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निशांत कुमार आजाद
बनारस ऐतिहासिक रूप से संस्कृति का प्रमुख केंद्र रहा है और मनुष्यों के निवास की दृष्टि से इसे दुनिया के प्राचीनतम शहर होने का गौरव प्राप्त है। यहां धर्म, संस्कृति और ज्ञान के कई संस्थान हैं, जो बनारस की सांस्कृतिक समृद्धि को संबल प्रदान करते हैं, लेकिन इनमें सबसे महत्वपूर्ण है काशी हिन्दू विश्वविद्यालय। अंग्रेजी में इसे बनारस हिन्दू विश्वविद्यालय (बीएचयू) कहा जाता है। इस साल बीएचयू अपना शताब्दी वर्ष मना रहा है और यही समय है विश्वविद्यालय के इतिहास में झांकने और इसकी समसामयिक प्रासंगिकता को परखने का। 1,360 एकड़ में फैला यह विश्वविद्यालय इसके संस्थापक मालवीय जी की दूरदर्शिता और वास्तुकला में उनकी अभिरुचि का सजीव प्रमाण है। विश्वविद्यालय का मानचित्र शुक्ल पक्ष की अष्टमी के चांद के समान है, जो समस्त दशाओं में एक समान रहता है। विश्वविद्यालय में एक-एक ईंट सोच-समझकर विशेष प्रयोजन से रखी गई है और हर ईंट पर हिन्दी में 'काशी हिन्दू विश्वविद्यालय' लिखा गया है। यह विश्वविद्यालय इतना दिव्य है कि जिन लोगों ने प्राचीन नालंदा और तक्षशिला विश्वविद्यालयों के बारे में सुना या पढ़ा है वे काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के परिसर में आकर उनकी अनुभूति कर सकते हैं।
इस विश्वविद्यालय की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहां नर्सरी से लेकर डॉक्टरेट तक की शिक्षा दी जाती है और विश्व में शायद ही कोई ऐसा विषय हो जिसकी पढ़ाई न होती हो। विश्वविद्यालय में प्राच्य विद्या और आधुनिक शिक्षा का समावेश है। इस समावेश को विश्वविद्यालय के कुलगीत के रचयिता और महान वैज्ञानिक प्रो. शान्ति स्वरूप भटनागर ने इन शब्दों में व्यक्त किया है-
'मधुर मनोहर अतीव सुन्दर
यह सर्व विद्या की राजधानी,
प्रतीचि-प्राची का मेल सुन्दर
यह विश्व विद्या की राजधानी।'
इसे सुरों में ढाला था प्रसिद्ध संगीतकार पंडित ओंकार नाथ ठाकुर ने। मालवीय जी इस विश्वविद्यालय के जरिए युवाओं को आधुनिक शिक्षा के साथ-साथ अपनी संस्कृति, अपने धर्म, अपनी माटी, अपनी भाषा सबमें पारंगत कराना चाहते थे। इसलिए उन्होंेने आधुनिक शिक्षा का भारतीयकरण कर स्थानीय आवश्यकताओं के अनुरूप ढालने के लिए विश्वविद्यालय में इंजीनियरिंग, मेडिकल और कृषि संकायों की तो स्थापना की ही, साथ-साथ संस्कृत विद्या और धर्म विज्ञान संकाय की भी नींव डाली। भारत ही नहीं विश्व में भी अपने ढंग का यह अनोखा संकाय है जिसका मुख्य उद्देश्य है प्राचीन ज्ञान को खंगाल कर उसे आज के संदर्भ में सामयिक बनाकर विश्व के सामने रखना।
