संघ-संस्कार के जीवंत रूप : बालासाहेब
August 15, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम Archive

संघ-संस्कार के जीवंत रूप : बालासाहेब

Written byArchiveArchive
Nov 9, 2015, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 09 Nov 2015 16:29:32

 

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के विकास के विषय में जानने की जिज्ञासा लोगों के मन में सहज ही दिखलाई पड़ती है। यद्यपि संघ ने कभी अपने को समाज से इतर किसी संगठन के रूप में नहीं माना है, तथापि संंघ और जिस समाज को संगठित करने का संघ ने संकल्प लिया है, इन दोनों के बीच के संबंधों के बीच इस दीर्घ कालावधि में अनेक बार उतार-चढ़ाव आए हैं। उदासीनता, उपहास, अविश्वास तथा वैमनस्य के प्रारंभिक चरणों के बाद अब स्वीकृति, समर्थन तथा सहभागिता की स्थिति दिखाई देती है। संघ को समाज के विभिन्न वर्गों से मिलने वाला व्यापक समर्थन आकस्मिक नहीं है। आज हमें संघ जहां खड़ा दिखाई देता है, उसे समझने के  लिए संघ के क्रमिक विकास को समझना आवश्यक है।

प्रथम तीन सरसंघचालक

संघ के मूल चरित्र और इसकी कार्य-पद्धति का निर्धारण मौटे तौर पर पहले तीन सरसंघचालकों की कार्यावधि के दौरान ही हुआ है। संघ के ये पहले तीन सरसंघचालक थे-डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार (1925-1940), माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य श्री गुरु जी (1940-1973) तथा मधुकर दत्तात्रेय देवरस उपाख्य बालासाहेब देवरस (1973-1994)। इन तीनों सरसंघचालकों ने अपने बौद्धिक-चिंतन तथा अथक परिश्रम के माध्यम से संघ का मार्गदर्शन किया। विश्लेषक उनके कालखंडों को ‘हेडगेवार युग’, ‘गोलवलकर युग’ तथा ‘देवरस युग’ के नाम से चिह्नित करते हैं, मानो ये एक दूसरे से निरपेक्ष व असंबद्ध कोई नितांत भिन्न कालखंड हों। इस अवधारणा के मूल में यह भ्रामक चिंतन काम करता है कि संघ जैसा कोई व्यापक संगठन किसी एक व्यक्ति की इच्छानुसार चलाया जा सकता है। जबकि वास्तविकता यह है कि संघ में प्रत्येक महत्वपूर्ण निर्णय (यहां तक कि इसका नामकरण भी) निचले स्तर तक के कार्यकर्ताओं के साथ विचार-विमर्श के पश्चात् सामूहिक रूप से ही लिया जाता है। श्री गुरु जी व बालसाहेब देवरस, दोनों 1935 के पश्चात् से, डॉ़ हेडगेवार के समय से ही निर्णय लेने की प्रक्रिया में सम्मिलित रहे थे। संघ के प्रारंभिक तीनों सरसंघचालकों को क्रमश: राजनैतिक, आध्यात्मिक एवं सामाजिक विशेषणों से विभूषित किया जाता है।

