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अदालतों में वादों के शीघ्र निपटान की मांग लंबे अरसे से बनी हुई है। वर्तमान सरकार ने संदर्भ से बाहर हो चुके कानूनों को हटाने की बात की है। इसके साथ ही देश की अदालतों में मामलों को निपटाए जाने की समयावधि भी तय होनी चाहिए
विकास महाजन
आज देश की विभिन्न अदालतों में करीब 30 लाख मामले लंबित हैं और किसी भी विवाद को निपटाने में अदालतें औसतन 15 साल का लंबा समय लेती रही हैं। साफ है कि हमारी न्यायिक प्रणाली बहुत दोषपूर्ण है। कानून व्यवस्था के सामने सबसे बड़ी चुनौती है न्याय दिलाने में होने वाले विलंब को दूर करना। मामलों के निपटारे में अत्यधिक देरी से न्याय की आस में अदालत के दरवाजे पर टिकी आंखों में हताशा छाने लगती है, साथ ही कानून व्यवस्था भी उपयुक्त और प्रभावी न्याय करने से पिछड़ जाती है। अदालती कार्रवाई में लंबा समय खर्च होने से कई मामलों में न्याय नहीं मिल पाता, क्योंाकि समय बीतने के साथ उस मुद्दे की प्रासंगिकता ही खत्म हो जाती है।
आम आदमी चाहता है कि उसे शीघ्र न्याय मिले और उसकी जेब पर बोझ न पड़े, पर वास्तविकता इसके उलट होती है। वह जिंदगीभर अदालतों के चक्कर काटने की बजाय कानून अपने हाथ में लेने के लिए बेचैन होने लगता है। जाहिर है, आम आदमी कानून की बारीकियों, विस्तार, तकनीकियों और संविधान से ज्यादा परिचित नहीं है, फिर भी उसकी सहज बुद्धि उन पहलुओं को आसानी से खंगाल लेती है जिन्हें पढ़ने में अक्सर विशेषज्ञ भी चूक जाते हैं। मिसाल के लिए, यह जगजाहिर है कि अदालती मामलों में चक्कर काटने पड़ते हैं और पैसा पानी की तरह खर्च होता है। जितनी देरी होती है, खर्च उतना ही बढ़ता जाता है। ऐसे में कुछ सवाल हैं जो निश्चित ही आम आदमी के मन में मथते रहते हैं। जैसे, अब तक न्यायिक प्रणाली में किसी मामले को निपटाने की एक खास समय सीमा क्यों नहीं तय की गई? अदालतों की संख्या क्यों नहीं बढ़ाई गई? क्यों अदालतें आज भी औपनिवेशिक काल के नियमों का पालन करती हुईं गर्मी की लंबी छुट्टियों के तहत बंद हो जाती हैं? अदालतें किसी मामले की सुनवाई के दौरान बार-बार कार्रवाई स्थगित करने की आदत से क्यों ग्रसित हैं? आजादी के सात दशक बाद भी न्याय हासिल करना इतना महंगा क्योंे है? मौजूदा समय में पुराने और अप्रासंगिक हो चुके ब्रिटिश काल के विधान अब भी कानून की किताबों में दर्ज क्यों हैं?
