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प्रदेश में जब से सपा की सरकार बनी, तभी से यह प्रचार-प्रसार हुआ कि प्रदेश में 'हेल्पलाइन' को दुरुस्त किया जाएगा। सरकार अपना कार्यकाल करीब-करीब पूरा कर चुकी है। अब यह पता चल रहा है कि 'हेल्पलाइन' के नाम पर खर्च किए गए करोड़ों रुपए का नतीजा सिफर है। प्रदेश में हुई कुछ बड़ी घटनाओं के मौके पर जब पीडि़तों ने इस हेल्पलाइन के नम्बर मिलाए तब काफी देर इनसे सम्पर्क नहीं हो पाया। वैसे इनका नवीनीकरण बहुत धूम-धड़ाके से किया गया था। इसकी कमान स्वयं मुख्यमंत्री अखिलेश यादव ने सम्भाल रखी है मगर जरूरत पड़ने पर लोगों को मदद नहीं मिल पा रही।
अखिलेश यादव इन हेल्पलाइन को लेकर गंभीर हैं, उन्होंने इन हेल्पलाइन को चुस्त-दुरुस्त करने के लिए करोड़ांे रुपए का बजट मुहैया कराया है। डायल 100 की व्यवस्था को हाई टेक करने के लिए हरेक जनपद में इनोवा जैसी आधुनिक कार भेजी गयी है। इन सभी कारों को कंट्रोल रूम से जोड़ा गया है। डायल 100 के बारे में मुख्यमंत्री का कहना है कि इसको और आधुनिक बनाया जाएगा ताकि इसमें एम्बुलेंस की सुविधा भी मुहैया कराई जा सके।
डायल 100 समेत अन्य हेल्पलाइन को कार एवं अन्य आधुनिक उपकरण दिए गए, स्वयं मुख्यमंत्री इसकी 'ब्रांडिंग' करते नजर आये। काफी प्रचार के साथ इन हेल्पलाइन नम्बरों को अखबारों में विज्ञापन के तौर पर छपवाया गया। मगर यह हेल्पलाइन किसी भी बड़े मौके पर किसी की 'हेल्प' करती नजर नहीं आ रही है।
कुछ ही समय बीता है जब बुलंदशहर राजमार्ग पर एक परिवार के सदस्यों को बंधक बनाकर, मां और बेटी के साथ बलात्कार की घटना को अंजाम दिया गया। घटना के बाद पीडि़ता के घर वाले करीब आधे घंटे तक 100 नंबर डायल करते रहे मगर वह नंबर मिलकर ही नहीं दिया। थक-हारकर पीडि़ता के घर वालों ने अपने एक मित्र को फोन करके घटना की जानकारी दी। उसके बाद उनके मित्र ने पुलिस को फोन करके बताया, तब पुलिस को यह जानकारी हुई कि इस प्रकार की गंभीर घटना को अंजाम दिया गया है।
अभी हाल ही में एक पिता अपने मासूम बच्चे को लेकर इधर-उधर भटकता रहा मगर एम्बुलेंस की व्यस्था नहीं हो पायी। एम्बुलेंस न मिल पाने के कारण बच्चे को अस्पताल नहीं ले जाया जा सका। 12 वर्ष के बच्चे ने वहीं पर दम तोड़ दिया। आरोप के मुताबिक कानपुर जनपद के हैलट अस्पताल के डॉक्टरों की लापरवाही से 12 साल के मासूम अंश की जान चली गई। डॉक्टरों ने उस मासूम को एंबुलेंस तक मुहैया नहीं करायी।
हुआ यूं कि कानपुर में सुनील कुमार अपने 12 साल के मासूम बच्चे अंश को बीमार अवस्था में हैलट अस्पताल लेकर पहुंचे थे। अंश को तेज बुखार के साथ-साथ दस्त हो रहे थे। सुनील कुमार का आरोप है कि डॉक्टरों ने उनसे अपने बच्चे का इलाज किसी निजी अस्पताल में कराने के लिए कहा। उसके बाद जब उन्होंने बच्चे को हैलट अस्पताल से दूसरे अस्पताल ले जाने के लिये एम्बुलेंस खोजनी शुरू की तो वह नहीं मिल पायी। सुनील अपने बीमार बच्चे को कंधे पर लादकर इधर-उधर लोगों से मदद की गुहार लगाते रहे मगर कोई मदद नहीं मिली। बच्चे की हालत को बिगड़ता देख पिता उसे कंधे पर लादे दूसरे अस्पताल की तरफ पैदल चल पड़ा। कुछ दूर तक बेटे को ले जाने के बाद जब उसकी हिम्मत जवाब दे गई तो बच्चे के चाचा उसे उठाकर एक निजी अस्पताल पहंुचे। पर वहां पहंुचते-पहुंचते बहुत देर हो चुकी थी, डॉक्टरों ने अंश को मृत घोषित कर दिया। पीडि़त पिता के मुताबिक उस निजी अस्पताल के डाक्टरों ने कहा कि अगर वे कुछ देर पहले आ जाते तो अंश की जान बच सकती थी।
