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पूवार्ेत्तर भारत प्राकृतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से अत्यंत समृद्ध है। शिक्षा और रोजगार वे दो क्षेत्र हैं जो पूवार्ेत्तर के विकास के लिए आवश्यक हैं। इस समझौते ने पंूजीपतियों को पूवार्ेत्तर भारत में निवेश करने का हौसला दिया है। समझौते से पूवार्ेत्तर के आम लोगों का भविष्य सुधरेगा, भारत की 'लुक ईस्ट नीति' सफल होगी, चीन को मुंहतोड़ जवाब मिलेगा, पूर्व के देशों के साथ व्यापार बढे़गा और सांस्कृतिक समरसता बनेगी। शेष भारत में नक्सली या अन्य प्रकार की हिंसा पर रोक सहित कई समस्याओं का समाधान इस समझौते से संभव है।
3 अगस्त 2015 को भारत सरकार और भारतीय नागा मूल के इसाक-मुइवा द्वारा संचालित नागा विद्रोही गुट 'नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड' के बीच ऐतिहासिक शांति समझौता हुआ है। पूरे पूवार्ेत्तर में कांग्रेस, वामपंथी और गैर-भाजपा सरकारें हैं, बंगलादेशी घुसपैठ और चीन के गैर दोस्ताना माहौल में यह समझौता किस हद तक महत्वपूर्ण है, इसका एक अनुमान हम स्वयं भी लगा सकते हैं। बाकी धुंध समय के साथ साफ होगी।
नागा विद्रोह की पृष्ठभूमि
यह समझौता कोई अचानक नहीं हुआ है। इसके पीछे का इतिहास काफी पेचीदा है। 1918 में नागा क्लब बना, जिसने 1929 में साइमन कमीशन को एक ज्ञापन सौंपा कि हम भारतीय प्रशासकीय इकाई से अलग स्वतंत्र राष्ट्र रहना चाहते हैं। फिजो के नेतृत्व में नागा क्लब 1946 में नागा नेशनल काउंसिल में बदल चुका था। इमति अलिबा और टी. शाखरी इसके सदस्य थे। जब अंग्रेजों ने भारत से इंग्लैंड वापस लौटना तय किया तब ही नागालैंड में आन्दोलन चला रहे नागा नेता अंगामी जापू फिजो ने असमिया, मैतेई, गारो, खासी, लुशाई, मिकिर, मिशमिस आदि पूवार्ेत्तर की सभी प्रमुख जनजातियों से व्यक्तिगत तौर पर अलग-अलग बातचीत करके भारत से अलग राष्ट्र बनाने पर समर्थन प्राप्त करना चाहा, जिसमें उसे सफलता नहीं मिली। इसके बावजूद देश को आजादी मिलने से एक दिन पहले ही 14 अगस्त 1947 में उसने नागा बहुल क्षेत्र के स्वतंत्र देश होने की घोषणा कर दी। नागा क्षेत्र को भारतीय गणराज्य से बाहर स्वतंत्र देश बनाने की यह सोच अंग्रेजी नीतियों का ही परिणाम थी।
भारतीय सीमावर्ती प्रशासनिक सेवा में नियुक्ति होने के कारण एनएनसी के सचिव पद से इमति अलिबा सेवानिवृत्त हुए तो 1950 के दशक में एनएनसी में जापू फिजो की पैठ बढ़ती गयी। तब नागालैंड असम का एक पहाड़ी जिला (हिल डिस्ट्रक्टि) ही था। नवम्बर 1949 में अपने विरोधी विजार अंगामी को मात्र एक वोट से हराकर फिजो एनएनसी का अध्यक्ष बना और लोगों से आम चुनावों का बहिष्कार करने की अपील कर डाली। मार्च 1956 में फिजो ने अंडरग्राउंड 'नागा फेडरल गवर्नमेंट' और 'नागा फेडरल आर्मी' बनाई और यहां से विद्रोह ने जोर पकड़ा। यह एक प्रकार से भारतीय संविधान के खिलाफ होना था। नागा विद्रोह दबाने के लिए दिल्ली से सेना भेजी गयी। फिजो बचकर पूर्वी पकिस्तान भागा, और वहां से जून 1956 में लन्दन। उसके बाद वह कभी भारत नहीं लौटा, 1990 में लन्दन में ही उसकी मृत्यु हुई। नागा आन्दोलन के नेतृत्वकर्ता को मरना भी अपनी नागाभूमि पर नसीब न हो सका। लेकिन विदेशी जमीन से भी जीवनभर वह इस अलगाववादी आन्दोलन का समर्थन करता रहा।
एनएससीएन- नागा विद्रोह का जनक
