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राजनीति में नैतिकता बनाम अनैतिकता की राजनीति

Written byArchiveArchive
Sep 19, 2016, 12:00 am IST
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दिंनाक: 19 Sep 2016 15:01:05

आजकल राजनीति से नैतिकता गायब होती जा रही है। अनैतिकता की राजनीति को मीडिया के माध्यम से स्थापित करने का प्रयास किया जा रहा है। यह तो राजनीति और पत्रकारिता दोनों का बलात्कार है। कम-से-कम भारतीय समाज तो इसका समर्थन नहीं करेगा।   

यह मामला इतना तूल नहीं पकड़ता यदि इस दुष्कर्म को उचित ठहराने का प्रयास नहीं होता। इस राजनीतिक समूह के समर्थक तर्क देते हुए दिखते हैं कि आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाना निजी विषय तो है ही अपितु स्वीकार्य भी है। आखिर ये लोग भारतीय समाज को किस तरह का विमर्श और दिशा देना चाह रहे हैं? विवाहित होकर भी अन्य स्त्रियों से संबंध बनाना क्या सदाचार है? क्या ऐसा आचरण अपनी पत्नी से बेईमानी नहीं है? क्या यह चारित्रिक भ्रष्टाचार नहीं है?

प्रो़ बृज किशोर कुठियाला

राजनीति में नैतिकता की जरूरत पर तो निरंतर सामाजिक विमर्श होता ही है, परन्तु नैतिकता की राजनीति का एक नया अध्याय प्रारंभ कर दिया है, एक ऐसे व्यक्ति ने जो पत्रकार से विधिवत राजनीतिज्ञ बन चुका है। उसने अपने ही सहयोगियों के दुष्कर्म को तर्क-कुतर्क से सही ठहराने का प्रयास किया है। किस्सा दिल्ली के एक मंत्री के यौन अनाचार के वीडियो और फोटो वायरल होने से प्रारंभ हुआ। मंत्री की सीडी किसी ब्लू फिल्म से कम नहीं है। संबंधित महिला का कहना है कि नशीला पदार्थ पिलाकर उससे बलात्कार किया गया। साधारण समझ का कोई भी मनुष्य मंत्री के इस कार्य को अनुचित ही मानेगा। सार्वजनिक जीवन में तो शुचिता की अपेक्षा रहती ही है, परन्तु इस तरह के कृत्य में कोई साधारण व्यक्ति भी लिप्त होता, तब उसे भी अनुचित ही माना जाता। इस बात को स्पष्ट तौर पर समझना चाहिए कि शारीरिक संबंधों की स्वच्छंदता किसी भी काल, स्थान और समाज में न उचित मानी गई है और न ही भविष्य में उसका समर्थन होने की कोई संभावना है। तथाकथित विकसित पाश्चात्य समाज में भी ऐसे अनेक उदाहरण हैं, जब पर-स्त्री से संबंध उजागर होने पर राजनेताओं को समाज ने दुत्कारा है। इस विषय के नकारात्मक परिणाम और भी गंभीर हो जाते हैं, जब आरोपी मंत्री उस राजनीतिक दल का सदस्य हो, जिसने यह सार्वजनिक घोषणा की है कि उसके सभी कार्यकर्ताओं के चरित्र की जांच की जा चुकी है।
प्रचलित मान्यताओं का उल्लंघन कर शारीरिक संबंध बनाना हर समाज में अनपेक्षित और निन्दनीय है। तर्क दिया जाता है कि पश्चिम के तथाकथित विकसित समाज में स्त्री-पुरुष संबंधों में स्वच्छंदता उनके उन्नत होने का सूचक है। परन्तु यहां भी सामाजिक कायार्ें को समर्पित और विशेषकर राजनीति में सक्रिय व्यक्तियों का स्वच्छंद होना समाज को स्वीकार्य नहीं है। सार्वजनिक जीवन में आए व्यक्तियों का सद्चरित्र होना न केवल अपेक्षित है, बल्कि अनिवार्य भी है। 1980 के दशक में अमेरिका के एक संभावित राष्ट्रपति को उसकी महिला मित्र के साथ रंगे हाथों पकड़ा गया। अमेरिका जैसे देश, जहां शारीरिक संबंधों की स्वतंत्रता, स्वच्छंदता तक पहुंच चुकी है, वहां भी इस व्यक्ति का राजनीतिक जीवन इस घटना के कारण समाप्त हो गया। फ्रांस के एक पूर्व राष्ट्रपति और अमेरिका के ही एक पूर्व राष्ट्रपति के ऐसे संबंधों का जिक्र होने से समाज में रोष एवं क्रोध उत्पन्न हुआ ही था। ये घटनाएं राजनीतिक और सामाजिक बहसों का हिस्सा बनी थीं। विमर्श का निष्कर्ष था कि राजनेताओं का इस तरह का आचरण समाज को भ्रष्ट बनाता है।
मानव समाज में स्त्री-पुरुष को वैवाहिक सूत्र में बांधने से जो परिवार रूपी सामाजिक रचना बनती है, वह रचना ही समाज के भौतिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक उत्थान की इकाई है। वैवाहिक संबंधों की सीमाओं को तोड़ना अर्थात् सामाजिक मर्यादा का उल्लंघन करना है। इसलिए हर प्रकार के स्त्री-पुरुष संबंधों की स्पष्ट रूप से व्याख्या की गई है। भारतीय संयुक्त परिवार की रचना विश्व की सर्वश्रेष्ठ उपयोगी और व्यावहारिक रचनाओं में मानी जाती है। पश्चिम की संस्कृति में इस विषय में थोड़ा ढीलापन हो सकता है, परन्तु वहां भी सार्वजनिक जीवन में चरित्रहीन होना अपेक्षित नहीं है, लगभग अपराध ही माना जाता है।
यह मामला इतना तूल नहीं पकड़ता यदि इस दुष्कर्म को उचित ठहराने का प्रयास नहीं होता। इस राजनीतिक समूह के समर्थक तर्क देते हुए दिखते हैं कि आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाना निजी विषय तो है ही अपितु स्वीकार्य भी है। आखिर ये लोग भारतीय समाज को किस तरह का विमर्श और दिशा देना चाह रहे हैं? विवाहित होकर भी अन्य स्त्रियों से संबंध बनाना क्या सदाचार है? क्या इस तरह का आचरण अपनी पत्नी से बेईमानी नहीं है? क्या यह चारित्रिक भ्रष्टाचार नहीं है? कल्पना कीजिए कि इन्हीं महानुभाव की प्रतिक्रिया क्या होती यदि इस काण्ड में भारतीय जनता पार्टी या कांग्रेस के कोई मंत्री आरोपित होते। अनेक  उदाहरण हैं जब राजनेताओं के अनैतिक संबंधों के दोषी होने का प्रचार हुआ, लेकिन उनके किसी भी समर्थक ने राजनेताओं के अनैतिक कार्य को उचित नहीं ठहराया। नैतिकता तो शुद्ध आचरण का ही नाम है। इसको व्यक्ति के आधार पर जांचा नहीं जा सकता।

