी शाखा में लाए थे और इस तरह मुझे इन महान हस्तियों से मिलने का सौभाग्य मिला था।

उन दिनों 'प्रचारिका' की अवधारणा अस्तित्व में नहीं आई थी। बेशक मेरे मौसेरे भाई बापू महाशब्दे के साथ इस विषय में कुछ विमर्श हुआ था। वह तमिलनाडु में कार्यरत अनन्य स्वयंसेवक एवं अल्पकालिक प्रचारक भी रहे थे। उनसे विमर्श के बाद हमने एक शैक्षणिक संस्थान की शुरुआत की थी। इसका अर्थ था विवाह न करना और अपने जीवन को किसी उद्देश्य हेतु समर्पित कर देना। समिति के साथ संपर्क में आने के बाद, न जाने कैसे मैं संस्थान से जुड़ी और अपना जीवन उसे समर्पित करने का निर्णय किया।

उन दिनों समिति का कोई कार्यालय नहीं होता था और ऐसी 'अविवाहित', 'एकल', 'कुंवारी' युवतियों को सम्मिलित करने से जुड़ी कोई योजना भी नहीं थी। महिला सामाजिक कार्यकर्ताओं की अवधारणा भी उन दिनों स्वीकार्य नहीं थी। अत: घर पर रहने और अपनी शिक्षा पूरी करने के लिए मैं वंदनीया मौसी जी के साथ समूचे भारतवर्ष में घूमती थी। मैंने कार्यकर्ताओं एवं आमजन के साथ उनके व्यवहार को गौर से देखा और विभिन्न परिस्थितियों से एवं घरों में वह किस तरह एकमेव हो जाया करती थीं, इसे भी गहराई से जाना।

1960 के दशक में हम समिति के शिविर मेें शामिल होने के लिए कर्नाटक की यात्रा पर थे। उन दिनों कर्नाटक-महाराष्ट्र सीमा विवाद के कारण माहौल गर्म था। मौसी जी ने साथ आने वाले पत्रकारों से कहा कि समिति इस तरह के विवादित मुद्दों से दूर अपना शिविर  शांतिपूर्ण तरीके से चलाती है। उन्होंने यह भी बताया कि कन्नड़ भाषा न जानने की उनकी सीमा के बावजूद वहां की सेविकाएं उनके  तथा मिशन के साथ गहरे स्नेह और समर्पण के साथ जुड़ी हैं। यही विश्वास, स्नेह और सोच की एकता उन्हें एक-दूसरे को बेहतर तरीके से समझने में मदद करती है। समिति कार्य को परिपूर्ण करने की यही कसौटी होती है। इसके बाद उन्होंने कहा कि गुरुदक्षिणा ही समिति का वित्तीय आधार है। जब एक पत्रकार ने समिति के संघ से संबंध का सवाल उठाया तो उन्होंने तुरंत जवाब दिया कि गुरुदक्षिणा प्राचीन भारतीय परंपरा है और समिति केवल उसका अनुसरण कर रही है।

1938 के बाद समिति का कार्य भारत के अन्य हिस्सों में फैलना शुरू हुआ था। मध्य प्रदेश एवं गुजरात इस विस्तार का पहला हिस्सा बने जिसके बाद सिंध का स्थान आया जो उस समय बॉम्बे प्रेसीडेंसी का अंग था। प्रसंगवश समिति की पहली अखिल भारतीय शारीरिक शिक्षण प्रमुख जेठी देवानी सिंध प्रांत से थीं। 14 अगस्त, 1947 को मौसी जी की कराची शाखा में बेहद साहसपूर्ण मौजूदगी, प्राकृतिक अथवा मानव-निर्मित आपदाओं में मुसीबत में फंसे हुए अपने लोगों की हमेशा मदद करना उनका लक्ष्य रहा। आगे आने वाले दिनों में जम्मू एवं कश्मीर और असम में भी उथल-पुथल दिखी। इस दौरान हम सेविकाएं राहत शिविरों में मुसीबत में फंसे लोगों के साथ रहीं एवं कई बार जम्मू एवं कश्मीर के कमिश्नर एवं गवर्नर से भी मिलीं।

