| दिंनाक: 04 Sep 2015 14:30:16 |
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हिन्दी अपने उद्भव-काल से ही एक शक्ति सम्पन्न भाषा रही है और इसकी शक्ति इसकी जीवंतता में निहित है। इसकी प्रवहमानता और सहजता में निहित है। अपनी बोलियों और हिंदीतर भारतीय भाषाओं की शब्दावली लेकर हिंदी की शक्ति कई गुनी बढ़ी है। इतना ही नहीं, बल्कि दूसरी भाषाओं एवं संस्कृतियों को हिंदी तथा हिंदी भाषियों ने मुक्त हृदय से गले लगाया है। इसलिए जब हम हिंदी के व्यापक प्रसार की चर्चा करते हैं तो हमको इसकी इस मुक्त हृदय सहजता और लचीलेपन का ध्यान तुरंत आता है। हम देख सकते हैं कि आज साहित्य ही नहीं अपितु जीवन के अनेकानेक क्षेत्रों में हिंदी का व्यापक प्रयोग हो रहा है। और यह प्रयोग क्षेत्र दिनोंदिन बढ़ता जा रहा है। इसमें सिनेमा जैसे लोकप्रिय जनमाध्यम की भूमिका अभी तक सबसे मुख्य मानी जाती रही है, किंतु अब नव इलेक्ट्रानिक जनमाध्यमों – टेलीविजन और इंटरनेट की भूमिका सवार्ेपरि है। हिंदी को संस्कृत का मातृत्व मिला है। संस्कृत विश्व की पांच वैज्ञानिक भाषाओं में से एक है। इसी क्रम में अत्याधुनिक तकनीक के साथ जुड़कर हिंदी ने विश्व की उन्नत और वैज्ञानिक भाषाओं में अपना सम्मानजनक स्थान बनाया है। इसका सवार्ेत्तम प्रमाण है इंटरनेट पर हिंदी भाषा का बढ़ता प्रयोग और हिंदी में प्रचुर मात्रा में उपलब्ध विषयवस्तु। अपने देश में ही नहीं, अपितु विदेशों में भी हिंदी में इंटरनेट पर सामग्री खोजने-पढ़ने वालों की संख्या में आश्चर्यजनक रूप से वृद्घि हो रही है। हाल ही में सामने आई एक जानकारी के अनुसार अकेले हमारे देश में ही ऐसे इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या 94 प्रतिशत की दर से बढ़ रही है, जबकि अंग्रेजी की सामग्री के प्रयोग में मात्र 19 प्रतिशत की दर से ही वृद्घि हुई है। एक मार्केटिंग सर्वेक्षण के अनुसार हर पाँच में से एक व्यक्ति (अर्थात 21 प्रतिशत लोग) हिंदी में इंटरनेट पर काम करना चाहता है। इस रुझान को देखते हुए गूगल जैसी दिग्गज कंपनी ने अपने सर्च और मैप जैसे उत्पादों को हिंदी में लाने का निर्णय लिया है। ध्यान दें कि भारत में सन् 2011 में जहां 10 करोड़ इंटरनेट उपयोगकर्ता थे वहीं 2017 तक यह संख्या 50 करोड़ तक पहुंचने का अनुमान है। कहने का अर्थ यह है कि इंटरनेट पर हिंदी में काम करना अत्यंत सुविधाजनक है और इस क्षेत्र में हिंदी का प्रयोग स्वत: बढ़ रहा है। हिंदी ने इसे अत्यंत संभावनाशील बाजार भी दिया है। किसी को भी आश्चर्य होगा कि भारतवर्ष में लगभग 15 करोड़ लोग मोबाइल पर इंटरनेट का प्रयोग करते हैं। यह संख्या केवल महानगरों की नहीं है, छोटे शहरों, कस्बों और गांवों के लोग भी इसमें सम्मिलित हैं। कहने का अर्थ यह है कि हिंदी मनोरंजन, सूचना और ज्ञान का सशक्त माध्यम बनकर उभरी है। इस धर्मप्राण राष्ट्र की आत्मा को मुखर करने वाली भाषा तो यह है ही।