इस तथ्य से इंकार नहीं किया जा सकता है कि प्रत्येक व्यक्ति के व्यक्तित्व की कुछ मूलभूत विशेषताएं होती हैं। डॉ़ हेडगेवार एक क्रांतिद्रष्टा थे, जो यह मानते थे कि एक परतंत्र राष्ट्र के लिए राजनीति अपरिहार्य है। श्री देवरस तथा संत प्रवृत्ति के श्री गुरु जी सुचिंतित राजनैतिक दृष्टि के विपरीत, चुनावी राजनीति को साध्य के रूप में कभी नहीं स्वीकार पाए। वास्तव में बालासाहेब में समाज व राजनीति की सूक्ष्मताओं को गहन रूप में समझने की शक्ति विद्यमान थी। यह भी सही है कि श्री गुरु जी चुनावी राजनीति को राष्ट्र और समाज उत्थान के क्रम में कोई विशेष महत्व नहीं देते थे। किंतु इसका यह अर्थ नहीं कि उन्हें राजनीति की समझ नहीं थी। प्रथम तीनों सरसंघचालकों के नेतृत्व में संघ का समान रूप से विकास हुआ। 1925 में संघ की स्थापना के पूर्व डॉ़ हेडगेवार ने कई सामाजिक, राजनैतिक आंदोलनों में भाग लिया था। श्री गुरु जी संघ के संपर्क में जिस समय आए, तब तक उनके व्यक्तित्व का गठन हो चुका था। इस प्रकार डॉ़ हेडगेवार और श्री गुरु जी, दोनों का ही समाज जीवन संघेतर था। बालासाहेब इस अर्थ में भिन्न थे कि जीवन के प्रारंभिक समय से ही उन्होंने संघ को जाना था। उनका विकास पूरी तरह संघ के परिवेश में हुआ था। संघ की स्थापना 1925 में हुई। बालासाहेब ने 1926 में संघ की शाखा में जाना प्रारंभ कर दिया था। उस समय उनकी आयु मात्र ग्यारह वर्ष थी। अन्य किशारों की भांति बालासाहेब भी डॉ़ हेडगेवार के व्यक्तित्व के आकर्षण में बंध चुके थे। शनै: शनै: वैचारिक सुदृढ़ता, जटिल संकल्पनाओं को सहज रूप में व सरल भाषा में प्रस्तुत करना, दूरदर्शिता, सूक्ष्म नियोजन, कर्तव्यनिष्ठा, उदार हृदयता, लोगों के हृदय को जीत लेना आदि गुण बालासाहेब के व्यक्तित्व में परिलक्षित होने लगे। संघ का विकास हो रहा था और साथ ही बालासहेब की जिम्मेदारियां भी बढ़ती जा रही थीं। डॉ़ हेडगेवार इस उभरते किशोर की प्रतिभाओं और क्षमताओं को पहचान रहे थे।

संघ प्रशिक्षकों के लिए 1927 में सत्रह दिनों का पहला शिविर आयोजित किया गया। प्रशिक्षण की यह परंपरा तब से अब तक अनवरत रूप से चलती आ रही है। बालासाहेब ने तीनों संघ शिक्षा वर्ग, जिन्हें उस समय आॅफिसर्स टेÑनिंग केंप (ओटीसी) कहा जाता था, क्रमश: 1928, 1929 और 1930 में किए। डॉ़ हेडगेवार इस समय संघ का नागपुर के मोहिते के बाडेÞ से बाहर विस्तार करने की योजना बनाने लगे थे। 1932 में उन्होंने मार्तन्ड राव मुलमुले, पुरुषोत्तम रामचन्द्र उपाख्य भैयासाहेब खांडवेकर को नागपुर के इतवारी क्षेत्र में शाखा प्रारंभ करने के लिए भेजा। बालासाहेब शाखा कार्यवाह नियुक्त किये गए। पश्चिमी महाराष्ट्र में पहला संघ शिक्षा वर्ग पुणे में अपै्रल, 1937 में आयोजित किया गया। बालासाहेब को इस वर्ग में मुख्य शिक्षक का दायित्व दिया गया। संघ की स्थापना भूमि नागपुर से संघ का प्रचार-प्रसार करने के लिए देश के विभिन्न भागों में प्रचारक भेजे। किंतु क्या आप सोच सकते हैं कि संघ के ‘पॉवर हाउस’ कहे जाने वाले इस नागपुर में ऊर्जा का संचार कौन करता था? नागपुर से संघ-संस्कारित प्रचारकों को बाहर भेजने का श्रेय यदि किसी एक व्यक्ति को देना हो तो वे थे नागपुर के कार्यवाह बालासाहेब! औपचारिक रूप से बेशक बालासाहेब के पास केवल नागपुर कार्यवाह का दायित्व था, किंतु कार्य के प्रति उनके समर्पण भाव और अथक उद्यमशीलता के फलस्वरूप उनका अखिल भारतीय प्रभुत्व निश्चित होना स्वाभाविक था। कार्य के प्रति उनके समर्पण को इस तथ्य से समझा जा सकता है कि सरसंघचालक बनने के बाद भी नागपुर में संघ-कार्य पर उनकी दृष्टि निरंतर लगी रहती थी। उनका इस बात पर बल रहता था कि नागपुर न केवल संघ-कार्य की दृष्टि से बल्कि संघ से प्रेरित होकर चलने वाले संगठनों की दृष्टि से भी मिसाल के तौर पर देश के सामने उपस्थित रहे। नागपुर में संघकार्य के संबंध में वे सटीक व बेबाक प्रश्न करते थे। जिस समय बालासाहेब सरकार्यवाह थे, उस समय जब एक कार्यकर्ता ने उनके समक्ष बताया कि पिछले एक माह में नागपुर में चार नई शाखाएं प्रारंभ हुई हैं, तो उन्होंने स्पष्ट रूप में उससे पूछा, ‘कभी इन शाखााओं पर स्वयं गए भी हो या केवल मुझे एक रपट भर दे रहे हो?’

