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'गांधी परिवार केवलम्' का मंत्र कांग्रेस की खासी फजीहत करा चुका है पर पार्टी में लीक से हटने की नहंी हिम्मत
ल्ल प्रमोद जोशी
हाल में एक चैनल की एंकर ने जयराम रमेश से पूछा, पार्टी 'गांधी परिवार मुक्त कांग्रेस' बनाने के बारे में क्यों नहीं सोचती? जयराम रमेश बोले नहीं जी, पार्टी बहुत ताकतवर है, हमारे भीतर विचार-विमर्श की मजबूत व्यवस्था है। अब राहुल जी अध्यक्ष बनने ही वालेे हैं, वे ही तय करेंगे कि किस रास्ते पर चला जाए। इसके कुछ दिन पहलेे दिग्विजय सिंह 'मेजर सर्जरी' की बात कर रहे थे। बात बढ़ी तो उन्होंने सफाई दी, यह सर्जरी सोनिया जी और राहुल जी को करनी है।
पार्टी 'गांधी परिवार केवलम्' के सूत्र पर चलती है। उसका बड़े से बड़ा नेता इस सत्य के आगे बात नहीं करता। बावजूद इसके राहुल गांधी के हाथ में कमान सौंपने के पहले 'किन्तु-परन्तु' जारी है। खतरा यह भी है कि बड़े स्तर पर बगावत न हो जाए। एक-एक कर क्षेत्रीय नेता पार्टी को 'नमस्ते' कर रहे हैं। त्रिपुरा में पार्टी के दस में से छह विधायकों ने नमस्कार कर दिया। उन्हें अपना भविष्य अंधकारमय लगने लगा है। छत्तीसगढ़ में अजीत जोगी नई पार्टी बनाने का इरादा जाहिर कर चुके हैं।
महाराष्ट्र में गुरुदास कामत ने संन्यास लेने की घोषणा कर दी है। उनका गुट राहुल गांधी की पसंद और मुंबई कांग्रेस अध्यक्ष संजय निरुपम पर उंगली उठा रहा है। बहरहाल कामत को मनाने की कोशिशें जारी हैं। पता नहीं, क्या होगा। राज्यसभा चुनाव में कई जगह से विद्रोह की खबरें हैं। विद्रोह करने वालेे भी वही हैं जो परिवार के करीबी हुआ करते थे। यह तस्वीर का एक पहलू है। और यह इस पार्टी का सबसे बड़ा अंतर्विरोध भी है।
हाल में पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव के परिणाम आने के बाद राज्य कांग्रेस इकाई के प्रमुख अधीर चौधरी ने विधायकों की बैठक में एक हलफनामे की पेशकश की। सभी विधायकों ने इस हलफनामे को मंजूर किया, जिसमें सोनिया गांधी और राहुल गांधी के नेतृत्व में पार्टी के प्रति वफादारी की शपथ लेने की घोषणा की गई है। इसमें यह भी संकल्प किया गया है कि विधायक पार्टी विरोधी गतिविधियों में शामिल नहीं होंगे। यह विचित्र हलफनामा कांग्रेस पार्टी की रीति-नीति से ज्यादा वर्तमान मनोदशा की जानकारी देता है।
