|
तीन मील लम्बा जुलूस: दो लाख लोग सम्मिलित
प्रिंसिपल घोष द्वारा अध्यक्षता
निज प्रतिनिधि द्वारा।
मुखर्जी। नगर (जालंधर): गत 27 मई को भारतीय जनसंघ के प्रधान प्रिंसिपल श्री देवप्रसाद जी घोष की अध्यक्षता में जो महापंजाब सम्मेलन संपन्न हुआ, वह पंजाब के इतिहास में चिरस्मरणीय रहेगा। इस सम्मेलन में पंजाब, पेप्स तथा हिमांचल प्रदेश की 2 लाख जनता ने सोत्साह भाग लिया।
इस सम्मेलन में एक स्वर से सरकार द्वारा प्रस्तुत की गई 'क्षेत्रीय समिति योजना' को राष्ट्रघातक घोषित करते हुए हर संभव तरीके से उसका मुकाबला करने का निश्चय किया गया। सम्मेलन ने सरकार से यह भी मांग की कि राज्यपुनर्गठन आयोग द्वारा पंजाब के संबंध में की गई सिफारिशों को तुरंत कार्यान्वित किया जाए।
जुलूस: इस अवसर पर सम्मेलन के अध्यक्ष श्री घोष के स्वागत में जो जुलूस निकाला गया वह जालंधर के इतिहास में सबसे बड़ा जुलूस था। जुलूस की लम्बाई 2 मील थी और उसमें लगभग 3 लाख लोगों ने भाग लिया। इस जुलूस ने स्टेशन से लेकर मुखर्जी नगर तक के 4 मील लम्बे रास्ते को 6 घंटों में तय किया और प्रात: 7 बजे प्रारम्भ होकर दोपहर के 1 बजे अपने गंतव्य स्थान पर पहुंच पाया। जुलूस में मजहबी सिखों के अतिरिक्त बहुत से अन्य सिख भी शामिल थे। जुलूस में स्त्रियां हजारों की संख्या में शामिल थी। चिलचिलाती धूप में भी वे अंत तक जुलूस में शामिल रहीं और उनमें अन्य राज्यों की अपेक्षा अधिक उत्साह दिखाई देता था।
मुस्लिम जमात सम्मेलन
भारत में इस्लामी राज्य की स्थापना के घातक मनसूबे
शासन पलटने की जोरदार धमकियां
निज प्रतिनिधि द्वारा।
फर्रुखाबाद।''हमें वह समय याद है जिस समय इस्लाम बड़ी बहादुरी से इस देश में आया था। वह देश के गली-कूचों तक में छा गया था और हमने 800 वर्ष तक यहां राज्य किया और यहां की सभ्यता, संस्कृति तथा एक नए जीवन का निर्माण किया था—15 अगस्त, 1947 के पश्चात् इस्लाम पर जो बरबादी, तबाही तथा गर्दिश के बादल मंडराए उनका कोई ठिकाना नहीं और आज जो मुसलमानों की हालत है और कांग्रेसी नेता हमारी हमदर्दी की बातें करते हैं, वह तस्वरी का एक पहलू है। अत: मुसलमानों, अल्लाह का नाम लेकर उठो और इस्लाम को फिरसे जिन्दा करो और अपने अधिकारों की रक्षा के लिए एकत्र होकर तैयार हो जाओ क्योंकि आपको अपनी हिफाजत खुद करनी है।'' ये शब्द मुस्लिम जमात के द्वितीय अखिल भारतीय अधिवेशन के अध्यक्ष पद से भाषण देते हुए कलकत्ता के भू. पू. मेयर श्री बदरुद्दज्जा ने कहे।
यह अधिवेशन फर्रुखाबाद में मदरसा मुफ्ती साहब में 'मुस्लिम जमात जिन्दाबाद' 'नाराए तदबीर' के नारों के साथ प्रारम्भ हुआ, सम्मेलन में उत्तर प्रदेश के विभिन्न जिलों के अतिरिक्त दिल्ली, मध्य प्रदेश, पटना, चरखारी, मध्यभारत तथा कलकत्ता से आए हुए 50 प्रतिनिधियों ने भाग लिया।
सरकार को झुकना पड़ेगा!
प्रतिनिधियों का स्वागत करते हुए खान अब्दुल अलील खान ने कहा कि फर्रुखाबाद का यह अधिवेशन बहुत ही महत्वपूर्ण है, जिसमें हमें मुस्लिम जनता की भलाई के लिए कदम उठाने हैं और ऐसे अवसर पर जबकि एकता तथा संगठन को आवश्यकता है हमारे कुछ साथी फूट डालने का प्रयत्न कर रहे हैं। यह बात हमारे लिए घातक सिद्ध होगी। एक वह समय था जब यहां के बादशाह थे और आज हमारी भाषा, संस्कृति तथा सभ्यता को कुचला जा रहा है। श्री खान ने आगे कहा कि आज हमें पंचमांगी और पाकिस्तान का हिमायती बताया जाता है तथा हमारी भाषा को लुप्त करने के प्रयत्न किए जा रहे हैं जबकि उर्दू संसार की तीसरी अंतरराष्ट्रीय भाषा है किन्तु हम साफ तौर से कह देना चाहते है कि हम इन बातों से बाज नहीं आने वाले हैं। यदि हमारे मुस्लिम भाई, जो भारत में है या पाकिस्तान में हैं, उनको तकलीफ होगी तो उनकी कसक हमारे दिलों को भी तकलीफ देगी और हम हर संभव बलिदान करके उनकी सहायता करेंगे। सैयद बदरूई जाखां ने अपने अध्यक्षीय भाषण को प्रारंभ करते हुए कहा कि आज मुसलमान बड़े नाजुक दौर से गुजर रहे हैं। हमें वह समय भी याद है जिस समय इस्लाम बड़ी बहादुरी से इस देश में आया था और देश के गली-कूचों में तक छा गया था और हमने 800 वर्षों तक राज किया और यहां की सभ्यता , संस्कृति तथा एक नए जीवन का निर्माण किया।
अपनी नित्य नूतन इच्छाओं की पूर्ति
प्राकृतिक साधन-सामग्री और अर्थव्यवस्था की सीमाओं का विचार इससे पूर्व किया जा चुका है। अब 'संयमित उपयोग' के बारे में दीनदयाल जी के विचार क्या थे, देखें। दीनदयाल जी कहते हैं- एक ओर तो हम अपनी नित्य नूतन इच्छाओं की पूर्ति के लिए नए-नए साधनों की खोज कर रहे हैं और दूसरी ओर अनेक नयी समस्याएं उत्पन्न संपूर्ण मानवता के नष्ट होने का संक्ट पैदा रहा है। अत: हमारी अर्थव्यवस्था का उद्देश्य असीम भोग नहीं, संयमित उपभोग ही होना चाहिए। दीनदयाल जी कहा करते थे-''अर्थशास्त्र में भौतिक उद्देश्यों के साथ ही आध्यात्मिक उद्देश्यों का भी विचार करना पड़ेगा।'' उपरिनिर्दिष्ट उद्धरण में पंडित जी जब 'संयमित उपभोग' का प्रतिपादन करते हैं तब वे वास्तव में अर्थनैतिक मूल्यों का बोध जाग्रत कराते हैं।
—पं. दीनदयाल उपाध्याय
(पं. दीनदयाल उपाध्याय विचार-दर्शन, खण्ड-4, पृष्ठ संख्या-34)











