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जल संरक्षण
इरादों से फूटी जलधार
तेज धूप और पानी को तरसते सूखे गले। मई की इस तपन में रीते ताल-तलैयों ने हाहाकार की सी स्थिति पैदा कर दी है और इस स्थिति में मानव समाज की लापरवाही का भी हाथ है। लोग पानी के मोल को समझते हुए भी नासमझ बने रहते हैं। लेकिन इसी समाज में कुछ लोग हैं, जो आगे बढ़ते हैं, जिम्मेदारी लेते हैं और प्रेरणा देते हैं। फिर चाहे वे सिमोन उरांव हों, डॉ. मलाली गौडा, मनसुखभाई सुवगिया, बीजाडीह गांव के आदिवासी या फिर म.प्र. की बंजारा समुदाय की महिलाएं। उन्होंने रास्ता दिखाया है कि पानी की समस्या होने के बावूजद अगर ठान लिया जाये तो संकट से उबरने का रास्ता ढंूढना मुश्किल नहीं है। तपती गर्मी के इस मौसम में उनकी दास्तान सुनाने का मकसद यही है कि इससे हम प्रेरणा लेकर अपने-अपने इलाकों में पानी को बरबाद न करके अभाव एवं संकट के समय के लिए इसका भंडारण करें
अश्वनी मिश्र
सुबह का यही कोई 5 बजे का समय होगा। सिर पर गमछा बांधे, हाथों में छड़ी लिए सामान्य वेशभूषा वाले 83 वर्ष के सिमोन उरांव अपने गांव के लोगों के साथ जंगल में टहल रहे हैं। सिमोन हर रोज 4 बजे उठकर खेत और जंगल की ओर अपने कुछ साथियों के साथ निकल पड़ते हैं। वे अपने द्वारा लगाये गए सैकड़ों पौधों को देखने जाते हैं, जो आज जंगल का रूप ले चुके हैं।
झारखंड के रांची के बीडो ब्लॉक के खक्सी टोली गांव के सिमोन उरांव अपने इलाके में 'बाबा' के नाम से जाने जाते हैं तो दूसरी ओर उन्हें राज्य के लोग 'वाटर मैन' भी बुलाते हैं। सिमोन वे व्यक्ति हैं, जिन्होंने न सिर्फ अपने गांव को सूखे की समस्या से छुटकारा दिलाया बल्कि आसपास के 51 गांवों को भुखमरी और बदहाली के कगार पर पहुंचने से भी बचाया है। सिमोन ने दृढ़ संकल्प, साहस और प्रकृति से मिले व्यावहारिक ज्ञान के बल पर हजारोंं लोगांे के जीवन में नई आस जगाने का काम किया है। उन्होंने कम पढ़े-लिखे होने के बावजूद अपनी ग्रामीण तकनीक से जल प्रबंधन और वन संरक्षण को नया आयाम दिया है। और अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर दर्जनों कुएं, तालाब, बांध बनाए हैं। उनके जज्बे को देखकर एकबारगी हैरानी होती है। उनकी उम्र देखकर कोई भी उनके काम का अंदाजा नहीं लगा सकता। उम्र की बात छेड़तेे ही वे कहते हैं,''मुझे कभी लगता ही नहीं कि मैं 83 वर्ष का हूं। अरे! अभी तो मैं 20 साल का युवा हूं।'' सिमोन ने इलाके में अपने गांव के लोगों के साथ मिलकर जल संचयन के लिए सैकड़ों बांध बनाए और अधिकतर तालाबों को जोड़कर जलाशय का निर्माण कर डाला। इन्हीं से आज 51 गांवों में पानी पहुंचता है, जिसके कारण इन गांवों मेंे करीब 25000 मीट्रिक टन सब्जियों की पैदावार होती है। 51 गांवों में सिमोन ने जल-जंगल और जमीन तीनों प्राकृतिक चीजों को सहेजे रखने में प्रभावी भूमिका निभाई है।
असल में सिमोन के जीवन में 1950 में बदलाव आया जब इलाके में भयंकर सूखे के हालात हो गए। लोग भूख के कारण इलाके को छोड़ने लगे। बस यह स्थिति सिमोन से नहीं देखी गई। पढ़ाई को अधर में ही छोड़कर वे पानी की समस्या को सुलझाने की कोशिश करने लगे।