20 फरवरी, 1939 को वर्धा जिले के एक छोटे-से गांव सिंदी में संघ के कुछ चयनित कार्यकर्ताओं की एक सप्ताह तक चलने वाली बैठक प्रारंभ हुई। इस बैठक में संघ की कार्य-पद्धति पर विचार किया गया। यही वह बैठक थी, जिसमें पहली बार डॉ़ हेडगेवार के आदेश पर संघ की आचार पद्धति का निर्धारण किया गया। संघ में प्रेरणादायी गीतों के गायन का प्रारंभ बालासाहेब द्वारा ही किया गया। उनका यह दृढ़ विश्वास था कि संघ के दर्शन एवं व्यवहार को ऐसे गीतों के माध्यम से प्रभावी रूप से व्यक्त किया तथा समझा जा सकता है। 21 जून, 1940 को डॉ़ हेडगेवार के असामयिक निधन के बाद बालासाहेब और उनके कनिष्ठ सहयोगी डॉ़ हेडगेवार की समाधि के पास घंटों बैठकर भविष्य के बारे में सोचा करते। ऐसे ही जब वे लोग एक बार डॉ़ हेडगेवार की समाधि के निकट बैठे थे, उसी समय बालासाहेब ने डॉक्टर जी की समाधि पर हाथ रखा और प्रतिज्ञा करते हुए बोल उठे, ‘डॉक्टर हेडगेवार हमें छोड़कर नहीं गए हैं। वे जीवित हैं। संघकार्य रुकेगा नहीं। हम अपने अंतिम श्वास तक संघकार्य को करेंगे। डॉक्टर साहब, हम आपके द्वारा प्रारंभ किये गए इस कार्य को आगे लेकर जाएंगे। आज के बाद संघकार्य का भार इन युवाओं के बलिष्ठ कंधों पर रहेगा।’ बालासाहेब के इन शब्दों ने उनके युवा साथियों को झकझोर कर रख दिया और कार्य में लगने को प्रेरित किया।

डॉ़ हेडगेवार की मृत्यु के पश्चात् कुछ लोग शंका व्यक्त करते थे कि गोलवलकर जी को तो अभी संघ का कोई विशेष अनुभव भी नहीं है, तो ये भला संघ का नेतृत्व किस प्रकार कर पाएंगे? ऐसे लोगों की शंकाओं को जिन लोगों ने दूर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थे उनमें डॉ़ हेडगेवार के चाचा मोरेश्वर श्रीधर उपाख्य आबाजी हेडगेवार, विदर्भ प्रान्त संघचालक श्री हरि किशन उपाख्य अप्पाजी जोशी तथा बालासाहेब प्रमुख थे। दिसम्बर, 1946 में नागपुर के निकट बरदावरी में विदर्भ प्रान्त के 1300 स्वयंसेवकों के सर्वप्रथम व्यापक शिविर के समापन समारोह में श्री गुरु जी ने अपना उद्बोधन प्रस्तुत करना था, किंतु बोलते वक्त उन्होंने उपस्थित स्वयंसेवकों से अनपेक्षित रूप से कहा, ‘बालासाहेब, जिनकी वजह से लोग सरसंघचालक के रूप में मुझे सम्मान देते हैं तथा जिनके अथक प्रयत्नों तथा मार्गदर्शन के फलस्वरूप यह शिविर इतने सफल रूप में संपन्न हो सका है, अब समापन भाषण प्रस्तुत करेंगे।’ 1940 से 1949 के गतिशील वर्षों के दौरान बालासाहेब ने संघ की दृष्टि से महत्वपूर्ण भूमिका का निर्वाह किया। संघ के महाल कार्यालय का निर्माण (1941-1945), संघ पर लगे प्रतिबंध के संबंध में नेहरू सरकार से बातचीत, संघ के संविधान का प्रारूप तैयार किया जाना तथा नागपुर के दैनिक ‘तरुण भारत’ का अधिग्रहण करते हुए पत्रकारिता जगत में संघ के प्रवेश को सुनिश्चित करना, ये सब बालासाहेब के संगठनात्मक कौशल के परिचायक हैं।

