गोवा विवाद और साध्य-साधन विवेक!
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गोवा विवाद और साध्य-साधन विवेक!

Written byArchiveArchive
Sep 19, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 19 Sep 2016 11:42:33

किसी विषय के लिए चरम को छूता आग्रह करते हुए और अस्मिता के स्वयं निर्मित अहंकार के मायाजाल में कार्यकर्ताओं को अपनी मर्यादा तथा जिम्मेदारी का ख्याल अवश्य रखना चाहिए। हमने जो जीवननिष्ठा स्वीकार की है तात्कालिक विषय का बल उससे अधिक नहीं होना चाहिए। यह जब ध्यान में नहीं रहता तब यह भान भी समाप्त हो जाता है। साध्य क्या है और अपना साधन क्या है इसका विवेक अवश्य रहना चाहिए। साधन साध्य से अधिक आग्रही नहीं होना चाहिए और चरम पर नहीं पहुंचना चाहिए

दिलीप धारुरकर
गोंवा के ताजा घटनाक्रम से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ पुनश्च प्रसार माध्यमों के लिए चर्चा का केन्द्र बना है। संघ के गोवा विभाग के संघचालक श्री सुभाष वेलिंगकर को उनके पद एवं जिम्मेदारी से मुक्त किया जाता है, ऐसा निर्णय कोंकण प्रांत के संघचालक जी ने एक पत्रक के माध्यम से बताया। किसी संघचालक पर इस प्रकार से कार्रवाई करने की नौबत आना यह संघ के स्वयंसेवक और संघ को बाहर से देखने वाले सभी के लिए एक अनपेक्षित घटना थी। संघ में ऐसे निर्णय लेने के पूर्व सभी संबंधित पक्षों से संवाद करने की पद्धति है। लेकिन अगर मूल आस्था और धारणा को ही हानि पहुंचती हो तो ऐसे अप्रिय निर्णय लेने पड़ते हैं। संघ द्वारा यह निर्णय लेते ही प्रसार माध्यमों ने इस विषय को तूल दिया। कहा गया कि इस निर्णय से गोवा के नाराज स्वयंसेवकों ने अलग 'राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गोवा प्रांत' की स्थापना करने की घोषणा की। उन्होंने यह भी कहा कि हमारा अब कोंकण प्रांत से कोई भी संबंध नहीं। समाचार पत्रों ने ऐसे भी समाचार प्रकाशित किये कि वेलिंगकर जी के समर्थन में चार सौ से अधिक स्वयंसेवकों ने त्यागपत्र दिया।
गोवा में वास्तव में क्या हुआ? संघचालक महोदय के ही ऐसे कौन से मतभेद हो गए? घटनाक्रम ऐसा टूटने के कगार तक क्यों चला गया? संघ का उद्देश्य इस राष्ट्र को संगठित करना और परम वैभव तक ले जाना है। इस उद्देश्य को सदा स्मरण रखकर संघ के स्वयंसेवक अपने-अपने कार्य क्षेत्र में कार्य करते हैं। संघ उनके लिए एक जीवन निष्ठा है।
जैसे, किसी परिवार में अलग-अलग सदस्य अपने-अपने काम करते हैं, पर अपने परिवार में अपनी भूमिका निभाते समय कुटुंब के सदस्य के नाते उनमें जो परस्पर स्नेह, प्रेम, निष्ठा होती है, वह कम नहीं होती। कुटुंब में भी एकाध विषय पर मतभेद होते रहते हैं। एक दूसरे पर क्षोभ भी होता है। लेकिन, परस्पर संबंध या फिर कुटुंब टूट नहीं जाते। उस तरह से आदर्श परिवार का टूटना अपेक्षित भी नहीं होता। उसी तरह से संघ के स्वयंसेवकों के विभिन्न क्षेत्रों में काम करते हुए, दो अलग-अलग क्षेत्रों के कार्यकर्ताओं में कभी-कभार तात्कालिक कठिनाइयों और विरोधाभास के कारण मतभेद निर्माण हो सकते हैं। पर ऐसे मतभेदों को चर्चा, संवाद और समन्वय के द्वारा हल किये जाने की अपेक्षा रहती है। गोवा के मतभेद भी इसी तरह उत्पन्न हुए। गोवा में अंग्रेजी माध्यम के स्कूलों को सरकारी अनुदान नहीं दिया जाए, इसके लिए भारतीय भाषा सुरक्षा मंच पहले से आंदोलन करता रहा है। उस समय भारतीय जनता पार्टी भी उस आंदोलन में मंच के साथ थी। उसके बाद विधानसभा चुनाव के प्रचार अभियान में भी भाजपा ने अंग्रेजी माध्यम वाले स्कूलों को सरकारी अनुदान नहीं दिया जाएगा, ऐसा आश्वासन दिया था। अंग्रेजी स्कूलों को पूर्व की सरकारों ने अनुदान दिया था। कोंकणी तथा मराठी माध्यम के विद्यालयों को अनुदान नहीं था। प्राथमिक शिक्षा का माध्यम मातृभाषा में हो यह सर्वमान्य विचार  है। संघ की भी यही भूमिका रही है।
गोवा के विभाग संघचालक सुभाष वेलिंगकर शिक्षा के क्षेत्र में ही काम कर रहे हैं। अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों को अनुदान मिलना बंद हो, इस विषय को लेकर भाजपा ने भी भाषा सुरक्षा मंच के साथ आंदोलन किया था। पर बाद में जब भाजपा सत्तासीन हुई तब इसपर सरकार ने अमल नहीं किया। संघ के स्वयंसेवकों के बनाये भारतीय भाषा सुरक्षा मंच को गोवा में कोंकणी तथा मराठी माध्यम ने शिक्षा को प्रोत्साहन के लिए अपना आग्रह चालू रखना था, वह ठीक ही था।

संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य ने एक पत्र के माध्यम से स्पष्ट किया कि संघ की कोई इकाई स्वयंसेवक को प्रांत से अलग नहीं कर सकती, इसलिए संघ का गोवा विभाग संघ के कोंकण प्रांत के ही एक विभाग के रूप में कार्य करेगा। यह संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी का निर्णय है। यह निर्णय दुनिया के किसी भी हिस्से के हरेक स्वयंसेवक के मन के भाव व्यक्त करने वाला निर्णय है।

जब अपने ही लोगों की ओर से अपेक्षित कृति नहीं होती है तब उसके क्रियान्वयन में क्या अड़चनें हैं, समस्याएं हैं, यह सामंजस्य से समझकर समन्वय निर्माण करने की अपेक्षा रहती है। दूसरी ओर, राजनीति में सत्ता में कार्यरत लोगों को भी जिन विचारों की प्रेरणा से वे राजनीति में आए हैं, उन विचारों को और अपनी वैचारिक पहचान को ध्यान में रखते हुए उस वैचारिक आंदोलन को अपेक्षित परिणाम अपने कार्य क्षेत्र के निर्णयों, कार्यान्वयन और कार्य पद्धति में दिखे, इसके लिए ध्यानपूर्वक कोशिश करनी चाहिए। कम से कम चुनाव के दौरान अपनी वैचारिक भूमिका के अनुरूप विषयों से संबंधित जो नीतिगत आश्वासन दिये उनको किया जाना चाहिए। आग्रह के बावजूद जब उस दिशा में प्रयत्न नहीं होते तब उसके कारण उत्पन्न होने वाली विफलता, निराशा और नाराजगी भी बड़ी हो जाती है। और सत्ता में बैठे लोगों पर अपने ही कार्यकर्ताओं के क्षोभ का सामना करने की नौबत आन पड़ती है। लगता है कि गोवा में ऐसा ही कुछ हुआ। लेकिन किसी विषय के लिए चरम को छूता आग्रह करते हुए और अस्मिता के स्वयं निर्मित अहंकार के मायाजाल में कार्यकर्ताओं को अपनी मर्यादा तथा जिम्मेदारी का ख्याल अवश्य रखना चाहिए। हमने जो जीवननिष्ठा स्वीकार की है, यह तात्कालिक विषय बल उससे अधिक नहीं होना चाहिए। यह जब ध्यान में नहीं रहता तब यह भान भी समाप्त हो जाता है। साध्य क्या है और अपना साधन क्या है इसका विवेक अवश्य रहना चाहिए। साधन साध्य से अधिक आग्रही नहीं होना चाहिए और चरम पर नहीं पहुंचना चाहिए। भारतीय भाषाओं का आग्रह, गोरक्षण का आग्रह, स्वदेशी का आग्रह ये सब ऐसे विषय हैं कि जिसके लिए समाज की मनोभूमिका धीरे-धीरे तैयार करके समाज का दबाव लाकर उनको गति देनी पड़ती है। ये सारे विषय जैसे समाज जीवन के दैनंदिन जीवन के विषय हैं, वैसे ही जीवन व्यवहार के जरिए विचारों का संस्कार देने वाले भी हैं। विचारों को संस्कार देना, उसके साथ आंदोलन में सहभागी होना और परम वैभव के अंतिम लक्ष्य की ओर अग्रसर होने का मार्ग प्रशस्त करना- यह इसका मूल प्रयोजन है। लेकिन, इस विषय का महत्व ध्यान में आ गया है इसलिए उसके प्रति अत्यधिक आग्रह की भूमिका लेते समय मूल जीवननिष्ठा, अनुशासन, मर्यादित