प्राय: कह दिया जाता है कि हिंदी इतनी सक्षम नहीं है कि आधुनिक ज्ञान-विज्ञान को अभिव्यक्त कर सके। यह धारणा असत्य, निराधार एवं भ्रामक है। अध्येता जानते हैं कि हिंदी पूर्णतया वैज्ञानिक भाषा है तथा सांस्कृतिक रूपों और ज्ञान-विज्ञान की अभिव्यक्ति एवं संप्रेषण के लिए सर्वथा सक्षम है। इतिहास में झांककर देखें तो खड़ी बोली हिंदी में वैज्ञानिक और तकनीकी लेखन की परंपरा लगभग 200 वर्ष पुरानी है। वैज्ञानिक शोधकार्य मुख्यत: अंग्रेजी भाषा के माध्यम से होने के कारण वैज्ञानिक उपलब्धियों की जानकारी समाज के मात्र मुट्ठीभर उच्च शिक्षित अंग्रेजीदां एवं शोधकर्ता वैज्ञानिक वर्ग तक ही सीमित रह जाती है। हमें इस विसंगति को दूर करना होगा। हर्ष है कि अटल बिहारी वाजपेयी हिंदी विश्वविद्यालय, भोपाल इस दिशा में अग्रसर है।
आज के तकनीकी युग में जहां ज्ञान और सूचना ही शक्ति है, भाषा का प्रश्न भी महत्वपूर्ण हो गया है। जनसंचार माध्यमों के अनियंत्रित या कहें कि 'अराजक' प्रसार ने दुनिया भर की भाषाओं के समक्ष अनेक तरह के प्रश्न, अनेक तरह की दुश्चिंतायें और आशंकायें खड़ी कर दी हैं। हिन्दी के सामने भी यह संकट कम नहीं है। यह एक सच्चाई है, जिसे हम बदल नहीं सकते। वह यह कि तकनीकी बदलती है, तो मनुष्य और समाज का जीवन, व्यवहार और चिन्तन, सब कुछ बदलने लगता है। भाषा भी। क्योंकि भाषा इनसे बाहर नहीं है। इनमें ही है। तकनालॉजी जहां सुविधा देती है, वहीं अन्य जीवन संदभोंर्-सहित भाषा में भी 'शार्टकट' और वैसे ही व्यवहार घटित होने लगते हैं। जनसंचार माध्यमों में तकनालॉजी का हस्तक्षेप और उनमें प्रयुक्त होने वाली हिन्दी में इसका गहरा हस्तक्षेप रोचक किन्तु गम्भीर विमर्श की मांग करता है।
तकनीकी विकास के साथ हिंदी भाषा का विकास भी तीव्रता से हुआ है, इसमें कोई संदेह नहीं। लेकिन भाषा की भ्रष्टता चिंताजनक है। यह चुनौती भी है। उदाहरण के लिए कम्प्यूटर के क्षेत्र में 'विंडोज' ने हिंदी का संस्करण निकाला! इसमें सारे निर्देश हिंदी में हैं। लेकिन इसका प्रयोग बहुत कम लोग करते हैं। ये निर्देश सहज नहीं हैं। क्योंकि कम्प्यूटर की शब्दावली हमारे कामकाज में रच-बस गई है।
जीवन के कार्य-व्यापारों में व्यापक प्रयोग और तकनीकी शब्दावली के आ जाने से हिंदी का जो नया रूप – हिंग्लिश उभरा है, वह कभी-कभी चिंता में डाल देता है। यह ठीक है कि तकनीकी शब्दावली का हम ठीक-ठीक अनुवाद नहीं कर सकते और उस मूल शब्दावली को हमें अपनाना ही पड़ेगा किंतु अंग्रेजी शब्दों की अनावश्यक मिलावट भाषा को हास्यास्पद और भ्रष्ट कर देती है। मीडिया की जो हिंदी उभरी है वह इसी मिलावट से भरी हुई है। लेकिन यह मुख्यत: मनोरंजन की भाषा है, और इसे इन्हीं क्षेत्रों तक ही सीमित रखना श्रेयस्कर रहेगा। विज्ञापन, रेडियो जकी द्वारा किए जा रहे मनोरंजक कार्यक्रमों की प्रस्तुति आदि में ऐसे प्रयोग चल सकते हैं। साहित्य में नहीं। साहित्य के क्षेत्र में हिंग्लिश का एक उदाहरण देखें –
क्यों नहीं ब्लैक ज़ेर मशके व्हाइट नाउएडेज?
यह हैं पावरफुल वह हैं बेजार वो माइट नाउएडेज
रेंट लॉ का गम करें या बिल ऑफ इनकम टैक्स का?