इस हलफनामे से तीन निष्कर्ष निकलते हैं। पहला, यह कि पार्टी के भीतर 'परिवार' को लेकर जबरदस्त जकड़बंदी है। पार्टी को जोड़कर रखने वाला 'गोंद।' हालांकि किसी को अंदेशा नहीं है कि पारिवारिक नेतृत्व को चुनौती दी जाएगी। फिर भी उसकी पेशबंदी में हलफनामे की परिकल्पना की गई। दूसरा निष्कर्ष यह है कि जैसे अरुणाचल और उत्तराखंड में पार्टी विधायकों ने बगावत की वैसा ही कुछ बंगाल में भी हो सकता है, इसलिए पहले से हलफनामा लिखवा लिया जाए। हालांकि यह समझ में नहीं आता कि हलफनामा किसी बगावत को रोकने में किस तरह की मदद करेगा।
तीसरा निष्कर्ष यह है कि अपने आंतरिक लोकतंत्र को बजाय मजबूत करने के पार्टी बचकाने तरीके से कार्यकर्ताओं को जोड़कर रखना चाहती है। यह बात उसके पराभव का संकेत देती है। सन् 2014 के लोकसभा चुनाव में जबर्दस्त हार के बाद हुई कांग्रेस कार्यसमिति की बैठक में पार्टी ने चुनाव में हार के लिए नेतृत्व को जिम्मेदार नहीं माना। बैठक में कहा गया कि कांग्रेस के सामने इससे पहले भी चुनौतियां आई हैं और उसका पुनरोदय हुआ है। इस बार भी वह 'बाउंसबैक' करेगी। पिछले दो साल से कांग्रेस 'बाउंसबैक' का इंतजार कर रही है।
'सर्जरी' की जरूरत
हाल में पांच राज्यों के चुनाव नतीजे आने के बाद दिग्विजय सिंह ने अपने एक ट्वीट में कहा कि बड़ी सर्जरी की जरूरत है। दिग्विजय सिंह ने बाद में अपने बयान की सफाई में जो कुछ कहा, उससे बातें और जटिल हो गईं। अखबारों में उनका यह बयान भी छपा है कि ये चुनाव परिणाम पार्टी के केन्द्रीय नेतृत्व की विफलता को परिलक्षित नहीं करते। सवाल है कि तब ये परिणाम किसकी विफलता को परिलक्षित करते हैं? और दिग्विजय जिस सर्जरी का सुझाव दे रहे हैं, उसका मतलब क्या है? कांग्रेस की सबसे बड़ी पहेली हैं राहुल गांधी। अब जब यह लगभग तय है कि राहुल गांधी अध्यक्ष पद संभलेंगे, यह सवाल खड़ा होता है कि क्या वे पार्टी के पराभव को रोक पाएंगे? साथ ही यह भी देखना होगा कि उन्होंने अब तक किया क्या है। हाल में दिग्विजय सिंह ने बताया कि लोकसभा चुनाव में भारी हार के बाद राहुल गांधी ने पार्टी के वरिष्ठ नेताओं से कहा कि वे अपनी रिपोर्ट बनाकर दें कि अब क्या किया जाए। रिपोर्ट देने की आखिरी तारीख थी 20 फरवरी, 2015। जून 2016 तक पार्टी ने जो किया वह हमारे सामने है। भले ही राहुल गांधी पार्टी के अध्यक्ष नहीं थे, पर वास्तविक नेता तो वही हैं।
ाोकसभा में राहुल
लोकसभा चुनाव में पराजय के बाद मई 2014 में कांग्रेस संसदीय दल ने सोनिया गांधी को जब अपना अध्यक्ष चुना तब सबको लगा था कि स्वाभाविक रूप से राहुल गांधी लोकसभा में पार्टी का नेतृत्व करेंगे। भले ही वे चुनाव की भावावेशी वक्ताओं में सफल न हुए हों, पर अब उन्हें अपनी बातें कहने का मौका मिलेेगा। संसद में कही गई बातें पूरा देश सुनता है। पर राहुल गांधी ने संसदीय रास्ते का ज्यादा इस्तेमाल नहीं किया। उनकी जगह मल्लिकार्जुन खड़गे लोकसभा में दल के नेता बने। राहुल ने संसद के मंच को क्यों नहीं अपनाया, इसे लेकर अपनी-अपनी राय है। पर मोटी बात यह समझ में आती है कि वे इतना आत्मविश्वास पैदा नहीं कर पाए।
