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मानवता विरोधी मानवाधिकारवादी

Written byArchiveArchive
Aug 29, 2016, 12:00 am IST
in Archive

दिंनाक: 29 Aug 2016 13:07:52

एमनेस्टी इंटरनेशल खुलेआम आतंकवादियों के समर्थन में खड़ी दिखती है। अलगाववादियों के मानवाधिकारों का रोना रोने वाली इस संस्था को घाटी से निकाल बाहर कर दिए गए कश्मीरी पंडितों की पीड़ा कभी दिखाई न देना उसकी मंशा पर सवाल खड़े करता है

प्रशांत बाजपेई
आम भारतीयों के मन में अक्सर यह सवाल उठता है कि तथाकथित मानवाधिकार संगठनों की आवाज उन्हें अपने खिलाफ जाती हुई ही क्यों महसूस होती है। आतंकी और आतंक पीडि़तों के बीच फर्क करने का कोई पैमाना इन संगठनों के पास है क्या? इसलिए जब देश स्वतंत्रता दिवस की तैयारियों में डूबा हुआ था और बेंगलुरु में एमनेस्टी द्वारा कश्मीर पर  आयोजित कार्यक्रम में भारत विरोधी नारे लगे तो बरसों पुरानी  चर्चा फिर सतह पर आ गई। यह किस्सों की श्रृंखला है।
कैमरे के सामने चाकू से बेकसूरों के गले रेतकर दुनिया को धमकाने वाले बगदादी के दरिंदे जिहादी जन और एक 'अंतरराष्ट्रीय मानवाधिकार संगठन' एमनेस्टी के बीच क्या संबंध हो सकता है? आम आदमी के लिए यह हैरान कर देने वाला सवाल है, लेकिन उंगलियां बरसों से उठ रही हैं। जिहादी जन, असली नाम मोहम्मद एमवाजी, ब्रिटिश मूल का इस्लामिक स्टेट आतंकी, दुनिया में कुख्यात होने के पहले एक मौके पर ब्रिटेन की आंतरिक सुरक्षा सेवा एमआई फाइव के रडार पर आया था, लेकिन वह उसके इरादों को भांप नहीं सके, जिहादी जन हाथ से निकल गया एवं  सीरिया जा पहुंचा, अपने जिहाद के सपने को पूरा करने के लिए। कुछ समय बाद जब उसकी करतूतों से सभ्य समाज सिहर उठा और उसकी पहचान जाहिर हुई तो ब्रिटेन की एक इस्लामी संस्था 'केज' सामने आई और बयान दिया कि जिहादी जन उर्फ मोहम्मद एमवाजी तो बड़ा 'सभ्य, दयालु और खूबसूरत नौजवान' था जो कि 2009 में एमआई फाइव द्वारा परेशान किये जाने के कारण 'भटक' गया था। इस बयान से लोगों का गुस्सा उबल पड़ा। तीखी प्रतिक्रियाओं के निशाने पर एमनेस्टी भी थी क्योंकि एमनेस्टी के केज से गहरे संबंध रहे हैं।