विश्वविद्यालय के सिंह द्वार (मुख्य द्वार) पर महामना की विशाल प्रतिमा लगी है। वहीं वे आगन्तुकों का स्वागत करते हैं। सिंह द्वार से प्रवेश करते ही बाईं ओर महिला महाविद्यालय दिखाई पड़ता है। दाहिनी ओर पूर्वी भारत के 'एम्स' के नाम से विख्यात चिकित्सा संस्थान का 'सर सुन्दरलाल चिकित्सालय' है, जो कम खर्च में प्रतिदिन हजारों मरीजों की सेवा आज भी करता है। आधुनिक युग की आवश्यकता का एहसास कराते हुए चिकित्सा संस्थान, चिकित्सालय के सामने ही स्थित है और विश्वविद्यालय के अंतिम छोर पर स्थित इंडियन इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी महामना के सपनों को कभी विस्मृत नहीं होने देता।
एक लंबे संघर्ष के बाद 1916 में संसदीय कानून (बीएचयू अधिनियम, 1915) के तहत इस विश्वविद्यालय की स्थापना हुई। इस तरह महामना के सपनों को उड़ान भरने और छात्रों के साथ विषयों की विविधता का उत्सव मनाने को पंख मिल गए थे। मालवीय जी ने अपने सपनों के विश्वविद्यालय की स्थापना के संबंध में अपनी इच्छा का सार्वजनिक इजहार 1905 के भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के बनारस अधिवेशन में किया था। उसके बाद 1911 में उन्होंने अपनी योजना बतातेे हुए कहा, ''गरीबी की चंगुल में फंसे लाखों लोगों को तभी छुटकारा मिल सकता है जब विज्ञान का उपयोग उनके हित में हो।'' बीएचयू के बारे में उनकी दृष्टि, प्रत्येक भारतीय के लिए वैज्ञानिक ज्ञान की उपलब्धता कराने की दिशा में एक ठोस पहल थी।
बीएचयू ने आधुनिक और समकालीन भारत के इतिहास में हमेशा एक प्रभावशाली भूमिका निभाई है। 1942 का भारत छोड़ो आंदोलन हो या आपातकाल (1975) के दौरान अत्याचारों के खिलाफ विरोध प्रदर्शन, बीएचयू के छात्र और शिक्षक स्वतंत्रता संग्राम के आदशार्ें पर अडिग रहे। एक साल पहले विश्वविद्यालय ने औपनिवेशिक काल से चले आ रहे दीक्षांत समारोह के तौर-तरीकों में बदलाव करते हुए गाउन की जगह भारतीय पारंपरिक परिधानों को अपनाते हुए एक महत्वपूर्ण संदेश दिया। बेशक यह एक प्रतीकात्मक कदम ही है, फिर भी इसका असर तो गहरा ही पड़ता है। ऐसी पहल मालवीय जी के आदशार्ें के अनुकूल ही थी। महामना ने पश्चिमी आधुनिकता को अंगीकार तो किया, लेकिन उन्होंने भारतीय और सनातन मूल्यों से कभी समझौता नहीं किया। ज्योतिष विभाग से लेकर कंप्यूटर विज्ञान और नाट्य-शास्त्र से लेकर नैनो-टेक्नोलॉजी के परस्पर दो ध्रुवों तक, विश्वविद्यालय ने अपने हर पहलू में विविधता को संजो रखा है।
विश्वविद्यालय के प्रतीक चिह्न में हंस पर बैठी देवी सरस्वती को वीणा बजाते हुए दिखाया गया है और ओंकार के बीच में स्थित कमल ज्ञान से अमरत्व प्राप्ति को प्रतिबिंबित करता है। विश्वद्यालय का यह चिह्न स्पष्ट करता है कि यह हिन्दू प्रतीकों के जरिए शैक्षिक और सांस्कृतिक आदशार्ें का प्रतिनिधित्व करता है। भारत की परंपरा और सांस्कृतिक अतीत के गौरव को बनाए रखना ही इस संस्था का लक्ष्य रहा है। इस दिशा में प्रयास का एक उल्लेखनीय उदाहरण है परिसर के अंदर स्थित एक समृद्ध सांस्कृतिक संग्रहालय—भारत कला भवन।
इसके अतिरिक्त बनारस हिंदू विश्वविद्यालय की एक और उल्लेखनीय विशेषता है इसके परिसर में स्थित भव्य विश्वनाथ मंदिर। मंदिर के ठीक सामने कुलपति कार्यालय है। मालवीय जी की कल्पना थी कि इस मंदिर के सामने कुलपति बैठेंगे तो उनमें सदैव शंकर का भाव रहेगा और विश्वविद्यालय की गरिमा बनी रहेगी।