पार्टी कार्यसमिति की बैठक के बाद सम्भवत: राहुल गांधी को अध्यक्ष बना दिया जाएगा। बावजूद इसके कि कुछ वरिष्ठ नेता चाहते हैं कि सोनिया गांधी अध्यक्ष बनी रहें। राहुल जिस स्थिति में हैं, उसे देखते हुए न तो उनकी अनदेखी की जा सकती है और न उनके नेतृत्व पर पूरा भरोसा किया जा सकता है। बहरहाल कभी न कभी उन्के हाथ में नेतृत्व देना ही होगा। कांग्रेस जिस मोड़ पर खड़ी है वहां से अब वापसी नहीं हो सकती। अब परिवार से बाहर भी किसी को नेतृत्व सौंपा नहीं जा सकता। सन् 1991 के बाद प्रधानमंत्री और कांग्रेस अध्यक्ष बने पीवी नरसिम्हाराव ने एकबारगी पार्टी को परिवार के हाथों से बाहर निकाल लिया था। पर परिवार के सहारे पार्टी पर अपनी पकड़ बनाए रखने वालों ने अंतत: बागडोर फिर 'परिवार' के हाथों में सौंप दी।
कार्यकर्ताओं का विश्वास
अब देखना यह है कि क्या कार्यकर्ताओं को लगता है कि 'खानदान' के सहारे पार्टी चुनाव में सफल होती रहेगी। कांग्रेस कार्यकर्ताओं को देर-सवेर यह समझ में आया कि गांधी परिवार के सहारे पार्टी की सत्ता में वापसी सम्भव नहीं है, तब क्या होगा? दरअसल पार्टी को ताकतवर नेता और क्षेत्रीय क्षत्रपों की जरूरत है। उसे नए नेता भी चाहिए जैसे राजीव गांधी के समय में आए थे। राहुल गांधी भी अपने साथ नए नेता लाने की कोशिश कर रहे हैं। राहुल के करीबी नेता भी हैं। क्षेत्रीय नेताओं में तरुण गोगोई और भूपेन्द्र सिंह हुड्डा जैसे नाम हैं। पर गोगोई पर अतिशय भरोसा असम में घातक साबित हुआ। दूसरी और पिछले कुछ वषोंर् में हरियाणा में वीरेन्द्र सिंह और राव इंद्रजीत सिंह, आंध्र में जगनमोहन रेड्डी, उत्तराखंड में विजय बहुगुणा और हरक सिंह रावत, असम में हिमंत बिस्व सरमा और अरुणाचल में कालिको पुल जैसे नेता पार्टी का साथ छोड़ गए हैं।
दूसरी ओर क्षेत्रीय स्तर पर पार्टी का साथ कई ताकतवर नेताओं ने छोड़ा है। पार्टी के वरिष्ठ नेता मानते हैं कि असम में हार को टाला जा सकता था। हिमंत विस्व सरमा को रोकना चाहिए था। पार्टी सूत्रों के अनुसार अहमद पटेल और दिग्विजय सिंह चाहते थे कि असम में गोगोई को हटाकर सरमा को उनकी जगह लाया जाए। पर राहुल गांधी ने बात नहीं मानी। तरुण गोगोई अपने बेटे को बढ़ावा देना चाहते थे। वरिष्ठ नेताओं और राहुल गांधी के बीच पटरी को बैठाना पार्टी के सामने बड़ी चुनौती है। पिछले दो साल में कांग्रेस को हरियाणा, राजस्थान, महाराष्ट्र, झारखंड, आंध्र प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, असम