2014 में नरेन्द्र मोदी सरकार ने केंद्र में आने के बाद इस दिशा में पहल करते हुए प्रधानमंत्री कार्यालय में सचिव आऱ रामानुजम की अध्यक्षता में एक समिति गठित की जिसका उद्देश्य उन सभी अधिनियमों का फिर से अध्ययन करना था जिन्हें 1998 में अटल बिहारी वाजपेयी सरकार द्वारा नियुक्त समिति ने निरस्त करने की सिफारिश की थी। समिति द्वारा पेश निष्कर्ष के आधार पर वर्तमान सरकार ने दो वर्ष में करीब 1,159 ऐसे कानून समाप्त कर दिए जो बेमानी हो गए थे। यह वास्तव में एक स्वागतयोग्य कदम है। ऐसे कई और कानून हैं जिन पर बदलते समय के साथ विचार करने की जरूरत है। हालांकि, कुछ ऐसे भी हैं जिनका सरोकार आम आदमी से है, लिहाजा जरूरी है कि विधायिका उनसे जुड़े मामलों पर तत्काल ध्यान देकर उनके शीघ्र निपटान की राह आसान करे, जैसे कि किराया कानून। विभिन्न राज्यों में लागू यह कानून पूरी तरह से किरायेदारों के अनुकूल है। अपने मकान से किरायेदार को हटाने के लिए मकान मालिक द्वारा दायर मामले पर फैसला आने में औसतन 10-15 साल लग जाते हैं। सेवानिवृत्त हो रहे, या हो चुके मकान मालिक को अपने मकान की वाकई जरूरत होती है क्योंकि वह जीवन के शेष दिन, अपने घर में सुकून से गुजारना चाहता है। इसलिए जरूरी है कि किराया कानून के तहत दर्ज मामलों में समय-सीमा निर्धारित हो।
आज भी राज्यों में आजादी के पहले बनाए गए राजस्व कानून ही लागू हैं, जो कृषि भूमि के साथ जुड़े हैं। इन कानूनों में तमाम तकनीकी ताम-झाम है और मजेदार बात यह है कि जिन्हें फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से ये बनाए गए थे, वे ही इसे समझ नहीं पाते। इसके अलावा कृषि भूमि का बंटवारा, दाखिल-खारिज के लिए मंजूरी, राजस्व अभिलेखों में प्रविष्टियों में सुधार जैसी कार्रवाई संबंधी फैसला लेने में अनावश्यक रूप से लंबा समय खर्च होता है। भारतीय समाज मुख्य रूप से कृषि प्रधान है, लिहाजा राजस्व कानून को तत्काल सरल बनाने की जरूरत है जिसे खेतिहर किसान आसानी से समझ सकें।
भारत की तीन प्रक्रिया संहिताएं-दीवानी प्रक्रिया संहिता, दंड प्रक्रिया संहिता और साक्ष्य अधिनियम-करीब 100 साल पुरानी हैं। इनमें इस बात का भी जिक्र नहीं है कि किसी मामले का निपटारा कितने दिनों के अंदर निश्चित रूप से हो जाना चाहिए। नतीजतन यह है कि अदालती चक्कर अंतहीन हो जाते हैं। भारत में आम बात है कि कोई नागरिक अगर किसी दीवानी अदालत में मुकदमा दायर करे तो उस पर सर्वोच्च न्यायालय से अंतिम फैसला मिलने तक एक या दो पीढि़यां गुजर जाती हैं। इसी तरह, विडंबना है कि किसी आपराधिक मामले में गिरफ्तार व्यक्ति पर अंतिम फैसला आने तक वह जेल में उस अवधि से ज्यादा समय बिता चुका होता है जो उसके अपराध के लिए कानून में निर्धारित है, लिहाजा फैसले और सजा के ऐलान के साथ उसके बरी होने की घोषणा भी हो जाती है। जघन्य अपराधों के आरोपियों को भी अदालत की लंबी प्रक्रिया के कारण सही समय पर सजा नहीं मिलती। अपराधी अक्सर प्रक्रिया संहिताओं का दुरुपयोग करके खुद को कानून के पंजे से आजाद रखने की तिकड़म में जीत जाता है और न्याय एक मखौल बनकर रह जाता है।
औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 जैसे श्रम कानून ऐसे समय बनाए गए थे जब देश में समाजवादी भावनाएं हावी थीं। अर्थव्यवस्था के कपाट खोलने के बाद अब इन श्रम कानूनों की खुले दिमाग से समीक्षा जरूरी है। विधायिका को नियोक्ता या औद्योगिक इकाइयों के मालिकों और इसके लाभार्थी-आम आदमी-के हितों के प्रति बेखबर नहीं होना चाहिए। उत्तर प्रदेश बनाम जयबीर सिंह, (2005) 5 एससीसी 1 मामले में सर्वोच्च न्यायालय की संविधान पीठ ने कहा था-''पिछली मजदूरी के मामले में भारी-भरकम पैकेज देने वाले औद्योगिक फैसले से कभी-कभी उद्योग की बुनियाद पर ही प्रतिकूल असर पड़ता