बढ़ती गई संघ-स्वीकार्यता

1948 में संघ पर प्रतिबंध लगने के बाद मची आंतरिक उथल-पुथल के फलस्वरूप संघ के कई कार्यकर्ताओं को केवल शाखा केंद्रित कार्य नाकाफी लगने लगा था। शाखा का दैनिक कार्य धीमा, अंतहीन प्रतीत होने लगा था। 1949 में जेल से छूटने के बाद श्री गुरु जी का देशभर में भव्य स्वागत हुआ। कुछ कार्यकर्ता भूलवश इसे चुनावी समर्थन मान बैठे। श्री गुरु जी ने उन्हें ऐसे भ्रम पालने के प्रति सतर्क भी किया। 1952 के चुनाव परिणाम ने उन लोगों को करारा झटका दिया, जो संघ की लोकप्रियता के संबंध में ख्याली पुलाव बनाने लगे थे। राष्ट्र जीवन के विविध क्षेत्रों में संघ के प्रसार की बहस संघ के भीतर ही जोरों से चलने लगी थी। इसी पृष्ठभूमि में 1953 से 1960 तक बालासाहेब को संघ की सभी प्रकार की जिम्मेदारियों से मुक्त रखा गया। वे संघ कार्यालय में ही उपस्थित रहते थे। संघ के गणवेश में ही सारे कार्यक्रमों में भाग लेते थे। संघ के कई ऐसे कार्यकर्ता रहे हैं, जिन्होंने सक्रिय रहते हुए आदर्श आचरण व व्यवहार को हमारे समक्ष प्रस्तुत किया है। बालासाहेब इस अर्थ में महान हैं कि उन्होंने उस कालखंड में भी आदर्श आचरण प्रस्तुत किया, जब उनके पास संघ की कोई जिम्मेदारी भी नहीं थी।                 सरसंघचालक के रूप में बालासाहेब

5 जून, 1973 को श्री गुरुजी के निधन के साथ हमारे राष्ट्र जीवन से एक महान व्यक्तित्व का अवसान हो गया। कुछ लोग संदेह करते थे कि श्री बालासाहेब उपयुक्त उत्तराधिकारी सिद्ध होंगे अथवा नहीं। इस सब प्रकार के सब संदेहों को शीघ्र ही विराम मिल गया। अब तक संघ के निंदक संघ को एक उच्च वर्गीय संगठन के रूप में चित्रित करते थे, जो कालबाह्य सामाजिक कुरीतियों में जकड़ा हुआ था। सामाजिक सुसंबद्धता के कार्य, जो कि संघ अपनी स्थापना के समय से ही करता आया है, को इन स्वयंभू प्रगतिशीलों द्वारा जानबूझकर अनदेखा किया जाता रहा। 8 मई, 1974 को पुणे में आयोजित प्रसिद्ध वसंत व्याख्यानमाला में ‘सामाजिक समरसता तथा हिंदू एकीकरण’ विषय पर बालासाहेब ने एक सारगर्भित भाषण दिया। वह भाषण हमारे देश में सामाजिक चिंतन के क्षेत्र में एक मील का पत्थर रहेगा। इससे संघ के आलोचकों के मुंह हमेशा के लिए बंद हो गए। बालासाहेब के लिए ‘समानता’ और ‘समरसता’ महजÞ दो आकर्षित करने वाले शब्द नहीं थे।

