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गत 13 नवम्बर को पेरिस में जबरदस्त आतंकी हमला हुआ था। इस स्पष्ट तौर पर, मजहबी आतंकी हमले से साफ हो गया है कि इस्लामिक स्टेट (आईएस) ने अब दुनिया को चुनौती देने की ताकत हासिल कर ली है। उस भीषण हमले में करीब डेढ़ सौ लोग मारे गए और सैकड़ों घायल हुए। उस घटना के फौरन बाद फ्रांस ने सख्त कार्रवाई की। हमले के दो ही दिन बाद माली में आतंकी हमला हुआ जिससे एक बार फिर साफ हो गया कि मजहबी आतंक की जड़ें काफी गहरी हो चुकी हैं। आईएस आज इस हालत में है कि दुनिया की महाशक्तियों को चुनौती दे। अब वह अपने सुरक्षित समझे जाने वाले क्षेत्र से आगे बढ़कर हमला करने लगा है। एक ओर तो वह मजहब के नाम पर खून की नदियां बहा रहा है तो दूसरी ओर ऐसी बयानबाजी कर रहा है जिससे पता चलता है कि वह मजहब के नाम पर वैसे ही हमले करने की राह पर है जैसा से अल कायदा करता रहा है।
पेरिस हमले की जिम्मेदारी लेते हुए आईएस ने जो कहा वह ध्यान देने लायक है। उसने कहा कि यह तो उसके आतंक का पहला झोंका है। उसने कहा कि फ्रांस में वेश्यावृत्ति और अश्लीलता चरम पर है। जाहिर है, फ्रांस की तरह ही यूरोप के बाकी देशों और कई अन्य में भी, जो खुले विचारों के हैं और जहां का समाज खुला है, वहां उनके प्रति भी आईएस का रवैया विरोध का होगा। आज ऐसा माहौल बना है कि अमरीका और लगभग सारे यूरोपीय देश हमलों को लेकर सतर्क और सशंकित हैं। बेल्जियम जैसे देश को देखें तो इस शंका का अंदाजा होगा। पेरिस में कुछ आतंकियों के मारे जाने के बावजूद अब तक यह साफ नहीं हुआ है कि वहां कितने आतंकी छुपे हुए हैं और उनका ताना-बाना कितना मजबूत है। यूरोप, वाशिंगटन और पश्चिमी एशिया के खुफिया अधिकारी यह जानने में जुटे हैं कि सीरिया के आईएस आतंकियों से जुड़े फ्रांसीसी और बेल्जियम हमलावरों के संजाल ने किस तरह फ्रांस के भीषण हमलों की साजिश रची और किस तरह उन्हें अंजाम दिया। पेरिस हमले का प्रभाव वैसे तो पूरी दुनिया पर पड़ना है, लेकिन सबसे ज्यादा प्रभाव यकीनन यूरोप के राजनीतिक और सामाजिक संबंधों के ताने-बाने पर पड़ेगा। सबसे नकारात्मक असर यूरोप के विभिन्न देशों में पश्चिम एशिया से हाल ही में पहुंचे या पहुंच रहे शरणार्थियों पर पड़ेगा। यूरोपीय देशों के स्थानीय नागरिकों में शरणार्थियों के प्रति कितना गुस्सा और घृणा उभर रही है इसका अंदाजा वहां के कई अखबारों की खबरों को देखकर लगाया जा सकता है। दक्षिणपंथी पार्टियों के लिए तो यह मौके जैसा है। इटली के एक दक्षिणपंथी अखबार ‘द लिबेरो’ ने ऐसा शीर्षक लगाया जो दिखाता है कि वहां की सामाजिक स्थिति में अचानक कैसा बदलाव आ गया है। कुछ दिनों पहले तक सीरियाई शरणार्थियों के प्रति जो लोग सहानुभूति रखते थे वे भी अब विरोध में उतर आए हैं। जर्मनी की चांसलर एंजेला मार्केल भी शरणार्थियों के प्रति नरम रवैया अपनाने के लिए लोगों के निशाने पर हैं। मौजूदा हालात को देखकर शायद मार्केल भी अपनी पुरानी राह पर कायम न रह पाएं। फ्रांस की जहां तक बात है, तो वहां के दक्षिणपंथी गुट के लोग भी अब खुलकर सामने आ रहे हैं।