और केरल में हार का मुंह देखना पड़ा है। इस दौरान उसे अकेली जीत अरुणाचल में मिली थी, जहां पार्टी में हुई बगावत के बाद सरकार भी हाथ से गई। यह कहानी उत्तराखंड में भी दोहराई गई, पर भाजपा के कुछ नेताओं की उतावली और नादानी के कारण वह बगावत विफल हो गई। अब कांग्रेस के पास कर्नाटक ही बड़ा राज्य बचा है। शेष हैं उत्तराखंड, हिमाचल, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम और पुदुच्चेरी का केन्द्र शासित क्षेत्र।
वैचारिक असमंजस
पिछलेे साल 56 दिन के प्रवास के बाद राहुल गांधी की वापसी के समय पार्टी में उत्साह था। उसके बाद संसद के मानसून सत्र में कांग्रेस ने छापामार रणनीति का सहारा लिया। उससे ऐसा लगा कि पार्टी संसद में अपनी भूमिका को बढ़ाएगी। पर ऐसा हुआ नहीं। कांग्रेस ने भूमि अधिग्रहण कानून में संशोधन और जीएसटी कानून को रोककर राज्यसभा में अपने संख्याबल का परिचय जरूर दिया, पर यह सकारात्मक भूमिका नहीं थी। इससे वोटर के बीच कोई अच्छा संदेश नहीं गया। सन् 1991 में उदारीकरण की शुरुआत करने वाली पार्टी ने सन् 2004 में वाममोर्चे की मदद से यूपीए-1 बनाया और नीतियों को बाएं बाजू मोड़ दिया। अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील के कारण यूपीए-1 टूटा। उम्मीद थी कि यूपीए-2 उदारीकरण से जुड़े अधूरे काम पूरे कर लेगा, पर ऐसा हुआ नहीं। कांग्रेस वैचारिक रूप से देश के गरीबों और मध्यवर्ग के बीच के अंतर्विरोधों को सुलझाने में नाकामयाब रही। आज भी पार्टी के पास ऐसा कोई कार्यक्रम नहीं है जो उसे देश में लोकप्रिय बना सके।
राहुल गांधी ने 2014 में पार्टी के महासचिवों से कहा था कि वे कार्यकर्ताओं से सम्पर्क करके पता करें कि क्या हमारी छवि 'हिन्दू विरोधी' पार्टी के रूप में देखी जा रही है। पचास के दशक में जब हिन्दू कोड बिल पास हुआ था तबसे कांग्रेस पर हिन्दू विरोधी होने के आरोप लगते रहे हैं। पर कांग्रेस की लोकप्रियता में तब कमी नहीं आई। साठ के दशक में गोहत्या विरोधी आंदोलन भी उसे हिन्दू विरोधी साबित नहीं कर सका।
अस्सी के दशक में मीनाक्षीपुरम के कन्वर्जन के बाद इंदिरा गांधी ने अपनी छवि हिन्दू-मुखी बनाने का बाकायदा प्रयास किया। उनके उत्तराधिकारी राजीव गांधी ने राम जन्मभूमि आंदोलन का रुख अपनी और मोड़ने की कोशिश भी की। अयोध्या में ताला खुलवाने और शिलान्यास कराने के कार्यक्रम कांग्रेस सरकार के इशारे पर ही हुए थे। लोकसभा चुनाव के बाद एके एंटनी ने केरल में पार्टी कार्यकर्ताओं से कहा था कि 'छद्म धर्मनिरपेक्षता' और अल्पसंख्यकों के प्रति झुकाव रखने वाली अपनी छवि को सुधारना होगा। पर कैसे सुधारेंगे ऐसी छवि?