समिति का मानना रहा है कि महिला सशक्तीकरण राष्ट्र सशक्तीकरण का आधार है। महिला वर्ग को सशक्त करने के लिए समिति ने 'उद्योग मंदिर' एवं 'बालक मंदिर' की शुरुआत की। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद 'भारतीय महिला' के रोल मॉडल के लिए कुशल शासन के तौर पर अहिल्याबाई होल्कर, मातृत्व के साथ नेतृत्व के तौर पर रानी झांसी लक्ष्मीबाई और ज्ञानवान मातृत्व के तौर पर जीजाबाई के प्रतीकों को स्थापित किया। 1950 के दशक में समिति ने माता अष्टभुजा को महिला सशक्तीकरण के प्रतीक के रूप में सामने रखा। 1953 में हमने 'सेविका प्रकाशन' एवं 'गृहिणी विद्यालय' (ग्रीष्म शिक्षा) एवं 'योग शिक्षण' की शुरुआत की थी। मुंबई में 'स्त्री जीवन विकास परिषद' में हमने केशव कर्वे, डॉ़ पुरंदरे, डॉ़ देशपांडे जैसे दिग्गजों को आमंत्रित किया। इन दिग्गजों के साथ वंदनीया मौसीजी ने महिलाओं को ऐसा शारीरिक प्रशिक्षण देने पर विमर्श किया जिससे उनके वैवाहिक जीवन पर असर न पड़े एवं साथ ही वह निडरता, शौर्य एवं निष्ठा के साथ भारत माता एवं हिंदू संस्कृति अर्थात् स्वदेश भक्ति में भी अपनी भूमिका निभा सकें। यही वह समय था जब समिति ने विचार दिया कि महिलाओं को जीवन रथ की कमान संभालनी चाहिए। एक कुशल चालक ही वाहन को कम समय में उसके गंतव्य तक पहुंचा सकता है। यह विचार आज के विमेन्स लिव और लैंगिक समानता के महिलावादी विचार से कहीं आगे था। 1958 का वर्ष भी समिति के लिए महत्वपूर्ण था। इस वर्ष 1857 के स्वतंत्रता संग्राम की सौवीं सालगिरह थी। इस दौरान हमने उस युद्ध की यादें दर्शाने वाली एक प्रदर्शनी आयोजित की थी। इस दौरान नासिक में पहले धर्मार्थ ट्रस्ट की नींव रखी गई जिसका नाम रानी लक्ष्मीबाई झांसी ट्रस्ट था। इसके बाद देशभर में सामुदायिक तौर पर कन्या छात्रावास, नि:शुल्क चिकित्सा शिविर आदि चलाने वाले व्यापक वर्ग तक पहुंचने के लिए 38 अन्य ट्रस्ट की भी नींव रखी गई थी। 1965 में नागपुर में देवी अहिल्याबाई स्मारक समिति की स्थापना हुई जहां से समिति का केंद्रीय कार्यालय चलता है और उस वर्ष से मैं यहीं रह रही हूं।

समिति का कार्य केवल उसके सदस्यों की संख्या बढ़ाने तक ही सीमित नहीं है, बल्कि यह इस बात पर भी निर्भर करता है कि कार्य के जरिए हम सेविकाओं को किस स्तर तक अपने साथ कर सकते हैं। अत: सफलता का मानदंड संख्या न होकर विश्वास, साथ जुड़ने की मंशा और स्नेह होता है।

मैं खुशकिस्मत थी कि वंदनीया मौसीजी के अतिरिक्त मुझे उनके बाद कार्य संभालने वाली ताई आप्टे के संपर्क में रहने का अवसर मिला। वह सौहार्द, सरलता, निष्ठा और एकजुटता का अद्भुत संगम थीं। लोकमान्य तिलक उनके पिता के मामा थे और वह भी लोकमान्य तिलक के निकट संपर्क में रह चुकी थीं। वह हिंदू मातृत्व का साक्षात उदाहरण थीं। उनके निधन के बाद संपादकीय शीर्षक था 'हमने हिंदुत्व का मातृहृदय खो दिया।'

हमारी तीसरी प्रमुख संचालिका उषाताई चाटी थीं। उनका अटूट विश्वास था कि समिति की तरक्की केवल प्रचारिकाओं की संख्या ही नहीं, बल्कि प्रचारिका की सोच रखने वाली सभी सेविकाओं पर निर्भर करती है। महिला जीवनदायिनी होती है। उसमें अपने बच्चों के साथ-साथ अपने जीवनसाथी के चरित्र को आकार एवं क्षमता प्रदान करने की शक्ति होती है। अत: यह उचित होगा कि उसे जीवन के अर्थ और उसके गंतव्य का पता हो ताकि वह नैतिक मूल्यों को समझा सके जिनके आधार पर परिवार, समाज एवं राष्ट्र का अचल चरित्र निर्मित होता है।

समय के साथ-साथ समिति में कई परिवर्तन भी आए जो बेहद सामान्य प्रक्रिया थी। पोशाक में नौ गज लंबी साड़ी की बजाय सलवार-कुर्ता का चलन शुरू हुआ। परंतु बुनियादी विचार वही रहे। आज समाज एवं राष्ट्र के सम्मुख भी अनेकानेक चुनौतियां मुंह बाए खड़ी हैं। हमें युवा पीढ़ी को उनके लिए तैयार करना होगा। इसी विचार को केंद्र में रखते हुए इस वर्ष समिति ने 'तेजस्वी भारत' थीम पर 'तरुणी सम्मेलन' की सफलतापूर्ण शुरुआत की। इसमें प्रतिभागियों को भारत की उन उपलब्धियों के बारे में बताया गया जिनका उन्हें ज्ञान नहीं था। वह इस शुरुआत से बहुत प्रभावित हुए। इस सम्मेलन का दूसरा बिंदु था 'हम हैं भारत भाग्यविधाता'। यह विचार युवाओं के दिलों में गहरे तक गया।

मैं समिति के साथ अपने सात दशक के जुड़ाव को लेकर खुद को भाग्यशाली एवं संतुष्ट महसूस करती हूं। मेरा मानना है कि अपने किसी 'पुण्य' के कारण भारत में मेरा जन्म हुआ और मैं महिला सशक्तीकरण के जरिए राष्ट्र सशक्तीकरण का काम करने वाली राष्ट्र सेविका समिति के संपर्क में आई। मेरा ऐसा अनुभव है कार्य को और अधिक गति एवं ऊर्जा देने के लिए कुछ नवीन प्रणाली विकसित की जाए। वंदे मातरम्!

-प्रमिला ताई मेढ़े

(लेखिका राष्ट्र सेविका समिति की पूर्व प्रमुख संचालिका हैं।  विराग पाचपोर से बातचीत के आधार पर) 

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