नेशनल फ्रंट के नेता मैरीन ली पेन ने यह मांग उठाई है कि फ्रांस की सरकार अपनी सीमाओं की फिर से नाकेबंदी करे और देश में जितने भी इस्लामिक संगठन सक्रिय हैं उन पर पाबंदी लगा दी जाए। ली का शरणार्थी और दूसरे देशों से फ्रांस की नागरिकता लेने वाले नागरिकों के प्रति हमेशा से कड़ा रुख रहा है, लेकिन इस बार वे कहीं ज्यादा तल्ख हैं। उन्होंने यह भी मांग उठाई है कि ऐसे मजहबी स्थल, जो कथित तौर पर कट्टरता को बढ़ावा देते हैं, बंद कर दिए जाएं। इतना ही नहीं, अभी तक जिन शरणार्थियों को वहां शरण दी गई है उन्हें भी बाहर का रास्ता दिखा दिया जाए।
उन्होंने ऐसे फ्रांसीसी मुस्लिम नागरिकों को भी देश से निकालने की मांग रखी है, जिन्होंने दोहरी नागरिकता ले रखी है और अपने पुराने देश की पहचान भी अब तक बनाए रखे हुए हैं। उनकी मांग को ठुकरा भले दिया जाए लेकिन इससे इनकार नहीं किया जा सकता है कि फ्रांस के हजारों आम लोग ऐसी सोच रखते हैं। सवाल है कि क्या यह संभव है? बिल्कुल नहीं।
फ्रांस में आज 50 लाख मुस्लिम रहते हैं। वे कहीं और भेजे ही नहीं जा सकते। लेकिन कुल आबादी का दस फीसद भी अगर उन्हें भेजने की सोच रखता है तो फिर समाज में विखंडन होना तय है। यह भी नहीं भुलाया जा सकता है कि यूरोप के अधिकांश देश अभी कुछ ही दिनों पहले मंदी की मार झेल रहे थे। मंदी की आशंका अभी भी मंडरा रही है। लोगों में आर्थिक मोर्चे पर भी आशंका है। सामाजिक और राजनीतिक मोर्चे पर भी ऐसे हाल बने तो समस्या और गंभीर हो जाएगी। फिर इन सारे बिंदुओं का आकलन कर आईएस या उस जैसे अन्य आतंकवादी संगठन भी इन देशों में अपने पांव जमाने के मौके देखेंगे। एक बार उन्हें जड़ें जमाने का मौका मिल गया तो फिर यूरोपीय सरकारों के लिए उनसे निबटना काफी कठिन हो जाएगा।
इन हालात में आईएस के खिलाफ एकजुट होकर लड़ाई की जानी चाहिए। संयुक्त राष्टÑ सुरक्षा परिषद में आईएस के हमलों के विरुद्ध फ्रांस द्वारा पेश प्रस्ताव का सर्वसम्मति से पारित हो जाना सकारात्मक पहल है। इसमें सभी देशों से इस्लामिक स्टेट और अन्य आतंकी समूहों को हमले करने से रोकने के लिए अपने प्रयास दोगुने करने और इस दिशा में समन्वित सहयोग करने की बात की गई है। यहां यह बात भी याद रखनी चाहिए कि हाल में जब रूस के विमान पर हमला हुआ था तो इस तरह से सभी देश सामने नहीं आए थे। जाहिर है, आतंकवाद प्रभावित देशों को अलग-अलग श्रेणियों में नहीं बांटा जा सकता। हमें पेरिस पर हुए हमलों के पीछे की वजह जाननी होगी। यह गलत नीतियों को अपनाने का नतीजा है जिसकी जड़ें 2003 में इराक पर हुए अमरीकी हमले से जुड़ी हैं। इस हमले ने पश्चिमी एशिया क्षेत्र में कई अलग-अलग प्रकार के गुट पैदा कर दिए, जिन्हें बाद में भी कई देशों ने सींचा। सऊदी अरब, तुर्की, ईरान, कतर, सीरिया जैसे देशों ने अपनी-अपनी अलग नीतियां अपनाईं।
इस्लामिक स्टेट के गढ़ सीरिया में भी पश्चिमी देशों के स्वार्थ अलग-अलग हैं। सीरिया के मुद्दे पर जिस तरह से अमरीका और रूस में टकराव है, वह दुनिया की शांति के लिए नुकसानदेह है। आतंकवाद के खिलाफ बड़े देशों की अलग-अलग नीतियां अलगाववादियों-आतंकियों के लिए अनुकूल हैं। ऐसे हालात में ही आईएस ने सीरिया में अपनी ताकत बढ़ाई। यह ताकत इतनी बढ़ चुकी है कि निकट भविष्य आतंकवाद के असर से शायद ही अछूता रहे। अच्छी बात यह है कि दुनिया के देश पेरिस हमले के बाद संजीदा और सतर्क हैं। वे इस बात के लिए बेचैन दिख रहे हैं कि क्या किया जाए जिससे ऐसे बम धमाके और गोलीबारी न हो जो रह-रहकर निरंतर हो रही है।
सी. उदय भास्कर (लेखक रक्षा मामलों के विशेषज्ञ हैं)