आचरण, संगठनात्मक मर्यादाओं की चौखट हम तोड़ देंगे ऐसा अगर कोई करने लगे तो वह श्रेयस्कर नहीं है। भारतीय भाषा सुरक्षा मंच की मांगें और आग्रह रत्तीभर भी गलत नहीं हैं पर इसको अपने ही लोगों के सामने रखते हुए उनकी भी कुछ मर्यादाएं, मुश्किलें हो सकती हैं, इस पर भरोसा करना चाहिए। पर वह विश्वास दिखाना तो दूर रहा, इस विषय के लिए हम राजनीतिक क्षेत्र में कूद रहे हैं और इसके लिए एक राजनीतिक दल की स्थापना कर रहे हैं ऐसी भूमिका इस भारतीय भाषा सुरक्षा मंच ने वेलिंगकर की मौजूदगी में ली। जब अपने मन के अनुरूप, अपने आग्रह के अनुसार घटित नहीं होता तब अपनी परीक्षा है, ये समझना जरूरी होता है। संघचालक के पद से हटकर इस तरह के आंदोलन करने में कोई हर्ज नहीं लेकिन संघचालक पद की जवाबदारी निभाते हुए ये उचित नहीं है। संघ की यह परंपरा भी नहीं है।
संघचालक पद की गरिमा का वर्णन नगर जिला के ग्रामांचल से आए एक स्वयंसेवक ने किया था। उसने कहा, 'माता जिस प्रकार अपने सब बच्चों की देखभाल करती हैं वैसे ही संघचालक भी सबको समझकर संभाल लेते हैं।' संघचालक की भूमिका का इससे अच्छा वर्णन नहीं हो सकता। इस पृष्ठभूमि में गोवा के संघचालक का राजनीतिक पार्टी की हिमायत करना सबको समझने और संभाल लेने की उनकी भूमिका के एकदम विपरीत था। इसलिए विभाग संघचालक को उनके दायित्व से मुक्त करने का निर्णय कोंकण प्रांत के संघचालक को घोषित करना पड़ा। यह घोषणा करते समय भारतीय भाषा सुरक्षा मंच के बारे में संघ की भूमिका भी उन्होंने स्पष्ट की। भारतीय भाषाओं का संवर्द्धन और भारतीय भाषा में ही प्राथमिक शिक्षा का आग्रह— यह संघ की भूमिका है। यह भी उन्होंने स्पष्ट किया। ऐसे प्रयत्नों को संघ का समर्थन है, इसकी घोषणा भी उन्होंने की। मगर इसके बाद भी इन लोगों ने गोवा प्रांत संघ की स्थापना करने का निर्णय जाहिर किया और कोंकण प्रांत से संबंध विच्छेद कर लिया। उस प्रकार एक पत्रक भी प्रकाशित किया। संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार जी के जीवन का अनुशीलन किया जाए तो किसी भी स्वयंसेवक को उसके जीवन के प्रश्नों के उत्तर मिल सकते हैं। कोंकणी और मराठी भाषा का आग्रह रखते हुए वेलिंगकर को अगर वह विषय तात्कालिक रूप से संघ के व्यापक उद्देश्य से भी अधिक तीव्रता का, महत्व का लगता होगा तो उसके लिए भी उनके सामने एक उपाय था। डॉ. हेडगेवार जब सरसंघचालक थे तब जंगल सत्याग्रह करना उन्हें महत्वपूर्ण लगा लेकिन उसके लिए उन्होंने संघ कार्य को दाव पर नहीं चढ़ा दिया या वह विषय संघ पर थोपा भी नहीं। ऐसा करने से पूर्व उन्होंने अपना दायित्व डॉ. ल.वा. परांजपे को सौंप दिया था और फिर जंगल सत्याग्रह में शामिल हुए थे। 