है। कई बार तो भारी-भरकम बोझ डालने वाले ऐसे फैसले के कारण मामूली परिसंपत्तियों वाले नियोक्ता को इकाई बंद करने का निर्णय लेने को मजबूर होना पड़ता है। इससे न केवल नियोक्ता और कामगारों बल्कि आम जनता-जो उद्योग की भौतिक वस्तुओं और सेवाओं की अंतिम लाभार्थी है-के हितों को नुक्सान पहुंचता है…श्रमिकों और नियोक्ताओं के शोषण की समान रूप से जांच होनी चाहिए। कानून, विशेष रूप से औद्योगिक कानून की ऐसी व्याख्या होनी चाहिए कि न तो नियोक्ताओं और न ही कर्मचारी एक-दूसरे पर हावी हो सकें। उद्योग के विकास और इस तरह बेहतर सार्वजनिक सेवा के लिए ये दोनों परस्पर हित के लिए आपस में सहयोग करें।''
उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम उपभोक्ताओं की शिकायतों के निवारण करने के लिए बनाया गया। इसकी धारा 13 (3) कहती है कि 'हर शिकायत यथासंभव जल्दी सुनी जाए, जिन मामलों में शिकायत के विश्लेषण या वस्तुओं की जांच की आवश्यकता नहीं, उन्हें शिकायत मिलने की तारीख से तीन महीने और जिन मामलों में शिकायत के विश्लेषण या वस्तुओं की जांच की जरूरत है, उनमें पांच माह के भीतर फैसला सुनाने की कोशिश की जाएगी।' अधिनियम का यह प्रावधान बेअसर रहा है क्योंकि उपभोक्ता शिकायत में प्रतिवादी को नोटिस जारी होने के बाद मामले की पहली सुनवाई अनिवार्य रूप से तीन महीने के बाद ही हो पाती है। इसलिए किसी भी मामले को, उसकी प्रकृति के लिहाज से निपटाने की उचित समय सीमा तय होनी चाहिए।
सर्वोच्च न्यायालय ने न्यू इंडिया एश्योरेंस कंपनी लिमिटेड बनाम हिली मल्टीपरपज कोल्ड स्टोरेज प्राइवेट लि़ (सिविल अपील सं़ 10941-42) के मामले में 4 दिसम्बर, 2015 को सुनाए फैसले में उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम, 1986 की धारा 13 (2) (क) (जो जवाब दाखिल करने के लिए तीस दिन या जिला उपभोक्ता फोरम द्वारा दी गई छूट की अवधि, जो पंद्रह दिन से अधिक नही हो सकती-का प्रावधान करती है) की व्याख्या करते हुए इसे अनिवार्य कर दिया। अदालत ने कहा कि उपभोक्ता फोरम उपभोक्ता संरक्षण अधिनियम के तहत निर्धारित प्रक्रिया का पालन करने के लिए बाध्य हैं क्योंकि यह प्रावधान त्वरित सुनवाई के लिए है। इस ऐतिहासिक फैसले से यह सुनिश्चित हो सकेगा कि प्रतिवादी उपभोक्ता को परेशान करने के लिए जान-बूझकर कार्रवाई में देरी न कर पाएं।
यह दुखद लेकिन सच है कि वादियों की मांग पर अदालतें बड़ी आसानी से कार्रवाई स्थगित कर देती हैं। सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में गायत्री बनाम एम़ गिरीश मामले में 27 जुलाई, 2016 को फैसला सुनाते हुए बार-बार आगे बढ़ाई जाती कार्रवाइयों पर सख्त रुख अपनाते हुए कहा,''हम यह कहने को विवश हैं कि स्थगन मांगने के इस वायरस को नियंत्रित करना होगा।''
ऐसे कानूनों की फेहरिस्त अंतहीन है जिन्हें बदलते समय के साथ बदलने या फिर बनाने की जरूरत है। न्याय दिलाने की व्यवस्था से जुड़े हर व्यक्ति को इस प्रणाली के प्रति आम आदमी के भरोसे को बनाए रखना होगा। संविधान निर्माता डॉ. बी़ आऱ आंबेडकर ने 25 नवंबर, 1949 को संविधान सभा में अपने भाषण में कहा था, ''मैं मानता हूं कि कोई संविधान कितना ही अच्छा क्यों न हो, यह बुरा ही साबित होगा अगर इसे अमल में लाने वाले बुरे होंगे। और कोई भी संविधान कितना भी बुरा क्यों न हो, अच्छा ही साबित होगा अगर इस पर अमल करने वाले लोग अच्छे होंगे।''
(लेखक सर्वोच्च न्यायालय में अधिवक्ता हैं)
आखिर क्यों?
क्यों अदालतें आज भी औपनिवेशिक काल के नियमों का पालन करती हुईं गर्मी की लंबी छुट्टियों के तहत बंद हो जाती हैं?
अदालतें किसी मामले की सुनवाई के दौरान बार-बार कार्रवाई स्थगित करने की आदत से क्यों ग्रसित हैं?
आजादी के सात दशक बाद भी न्याय हासिल करना इतना महंगा क्योंे है?