क्या करें? अपना नहीं है सेंस राइट नाउएडेज।
़.़. डार्कनेस छाया हुआ है हिन्द में चारों तरफ
नाम की भी है नहीं बाकी ना लाइट नाउएडेज।
ये पंक्तियां सन् 1885-86 में लिखी गई थीं। कवि हैं श्री अयोध्या प्रसाद खत्री। दूसरा
उदाहरण है-
अहल यूरप हुआ जेण्टिलम्यान कहलाता है हम।
बाबू न कहना फिर कभी मिस्टर कहा जाता है हम॥
ये पंक्तियां हैं – श्री बालकृष्ण भट्ट की। भट्ट जी की एक गजल 'हिन्दी प्रदीप' के 1 अक्तूबर, 1880 के अंक में छपी थी। उस गजल की पंक्तियां हैं ये।
इन से भी पहले 'हिंग्लिश' का प्रथम प्रयोग हमें स्वतंत्रता आंदोलन के दौरान 19वीं शताब्दी के अंतिम भाग में देखने को मिलता है। उल्लेख मिलता है कि हिंदी भाषा में अंग्रेजी शब्दों का सर्वप्रथम प्रयोग रीवा के राजा विश्वनाथ सिंह ने अपने नाटक 'आनंद रघुनंदन' (1828) में किया था।
इस नाटक में राम कथा है। कथानक जन्म-बधावे से आरंभ होता है, और अंत में रावण पर विजय और गृह प्रवेश तथा उसके उपलक्ष्य में राम स्तुति और गंधर्व नृत्य-गान है। अप्सराएं विभिन्न देशों से आई हैं। एक नर्तक मंडली 'गुरुण्ड देश' (इंग्लैण्ड) से आई है। उदाहरण इस प्रकार है –
'(प्रविश्य गुरुण्ड देशीयोनर्तक:)
णिंम्य नृत्यति गायतिच।
एकिंग हितकारी माई डियर बेरी।
लिबरेल एण्ड बरेवशहिरी॥
गुड इम्प्रेमाइ मिनटापलाड।
गुड आल डैम विसुनाथ आफ गॉड॥
ये किस बादशाहों का बादशाह हितकारी भगवान
माई हमारा डियर प्यारा वेरी बहुत परस्पर प्यारा़.़.।''
इसमें हिंदी, संस्कृत और अंग्रेजी का मिश्रण है।
अयोध्या प्रसाद खत्री (1857-1905) ने खड़ी बोली हिन्दी में कविता लिखने के लिए बहुत बड़ा आंदोलन चलाया था। क्योंकि उस समय तक कविता ब्रज भाषा में लिखी जा रही थी और गद्य खड़ी बोली में। उन्होंने गद्य-पद्य की भाषा एक ही रखने का आह्वान किया था। इसके लिए 'खड़ी बोली का पद्य' शीर्षक से उन्होंने दो भागों में संकलन भी संपादित किए थे, जो क्रमश: 1887 एवं 1889 में प्रकाशित हुए थे। (ये 2008 में साहित्य अकादमी, नई दिल्ली से पुनर्मुद्रित हुए हैं। संपादक हैं – रामनिरंजन परिमलेंदु)
अयोध्या प्रसाद खत्री ने अपने समय में प्रचलित हिंदी की पांच शैलियां स्वीकार की थीं, जिन्हें उन्होंने क्रमश: – ठेठ हिंदी, पण्डित जी की हिंदी, मुंशी जी की हिंदी, मौलवी साहिब की हिंदी, और यूरेशियन हिंदी कहा।़.़ उनका कहना था कि – '1़ ठेठ हिंदी वह है कि जिसमें न विदेशी शब्द हों और न संस्कृत के (कठिन)। इनमें तद्भव और देशज शब्द अधिक रहते हैं। 2़ पण्डित जी की हिंदी में संस्कृत के बड़े-बड़े और कठिन शब्द रहते हैं, विदेशी शब्द प्राय: नहीं रहते। 3़ मुंशी जी की हिंदी पण्डित जी और मौलवी साहब की हिंदी के बीच की हिंदी है और इसको यूरोपियन विद्वान 'हिंदुस्तानी' कहते हैं। 4़ मौलवी साहब की हिंदी, फारसी अरबी (कठिन तत्सम) संज्ञाओं से भरी रहती है। इसको मौलवी साहब उर्दू कहकर पुकारते हैं। 5़ यूरेशियन हिंदी में अंग्रेजी के तत्सम संज्ञा शब्द आते हैं।'
यह सब इतिहास की बातें हो चली हैं। किंतु हिंग्लिश का इतिहास नहीं वह वर्तमान बलवती हो चली है! संकट इसके फैशन बन जाने और लोकप्रिय हो जाने का है। इतना ही नहीं देवनागरी लिपि के स्थान पर रोमन लिपि की स्वीकार्यता पर गहन चिंतन की भी आवश्यकता हो चली है।