मराठी-कोंकणी का विषय अगर बहुत महत्व का लगता था तो वेलिंगकर (ऊपर) अपने पद से हटकर इस आंदोलन को उनको जो मार्ग सुविधा का लगता उससे चला सकते थे। लेकिन संघचालक पद के दायित्व से मुक्त हुए बिना उन्होंने सीधे राजनीतिक पार्टी की स्थापना की घोषणा कर दी। संघ द्वारा उन्हें दायित्व से मुक्त किये जाने के बाद भी उन्होंने गोवा प्रांत के नाम से एक अलग संघ स्थापित करने की घोषणा कर डाली। इतना ही नहीं, चार सौ स्वयंसेवकों ने उनके समर्थन में त्यागपत्र दिया ऐसे समाचार भी प्रसारित किये गये।

डॉ. हेडगेवार जब सरसंघचालक थे जब जंगल सत्याग्रह करना उन्हें महत्वपूर्ण लगा लेकिन उसके लिए उन्होंने संघ कार्य को दाव पर नहीं चढ़ा दिया या वह विषय संघ पर थोपा भी नहीं। ऐसा करने से पूर्व उन्होंने अपना दायित्व डॉ. ल.वा. परांजपे को सौंप दिया था और फिर जंगल सत्याग्रह में शामिल हुए थे।