वैज्ञानिक, मानव संसाधन और क्षमता का आधार तैयार करना विश्वविद्यालय का केंद्रीय उद्देश्य रहा है। गौरतलब है कि जब औपनिवेशिक सत्ता भारतीयों की तकनीकी शिक्षा पर ध्यान नहीं दे रही थी, बीएचयू ने ही इस दिशा में पहल की थी। 1919 में ही तीन कॉलेजों- बनारस इंजीनियरिंग कॉलेज, दि कॉलेज आफ टेक्नोलॉजी और कॉलेज आफ माइनिंग एंड मेटलर्जी, को मिलाकर इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी (आईटी) की स्थापना की गई। 1931 में यहां कृषि विज्ञान संस्थान की स्थापना की गई और तब बीएचयू कृषि विज्ञान में एम़ एससी. की शिक्षा देने वाला देश का पहला संस्थान बना। 1917 में प्रोफेसर पी़ के. तेलंग द्वारा दान की गईं पुस्तकों से बीएचयू का पुस्तकालय शुरू हुआ। हालांकि, वर्तमान केन्द्रीय पुस्तकालय बड़ौदा के महाराजा सयाजीराव गायकवाड़ से मिले दान से बना है। महलनुमा इमारत में बने इस पुस्तकालय में करीब 13 लाख किताबें हैं।
विश्वविद्यालय का हरा-भरा परिसर एशिया के चंद सबसे बड़े आवासीय परिसरों में से एक है। सस्ते भोजन, तेज इंटरनेट संपर्क समेत तमाम आधुनिक सुविधाओं वाले 60 से अधिक छात्रावासों में करीब 10,000 छात्रों के रहने की व्यवस्था है। शीर्ष विश्वविद्यालयों से जुड़े 'इंडिया टुडे और नीलसन' के सर्वेक्षण में बीएचयू हमेशा भारत के अग्रणी पांच विश्वविद्यालयों में रहा। परिसर के प्रमुख आकर्षणों में से एक साइबर लाइब्रेरी है। 200 से अधिक छात्रों के बैठने की क्षमता वाली यह वातानुकूलित साइबर लाइब्रेरी 24 घंटे खुली रहती है और यह विशेष तौर पर आर्थिक रूप से पिछड़े उन छात्रों के लिए है जो लैपटॉप नहीं खरीद सकते।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की दृष्टि में आज बीएचयू देश के निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। समाज विज्ञान विभाग समय-समय पर सम्मेलनों और गोष्ठियों का आयोजन करता है, ताकि सरकार को सुशासन का दायरा व्यापक बनाने में मदद मिले। विज्ञान और प्रौद्योगिकी से जुड़े विभाग ऐसी तकनीक विकसित करने के लिए बढ़ावा दे रहे हैं जो आम जनता को सशक्त बनाने में मदद करे।
बीएचयू के जनसंपर्क अधिकारी डॉ. राजेश सिंह कहते हैं, ''बीएचयू ने 100 साल पूरे कर लिए हैं, यह हम सभी के लिए गर्व का मौका है। यह संस्था कई कारणों से महान है और उनमें से एक है कि यह दुनिया का एकमात्र विश्वविद्यालय है जिसकी स्थापना राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य के साथ छात्रों के हित के लिए दिए दान से की गई। शिक्षा के साथ-साथ हम चरित्र निर्माण पर भी ध्यान देते हैं। छात्रों का चरित्र निर्माण बीएचयू के प्रमुख उद्देश्यों में एक है। धार्मिक और नैतिक शिक्षा को अपनी शिक्षा प्रणाली का अनिवार्य अंग बनाकर हम युवाओं में चरित्र निर्माण को बढ़ावा देने पर ध्यान देते हैं।'' विश्वविद्यालय में चंद नकारात्मक घटनाएं भी घटीं। 