'आम आदमी को न्याय दिलाना ही लक्ष्य'
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'आम आदमी को न्याय दिलाना ही लक्ष्य'

Written byArchiveArchive
Sep 5, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 05 Sep 2016 12:36:48

 

न्यायपालिका और आम आदमी के बीच सेतु का काम करने वाली अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद् इस वर्ष अपनी रजत जयंती (25वीं वर्षगांठ) मना रही है। सितंबर से देशभर में अनेक कार्यक्रम आयोजित हो रहे हैं। एक वर्ष तक आयोजित होने वाले इन कार्यक्रमों में लोगों को परिषद् की उपलब्धियों और उद्देश्यों के बारे में बताया जाएगा। 25 वर्ष की यह यात्रा किन उतार-चढ़ावों से गुजरी और किस तरह के कार्य हुए, कुछ ऐसे ही प्रश्नों को लेकर अरुण कुमार सिंह ने परिषद् के संगठन महामंत्री जयदीप राय से बातचीत की, जिसके मुख्य अंश प्रस्तुत हैं-    

  अधिवक्ता परिषद् की स्थापना कब हुई और उसकी पृष्ठभूमि क्या है?
अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद् की शुरुआत 1992 में दिल्ली में हुई थी, लेकिन इसकी पृष्ठभूमि आपातकाल के बाद ही तैयार हो गई थी। आपातकाल में समाज के लिए बोलने वाले अधिकतर लोग, चाहे वे सामाजिक कार्यकर्ता हों, वकील हों, पत्रकार हों, बुद्धिजीवी हों, जेलों में बंद थे। इस हालत में कानूनी लड़ाई लड़ने वाले वकीलों के बीच जागरूकता की कमी थी। इसी कमी को देखते हुए देशभर के समविचारी वकीलों ने अपने-अपने राज्यों में अलग-अलग संगठन बनाए। ऐसे वकीलों ने 1977 में कोलकाता में 'नेशनलिस्ट लॉयर्स फोरम' नामक संगठन बनाया। 1980 में नागपुर में 'जूनियर लॉयर्स फोरम', 1987 में केरल में   'भारतीय अभिभाषा की परिषद्', आंध्र प्रदेश में 'भारतीय न्यायवादी परिषद्', तमिलनाडु में 'तमिलनाडु कल्चरल एडवोकेट एसोसिएशन', उत्तर प्रदेश में 'अधिवक्ता परिषद् उत्तर प्रदेश' और दिल्ली में 'दिल्ली अधिवक्ता परिषद्' का गठन हुआ। बाद में भोपाल के श्री उत्तमचंद ईसरानी, कोलकाता के श्री कालीदास बसु, इलाहाबाद के श्री वी.के.एस. चौधरी जैसे कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं को लगा कि इन संगठनों को एक सूत्र में बांधा जाना चाहिए। इन सबके प्रेरणा-पुरुष थे वरिष्ठ समाजसेवी श्री दत्तोपंत ठेंगडी। उन्होंने अधिवक्ता परिषद् के काम और स्वरूप का भी खाका खींचा था। इसके बाद राज्यों के इन संगठनों को मिलाकर अखिल भारतीय अधिवक्ता परिषद् का गठन हुआ। पर ये संगठन आज भी अपने-अपने राज्यों में अपने नाम से ही काम कर रहे हैं। अधिवक्ता परिषद् से उन्होंने संबद्धता ली है। ये सभी संगठन अधिवक्ता परिषद् की छत्रछाया में काम  करते हैं।

    अधिवक्ता परिषद् समाज के लिए किस तरह का काम करती है?
परिषद् ने अधिवक्ताओं के मन में समाज और देशहित की भावना पैदा करने का काम किया, ताकि ये लोग अपने काम के अलावा देश और समाज के बारे में भी सोचें। समाज के अंदर जो कुरीति है, उसे दूर करने में सहयोग दें। उस कुरीति को न्यायपालिका में ले जाने की जरूरत हो तो उसे ले जाएं। समाज और संविधान के विरुद्ध बनने वाले कानूनों को भी हमारे वकीलों ने चुनौती दी। इसमें हमें कहीं सफलता मिली, तो कहीं नहीं भी मिली। पर हमारे प्रयास जारी हैं। हमारा उद्देश्य है 'न्याय अंतिम व्यक्ति तक'।  समाज के अंतिम व्यक्ति को भी न्याय मिले, इसके लिए भी हमारे कार्यकर्ता काम करते हैं। केवल न्यायालय में न्याय दिलाना ही न्याय नहीं है। हर प्रकार का न्याय दिलाना हमारा काम है। एक छोटी-सी बच्ची को स्कूल में दाखिला दिलाना भी न्याय है। किसी बेरोजगार को रोजगार दिलाने में मदद करना भी न्याय है, किसी बीमार को किसी अस्पताल में भर्ती कराना भी न्याय है। हमारे कार्यकर्ता जब न्याय केन्द्र में जाकर काम करते हैं तो वे न्याय के इन सभी पहलुओं को ध्यान में रखते हैं। वे किसी रोजगार युवक का बायोडाटा बनाते हैं, किसी बच्चे को स्कूल में दाखिला दिलाने के लिए आवेदन लिखते हैं। किसी मरीज को अस्पताल में भर्ती कराने के लिए आवेदन लिखने की जरूरत पड़ती है तो वह भी करते हैं।

