| दिंनाक: 27 Jun 2016 12:30:56 |
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भारत विविधताओं का देश है। अच्छी बात। यह हमारी शक्ति है। लेकिन, क्या यह कोरी, अकारण असहमतियों का भी देश है? ऐसा देश जहां सामान्य मुद्दों पर भी सहज सहमति नहीं बनती?
ऐसे मुद्दे जिन पर असहमत होने का कोई तर्क नहीं है, वहां भी हम सहमत नहीं होते?
समाज और राजनीति के धरातल पर असहमति के मायने अलग-अलग हैं। असहमति का अधिकार समाज के लिए शक्ति है तो राजनीति के लिए यह दूसरे पर हमलावर होने, उसे कमजोर करने का औजार। यहीं राजनीति समाज के सामने बौनी पड़ जाती है। कठिन प्रश्नों को सुलझाने वाली परस्पर समझ की जो चाबी समाज के पास है, राजनीति आपसी रस्साकशी में उसे खो बैठी है। सरकार की अच्छी सामाजिक पहलों पर भी अंगुली उठाना। जिन विषयों पर पूर्व में सहमत थे, बाद में उन्हीं मुद्दों पर लंगड़ी लगाना। और तो और, जो बात सबके समान लाभ की है उसमें भी सिर्फ इसलिए छिटककर अलग खड़े हो जाना कि विरोध और असहमति का रंग जरा चटख दिखे। यह तेवर राजनीति को सुहा सकता है पर समाज को यह बात नहीं भाती।
ऐसे में इसे वैचारिक विविधता कहा जाए या असहमति के अधिकार का दुरुपयोग? अधिकार के ऐसे दुरुपयोग के मामलों में राजनीति बार-बार अनावृत हुई है।
पहला मामला था स्वच्छ भारत मिशन का। देश साफ-सुथरा हो, समाज स्वस्थ हो, इससे कौन असहमत होगा? लेकिन नहीं, अभियान चूंकि भाजपाा की अगुआई वाली राजग सरकार ने शुरू किया है तो बाकी राजनीतिक दलों को मीनमेख निकालनी ही है। राष्ट्रीय महापुरुष, महात्मा गांधी का सपना पूरा करने की पहल में सभी को पूरे मनोयोग से जुटना था परंतु मुद्दे को महापुरुषों पर कब्जे की बहस में धकेलने की कोशिश हुई। राजनीति ने जो भी रंग दिखाया हो, सकारात्मक आह्वान का समाज ने समुचित उत्तर दिया। सार्वजनिक स्थलों पर लोगों के कार्य-व्यवहार में स्वच्छता के प्रति आग्रह दिखा और स्थिति में अंतर भी।
असहमति के दुरुपयोग का दूसरा मौका वस्तु एवं सेवा शुल्क यानी जीएसटी के प्रश्न पर दिखा। कांग्रेस केंद्र सरकार की बांह उसी मुद्दे पर मरोड़ रही है जो खुद उसका लाया हुआ है। हालांकि राज्यसभा का गणित बदलने पर सभी के तेवर बदले हैं मगर इसे सिर्फ सदन में किसी राजनैतिक दल के स्थिति परिवर्तन से कैसे जोड़ा सकता है? अगर जीएसटी से दोहरा कराधान समाप्त होता है, महंगाई घट सकती है, आमजन को राहत मिल सकती है, तो कांग्रेस या किसी अन्य राजनैतिक दल को जनता को राहत देने वाले उपाय से ऐतराज क्यों होना चाहिए? ऐसी आपत्तियों को क्या कहा जाए?
राजनीति का मन कितना छोटा हो सकता है, यह बात तीसरी बार अंतरराष्ट्रीय योग दिवस के मौके पर सामने आई। जिस समय पूरा विश्व भारतीय ज्ञान और आरोग्य परंपरा को अपनाने के लिए कदम बढ़ा रहा था, बिहार और दिल्ली सरकार के प्रतिनिधि बिदके हुए अलग खड़े थे। अपने ही पूर्वजों की परंपरा से मुंह फुलाने वाली इस राजनीति को क्या कहेंगे?
स्वच्छता को लेकर छेड़ी गई मुहिम राष्ट्रीय अभियान है। यह गंदगी के विरुद्ध तो है ही, इससे हमारे नाागरिकों का स्वास्थ्य, और देश की छवि, दोनों जुड़े हैं।
जीएसटी राज्यों की कर व्यवस्था को एक करता है और इस तरह देश को आर्थिक रूप से एकात्म करता है। और योग, यह तो व्यक्ति से लेकर अखिल विश्व तक सबके लिए है…व्यक्ति की चेतना ब्रह्मांडीय चेतना से इस तरह जुड़ती है कि बाकी जोड़-गुणा का भार घटता जाता है।
तो, एक बात साफ है। सबके लिए फायदेमंद, समाज को सुहाती बातों से मुंह बिचकाती, रार मचाती राजनीति लोगों के मन से उतर ही नही रही, नाहक अपना दम भी फुला रही है। ऐसे में राजनीतिकों के लिए संदेश एक ही है। असहमति जरूर उठाएं परंतु साथ बैठकर सहमति भी बनाएं। सही दिशा में सब बढ़ते जाएं। मन को शांत रखें और गहरी लंबी सांस लें…इससे सिर्फ 'मोदी' को नहीं आपको भी फायदा होगा। पूरे देश को फायदा होगा।