वर्ष 2001 में एक वेबसाइट ने रहस्योद्घाटन किया था, जिसमें सुरक्षा बल के वरिष्ठ अधिकारियों पर अनैतिक शारीरिक संबंधों का दोष लगाया गया था। बाद में एक प्रमुख समाचार पत्र ने खुलासा किया कि वेबसाइट के कर्ताधर्ताओं ने व्यावसायिक महिलाओं का उपयोग कर इन अधिकारियों को फंसाया था। आज उसी वेबसाइट के प्रमुख मीडियाकर्मी स्वयं अनैतिक चरित्र के लिए आरोपित किए गए हैं और जेल में भी रह चुके हैं। भारतीय समाज सामाजिक जीवन में दुराचार को कभी भी स्वीकार नहीं कर सकता। वास्तव में भारत की मानसिकता तो दुराचार को अपराध ही नहीं वरन पाप मानती है।
हालिया घटनाक्रम ने राजनीति में नैतिकता की आवश्यकता की बहस को नैतिकता की राजनीति तक पहुंचा ही दिया, परन्तु एक बड़ा प्रश्न और खड़ा कर दिया कि पत्रकारिता में भी क्या नैतिकता उपस्थित है? पत्रकारिता के पास संप्रेषण का एक अतिरिक्त अधिकार एवं शक्ति रहती है। स्थापित पत्रकार का प्रभाव क्षेत्र तो और भी अधिक व्यापक एवं असरदार होता है। निष्पक्षता एवं तथ्यपरकता, पत्रकारिता का मूल सिद्घान्त है। मानो यही पत्रकारिता की आत्मा हो। परन्तु जब पत्रकारिता अपने व्यक्तिगत संबंधों एवं धारणाओं के आधार पर अनैतिक संप्रेषण करती है, तब पत्रकारिता की मर्यादा का उल्लंघन होता है। एक आम व्यक्ति भी जब किसी यौन संबंधी दुराचार में लिप्त पाया जाता है तब समस्त पत्रकारिता उसकी निन्दा करती है। उसका विरोध करती दिखती है। परन्तु एक व्यक्ति विशेष या दल विशेष के सदस्य के उसी तरह के कृत्य को उचित ठहराने का प्रयास पत्रकारिता की दृष्टि में अनैतिक तो है ही, बल्कि अपराध एवं पाप भी है। पत्रकारों का यही वर्ग 'कास्टिंग काउच' (फिल्म उद्योग में नई महिला कलाकारों का काम दिलाने के बहाने दैहिक शोषण) के विरोध में आसमान सिर पर उठा लेता है। सैनिक अधिकारियों के तथाकथित अनाचार को भी वे बुलंद आवाज में आपराधिक कृत्य घोषित करते हैं। परन्तु किस कलम से वे वर्तमान दुराचारी को निदार्ेष घोषित कर रहे हैं?
किसी को दुराचार के समर्थन में इस प्रकार का अनर्गल प्रचार-प्रसार करने का अधिकार  नहीं है। एक ओर तो पूरी सामाजिक व्यवस्था राजनीति के शुद्धिकरण की प्रक्रिया में नैतिकता का प्रवेश कराने में लगी है, दूसरी ओर एक छोटा वर्ग नैतिकता पर ही राजनीति करने पर उतारू है। करेला नीम पर तब चढ़ जाता है जब अनैतिकता की राजनीति को मीडिया के माध्यम से स्थापित करने का प्रयास किया जाता है। यह तो राजनीति और पत्रकारिता दोनों का बलात्कार है। कम-से-कम भारतीय समाज तो इसका समर्थन नहीं करेगा। भरतीय समाज के जीवंत होने का एक बड़ा प्रमाण यह है कि ऐसे राजनेता बने पत्रकार को उनके अपने दल ने भी नकारा है। भारतीय समाज की यही जिजीविषा सामाजिक मर्यादाओं को बनाए रखने में लगातार सफल सिद्ध होती रही है।
(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता  एवं जनसंचार विश्वविद्यालय, भोपाल के कुलपति हैं) 

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