क्षेत्रीय दलों का सहारा
पिछले साल पार्टी ने जेडीयू और आरजेडी के साथ बिहार में महागठबंधन का रास्ता चुना था। पर असम में एआईयूडीएफ के साथ गठबंधन के लिए पार्टी तैयार नहीं हुई। बंगाल और असम में मुस्लिम वोट महत्वपूर्ण थे। यह वोट उत्तर प्रदेश में भी महत्वपूर्ण होगा। पर कांग्रेस को वहां कोई प्रभावशाली दोस्त अभी तक नहीं मिला है। उत्तर प्रदेश में इस वोट पर मुलायम सिंह का कब्जा है। पार्टी यदि असम और बंगाल में सफल होती तभी उत्तर प्रदेश पर असर पड़ता, भले ही वह केरल में हार जाती। दिक्कत यह है कि पार्टी को मुस्लिम वोट चाहिए, मुस्लिमपरस्त पार्टी की छवि नहीं चाहिए। उसे भाजपा का विरोध करना है, पर हिन्दू विरोधी छवि नहीं चाहिए।
आत्म मंथन बीती बात हो गया है। अब कार्य करने का समय आ गया है। अब आगे बढ़ने का समय है और कुछ प्रत्यक्ष बदलावों का भी जिन्हें दुनिया और देश भी देख सके। क्योंकि 2014 के बाद से कुछ वर्षों से विचार, भाव और आत्मनिरीक्षण की प्रक्रिया को स्थान मिलना चाहिए। अब नेतृत्व के लिए समय आ गया है कि आत्ममंथन के निचोड़ को निकालकर आवश्यक कार्रवाई की जाए। राहुल गांधी को जल्दी से जल्दी कांग्रेस की कमान संभाल लेनी चाहिए।''
राहुल के कारण ही कांग्रेस की हालत खराब हुई है उन्हें संगठन को मजबूत करने वाले नेता नहीं चाहिए बल्कि केवल 'यस मैन' चाहिए।
—गुलचैन सिंह चाढक,
पूर्व मंत्री, जम्मू-कश्मीर सरकार
कांग्रेस के सामने हैं चार चुनौतियां
लगातार होती पराजय को रोकना
संगठन के भीतर बढ़ती जूतम पैजार पर काबू पाना और कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ाना
राहुल गांधी के नेतृत्व को मजबूत करना
पार्टी को नया वैचारिक आधार प्रदान करना
कांग्रेस अब क्षेत्रीय पार्टी के रूप में भी नहीं बची है। जिस तरह उसका आंध्र प्रदेश, ओडि़शा, तमिलनाडु और बंगाल से सफाया हुआ, उसे देखते हुए लगता है कि पूवार्ेत्तर के राज्यों में भी उसकी यही दशा होगी। कई राज्यों में पार्टी दूसरे स्थान पर भी नहीं है। वह अब क्षेत्रीय दलों का मुंह देख रही है। कांग्रेस संकट में होती है तो वह सोचना शुरू करती है। 1974 में नरोरा का शिविर जय प्रकाश नारायण के आंदोलन का राजनीतिक उत्तर खोजने के लिए था। 1998 का पचमढ़ी शिविर 1996 में हुई पराजय के बाद बदलते वक्त की राजनीति को समझने की कोशिश थी। सन् 2003 का शिमला शिविर गठबंधन की राजनीति की स्वीकृति के रूप में था। नवीनतम शिविर जनवरी 2013 का जयपुर चिंतन शिविर था, जिसमें राहुल गांधी के आरोहण की कामना की गई थी। पार्टी अपने उस संकल्प को पूरा कर रही है। इसके आगे क्या होगा, कहना मुश्किल है।
सन् 1977 और 1989 में जब कांग्रेस पराजित हुई थी तब कोई वैकल्पिक राजनीतिक ताकत देश में खड़ी नहीं हो पाई थी। सन 1996 में भाजपा बड़ी पार्टी के रूप में थी, पर उसे बाहरी मदद की जरूरत थी। 1998, 1999 और 2004 में भी भाजपा इतनी बड़ी ताकत नहीं थी। कांग्रेस हर हाल में भाजपा से बड़ी पार्टी थी। पर इस समय भारतीय जनता पार्टी राज्यों में अपनी ताकत लगातार बढ़ा रही है। कांग्रेस ने इसके पहले जब भी 'बाउंसबैक' किया है तब उसके पीछे राज्यों की ताकत होती थी। 2014 के पहले के लोकसभा चुनावों में हारने के बावजूद विधानसभाओं में उसकी काफी ताकत होती थी। यह पहला मौका है जब विधानसभाओं में उसकी ताकत क्षीण होती जा रही है। देश के 10 सबसे बड़े राज्यों में से केवल एक (कर्नाटक) में उसकी सरकार है। हो सकता है कि अगले लोकसभा चुनाव के पहले 2018 में वह भी उसके हाथ से निकल जाए। कांग्रेस के सामने चुनौती है ढलान पर उतरते अपने रथ की दिशा बदलने की। यह कैसे होगा?