आपातकाल के दौरान विभिन्न राजनैतिक दलों के कार्यकर्ताओं के साथ बालासाहेब को भी यरवदा जेल में बंदी बना दिया गया। बालासाहेब के स्पष्टवादी सामाजिक विचारों तथा आचरण से प्रभावित होकर भिन्न विचार रखने वाले भी उनके व्यक्तित्व के मुरीद हो गए। संघ के भीतर बालासाहेब ने जिज्ञासा समाधान की परंपरा की भी शुरुआत की। वे स्वयंसेवकों को प्रश्न पूछने के लिए प्रेरित करते, सभी प्रश्नों का उत्तर देते। वे प्रश्नकर्ता को तब तक नहीं बैठने देते थे जब तक कि वह उनके उत्तर से पूरी तरह से संतुष्ट नहीं हो जाता था। सरसंघचालक बनने के पश्चात, बाला साहेब ने संघ गणवेश के कुछ आयामों तथा सैन्य गतिविधियों में परिवर्तन किया। इस विषय पर उनका चिंतन स्पष्ट था, ‘हमें वैसा नहीं दिखना है जैसे हम नहीं हैं!’ इससे पहले सामान्य नागरिक संघ स्वयंसेवकों को केवल ‘विजयादशमी पर गणवेश में संचलन करने वाले लोगों’ के रूप में जानते थे। बालासाहेब ने बल देकर कहा कि स्वयंसेवक समाज के अंगभूत हैं, वे समाज से निरपेक्ष होकर नहीं रह सकते बल्कि उन्हें अपने आसपास के समाज के सुख-दुख में सहभागी होना होगा। उन्होंने संघ शाखा की संकल्पना को इन शब्दों में रूपायित किया है, ‘संघ की शाखा केवल खेल खेलने अथवा कदमताल करने का स्थान नहीं है, बल्कि समाज के श्रेष्ठ नागरिकों की रक्षा का एक अनकहा वायदा है, युवाओं को अवांछित नशों से दूर रखने का एक सांस्कृतिक मंच है, संकट के समय लोगों की बिना शर्त सेवा तथा त्वरित कार्रवाई के लिए आशा की एक किरण है। यह महिलाओं के निर्भय होकर विचरण करने तथा उनके प्रति असभ्य व्यवहार करने वालों को रोकने की एक सशक्त गारंटी है, अमानवीय तथा राष्ट्र विरोधी ताकतों के समक्ष उपस्थित एक सशक्त ताकत है। किंतु इसका महत्वपूर्ण आयाम यह है कि यह उपयुक्त कार्यकर्ताओं के प्रशिक्षण की एक पाठशाला है जोकि राष्ट्र जीवन के विविध क्षेत्रों की जरूरतों को पूरा करने के लिए उन्हें तैयार करती है। इस सबको प्राप्त करने का माध्यम वे खेल हैं जिन्हें हम संघ शाखा के दौरान खेलते हैं।’

बालासाहेब का व्यक्तित्व आदर्शवाद एवं व्यवहारवाद का एक अद्भुत सम्मिश्रण था। वे जानते थे कि राजनीति कोई बहुत महत्वपूर्ण चीज नहीं है किंतु साथ ही वे इसका सही मोल भी समझते थे। बालासाहेब ने राष्ट्र की नब्ज को पहचाना था। वर्ष 1974 में जयप्रकाश नारायण के नवनिर्माण आंदोलन को समर्थन देने के उनके निर्णय का उचित मूल्यांकन भविष्य के इतिहासकारों द्वारा इस रूप में किया जाएगा कि यह एक ऐसा निर्णय था जिसने संघ को सर्व स्वीकार्यता प्रदान की।

बालासाहेब ने ही विजयादशमी संबोधन के प्रारूप को अपने सहयोगियों के परामर्श से तैयार करने तथा मीडिया में इसके अंतिम प्रारूप को पहले ही दे देने की परंपरा की शुरुआत की। उन्होंने निर्देश दिए कि ‘परम पूजनीय’ शब्द का प्रयोग केवल डॉ. हेडगेवार तथा श्री गुरुजी के नामों के साथ ही किया जाए, अन्य किसी व्यक्ति के नाम के साथ नहीं। यह उपाधि केवल सरसंघचालक दायित्व के साथ ही लगाई जाए, व्यक्ति के नाम से पूर्व केवल माननीय का प्रयोग किया जाए। उन्होंने संघ के कार्यक्रमों में केवल प्रथम दो सरसंघचालकों के चित्रों को ही रखे जाने का अनुमोदन किया।

