|
तीसरा भारत-अफ्रीका शिखर स्#ाम्मेलन नई दिल्ली में सम्पन्न हुआ। इससे पूर्व दो सम्मेलन नई दिल्ली (2008) और अदिस अबाबा (2011) में हुए थे। इन सम्मेलनों का उद्देश्य भारत और अफ्रीका को उत्तरोत्तर निकट लाना है। यद्यपि ऐसे सम्मेलनों की शुरुआत चीन और जापान ने की थी। अगला चीन-अफ्रीका सम्मेलन दक्षिण अफ्रीका में अगले माह होने जा रहा है। लेकिन भारत ने भी इस दिशा में तेज प्रगति की है। जहां 2008 के पहले सम्मेलन में केवल 2 अफ्रीकी देशों ने भाग लिया था, वर्तमान सम्मेलन में 40 राष्ट्राध्यक्षों समेत 54 अफ्रीकी देश शामिल हुए। यह अफ्रीका में भारत के प्रति बढ़ते विश्वास का परिचायक है। ज्यादातर अफ्रीकी देश पहले यूरोपीय उपनिवेश रहे हैं, इस कारण चीन की तुलना में वे भारत को अधिक नजदीक पाते हैं। हालांकि चीन-अफ्रीका व्यापार भारत-अफ्रीका व्यापार की तुलना में अभी भी बहुत आगे है।
जो संकेत प्राप्त हुए हैं, उनके अनुसार जिन मुद्दों पर प्रमुखता से बातचीत हुई, ये हैं वाणिज्य, सुरक्षा क्षमता वृद्धि एवं संयुक्त राष्ट्र संघ में सुधार। पिछले सात वर्ष में भारत-अफ्रीका व्यापार का आंकड़ा चौदह गुना बढ़कर लगभग 70 अरब डॉलर पर पहुंच गया है, जिसके इस वर्ष के अन्त तक एक खरब डॉलर तक हो जाने की संभावना है। भारत से होने वाला निर्यात 23 प्रतिशत बढ़ा है जबकि अफ्रीका से आयात इस वर्ष 32 प्रतिशत बढ़ा है। यह इस बात का भी प्रतीक है कि भारत को निर्यात करने के लिए अफ्रीकी देश अब अधिक उत्साहित हैं। भविष्य में अफ्रीका भारतीय उत्पादों के लिए एक बड़ा बाजार सिद्ध हो सकता है। चीन के उत्पादों की तुलना में भारतीय उत्पादों की गुणवत्ता भविष्य में विकास की और संभावनाएं प्रदान करेगी। चीन अफ्रीका से कच्चा माल लेकर अपने उत्पाद अफ्रीका को बेचता रहा है। चीन की घटती हुई आर्थिक प्रगति ने भारत को एक सुनहरा मौका दिया है, भारत ने 'प्रगति में सहभागिता' के सिद्धान्त के तहत अफ्रीका में छोटे-बड़े हर स्तर पर विकास कार्यक्रम और क्षमतावर्धन के कार्यक्रमों से अपनी अलग पहचान बनाई है, जो आगे चलकर व्यापार वृद्धि में अहम भूमिका निभाएगी।
विगत शीर्ष सम्मेलन में भारत ने अफ्रीका के लिए एक 10 अरब डॉलर के पैकेज की घोषणा की थी जिसके अन्तर्गत लगभग 7.4 अरब डॉलर विभिन्न परियोजनाओं के लिए अफ्रीकी देशों को 'लाइन ऑफ क्रेडिट' के तहत कम ब्याज दर पर दीर्घावधि के लिए ऋण के रूप में दिया जाना था और शेष राशि क्षमतावर्धन पर व्यय की जानी थी। अधिकतर परियोजनाएं या तो पूर्ण हो चुकी हैं या पूर्णता के निकट हैं।
विगत 3 वर्षों में 2500 से अधिक अफ्रीकी भारतीय संस्थानों में प्रशिक्षण पा चुके हैं। आशा है कि अफ्रीकी देशों की मांग पर इस कोष को बढ़ाकर 12.5 अरब डॉलर कर दिया जाएगा और ऋण की ब्याज दर में भी कटौती की जाएगी। इससे जहां प्रत्यक्षत: भारतीय सहयोग को अधिक मान्यता व प्रतिष्ठा प्राप्त होगी वहीं परोक्षत: यह भारतीय व्यापार को बढ़ाने में मददगार होगी।
आतंकवाद के विरुद्ध युद्ध भारत के लिए सदा से एक महत्वपूर्ण विषय रहा है। उत्तरी अफ्रीका के देशों में आईएसआई, बोको हराम जैसे आतंकवादी संगठनों की उपस्थिति ने न केवल इस क्षेत्र के देशों को त्रस्त किया है, बल्कि समस्त अफ्रीका को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि इनसे मुक्ति कैसे पाई जाए। अरब सागर में होने वाली सामुद्रिक डकैती की घटनाओं ने अफ्रीकी महाद्वीप का ध्यान सहयोग के लिए भारत की ओर खींचा है। अमरीका और चीन जैसे मौखिक और सतही सहयोग देने वाले देशों की तुलना में भुक्तभोगी, अनुभवी और सज्जन भारत से सहयोग लेना अफ्रीका के लिए अपरिहार्य हो गया है। यही कारण है कि विदेश मंत्रियों की बैठक में आतंकवाद से निजात पाने के लिए भारत से सहयोग मांगा गया।
भूराजनैतिक दृष्टि से भी यह सम्मेलन महत्वपूर्ण रहा। चीन की घटती हुई साख के परिदृश्य में आर्थिक विकास व आतंकवाद के खिलाफ मुहिम में भारत का सहयोग हमें सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता दिलाने में समर्थ हो सकता है।
यह विडम्बना है कि भारत और अफ्रीका को मिलाकर दुनिया की एक तिहाई आबादी को सुरक्षा परिषद में कोई स्थान नहीं मिला है। जहां एशिया से भारत और जापान इस सदस्यता के दावेदार हैं, वहीं अफ्रीकी महाद्वीप से दक्षिण अफ्रीका की दावेदारी प्रबल है। दक्षिण अफ्रीका की दावेदारी का समर्थन कर भारत अपना पक्ष मजबूत कर सकता है और समस्त अफ्रीका का समर्थन पा सकता है। अरब सागर में समुद्री डकैती रोकने में सक्रिय भूमिका निभाकर भारत हिन्द महासागर में चीन के बढ़ते प्रभुत्व को भी कम कर सकता है।
यह आशा की जा सकती है कि इस शीर्ष सम्मेलन से न केवल अफ्रीका को लाभ होगा, अपितु भारतीय व्यापार, निवेश और कूटनीतिक प्रतिष्ठा को दूरगामी सकारात्मक परिणाम मिलेंगे।
जे. के. त्रिपाठी
(लेखक जिम्बाब्वे में भारत के राजदूत रहे हैं।)