यह पहली बार नहीं हुआ था, जब एमनेस्टी के इस्लामी कट्टरपंथियों और जिहादी आतंकियों से संबंध उजागर हुए थे। फिलिस्तीन के 'हमास' के साथ भी साठगांठ के आरोप इस पर लगते रहे हैं। इस्रायल के सुरक्षाबलों और हमास के आतंकियों के बीच हुई झड़पों में एमनेस्टी इस्रायल को सीख देता नजर आया। अंतत: जब मार्च 2015 में एमनेस्टी ने रिपोर्ट जारी की कि हमास ने 'भी' युद्ध अपराध किये हैं तो सारी दुनिया समेत इस्रायल ने भी इसे कोई भाव नहीं दिया। इस्रायल की आपत्ति थी कि युद्ध अपराध शब्द किसी सेना की कार्रवाही के संबंध में तो पयुक्त किया जा सकता है, नागरिक आबादी पर हमले कर रहे किसी आतंकी संगठन के लिए नहीं। इस्रायली सेना के प्रवक्ता लेफ्टिनेंट कर्नल पीटर लर्नर ने ट्वीट किया,''वाह, आतंकी संगठन ने युद्ध अपराध को अंजाम दिया। बड़े आश्चर्य की बात है।'' संयुक्त राष्ट्र के आंकड़ों के अनुसार हमास व उसके सहयोगियों ने इस्रायल पर 4,800 राकेट और 1700 मोर्टार दागे हैं। उयकी शिकायत है कि जब हमलावर हमास के आतंकियों के विरुद्ध उसकी कार्रवाही में किसी फिलिस्तीनी को नुक्सान पहुंचता है तब एमनेस्टी जैसे संगठन इस्रायल पर आरोप लगाते हैं लेकिन नागरिक आबादी को अपनी ढाल के रूप में इस्तेमाल करने वाले हमास के लोगों के विरुद्ध एक शब्द भी नहीं कहा जाता।    हालांकि 2015 की रिपोर्ट में एमनेस्टी ने माना कि फिलिस्तीनी 'जनसेना' ने हथियारों के संग्रह तथा इस्रायल पर राकेट दागने के लिए स्कूल, मस्जिद, चर्च और अस्पतालों का उपयोग किया है, लेकिन तब तक बहुत देर हो चुकी थी। एमनेस्टी की यह रिपोर्ट उसकी अपनी ही पहले की रिपोटोंर् पर सवाल खड़े करती है। इस तर्क को कोई बच्चा भी समझ सकता है कि यदि इस्रायल की आबादी पर अस्पतालों-मस्जिदों और रिहाइशी इलाकों से बम दागे जाएंगे तो इस्रायल भी इन्हीं इलाकों पर जवाबी हमला करेगा। गौरतलब है कि फिलिस्तीन में हमास के अलावा भी कई संगठन हैं जो तुलनात्मक रूप से नरम और खुली सोच वाले हैं, लेकिन एकमात्र हमास के जिहादियों को ही मंच मुहैया करवाया जाता रहा। आरोप बाहर से तो लग ही रहे थे, लेकिन संस्था के अंदर से भी आरोप लगे। एमनेस्टी की 'जेंडर विंग' की प्रमुख गीता सहगल को 2010 में निकाल बाहर किया गया जब उन्होंने इस्लामी कट्टरपंथियों के साथ संस्था की गलबहियों पर आपत्ति उठाई। सहगल की आपत्ति इस्लामी  ब्रिटिश संस्था केज को लेकर थी। उन्होंने अपने बयान में कहा कि सारे ब्रिटेन में  तालिबान समर्थक के रूप में विख्यात केज को एमनेस्टी द्वारा मानवाधिकार रक्षक के रूप में स्थापित करना नैतिक दिवालियेपन की    मिसाल है।