1987 में छात्र संघ के चुनाव के दौरान एक छात्र पुलिस की गोलीबारी में मारा गया। उस समय के कुलपति हरि गौतम ने बीएचयू को अनिश्चितकाल के लिए बंद करने का आदेश दे दिया था। हालांकि एक माह बाद विश्वविद्यालय खुला और पढ़ाई शुरू हुई, लेकिन छात्र संघ चुनाव अनिश्चित अवधि के लिए स्थगित कर दिया गया। तभी से एक पूर्ण छात्र संघ के गठन का मुद्दा विश्वविद्यालय में विवाद की जड़ बना हुआ है। बहरहाल, आज विश्वविद्यालय अपने अप्रिय अतीत को पीछे छोड़कर विश्वास के साथ आगे बढ़ता दिख रहा है। हिंदी भाषा से एम़ ए. कर रही श्रीलंका की सुगंधी कहती हैं,'मैं हिन्दी पढ़ने के लिए भारत आई हूं। मैं बीएचयू से हिंदी में मास्टर्स कर रही हूं और आगे की पढ़ाई भी हिंदी में ही करने की सोच रही हूं। बीएचयू के वातावरण में गजब की सकारात्मकता है। मैं हिन्दी दर्शन का अनुवाद श्रीलंकाई भाषाओं में करने की तैयारी कर रही हूं। वैसे, अभी रामायण पढ़ रही हूं।'
थौंग थाईलैंड से हैं और दर्शनशास्त्र में पी.एचडी. कर रहे हैं। वे कहते हैं, 'बीएचयू सवार्ेत्कृष्ट विश्वविद्यालय है और भारत में अध्ययन करने के लिए सबसे अच्छी जगह है। मुझे इसका हिस्सा बनने पर गर्व है। बीएचयू में मुझे विभिन्न धार्मिक और दार्शनिक शिक्षाओं के बारे में जानकारी प्राप्त करने का मौका मिला।'
संघर्ष और बदलाव के लिए आंदोलन की विरासत ने बीएचयू को प्रगति की राह पर अग्रसर रखा है।
पुराना है संघ और बीएचयू का रिश्ता
मालवीय जी और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के संस्थापक डॉ. हेगडेवार के समान विचार ने बीएचयू के निर्माण की बुनियाद रखी। एक अमेरिकी लेखक ने विश्वविद्यालय पर लिखी अपनी किताब में लिखा है कि आरएसएस और बीएचयू के उद्देश्यों की परस्पर समानता ने दोनों के बीच एक गहरे रिश्ते को विकसित करने में अहम भूमिका निभाई। उनकी विकास यात्रा लगभग समानांतर चली। डॉ. हेगडेवार द्वारा राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना के तत्काल बाद मालवीय जी को संघ के हिंदू हितों से जुड़े उद्देश्यों के बारे में मालूम हुआ और उन्होंने ड़ॉ. हेगडेवार से मुलाकात करने का विचार किया। उन दिनों डॉ. हेगडेवार प्रतिष्ठित व्यक्तियों से मुलाकात करते और उन्हें संघ के बारे में बताते। लेकिन मालवीय जी खुद डॉ. हेगडेवार से मिलने नागपुर गए और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के बारे में जानकारी ली। बात 1928 की है। उन दिनों महामना मालवीय हिंदू महासभा के अध्यक्ष थे। वे महासभा के वार्षिक सम्मेलन की अध्यक्षता करने अकोला पहुंचे। डॉ. हेगडेवार भी वहां मौजूद थे। अधिवेशन के बाद मालवीय जी नागपुर स्थित मोहिते के बाड़े में डॉ. हेगडेवार से मिले। यहीं संघ की पहली शाखा लगी थी और इसके पास ही इन दिनों आरएसएस का मुख्यालय है। उस समय उस जगह की स्थिति ठीक नहीं थी। यह देखकर मालवीय जी को बेहद अफसोस हुआ था। फिर भी,उन्होंने वहीं डॉ. हेडगेवार से भेंटकर कई मुद्दों पर चर्चा की। उनकी धारणा थी कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को