  कहां-कहां न्याय केन्द्र हैं और उनकी कार्य पद्धति क्या है?
भारत के हर प्रांत में हमारे न्याय केन्द्र चल रहे हैं। जहां गरीब लोग रहते हैं, वहां न्याय केन्द्र काम कर रहे हैं। इन केन्द्रों में हफ्ते में एक दिन वकीलों की टोली बैठती है और लोगों को कानून की जानकारी देती है। इसके अलावा हम जागरूकता अभियान चलाकर भी लोगों को कानून की जानकारी देते हैं। लोगों को कानून के बारे में बिल्कुल ही जानकारी नहीं है। जैसे लीगल सर्विसेज अथॉरिटी एक्ट के तहत गरीबी रेखा से नीचे रहने वाले लोगों को किसी मुकदमे के लिए सरकार वकील उपलब्ध कराती है, लेकिन इसकी जानकारी लोगों को नहीं है। हमारे कार्यकर्ता आम लोगों को इसकी जानकरी देते हैं और जरूरत पड़ने पर वे लोग इस जानकारी का लाभ उठाते हैं। उन्हें किसी मामले में सरकारी वकील नि:शुल्क मिल जाते हैं। इस दौरान हमारे कार्यकर्ता भी उनकी मदद करते हैं। एक बात यह भी सही है कि कोई समस्या होने पर अभी भी 80 प्रतिशत लोग न्यायपालिका तक नहीं पहंुच पाते। जब तक हम ऐसे लोगों तक न्याय को नहीं पहुंचा देंगे, तब तक भारत को परम वैभव तक नहीं पहंुचाया जा सकता। हमारे कार्यकर्ता  ऐसे लोगों के लिए काम कर रहे हैं। हम एक गरीब आदमी और न्यायालय के बीच सेतु का काम करते हैं।
  

 परिषद् की कुछ ऐसी उपलब्धियों के बारे में बताएं, जिनका दूरगामी असर हुआ हो?  
 हमारे अधिवक्ताओं ने श्रीराम जन्मभूमि और रामसेतु जैसे मामलों में बड़ी भूमिका निभाई। कुछ प्रांतों में मजहब के नाम पर सरकारों ने आरक्षण देने की कोशिश की। इस आरक्षण को अदालतों में हमारे कार्यकर्ताओं ने चुनौती दी। उसी का परिणाम है कि यह मामला आज तक  लटका हुआ है। जब सरकार ने मजहब के नाम पर कुछ लोगों को आवास देने का निर्णय किया तो हमारे कार्यकर्ताओं ने उसका भी विरोध किया और उसे भी अदालत में चुनौती दी गई। कई जगहों पर वनवासी और अनुसूचित जाति/ जनजाति के छात्रों के लिए बने छात्रावासों पर सरकारी विभागों ने कब्जा कर लिया था। कुछ छात्र संगठनों के कार्यकर्ता इस मामले को लेकर अधिवक्ता परिषद् के पास आए थे। हमने इस मामले को सर्वोच्च न्यायालय तक पहुंचाया और कई वर्ष तक लड़ाई लड़ने के बाद छात्रावासों से अवैध कब्जा हटा और अब उन छात्रावासों में छात्र रह रहे हैं। बांगलादेशी घुसपैठियों पर लगाम लगाने के लिए भी हम लोगों ने अदालतों में जनहित याचिकाएं दाखिल की थीं। पिछले दिनों केन्द्र सरकार ने बंगलादेश के साथ भू सीमा समझौता किया था। इस समझौते के बाद वहां से जो हिन्दू और बौद्ध भारत आना चाह रहे थे, उन्हें बंगलादेशी भूमाफिया परेशान कर रहे थे। उन लोगों ने पुरुषों को मारपीट कर भगा दिया और महिलाओं का अपहरण कर लिया था। इसकी जानकारी जब हुई तो हमने तुरंत कार्रवाई शुरू की। हम लोग एक आवेदन लेकर राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग के पास गए। आयोग ने 24 घंटे के अंदर केन्द्रीय गृह मंत्रालय, विदेश मंत्रालय, असम सरकार और पश्चिम बंगाल सरकार को नोटिस जारी कर उनकी जानकारी मांगी। इसका परिणाम बहुत ही सुखद रहा। वे सभी लोग सकुशल भारत आ गए। इसी तरह जो लोग तय समय के अंदर बंगलादेश से भारत आ गए थे, लेकिन मतदाता सूची में उनका नाम नहीं होने से उन्हें भू सीमा समझौता का कोई लाभ नहीं मिल रहा था, उनके मामले को भी हम लोगों ने सुलझाया। हमारी पहल से ही विशेष शिविर लगाया गया और उन सबका नाम मतदाता सूची में चढ़ाया गया और उन्हें इस समझौते का लाभ मिला।
 

   समय पर न्याय नहीं मिलने से लोगों का अदालतों से विश्वास उठने लगा है। इस विश्वास को बनाए रखने के लिए परिषद् कुछ करती है क्या?   
बिल्कुल करती है। इसके लिए परिषद् वकीलों को प्रशिक्षण दिलाती है। इस प्रशिक्षण में यह बताया जाता है कि कैसे एक मामले को जल्दी से जल्दी निपटाया जाए। वकीलों को जल्दी काम निपटाने की तकनीक भी बताई जाती है। जहां बहुत ज्यादा मामले लंबित हैं, वहां जरूरत पड़ती है तो हम लोग न्यायाधीश से अपील भी करते हैं कि मामलों को निपटाने के लिए विशेष अदालत या लोक अदालत बनाई जाए। इसके साथ ही हम लोग वकीलों के बीच जागरूकता भी फैलाते हैं, जिसकी इस क्षेत्र में बहुत ही जरूरत है।
अदालतों में मामले इसलिए भी जल्दी नहीं निपट पाते क्योंूकि हमारे जो कानून हैं वे अंग्रेजों के बनाए हुए हैं। जब तक अंग्रेजों के कानून चलेंगे तब तक हम यह दावा नहीं कर सकते कि हमारे यहां यूरोप-केन्द्रित भावना नहीं रहेगी। यूरोप-केन्द्रित भावना को भारत-केन्द्रित भावना में बदलने के लिए हमें अपने देश के अनुरूप कानून बनाने की जरूरत है। ब्रिटिश समाज और भारतीय समाज में जमीन-आसमान का अंतर है। उनकी सोच और हमारी सोच में भी बहुत फर्क है। जब अंग्रेजों ने हमारे लिए कानून बनाए थे तो उस समय वे हमारे शासक थे और हम उनकी प्रजा थे। हमारे ऊपर शासन करने के लिए जो कानून बनाए गए हैं, वे हमारे नहीं हो सकते हैं। हमें भारतीय समाज के अनुरूप कानून बनाना होगा। इसलिए अधिवक्ता परिषद् की रजत जयंती में संविधान और भारतीय मूल्यों के प्रत्यक्ष प्रकटीकरण पर विशेष रूप से चर्चा होगी।

कुछ उपलब्धियां
    श्रीराम जन्मभूमि और रामसेतु जैसे मामलों में बड़ी भूमिका निभाई।
    मजहबी आरक्षण के विरोध में याचिकाएं दायर कीं। उसी का परिणाम है कि यह मामला आज तक  लटका हुआ है।
     संप्रग सरकार ने मजहब के नाम पर कुछ लोगों को आवास देने का निर्णय लिया तो उसे भी अदालत में चुनौती दी गई। इसलिए सरकार की यह योजना सफल नहीं हुई।
    देशभर में अनेक जगहों पर वनवासी और अनुसूचित जाति/ जनजाति के छात्रों के लिए बने छात्रावासों पर सरकारी विभागों के अवैध कब्जे को हटवाया।
ल्ल    बांगलादेशी घुसपैठियों पर लगाम लगाने के लिए भी अदालत में जनहित याचिकाएं दाखिल की थीं।
    शोषित और पीडि़त बंगलादेशी हिन्दुओं को सकुशल भारत लाने में अहम भूमिका निभाई। 

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