उन्होंने एकात्मतास्त्रोत्र का विस्तार किया तथा इसे व्यापक व सर्वसमावेशी बनाया। अपने खराब स्वास्थ्य के कारण उन्होंने अपना दायित्व छोड़कर प्रो. रज्जू भैया को अपने जीवनकाल में सरसंघचालक नियुक्त किया। उन्होंने अपना अंतिम संस्कार दोनों सरसंघचालकों की समाधियों के निकट न करने का आग्रह किया। बालासाहेब का जीवन संघ के पहले 70 वर्षों का इतिहास है। बालासाहेब संघ दर्शन की साक्षात् प्रतिमूर्ति थे। वास्तव में उनके जीवन को संघ संस्थापक द्वारा गढ़ी गई एक सुंदर मूर्ति के रूप में रूपायित किया जा सकता है। संघ ने बालासाहेब को गढ़ा और बालासाहेब ने संघ को दिशा प्रदान की। संघ पर उनका प्रभाव अमिट है और रहेगा। उनके प्रति असली श्रद्धांजलि यही होगी कि समाज के सकारात्मक दिशा में परिवर्तन में अधिक से अधिक लोगों को सहभागिता के लिए प्रोत्साहित करें। डॉ. श्रीरंग गोडबोले

Share
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

विभाजन की विभीषिका पर आयोजित कार्यक्रम में बलिदानियों को दी गई श्रद्धांजलि। सीएम पुष्कर सिंह धामी कार्यक्रम में हुए शामिल।

‘बंटवारे का दर्द न भूलेंगे, न भूलने देंगे’ : विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर बोले सीएम धामी

Sindh partition 1947

“हमने आधी नहीं, पूरी दुनिया खो दी” – सिंधी हिंदुओं की विभाजन की पीड़ा और कराची नरसंहार

Mamta Banerjee

आरजी कर कांड : मंत्री अग्निमित्रा पाल ने ममता बनर्जी की गिरफ्तारी की मांग की

“असभ्य बुतपरस्त” से लेकर ईसाई संरक्षण तक: नेहरू के मिशनरी मतांतरण को खुली छूट का परिणाम

गरीब, किसान, युवा और नारी सहित सभी वर्गों के कल्याण के लिए कार्य कर रही राज्य सरकार : मोहन यादव

अगस्त 1946 का डायरेक्ट एक्शन डे : खूनी नरसंहार और औपनिवेशिक बंगाल से भारत विभाजन तक की पृष्ठभूमि

Load More

ताज़ा समाचार

विभाजन की विभीषिका पर आयोजित कार्यक्रम में बलिदानियों को दी गई श्रद्धांजलि। सीएम पुष्कर सिंह धामी कार्यक्रम में हुए शामिल।

‘बंटवारे का दर्द न भूलेंगे, न भूलने देंगे’ : विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस पर बोले सीएम धामी

Sindh partition 1947

“हमने आधी नहीं, पूरी दुनिया खो दी” – सिंधी हिंदुओं की विभाजन की पीड़ा और कराची नरसंहार

Mamta Banerjee

आरजी कर कांड : मंत्री अग्निमित्रा पाल ने ममता बनर्जी की गिरफ्तारी की मांग की

“असभ्य बुतपरस्त” से लेकर ईसाई संरक्षण तक: नेहरू के मिशनरी मतांतरण को खुली छूट का परिणाम

गरीब, किसान, युवा और नारी सहित सभी वर्गों के कल्याण के लिए कार्य कर रही राज्य सरकार : मोहन यादव

अगस्त 1946 का डायरेक्ट एक्शन डे : खूनी नरसंहार और औपनिवेशिक बंगाल से भारत विभाजन तक की पृष्ठभूमि

Morena Madarsa Ayesha Islamia

मुरैना के खड़ियाहार मदरसे में बड़ा खुलासा: दो कमरों में 35 बच्चे, रजिस्टर में 448 नाम; 90% हिंदू बच्चों के नाम

विभाजन की विभीषिका: 1947 का वह छल और हिंदू-सिख नरसंहार

भारतीय सीमा में चीनी सैनिकों की घुसपैठ का वीडियो वायरल: PIB फैक्ट चेक ने बताई सच्चाई

प्रियांक खड़गे

राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से इतना डर क्यों? कर्नाटक सरकार ला रही पब्लिक स्पेस बिल

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies