| दिंनाक: 14 Sep 2015 12:59:46 |
|
शिवानन्द द्विवेदी
कुछ ही समय पहले नई दिल्ली में 'हंस' पत्रिका की सालाना गोष्ठी आयोजित हुई थी। गोष्ठी का विषय था 'राजनीति की सांस्कृतिक चेतना'। स्वाभाविक तौर पर मंच पर गैर-राष्ट्रवादी एवं वाम झुकाव की विचारधारा का बहुमत था। मंच पर साहित्यकार अशोक वाजपेयी, वामपंथी सुहासिनी अली, वामपंथी रुझान के ही फिल्म कलाकार एवं निर्देशक एम़ के. रैना, जदयू सांसद एवं पूर्व राजनयिक पवन वर्मा, हंस के सम्पादक संजय सहाय और भाजपा के राज्यसभा सांसद तरुण विजय वक्ता के तौर पर विराजमान थे। स्पष्ट है कि मंच पर जमा गैर-राष्ट्रवादी जुटान के वैचारिक हमलों के प्रतिवाद एवं जवाब का सारा दायित्व अकेले तरुण विजय पर था। वक्ता के तौर पर सबसे पहले आए अशोक वाजपेयी। विषय राजनीति में सांस्कृतिक चेतना का था, जबकि अशोक वाजपेयी के भाषण में साहित्यिक संस्थानों और अकादमियों में उनकी दरकती जमीन का दर्द बार-बार उबाल मारता दिखा। उन्होंने कहा कि राजनीति में सांस्कृतिक चेतना का अभाव हो रहा है, जबकि संस्कृति में राजनीति का हस्तक्षेप बढ़ रहा है।
राजनीति की सांस्कृतिक चेतना के बहाने भाषण देते हुए अशोक वाजपेयी संस्थानों और अकादमियों तक चले गए। उन्होंने बाकायदा नेशनल बुक ट्रस्ट के वर्तमान अध्यक्ष बल्देव भाई शर्मा तक का जिक्र तंज के लहजे में किया। अशोक वाजपेयी यह साबित करने की कोशिश करते रहे कि बल्देव भाई शर्मा का किताबों से कोई लेना-देना नहीं है। इस पर वहां कुछ लोग यह कहते देखे गए कि बल्देव भाई शर्मा क्या हैं और क्यों लाए गए हैं, यह विमर्श का विषय नहीं है। यहां सवाल यह है कि अशोक वाजपेयी के हृदय में उठते दर्द की वजह क्या है? कुछ लोगों ने वाजपेई को लेकर अनेक बातें भी बताईं। जैसे सवाल वह व्यक्ति उठा रहा है जिसने सरकारी चन्दे पर खुद को साहित्य में स्थापित किया है। ये वही अशोक वाजपेयी हैं, जो नौकरशाह रहते हुए मध्य प्रदेश के साहित्य और संस्कृति की ठेकेदारी एक पूर्व मुख्यमंत्री के बूते दंभपूर्वक चलाते रहे। अशोक वाजपेयी के सार्वजनिक जीवन से अगर कांग्रेसी नेता और मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री अर्जुन सिंह का नाम हटा दिया जाए, तो बचता ही क्या है? दशकों पहले सरकारी खजाने से भोपाल का भारत-भवन बना और वे वहां एक तानाशाह की तरह चौकड़ी मारकर बैठ गए। उन्हें तानाशाह यूं ही नहीं कहा जा रहा है। अशोक वाजपेयी का निरंकुश चेहरा उनके उस समय के कुछ बयानों में नजर आता है। दिसम्बर, 1984 में भोपाल के भारत-भवन में एक बड़ा साहित्यिक एवं सांस्कृतिक उत्सव होने वाला था।
फोर्ड फाउंडेशन के चंदे (यह खुद वामपंथी आलोचक रामबिलास शर्मा का मानना था जिसे बाद में नामवर सिंह ने भी कभी-कभार स्वीकार किया) एवं तत्कालीन कांग्रेस सरकार के सहयोग से आयोजित किया गया था। आयोजन से 2-3 दिन पहले भोपाल की त्रासदी हो गई और 5000 लोगों की मौत की खबर आई। साहित्य जगत का एक बड़ा धड़ा अनुरोध करता रहा कि यह आयोजन रद्द हो। लेकिन इन सबसे बेपरवाह अशोक वाजपेयी एक तानाशाह की तरह सामने आए और बोले, 'मुदार्ें के साथ कोई मर नहीं जाया करता।' यह भी किसी से छुपा नहीं है कि मध्य प्रदेश से केन्द्रीय सेवा में आने के बाद भी अशोक वाजपेयी की कांग्रेसी आस्था ज्यों की त्यों बनी रही। अर्जुन सिंह की चौकठ परिक्रमा करके पहले भारत-भवन की ठेकेदारी करने वाले इस कथित साहित्यकार ने नया ठिकाना 1997 में स्थापित महात्मा गांधी अन्तरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय, वर्धा में बनाया। जगजाहिर है कि इस विश्वविद्यालय की स्थापना एवं प्रथम कुलपति के तौर पर अशोक वाजपेयी की नियुक्ति में किस विचारधारा और किस दल का हाथ रहा! जो व्यक्ति खुद सरकार के प्रश्रय पर संस्थानों में अपनी जमीन तैयार करता रहा हो, वह आज यह कहे कि सरकार अपने लोगों को संस्थानों में ला रही है तो बड़ा ही हास्यास्पद लगता है।
खैर, यह तो अशोक वाजपेयी के दोहरे मानदंड की बात रही। अब बात हंस कार्यक्रम की करें तो वहां जितने भी वक्ता आए सभी का सवाल तरुण विजय से ही था। ऐसा लग रहा था कि मानो राष्ट्र की सांस्कृतिक चेतना का सारा दायित्व अकेले वर्तमान सरकार का हो। पवन वर्मा ने कहा कि हमारे राजनेता पढ़ते नही हैं, लेकिन उन्होंने यह जरूर कहा कि नीतीश कुमार एक ऐसे दुर्लभ नेता हैं, जो पढ़ते हैं। जब तक संजय सहाय, अशोक वाजपेयी और पवन वर्मा बोले तब तक सब सुनते रहे, लेकिन जैसे ही तार्किक रूप से तरुण विजय ने सवालों का जवाब देना शुरू किया मानो वामपंथी, प्रगतिशील खेमा बौखला गया हो। सभा में शोर करके तरुण विजय के भाषण की खिल्ली उड़ाने की कोशिश हुई। लेकिन तरुण विजय ने चुनौती देते हुए कहा कि अगर बुलाते हो तो सुनने की हिम्मत रखो। खैर, राजनीति की सांस्कृतिक चेतना के मुद्दे पर तरुण विजय ने सरकार द्वारा कैलास मानसरोवर यात्रा के लिए उठाए गए कदमों और अन्य कार्यों की चर्चा की। उन्होंने कश्मीर की बुनियादी समस्याओं पर सरकार के प्रयासों का जिक्र किया तो सब निरुत्तर नजर आए। वे जब बोल रहे थे तब कुछ वामपंथी सभागार से बाहर चले गए, क्योंकि उनमें तर्क सुनने की हिम्मत नहीं थी। खैर, इसके बाद फिल्मकार एम़ के. रैना ने कश्मीर को लेकर तरुण विजय से सवाल पूछते हुए कहा कि मैंने कश्मीर में काम किया है और वहां किसान बदहाल है। जब इसका तथ्यों के साथ तरुण विजय ने जवाब दिया तो एम़ के. रैना का कहना था कि किसानांे से अन्याय वाली बात मैंने टी़ वी़ पर देखी है।
इस पर लोगों ने सवाल उठाए कि दशकों तक कश्मीर में काम करने वाले एम़ के. रैना टेलीविजन देखकर कश्मीर पर अपनी राय बनाते हैं? फिर वे भी निरुत्तर हुए। सवाल-जवाब सत्र में रमणिका गुप्ता ने मंच पर आकर मैला-ढोने का मुद्दा उठाते हुए कहा कि तरुण जी जिस संस्कृति की आप बात करते हैं उसमे वंचितों से मैला ढुलवाने की परम्परा है इस पर तरुण विजय ने कहा कि रमणिका जी जिसे आप परम्परा कह रही हैं उसे हम कुरीति कहते हैं। तरुण विजय ने याद दिलाया कि मैंने मैला ढोने के खिलाफ निजी विधेयक संसद में लाया था। अब आप बताइए कि विधायक रहते हुए आपने इस दिशा में क्या किया? इस पर रमणिका गुप्ता निरुत्तर। तरुण विजय अंत तक सवालों का जवाब देने के लिए टिके रहे और वाम खेमा सुनने की हिम्मत हारकर भागने लगा। अंत में जब चार वक्ता कम पड़ गए तो खुद मंच संचालक तरुण विजय के खिलाफ चारों के बचाव में उतर गए। जिसका जनता ने जोरदार विरोध किया। ल्ल