विदेशों में हिंदी का प्रयोग निरंतर बढ़ रहा है। अध्येताओं के अनुसार विदेशों में चालीस से अधिक देशों के 600 से अधिक विश्वविद्यालयों और स्कूलों में हिन्दी पढ़ाई जा रही हैं । भारत से बाहर जिन देशों में हिन्दी का बोलने, लिखने-पढ़ने तथा अध्ययन और अध्यापन की दृष्टि से प्रयोग होता है, उन्हें हम मुख्यत: चार वगोंर् में बांट सकते हैं –
1. जहां भारतीय मूल के लोग अधिक संख्या में रहते हैं, जैसे- मरीशस, फिजी, सूरीनाम, गयाना, पाकिस्तान, नेपाल, भूटान, बंगलादेश, म्यांमार, श्रीलंका, मालदीव आदि।
2़ भारतीय संस्कृति से प्रभावित दक्षिण पूर्वी एशियाई देश, जैसे- इंडोनेशिया, मलेशिया, थाईलैंड, चीन, मंगोलिया, कोरिया तथा जापान आदि।
3. जहां हिन्दी को विश्व की आधुनिक भाषा के रूप में पढ़ाया जाता है- अमरीका, आस्ट्रेलिया, कनाडा और यूरोप के देश।
4़ अरब और अन्य इस्लामी देश, जैसे- संयुक्त अरब अमीरात, अफगानिस्तान, कतर, मिस्र, उज्बेकिस्तान, कजाकिस्तान, तुर्कमेनिस्तान आदि। इसी तरह मालदीव की भाषा दीवेही भारोपीय परिवार की भाषा है जो हिन्दी से मिलती-जुलती है। फ्रांस, इटली, स्वीडन, आस्ट्रिया, नार्वे, डेनमार्क तथा स्विट्जरलैंड, जर्मनी, रोमानिया, बुल्गारिया और हंगरी के विश्वविद्यालयों में भी हिन्दी के पठन-पाठन की व्यवस्था है ।
इन देशों में हिंदी फिल्में अत्यंत रुचिपूर्वक देखी जाती हैं। फिल्मी गाने और संगीत का जादू लोगों के सिर पर चढ़कर बोलता है। भारतीय संस्कृति के प्रति इन देशों के लोगों में गहरा अनुराग है। यहां हिंदी इस अनुराग को और प्रगाढ़ करती है। फिल्मों के अतिरिक्त इंटरनेट पर हिंदी की अनेक ई-पुस्तकें और ई-पत्रिकाएं उपलब्ध हैं, जिनमें से कई विदेशों में रह रहे हिंदी प्रेमियों द्वारा संपादित होती हैं। इसी तरह हिंदी के हजारों 'चिट्ठे' (ब्लॉग) इंटरनेट पर पढ़े जा सकते हैं। संक्षिप्त संदेश सेवा (एस़एम़एस़) और सचित्र बहुमाध्यम संदेश (एम़एम़एस़), चटपट बातचीत या गपशप (चैटिंग) आदि में हिंदी का बढ़ता प्रयोग अब सामान्य बात है। फेसबुक, ट्विटर, लिंक्डिन जैसे सोशल मीडिया पर भी हिंदी छाई हुई है। ई-बैंकिंग, ई-कॉमर्स और यातायात के लिए टिकट आरक्षण से लेकर अन्य तमाम सुविधाओं के लिए हिंदी में काम हो रहा है। निस्संदेह राष्ट्र के विकास के लिए संकल्पित 'डिजिटल इंडिया' अभियान को साकार करने और सफल बनाने में हिंदी की भूमिका सवार्ेपरि सिद्घ होगी। इसके लिए तकनीकी शिक्षा और तकनीकी के प्रति जागरूकता की महती आवश्यकता है।
कहना न होगा कि हिन्दी आज विश्व के विराट फलक पर अपने अस्तित्व को विस्तार दे रही है और विश्व भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त करने की ओर अग्रसर है। वह दिन दूर नहीं जब हिंदी भी चीनी, अंग्रेजी, अरबी, फ्रेंच, रूसी और स्पेनिश की भांति संयुक्त राष्ट्र संघ की आधिकारिक भाषा के रूप में मान्यता प्राप्त कर लेगी। -प्रो़ हरि मोहन
लेखक के.एम. मुंशी हिंदी विद्यापीठ,आगरा के पूर्व निदेशक और जे़ एस़ विश्वविद्यालय, शिकोहाबाद के कुलपति हैं।