| दिंनाक: 03 Oct 2016 14:47:16 |
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भारत एक अनुपम देश है। इस देश के अद्वितीय राष्ट्र-जीवन पर दृष्टिपात करने से ज्ञात होता है कि हमारे पूर्वजों ने प्रकृति के सान्निध्य में बैठकर राष्ट्र जीवन के छोटे से छोटे तथ्य को समझकर यहां की समाज रचना का स्वरूप विकसित किया। इस विकास की अवधारणा का मूल सूर्य, चन्द्र, पृथ्वी, वायु, आकाश के साथ-साथ प्रकृति मां है। जिससे मानव ने सीखा यह समष्टि उस ईश्वरीय चैतन्य का अंश है। गीता में भी श्रीकृष्ण जी कहते हैं — मयि सर्वमिदं सूत्रे मणिगणा इव अर्थात् समस्त जीव सृष्टि, प्रकृति मेरी चिरंजीवी सत्ता से युक्त है। इसी मूल सिद्धान्त के आधार पर विकसित हुआ भारत राष्ट्र का तत्व दर्शन, जीवन-दर्शन, जीवन पद्धति, जिसकी अभिव्यक्ति हमारी संास्कृतिक सम्पदा एवं व्यवहार से होती है।
दूसरे शब्दों में हम कह सकते हैं कि सम्पूर्ण सृष्टि में मानव की विशेष योग्यता पहचान कर हमारे ऋषि-मुनियों ने प्रत्येक व्यक्ति के मन में 'स्व' स्वोपभोग या स्वार्थ के निराकरण तथा 'पर' या 'परसेवा' के भाव के विस्तारण का समग्र विचार किया है। उनका विश्वास था कि सृष्टि के सुचारु रूप से संचालन हेतु — व्यक्ति के मन में परहित का विचार ़.़. परिवार, समाज, देश, विश्व, सृष्टि, समष्टि, परमेष्टि की सीमा तक अधिकाधिक प्रबल होते जाना चाहिए। यही 'मैं' की 'हम' में व्याप्ति है। यही राष्ट्र की चिरन्तरता, अनादिता, अनन्तता का आधार है।
इस एकात्म विचार के परिप्रेक्ष्य में हमारे पूर्वजों ने समाजजीवन-रचना के अलौकिक सूत्र रचे। उन्होंने व्यक्ति को राष्ट्र की प्रथम इकाई न मानते हुए परिवार को राष्ट्र जीवन की समरसता, समुन्नतता, एवं विकास प्रक्रिया का मूल सोपान स्वीकारा। यह परिवार ही वह केन्द्र बना जहां से-उन्नत चरित्र, शिक्षा-संस्कार, राष्ट्रीयता, राष्ट्रभक्ति, आध्यात्मिकता, ईश भक्ति की अनेक वैचारिक भाव धाराएं गंगा धारा के समान फूट पड़ीं।
गृहिणी के बिना घर-परिवार की संकल्पना कठिन होती है। गृहिणी किंवा सृजन करने वाली, पोषण-संरक्षण करने वाली – राष्ट्रानुकूल दिशा देने वाली। हमारे पूर्वजों ने उसकी सृजन धर्मिता के कारण उसे मां कहा है। माँऽऽ अर्थात् ईश्वरीय गुण-व्यवहार की प्रतिनिधि़.़ सबका हित विचार करने वाली। सर्वदा अपनी वत्सलता का दान करने वाली़.़ प्रकृति सदृश अद्वितीय शक्ति वाली, कलाकार के समान तूलिका लेकर सन्तति, समाज, राष्ट्र के जीवन में शतरंगी रंगों की छटा बिखेरने वाली। इसलिए राष्ट्र सेविका समिति की आद्य संचालिका वंदनीया लक्ष्मीबाई केलकर जी कहती थीं, ''मां परिवार का केन्द्र बिन्दु है। एक जाग्रत मां जाग्रत राष्ट्र की निर्माण कर्त्री बनती है। इसका उदाहरण शिवाजी की मां जीजामाता हैं।''
राष्ट्र सेविका समिति अपने प्रारंभ काल से ही महिलाओं एवं उनके द्वारा संचालित परिवार की राष्ट्र के विकास में कैसी भूमिका है, उसे किस प्रकार निभाना है़.़ इसका जागरण करती आई है। इसका आधार नित्य शाखा, सम्मेलन, शिविर, अभियान बनते रहे। मौसीजी एक आदर्श परिवार के बारे में कहती थीं, ''जहां बच्चों को अच्छे संस्कार दिए जाते हैं, उनकी किलकारियां गूंजती हैं, बड़ों की सेवा, अतिथि सत्कार, भोजन पवित्रता से बनाना, प्रेम से खिलाना, घर के वातावरण में संस्कारक्षम दिव्यता, आनन्द का वातावरण अच्छे मित्र की संगति, धर्म संस्कृति का संरक्षण, संवर्धन, ईश आराधना, समाज एवं राष्ट्र की समुन्नति का चिन्तन होता है—वही श्रेष्ठ घर है। इसलिए मां (स्त्री) को दस भुज धारिणी दुर्गा बनना पड़ता है।''
घर अर्थात् मानव जीवन का द्वितीय पड़ाव गृहस्थाश्रम समाज धारणा का आधार है तभी तो कहा,धन्यो गृहस्थाश्रम। घर में ही व्यक्ति सीखता था धर्म क्या है? अधर्म क्या है? पाप क्या? पुण्य क्या है? क्या करना है, क्या नहीं करना है? जीवन की दिशा क्या है? अर्थात् प्रतिक्षण मां एवं घर की अन्य महिलाएं हर चेष्टा, हर साधन से देश की भावी पीढ़ी एवं परिवार के सदस्यों के मन को उस परमतत्व की जिज्ञासा से परिपूर्ण बनाते हुए़. राष्ट्र कार्य की प्रेरणा देती थीं। इसका परिणाम था भारत का नैतिक आध्यात्मिक जीवन, भोग कम त्याग अधिक, अर्थार्जन न्याय के मार्ग से परन्तु पुण्य के काम में व्यय करना। सम्पूर्ण समाज, देश, विश्व सुखी रहे इसके प्रयत्न करना। अपने मन को वसुधैव कुटुम्बकम् की संकल्पना तक विशाल बनाना।
मौसी जी का विश्वास था कि स्त्री परिवार रूपी रथ की सारथी है। अगर उसके मन में राष्ट्र जीवन के विकास में संकल्पना सुदृढ़ है तो वह निश्चित ही मार्ग निकालकर कृत संकल्प बनेगी। इसी उद्देश्य से समिति ने अपनी जीवन यात्रा के 80 वर्ष पूर्ण होने पर 11,12,13 नवम्बर, 2016 को सम्पन्न होने वाले अखिल भारतीय कार्यकर्ता प्रेरणा शिविर, नई दिल्ली में यह विषय बहनों के सामने विचारार्थ रखा है। – डॉ.शरद रेणु
(लेखिका राष्ट्रसेविका समिति की अखिल भारतीय बौद्धिक प्रमुख हैं)