धन की आवश्यकता है, लिहाजा उन्होंने डॉ. हेगडेवार को बताया कि लोग मुझे 'भिक्षुओं का राजकुमार' कहते हैं, इसलिए मैं आपके राष्ट्रीय कार्य के लिए आवश्यक राशि जमा कर सकता हूं। इस पर डॉ. हेगडेवार ने विनम्रतापूर्वक जवाब दिया कि मुझे धन नहीं, बल्कि जन की जरूरत है। अत: अगर आप मेरे इस राष्ट्रीय उद्देश्य के लिए ज्यादा से ज्यादा जन जुटा सकें तो वह सबसे बड़ी मदद होगी।
इसके बाद 1928-29 में डॉ. हेगडेवार ने 10-12 छात्रों का एक समूह बीएचयू भेजा। उनमें से एक भैयाजी दाणी थे। उन्हें स्पष्ट निर्देश दिए गए थे कि बीएचयू एक राष्ट्रीय विश्वविद्यालय है, जहां पढ़ने के लिए देशभर से छात्र आते हैं। उन छात्रों के साथ संवाद कायम करके उन्हें संघ कार्य के साथ जोड़ना होगा। यह संयोग नहीं कि महाराष्ट्र के बाहर संघ की पहली शाखा बीएचयू में शुरू हुई। इसका श्रेय बाबाराव सावरकर और भैयाजी दाणी को जाता है। धनधानेश्वनर नगर और विश्वविद्यालय शाखाएं करीब एक ही समय में शुरू हुईं। इस तरह, आरएसएस और बीएचयू के बीच एक मजबूत रिश्ता पल्लवित हुआ। भैयाजी दाणी के मार्गदर्शन में शाखाएं तेजी से फैलने लगी थीं।
1931 में एम. एससी. करने के बाद जब श्रीगुरुजी ने बीएचयू में अध्यापन शुरू किया तो यह श्रीगुरुजी और आरएसएस, दोनों के लिए एक महत्वपूर्ण मोड़ साबित हुआ। भैयाजी दाणी के प्रयासों से श्रीगुरुजी स्वयंसेवक बन गए। इस तरह जिस व्यक्ति ने भारत की आजादी के बाद की अवधि में लंबे समय तक संघ का नेतृत्व किया और उसके कार्यकलापों को नया स्वरूप प्रदान किया, वह इसी बीएचयू में आरएसएस के संपर्क में आया और काशी का संघचालक बना। बीएचयू परिसर में वर्षों तक संघ कार्यालय रहा। आपातकाल के समय तत्कालीन कुलपति ने उस कार्यालय को गिरवा दिया था।
मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग
1919 में मैनचेस्टर के प्रो़ चार्लिस ए़ किंग (बेनको के तत्कालीन प्राचार्य) के नेतृत्व में मैकेनिकल इंजीनियरिंग विभाग, आईआईटी (बीएचयू) की स्थापना हुई। इसने शिक्षण-ज्ञान का अनूठा माहौल तैयार किया और छात्रों को वास्तविक दुनिया की चुनौतियों से रुबरू कराया, साथ ही भारत में मैकेनिकल और इलेक्ट्रिकल इंजीनियरिंग में पहली बार डिग्री स्तर के कार्यक्रम पेश किए। विभाग द्वारा पिछले 5 वर्ष में हासिल उपलब्धियों में सैद्धान्तिक और व्यावहारिक क्षेत्रों में 25 अनुसंधान परियोजनाएं, 324 प्रकाशन, 15 किताबें और मशीन डिजाइन, थर्मल और फ्लुइड इंजीनियरिंग, प्रोडक्शन इंजीनियरिंग और औद्योगिक प्रबंधन के विभिन्न क्षेत्रों के अंतर्गत 8 परामर्श परियोजनाएं शामिल हैं। विभाग के हाल के विस्तार में फ्लेक्सिबल मैन्युफैक्चरिंग सिस्टम लैब, ऊर्जा और संसाधन विकास केंद्र की स्थापना शामिल है।
अंतरराष्ट्रीय छात्रावास
उच्च शिक्षा हासिल करने के लिए दुनिया के विभिन्न हिस्सों से काफी संख्या में छात्र बीएचयू आते हैं। युद्ध से जूझते देशों जैसे ईरान, इराक, सीरिया और कई अफ्रीकी देशों से भी छात्र लगातार यहां आ रहे हैं। इनमें से चंद छात्रों को जलवायु, भोजन आदि के साथ मेल बिठाने में मुश्किल होती है और घर की याद भी सताती है।
छात्रावास की वार्डन डॉ. प्रियदर्शिनी कहती हैं, ''मैं उन्हें भारतीय दर्शन और भारतीय त्योहारों के महत्व को समझाने की कोशिश करती हूं। पिछले साल पहली बार हमने विदेशी छात्रों के साथ होलिका दहन, गुलाल, गुझिया, संगीत और नृत्य के साथ-साथ ठंडाई का आनंद लिया। यह उनके जीवन के अद्भुत पल थे, क्योंकि वे पहली बार एक भारतीय त्योहार मना रहे थे जो विशेष रूप से उनके लिए आयोजित किया गया था। ये छात्र अब रक्षाबंधन, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी, दीपावली और सरस्वती पूजा भी मनाते हैं।''
हिन्दुस्तानी संगीत में अच्छी शिक्षा के लिए बीएचयू की ख्याति श्रीलंका में भी है। मेरे एक रिश्तेदार ने मुझे सलाह दी कि संगीत की शिक्षा लेनी हो तो बीएचयू जाओ। यहां पढ़ाई करना एक दिलचस्प अनुभव है। मैं इस विश्वविद्यालय का हिस्सा बनकर बहुत खुश हूं। यह विश्वविद्यालय वास्तव में अद्वितीय है।
—निसनसला, बी़ ए. संगीत की छात्रा
कृषि विज्ञान संस्थान
बीएचयू के प्रमुख आकर्षणों में से एक कृषि विज्ञान संस्थान है जिसने अधिक उपज देने वाली करीब 45 से ज्यादा फसलों की किस्मों का विकास किया जो खराब मौसम का भी सामना कर सकती हैं।
हर रविवार गीता पाठ
हर रविवार को मालवीय भवन में गीता पाठ होता है। यह परंपरा शुरू से ही निभाई जा रही है। इसमें कोई भी भाग ले सकता है। इस कार्यक्रम का उद्देश्य छात्रों के मन में आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार करना है।
गणितीय विज्ञान विभाग
अनुसंधान और विज्ञान विषयों से संबंधी प्रकाशन के क्षेत्र में इस विभाग का योगदान बहुत बड़ा है। अवकाश प्राप्त वैज्ञानिकों ने अपने योगदानों से इन प्रयासों को सार्थक दिशा दी है। विभाग ने 1,400 से अधिक शोध पत्र प्रकाशित किए हैं।
'मूल्यरहित शिक्षा निरर्थक'-त्रिपाठी
विश्वविद्यालय के कुलपति प्रो. गिरीश चन्द्र त्रिपाठी से निशांत आजाद की हुई बातचीत के प्रमुख अंश-
विश्वविद्यालय के पीछे मालवीय जी की मूल कल्पना क्या थी?
यह विश्वविद्यालय महान राष्ट्रवादी विचारक, शिक्षाविद्, स्वतंत्रता सेनानी और समाज सुधारक पं. मदन मोहन मालवीय जी के विचारों का साकार रूप है। वे चाहते थे कि शिक्षा ऐसा जरिया बने जिससे मानव का दिल और दिमाग साथ-साथ प्रबुद्ध बनें और इस उद्देश्य को पाने का आधार भारतीय संस्कृति और मूल्यपरक शिक्षा हो। इसी उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए उन्होंने समग्र शिक्षा के एक केंद्र के रूप में इस महान संस्था की नींव रखी। महामना चाहते थे कि शिक्षा राष्ट्र निर्माण के उद्देश्य को पूरा करे। इसलिए इस विश्वविद्यालय की स्थापना भारत को ज्ञान के क्षेत्र में संप्रभु बनाने के लिए की गई थी।
कई अन्य विश्वविद्यालय भी ऐसे ही आदर्शों और उद्देश्यों का पोषण कर रहे हैं, फिर बीएचयू उन विश्वविद्यालयों से अलग कैसे है?