मामला बढ़ने पर हैलेट अस्पताल की तरफ से यह बयान जारी हुआ कि ''बच्चे की मौत उससे पहले हो चुकी थी, जब उसके पिता उसे लेकर अस्पताल पहुंचे थे। उसके दिल की धड़कन नहीं थी, नब्ज नहीं चल रही थी, आंखों की पुतलियां फैल चुकी थीं। बच्चे की मौत हैलट अस्पताल लाए जाने से दो-तीन घंटे पहले ही हो चुकी थी।'' उधर पीडि़त पिता का कहना है कि जब वह अपने बेटे को लेकर निजी अस्पताल पहुंचा तो वहां के डॉक्टर ने कहा कि देर कर दी। दस मिनट पहले आते तो बच्चा बच जाता। इस घटना को कुछ ही दिन बीते थे कि मिर्जापुर जनपद में एक 70 साल के बुजुर्ग कपूर चन्द्र पाण्डेय को अपनी गर्भवती बहू अंशू पाण्डेय को कंधे पर लेकर अस्पताल के चक्कर लगाने पडे़ मगर उन्हें कोई एम्बुलेंस नहीं मिल पायी। एम्बुलेंस न मिल पाने और इलाज में देरी के कारण उस महिला और बच्चे-दोनों की मौत हो गयी।
विगत 14 सितंबर को गोंडा जनपद में शिवपूजन अपने 4 वर्षीय बेटे सत्यम को लेकर सरकारी अस्पताल में इलाज कराने पहंुचे। उसे तेज बुखार था। पर कुछ देर बाद सत्यम की मृत्यु हो गयी। अस्पताल में जैसे ही बच्चे की मौत की खबर फैली, वहां खड़ी एम्बुलेंस का चालक एम्बुलेंस को लेकर भाग गया। लाचार पिता अपने बेटे के शव को लेकर इधर-उधर भटकता रहा। कुछ देर बाद स्थानीय लोगों ने चन्दा करके एक रिक्शे से उसके बेटे के शव को घर भिजवाया।
वैसे तो उत्तर प्रदेश पुलिस ने हेल्पलाइन का काफी विस्तार किया है। पुलिस की वेबसाइट पर कई हेल्पलाइन और मोबाइल ऐप डाउनलोड करने का विकल्प भी है। पुलिस की वेबसाइट पर महिला सम्मान प्रकोष्ठ के लिए पुलिस का सरकारी नंबर 9454401149 जारी किया गया है। कंट्रोल रूम के लिए 100, फायर ब्रिगेड के लिए 101, एम्बुलेंस के लिए 108, रेलवे हेल्पलाइन के लिए 1512 और चाइल्ड हेल्पलाइन के लिए 1098 नंबर जारी किए गए हैं।
महिला हेल्पलाइन के लिए 1090 जारी किया गया है। खास बात यह है कि महिला हेल्पलाइन लिखने के बाद 'हेल्प' को काट कर 'पावर' लिखा गया है। यानी यह बताने की कोशिश की गई है कि 1090 महिला हेल्पलाइन के बजाए महिला 'पावरलाइन' है। मगर ये सारे दावे किताबी हैं। राज्य में महिलाओं के विरुद्ध अपराधों में इजाफा हो रहा है तो अस्पतालों में बीमारों को एम्बुलेंस सेवाएं नहीं मिल पा रही हैं।
विडंबना ही है कि ओडिशा के कालाहांडी के दानामांझी का तो एक ही मामला था पर यूपी में तो विभिन्न जनपदों में हाशिए पर जी रहे गरीब एवं असहाय लोग अपने परिवारीजनों, स्त्रियों एवं बच्चों के इलाज के दर-बदर भटकने को मजबूर हैं। उधर सरकार और पुलिस एवं स्वास्थ्य विभाग व्यवस्था के चुस्त-दुरुस्त होने का दावा करते नहीं थक रहे। पर वस्तु स्थिति कुछ और ही है। लगता है कि प्रदेश की स्वास्थ्य मशीनरी को लकवा मार गया है। उसे खुद इलाज की जरूरत है, वह जनता का इलाज क्या करेगी।
-सुनील राय