केज को अज्जाम बेग चलाता है, जो आतंक के आरोपों में ग्वाटेनामो बे जेल में बंद रहा। केज (पूरा नाम केजप्रिजनर्स) का एक और प्रमुख सदस्य असीम कुरैशी है, जो हिज्ब-उत-तहरीर जैसे चरमपंथी संगठन की रैलियों में सशस्त्र जिहाद के समर्थन में खुलकर बोलता आया है। एमनेस्टी की इस पूर्व सदस्य  के अनुसार, ''एमनेस्टी इंटरनेशनल के वरिष्ठ नेतृत्व ने अज्जाम बेग से संस्था के संबंध में किये गए मेरे सवालों के उत्तर में अपने और बेग के संबंधों को स्वीकार किया है। अब उन्होंने इस बात की भी पुष्टि कर दी है कि उन्हें केज से कोई परेशानी नहीं है। उनके मुताविक जिहाद की अवधारणा मानवाधिकारों के विपरीत नहीं है, और अज्जाम बेग तथा केजप्रिजनर्स के उसके दूसरे साथी प्रत्येक  मुसलमान के व्यक्तिगत कर्तव्य की बात करते हैं।'' बेग किस प्रकार के कर्तव्यों की बात करता घूम रहा है, इसकी मिसाल है 21 मई, 2016 को 'द टेलीग्राफ' में छपी रिपोर्ट, जिसमें बताया गया है कि वह किस प्रकारब्रिटेन के कॉलेज परिसरों में जाकर मुस्लिम छात्रों से ब्रिटिश सरकार द्वारा चलाए जा रहे कट्टरपंथ विरोधी अभियानों को मुस्लिम विरोधी बतलाते हुए उन्हें ध्वस्त करने का आह्वान कर रहा है। सहगल का कहना है कि एमनेस्टी ने आतंकवादियों के अधिकारों को आतंक के शिकार लोगों के अधिकारों से ऊपर रखा है। यह एनजीओ नागरिक व राज्य के आत्मरक्षा के अधिकार पर चुप्पी साध जाता है, जबकि राजनैतिक मुद्दों में खूब रुचि लेता है। गीता कटाक्ष करते हुए कहती हैं कि उन्हें सवाल उठाने पर बाहर का रास्ता दिखा दिया गया जबकि एमनेस्टी सरकार को 'पारदर्शिता, जिम्मेदारी और निष्पक्षता' बरतने का प्रवचन देता रहता है और बोलने के अधिकार की रक्षा करने का दावा करता है। इस सारी पृष्ठभूमि को ध्यान में रखकर जब हम एमनेस्टी बेंगलुरू के कश्मीर केंद्रित आयोजन को देखते हैं तो तस्वीर साफ होने लगती है।
13 अगस्त को एक ईसाई संस्था यूनाइटेड थियोलॉजिकल कालेज बेंगलुरु (एक मिशनरी प्रशिक्षण संस्थान) में 'टूटे परिवार' नाम से कार्यक्रम आयोजित किया गया। विषय था जम्मू-कश्मीर में तथाकथित 'मानवाधिकार उल्लंघन।' पहले सेना द्वारा किए गए कथित अत्याचारों पर भाषण हुए उन्हेंे फिर को बल देने के लिए एक नाटक का मंचन किया गया। इस दौरान कश्मीरी पंडितों का एक समूह भी वहां पहुंच गया और उसने सेना के समर्थन में आवाज उठाई और पूछा कि सैकड़ों कश्मीरी पंडितों की निर्मम हत्या और लाखों हिंदुओं के घाटी से पलायन पर आपका कार्यक्रम पर्दा डाल रहा है, जबकि जान पर खेल रहे सुरक्षा बलों पर कीचड़ उछाला जा रहा है। इस पर दोनों तरफ से नारे लगे।
'आजादी' और 'वन्देमातरम्' के बीच कार्यक्रम का समापन हो गया। एमनेस्टी ने सफाई दी कि उसने कश्मीरी पंडितों को भी आमंत्रण दिया था, पर प्रश्न तो कार्यक्रम की रूपरेखा और मंच से हुई प्रस्तुति का है। हिंसा और बलात्कार के जोर पर खदेड़े गए लाखों लोगों  के 'टूटे परिवार' और तहस-नहस मानवाधिकार एमनेस्टी को क्यों नहीं दिखाई पड़े? कहने को एमनेस्टी ने कुछ समय पहले सरकार से कश्मीरी पंडितों के पुनर्वास की मांग की थी, पर हाथी के दांत खाने के और, दिखाने के और। क्या कभी इस संस्था ने कश्मीरी हिंदुओं के मानवाधिकारों को बहाल करने के लिए कोई वास्तविक  प्रयास किया? नहीं। वर्तमान जम्मू-कश्मीर सरकार ने जब कश्मीरी हिंदुओं के लिए कॉलोनी बनाने की बात की और जब स्थानीय अलगाववादियों, घाटी के नेशनल कान्फ्रेंस तथा कांग्रेस नेतृत्व ने इस मुद्दे पर कट्टरपंथ की राजनीति की तब एमनेस्टी ने क्या कदम उठाया? उसने पूर्ववर्ती की जम्मू-कश्मीर सरकारों के समक्ष इस मामले को  प्रस्तुत करने का प्रयास कब किया? ढाई दशक से मुसीबत झेल रहे कश्मीरी हिंदू एमनेस्टी का विरोध क्यों कर रहे हैं?
रंगमंचीय के नाटकों से त्रासदी को झुठलाने में लगे 'कलाकार', कलम की नोक से खंजर के निशान धुंधले करने में लगे बुद्धिजीवी और मानवाधिकारों के बैनर के नीचे लाशें छिपा रहे एक्टिविस्ट जवाब देंगे क्या?

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