दरअसल, महामना जी ने जिन उद्देश्यों को लेकर इस विश्वविद्यालय की स्थापना की थी, वही इन्हें अन्य विश्वविद्यालयों से भिन्न करते हैं। जहां अन्य विश्वविद्यालयों में करियर बनाने पर ध्यान दिया जाता है, वहीं बीएचयू का लक्ष्य राष्ट्र निर्माण है। बीएचयू में प्राचीन और आधुनिक ज्ञान का संगम है। यह एकमात्र ऐसा विश्वविद्यालय है, जिससे जुड़ीं छह विभूतियों को भारत रत्न प्रदान किया गया है। ये हैं- मालवीय जी, डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम, डॉ. भगवान दास, डॉ. सर्वपल्ली राधाकृष्णन, बिस्मिल्लाह खां और प्रो. सी़ एन. राव। इसी से इस विश्वविद्यालय के महत्व का पता चलता है।
अगर आकार की बात करें तो भारत या एशिया भर में बीएचयू के बराबर का कोई विश्विद्यालय नहीं है। विश्वविद्यालय का मुख्य परिसर 1,300 एकड़ से भी अधिक क्षेत्र में और दक्षिणी परिसर 2,764 एकड़ तक फैला है। आपने गौर किया होगा कि सरकारें अक्सर अपनी इच्छानुसार विश्वविद्यालयों की स्थापना करती हैं, पर बीएचयू का निर्माण राष्ट्र ने किया था और यही वजह है कि हर व्यक्ति को बीएचयू के साथ अपनापन महसूस होता है। यह राष्ट्र और राष्ट्र की इच्छा का प्रतिनिधित्व करता है। यह विश्वविद्यालय देश के सभी क्षेत्रों से प्राप्त सहयोग के साथ स्थापित किया गया था और इसी वजह से मैं समझता हूं कि आप किसी भी अन्य विश्वविद्यालय के साथ इसकी तुलना नहीं कर सकते। मालवीय जी का सपना था कि बीएचयू ज्ञान का केंद्र बने और उनकी कल्पना साकार हो रही है।
बीएचयू के प्रमुख उद्देश्यों में से एक है हिन्दू साहित्य और संस्कृति के अध्ययन को पुनर्जीवित करना। इस दिशा में बीएचयू किस हद तक सफल रहा है?
महामना जी ने बीएचयू में प्राचीन ज्ञान के साथ आधुनिक ज्ञान के समन्वय की कल्पना की थी। भारतीय दर्शन और भारतीय जीवन दर्शन में सृष्टि को सर्वशक्तिमान की अभिव्यक्ति और इस ग्रह को एक परिवार कहा गया है। भारतीय दर्शन का बुनियादी सार है 'सब खुश रहें!', मिलजुल कर रहने के सिवा कोई और विकल्प नहीं। इसे लिखित रूप से रखने, समृद्ध और संरक्षित करने की जरूरत है। इस उद्देश्य के लिए बीएचयू में 'भारत अध्ययन केन्द्र' खोलने का फैसला किया गया है। हम एक अमेरिकी विश्वविद्यालय के साथ आयुर्वेद पर काम कर रहे हैं। हम बुद्धिजीवियों को अपने साथ जोड़ने का प्रयास कर रहे हैं जो वैश्विक मंच पर भारतीय संस्कृति, कला और दर्शन को पहचान दिलाने के लिए काम करेंगे। जो शिक्षा मूल्यों की नींव न रख सके, वह निरर्थक है। इसलिए छात्रों में सांस्कृतिक प्रतिभा के पोषण के लिए हम मालवीय मूल्य अनुशीलन केन्द्रों को सशक्त करने की दिशा में काम कर रहे हैं।
पर्यावरण से संबंधित मुद्दों पर विश्वविद्यालय की पहल के बारे में कुछ बताएं।
ऊर्जा के वैकल्पिक स्रोतों को विकसित करने की जरूरत है और इसलिए बीएचयू में ग्रीन एनर्जी अध्ययन केंद्र स्थापित करने का निर्णय लिया गया है। हमने बीएचयू के दक्षिणी इलाके में एक सौर ऊर्जा परिसर की स्थापना की है। इसके अलावा मालवीय गंगा और नदी विकास एवं जल संसाधन प्रबंधन अनुसंधान केंद्र स्थापित करने की योजनाओं पर भी काम हो रहा है जो पूरी तरह से क्रमश:नदियों को बचाने और जल संसाधन प्रबंधन संबंधी अनुसंधानों और अध्ययन कार्यक्रमों पर केंद्रित होंगी। हमने बीएचयू के पूर्व छात्रों से संपर्क करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है और हमारा उद्देश्य है उनके साथ काम करके बीएचयू के अनुसंधान की गुणवत्ता को बेहतर बनाना।
जेएनयू विवाद पर आपकी क्या राय है?