मुझे एक स्वयंसेवक ने वॉट्सअप पर डॉ. हेडगेवार का वह पत्र भेजा है जिसमें उन्होंने ऐसे प्रसंग के बारे में बहुत ही मार्गदर्शक अभिमत व्यक्त किया है। 1 फरवरी, 1936 को लिखे अपने इस पत्र में डॉ. हेडगेवार कहते हैं, 'यहां की परिस्थिति को देखते हुए चिंता हो रही है। प्रस्तुत आंदोलन के कारण संघ को किसी प्रकार की हानि नहीं पहुंचनी चाहिए इसका अर्थ कोई यह कदापि नहीं लगाए कि संघ इस आंदोलन के विरुद्ध है। परंतु संघकार्य भी राष्ट्र कार्य है और उसे चालू रखना यह प्रत्येक स्वयंसेवक का कर्तव्य है। हमने आपको पहले भी सूचित किया था कि जिन जिन को इस आंदोलन में हिस्सा लेना है उन्हें व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर संघचालक की अनुमति से इसमें सहभागी होना चाहिए। लेकिन जो संघ के आधार स्तंभ (पदाधिकारी) हैं उनपर संघ को चलाने की जिम्मेदारी है। संघ जानता है कि इस आंदोलन के कारण देश में जागृति आएगी और जागृति आए, इसलिए संघ इसको सहकार्य करेगा, विरोध नहीं। फिर संघ के अस्तित्व को धोखा पहुंचाकर मदद करनी चाहिए ऐसा संघ को नहीं लगता और वैसा होना भी नहीं चाहिए। संघ पर इस कारण कार्यकर्ता का आरोप करना व्यर्थ है। संघ का हरेक स्वयंसेवक स्वाभिमानी है और किसी प्रकार का अपमान स्वीकार नहीं कर सकता। इसलिए इस आंदोलन से पूरी तरह जुड़ना ठीक नहीं होगा। किसी से विवाद करने में कोई अर्थ नहीं। हम अपना काम ठीक से करें और जहां तक संभव हो सके इस आंदोलन की सहायता करें। जहां आवश्यकता हो वहां हम जुड़ें। इस आंदोलन से जो जनजागृति आई है उसका उपयोग समाज संगठन के अपने कार्य के लिए करना है।'
डॉ. हेडगेवार जी के इस पत्र का वाचन और अनुशीलन किया गया होता तो गोवा में जिस प्रकार के सवाल आज खड़े हुए हैं वैसे प्रश्न निर्मित ही नहीं होते। मराठी-कोंकणी का विषय अगर बहुत महत्व का लगता था तो वेलिंगकर अपने पद से हटकर इस आंदोलन को उनको जो मार्ग सुविधा का लगता उससे चला सकते थे। लेकिन संघचालक पद के दायित्व से मुक्त हुए बिना उन्होंने सीधे राजनीतिक पार्टी की स्थापना की घोषणा कर दी। संघ द्वारा उन्हें दायित्व से मुक्त किये जाने के बाद भी उन्होंने गोवा प्रांत के नाम से एक अलग संघ स्थापित करने की घोषणा कर डाली। इतना ही नहीं, चार सौ स्वयंसेवकों ने उनके समर्थन में त्यागपत्र दिया ऐसे समाचार भी प्रसारित किये गये।  इस पर सोशल मीडिया पर एक बहुत बढि़या प्रतिक्रिया जतायी गयी। एक ने पूछा कि चार सौ में से कोई एक भी यह बताये कि उसके पास संघ की सदस्यता लेने का प्रमाणपत्र है? संघ का स्वयंसेवकत्व यह रजिस्टर में दर्ज करने या कोई प्रमाणपत्र मिलने से नहीं होता। वह तो मन से स्वीकारने की बात है उसे कोई छीन भी नहीं सकता, न ही उसे कोई छोड़ सकता है। इस पृष्ठभूमि में संघ से इस्तीफे की खबरें केवल स्टंटबाजी ही हैं। इस अर्थ में संघ ने वेलिंगकर को सिर्फ गोवा विभाग संघचालक पद से मुक्त किया, वे स्वयंसेवक तो हैं ही।इसलिए संघ के अखिल भारतीय प्रचार प्रमुख डॉ. मनमोहन वैद्य ने एक पत्र के माध्यम से स्पष्ट किया कि संघ की कोई इकाई स्वयंसेवक को प्रांत से अलग नहीं कर सकती इसलिए संघ का गोवा विभाग ये संघ के कोंकण प्रांत के ही एक विभाग के रूप में कार्य करेगा। यह संघ की केन्द्रीय कार्यकारिणी का निर्णय है। यह निर्णय दुनिया के किसी भी हिस्से के हरेक स्वयंसेवक के मन के भाव व्यक्त करने वाला निर्णय है। संघ की रचना, रीति-नीति, अनुशासन तोड़कर केवल जिद के लिए, जैसा मन को रुचे वैसा ढांचा स्वयं खड़ा कर लेने की कार्रवाई उन लोगों को कभी स्वीकार नहीं हो सकती जिन्होंने संघ को जीवननिष्ठा के रूप में स्वीकार किया है। संघ जैसे अति विशाल संगठन में व्यक्तिगत आकांक्षा, आग्रह के कारण मतभेद पैदा होने और संघ से अलग होने की गोवा जैसी घटनाएं पहले कभी हुई नहीं, ऐसा नहीं है। ऐसे प्रसंग तो हुए हैं लेकिन ऐसी समस्याएं समाचारपत्रों के द्वारा नहीं सुलझाई जातीं। वैसी संघ की कार्यपद्धति भी नहीं है। समन्वय से, नम्रता से विद्रोह का शमन करेंगे ये समाज में और संघ-अंतर्गत विद्रोह में संघ की स्थायी भूमिका रही है। तात्कालिक समस्याओं का समाधान पानी की सतह की उथल-पुथल जैसा है। उन तरंगों के शांत होने पर जैसे साफ तलहटी नजर आती है। उसी तरह स्वयंसेवक का संवेदनशील मनुष्य का शुद्ध मन भी प्रकट होता है और सारे वाद मिट जाते हैं, प्रश्न सुलझ जाते हैं। वैसा होने तक संयम रखने की जरूरत है।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनके द्वारा मराठी में लिखे गए इस लेख का अनुवाद विराग पाचपोर द्वारा किया गया है)     

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