सिमोन कहते हैं,''बात 1955 की होगी। जब पेड़ों की अंधाधुंध कटाई और बदलते मौसम चक्र के कारण यह इलाका पानी की कमी से जूझ रहा था। पीने के पानी के लिए लोगों को कई-कई किलोमीटर दूर जाना पड़ता था। मुझे यह बात सदैव खटकती थी। मैं बार-बार सोचता था कि इस समस्या को कैसे सुलझाया जाए। इसी दौरान एक दिन बारिश पर ध्यान गया तो देखा, पानी का एक तेज बहाव ऊंचाई से गिर रहा है और नीचे आकर कई धाराओं में बंटकर बहा जा रहा है। उस समय मुझे लगा कि क्यों न यहां पर बांध बना दिया जाए ताकि वर्षा का पानी जो बहकर नदियों में मिल जाता है, वह यहां संरक्षित हो जायेगा और गांव के लोगों की जो पानी की समस्या है, वह सुलझ जायेगी।'' वे बताते हैं,''मैंने अपने कुछ साथियों के साथ मिलकर 1961 में जयघट में एक बांध बनाने का काम शुरू किया। लेकिन उस दौरान अधिक बरसात हुई और वह पानी के तेज बहाव के चलते टूट गया। मैंने हार नहीं मानी और इससे अधिक मजबूत बांध बनाने की ठानी। ऐसे में हम सभी ने जल संसाधन विभाग की मदद से ठोस कंक्रीट से 45 फुट ऊंचे बांध का निर्माण कराया।''
काम करते समय आई चुनौतियों के बारे में सिमोन कहते हैं,''नहर और बांध बनाने के समय लोगों को समझाना बड़ा मुश्किल काम था। मैंने एक दिन आस-पास के गांवों से लोगों को एकत्र किया और उनसे बांध बनाने के लिए जमीन मांगी। लेकिन लोगों ने इसमें ना-नुकूर किया। इसे देखकर मैंने खुद की जमीन को बांध बनाने में लगा दिया। हरिहरपुर, जमटोली, खाक्सी टोली, बैतोली और भसनंदा में कई तालाब बनाए और उन्हें बांध से जोड़ा। बस यही कोशिश रंग लाई और गांव के पास तालाब और बांध में काफी पानी जमा होने लगा। आज इन बांधों में इतना पानी जमा हो जाता है कि कम से कम एक सीजन की खेती की सिचाई इससे की जा सकती है।''
सिमोन कहते हैं,''पानी की समस्या भविष्य में न हो इसके लिए गांव के लोगों को लेकर एक नियम बनाया है कि अगर कोई एक पेड़ काटता है तो उसे 10 पेड़ लगाने ही हैं।''
सिमोन के दशकों से किये जा रहे अथक प्रयास का परिणाम आज यहां देखा जा सकता है। इलाके के 51 गांवों में पानी के संरक्षण के लिए दर्जनों तालाब और कुएं हैं । पानी की कमी के समय यह पानी पीने और अन्य उपयोगों में काम आता है। जल संरक्षण के साथ-साथ पूरे इलाके में वनों की कटाई न हो, इसके लिए सभी प्रयास करते हैं। सिमोन ने अब तक खुद 30,000 से ज्यादा पेड़ लगाये हैं तो वहीं गांव के लोगों द्वारा भी वृक्ष लगाने का सिलसिला चल रहा है। आज भी गांव में सिमोन के नेतृत्व में हर सप्ताह गुरुवार को सुबह 6 बजे बैठक होती है, जिसमें वन रक्षा, पानी संचय एवं अन्य विषयों को लेकर चर्चा की जाती है। सामान्य से दिखने वाले सिमोन की कर्मठता और ठोस इरादों को मूर्त रूप देने के लिए केन्द्र सरकार की ओर से उन्हें हाल ही में पद्मश्री से सम्मानित किया गया है। वहीं झारखंड सरकार ने उन्हें 'जल छाजन मिशन' का ब्रांड एंबेसडर भी बनाया है।
एक नजर काम पर
नाम : सिमोन उरांव
स्थान : रांची से 35 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है बीडो ब्लाक का खक्सी टोली गांव
काम : जल संचयन के लिए सैकड़ों बांध बनाये और अधिकतर तालाबों को डैम से जोड़कर जलाशय का निर्माण किया। इन्हीं से आज 51 गांवों में पानी पहुंचता है। सिमोन ने करीब 30 हजार से ज्यादा पेड़ लगाये हैं, जो आज जंगल का रूप ले चुके हैं।
विशेषता : केन्द्र सरकार ने हाल ही में पद्मश्री पुरस्कार से सम्मानित किया।