जेएनयू के कुछ छात्रों के इन नारों में कि 'भारत की बर्बादी तक,जंग रहेगी,जंग रहेगी', देश को नुकसान पहुंचाने की मंशा झलकती है। वे देश के अंदर की बुराइयों या समस्याओं पर नहीं, बल्कि राष्ट्र पर हमला कर रहे हैं। अगर वे देश में मौजूद विसंगतियों और विरोधाभासों का विरोध करें तो कोई बुराई नहीं, लेकिन महिला सशक्तिकरण के नाम पर अगर वे मां दुर्गा का अपमान करें और दलितों के शोषण के मुद्दे पर महिषासुर का जयकारा हो, जो एक राक्षस था, तो यह अभिव्यक्ति की कैसी स्वतंत्रता है?
पूरी घटना निंदनीय है और इस अविवेकी हरकत का समर्थन कोई नहीं कर सकता। ऐसा अचानक नहीं होता। हम कल्पना भी नहीं कर सकते कि हमारे युवा राष्ट्र के खिलाफ नारेबाजी कर सकते हैं। उनके दिमाग में विष भरने का काम लंबे समय से हो रहा था। इस समस्या की जड़ों को खंगालने का समय आ गया है। यह एक बड़ी साजिश है और इसके समाधान के लिए हम सब को मिलकर विचार करने की जरूरत है। प्रोफेसरों की चंद जमातें ऐसी हैं जो राष्ट्रीयता की लक्ष्मण रेखा में विश्वास नहीं करतीं।
सामाजिक क्षेत्र में बीएचयू ने क्या योगदान किया है?
वर्तमान में बीएचयू ने नजदीकी इलाके के पांच गांवों के विकास का जिम्मा लिया है। हम ग्रामीण क्षेत्रों के बच्चों की प्रतिभा के विकास के लिए हर तरह की सुविधा मुहैया कराने का प्रयास रहे हैं। इसके अलावा, बीएचयू नियमित रूप से किसानों के कल्याण के लिए किसान मेलों का आयोजन करता है। इस कार्यक्रम के जरिए हम छोटे किसानों को नए बीजों और नई तकनीकों के बारे में पढ़ाते और सिखाते हैं। हम उन्हें सरकार के प्रमुख कार्यक्रमों के बारे में जानकारी देने की दिशा में भी काम कर रहे हैं।
बीएचयू में नया क्या है
बीएचयू में मालवीय गंगा,नदी विकास और जल संसाधन प्रबंधन अनुसंधान केंद्र स्थापित किए गए हैं जो पूरी तरह से नदियों और जल संसाधन प्रबंधन के प्रति समर्पित हैं। यह देश का एकमात्र केंद्र है जो पूर्णत: नदियों और जल संसाधन प्रबंधन पर अनुसंधान और शैक्षणिक कार्यक्रमों पर ही केंद्रित होगा।
महामना जलवायु परिवर्तन केंद्र
मालवीय मानवीय मूल्य केंद्र
भारत अध्ययन केंद्र : पारंपरिक और ऐतिहासिक संस्कृति
विश्वविद्यालय ने अमरीका,जर्मनी और कई देशों के विश्वविद्यालयों और महाविद्यालयों के साथ कई सहमति पत्र पर हस्ताक्षर किए हैं।
एशिया की सबसे बड़ी साइबर साइबर लाइब्रेरी करीब1़5 एकड़ में फैली हुई है, जबकि कार्य खंड दोमंजिला इमारत में स्थित है। यह एशिया की सबसे बड़ी साइबर लाइब्रेरी है। लगभग 500 कार्य खंडों सहित यहां कुल 455 कंप्यूटर लगाए गए हैं जो तेज गति वाले इंटरनेट संपर्क से लैस हैं। पूरा परिसर वाई-फाई की सुविधा से लैस है, लिहाजा इस केंद्र में अपने लैपटॉप के साथ आने वाले लोग साइबर लाइब्रेरी का इस्तेममाल कर सकते हैं। लाइब्रेरी
तेजस के प्रणेता बीएचयू के
आईआईटी-बीएचयू ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में बहुत अहम योगदान दिए हैं। भारत के हल्के लड़ाकू विमान (एलसीए) तेजस कार्यक्रम के प्रणेता कोटा हरिनारायण आईआईटी-बीएचयू के पूर्व छात्र हैं।











