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मीडिया जान–बूझकर देशभक्त नागरिकों की भावनाओं को ठेस पहुंचाने वाली हरकतों को तूल दे रहा
इन दिनों समाचार चैनलों और अखबारों में झूठी और नकारात्मक खबरों की मानो आंधी-सी आई हुई है। लगभग हर दिन कोई फर्जी खबर फैलाई जाती है और फिर उस पर सोशल मीडिया से लेकर गली-चौराहों तक बहस शुरू हो जाती है। विपक्ष बिना तथ्यों को जांचे मीडिया की खबरों के आधार पर सरकार पर हमला बोलता है। अगले दिन एक छोटा सा खंडन किसी कोने में छप जाता है। या कई मामलों में तो माफी मांगने या खेद जताने की जरूरत भी नहीं समझी जाती।
बीते दिनों इस खेल का बड़ा शिकार बना रेलवे विभाग। पहले व्हाट्सएप पर एक अफवाह उड़ी कि 1 जुलाई से रेलवे के किरायों में भारी बढ़ोतरी होने जा रही है। अगले दिन यह अफवाह न्यूज चैनलों और अखबारों की वेबसाइट पर खबर बनकर छप गई। स्वाभाविक है कि इस बात से लोगों में सरकार के लिए नाराजगी पैदा हुई। रेल मंत्रालय बताता रहा कि यह खबर झूठी है, लेकिन मीडिया ने अफवाह को फैलाने में भरपूर योगदान दिया।
इससे एक दिन पहले ही नागालैंड का अलग झंडा और अलग पासपोर्ट जारी होने की अफवाह भी बेहद योजनाबद्घ तरीके से उड़ाई गई। पहले अखबारों और चैनलों के जरिए इस बात को फैलाया गया। कई संपादकों और पत्रकारों ने इसे सोशल मीडिया पर भी हवा दी। गृह राज्यमंत्री सामने आकर सफाई देते रहे। लेकिन तब तक मीडिया अपना काम कर चुका था।
दिल्ली से भाजपा के सांसद महेश गिरी भी मीडिया के इसी खेल को शिकार बने। खुद भ्रष्टाचार के मामलों में डूबे मुख्यमंत्री ने उन पर हत्या का आरोप लगा दिया। आम आदमी पार्टी के छोटे से लेकर बड़े नेता रोज प्रेस वार्ता करके अलग-अलग चिट्ठियां लहराते रहे। इन झूठे सबूतों और बनावटी चिट्ठियों के आधार पर सांसद से सवाल पूछे जाते रहे। किसी चैनल या अखबार ने आम आदमी पार्टी के किसी नेता से जाकर यह पूछने की जरूरत नहीं समझी कि आप अपने सबूतों को लेकर किसी अदालत में क्यों नहीं चले जाते। क्या यह सामान्य बात है कि किसी सम्मानित और लोकप्रिय सांसद पर बिना सबूत के हत्या जैसा जघन्य आरोप लगाया जाए और मीडिया आरोप लगाने वाले नेता की जवाबदेही की जरूरत तक न समझे? कुछ दिन पहले केजरीवाल ने यही काम प्रधानमंत्री की डिग्री को लेकर भी किया था। तब भी उन्होंने मीडिया को भोंपू की तरह इस्तेमाल किया और मीडिया खुशी-खुशी भोंपू बना रहा।
मीडिया के अंदर बैठे लोग जान-बूझकर ऐसी हरकतें करने लगे हैं जिससे हर देशभक्त नागरिक की भावनाओं को ठेस पहुंचे। कश्मीर में सीआरपीएफ के 8 जवानों के बलिदान पर जब पूरा देश शोक में था तो टाइम्स ऑफ इंडिया ने अपनी खबर में आतंकवादियों को 'बागी' कहकर संबोधित किया। अगले दिन इसी अखबार ने खबर छापी कि उत्तर प्रदेश के फिरोजाबाद में एक हुतात्मा वीर के अंतिम संस्कार में देरी हुई क्योंकि गांव में अगड़ी जाति के लोगों ने इसके लिए जमीन देने से मना कर दिया। अंतिम संस्कार के वक्त वहां बाकी चैनलों, अखबारों के लोग भी मौजूद थे। किसी और को यह बात नहीं दिखाई दी? अगले दिन जब टाइम्स ऑफ इंडिया में खबर छपी तो सभी ने भेड़चाल में उसे सच मानकर चला दिया। अगर वह खबर सच थी तो आखिर उत्तर प्रदेश सरकार ने दोषी लोगों पर अनुसूचित जाति-जनजाति अधिनियम के तहत मामला दर्ज क्यों नहीं किया?
अब जब यह बात पता चल चुकी है कि जो खबर बताई जा रही है वह पूरी तरह सही नहीं है, तो किसी ने भी सच्चाई सामने लाने की जरूरत नहीं समझी। क्या ऐसी शरारतपूर्ण झूठी खबरों से देश और जवानों के मनोबल पर बुरा असर नहीं पड़ता है? एनएसजी में चीन के अड़ंगे के कारण भारत को जगह न मिल पाने पर मीडिया के एक तबके में जश्न का माहौल देखा गया। एनएसजी के फैसले को प्रधानमंत्री मोदी की निजी हार के तौर पर प्रचारित किया गया। जबकि एनएसजी से भी महत्वपूर्ण वैश्विक गठजोड़ मिसाइल टेक्नोलॉजी नियंत्रण प्रणाली (एमटीसीआर) की सदस्यता पाने में कामयाबी की खबर पूरी तरह दबा दी गई। यह जानकारी भी लगभग छिपा ली गई कि एमटीसीआर की सदस्यता के लिए चीन कई साल से नाक रगड़ रहा है।
इधर, दिल्ली का मीडिया अपराध की घटनाओं का महत्व धर्म के आधार पर आंकने की अपनी नीति पर मजबूती के साथ टिका हुआ है। बिहार के मोतिहारी में बलात्कार का एक मामला सामने आया। लड़की की हालत देखकर लोगों को दिल्ली का निर्भया कांड याद आ गया। लेकिन शायद मीडिया को ज्यों ही पता चला कि आरोपी एक खास समुदाय का है, यह खबर सभी चैनलों और अखबारों से उतर गई। बिहार सरकार ने खुलेआम आरोपियों की मदद की, उन्हें बचाने के लिए गलत मेडिकल रिपोर्ट दी गई। इतने बर्बर अपराध में सिर्फ बलात्कार के प्रयास का मामला दर्ज किया गया। लेकिन किसी अखबार या चैनल ने ऐसा कुछ भी नहीं दिखाया जिससे नीतीश कुमार के सुशासन के दावों पर सवाल उठते हों। कुछ हफ्ते पहले केरल में जीशा बलात्कार कांड में पूरा देश मीडिया का यही रवैया देख चुका है।