10-11 नवम्बर, 1975 को एक समझौता हुआ, जिसमें कहा गया था कि नागा फेडरल गवर्नमेंट बिना किसी शर्त के भारत की संप्रभुता को स्वीकार करती है, हालांकि समझौते में नागा लोगों के हित में भी कुछ प्रावधान थे। भारत सरकार के प्रतिनिधि के रूप में नागालैंड के तत्कालीन राज्यपाल श्री लल्लन प्रसाद सिंह और एनएनसी के केवी येली (जापू फिजो के छोटे भाई) के नेतृत्व में पांच नागा नेताओं ने इस पर दस्तखत किये। इस समझौते को 1975 के शिलांग समझौते के नाम से जाना जाता है। इस वक्त फिजो लन्दन में था। लेकिन यह सर्वस्वीकार्य हल नहीं था, क्योंकि अंगामी जापू फिजो के छोटे भाई केवी येली को भूमिगत उग्रवादी संगठनों का प्रतिनिधि माना जाता था न कि नागा फेडरल गवर्नमेंट का। एनएनसी के तत्कालीन अध्यक्ष इसाक चिसी स्वू और महासचिव थुइन्गालेंग मुइवा ने लन्दन में बैठे फिजो से भी सात लोगों का दल भेजकर समझौते का विरोध करवाने की पुरजोर कोशिश की, लेकिन फिजो इस विषय में मौन रहा, न समर्थन ही किया और न विरोध।
एनएनसी की तरफ से शिलांग समझौते को विद्रोही गुटों के साथ हुआ समझौता और विश्वासघात करार देकर यहां तक कह दिया गया कि नागा लोगों के अधिकारों को बेचा गया है। इसका जिम्मेदार फिजो को ठहराया गया। इसी बगावत से नागालैंड की निर्विवाद संप्रभुता यानी ग्रेटर नागालिम पाने के लिए विद्रोह की आग प्रबल होती गयी। इसाक चिसी स्वू, थुइन्गालेंग मुइवा और एस. खापलांग की तिकड़ी ने शिलांग समझौते के पांच साल बाद एनएनसी को पुनर्जीवित करने के उद्देश्य से 31 जनवरी, 1980 को 'नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड' का गठन किया, जो 8 साल बाद ही 30 अप्रैल 1988 को दो फाड़ हो गया। एक के मुखिया भारतीय नागा मूल के इसाक और मुइवा हैं तो दूसरे को बर्मा नागा मूल का खापलांग चलाता है। अभी 3 अगस्त 2015 को जो भारत सरकार-नागा समझौता हुआ है वह भारतीय मूल के इसाक और मुइवा के संगठन के मध्य हुआ है।
शांतिवार्ता की पहल
पहले की बात करें तो तब 15 जून 1995 को तत्कालीन प्रधानमंत्री पी. वी. नरसिंहराव ने मुइवा और स्वू के साथ पेरिस में मुलाकात कर शांति प्रक्रिया शुरू की थी। फिर नवम्बर 1995 में तत्कालीन गृह राज्यमंत्री राजेश पायलट ने बैंकाक में, 3 फरवरी 1997 को तत्कालीन प्रधानमंत्री एच. डी. देवेगौड़ा ने ज्यूरिख में और 30 सितम्बर 1998 को तब के प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी ने पेरिस में एनएससीएन-(आई एम) के प्रतिनिधिमंडल से मुलाकत कर शांतिवार्ता को आगे बढ़ाया था। आखिरी बार यह समझौता 31 जुलाई 2007 को अनिश्चितकाल के लिए बढ़ा दिया गया था।
पूर्ववर्ती सरकार ने नागालिम की मांग को मानते हुए एक समझौते की प्रक्रिया प्रारंभ की थी लेकिन समझौता हो पाता, उससे पहले ही अरुणाचल प्रदेश, असम और मणिपुर ने इस योजना का विरोध करना प्रारंभ कर दिया था। 2003 की इस घटना में इन राज्यों में अन्य जनजातीय संगठनों ने नागा विद्रोहियों के खिलाफ हथियार उठा लिये थे और बड़े पैमाने पर नागा और अन्य तीन राज्यों के वनवासियों में भयंकर युद्ध तक शुरू हो गया था। संगठन शक्ति में नागा बेहतर थे, परिणामस्वरूप हजारों की संख्या में अन्य वनवासी मारे गए, जनजातियों का वहां से पलायन होने लगा। वह समझौता सर्वस्वीकार्य नहीं था, इसलिए वह समस्या आज तक खिंची चली आई थी।
पिछले समझौतों से उपजी शंका
अभी तक की सरकारें विद्रोहियों की शतार्ें पर समझौता करती आयी हैंै। इन समझौतों का अर्थ इतना ही होता है कि वे उग्रवादी गुट हमारी सेना, नागरिकों और राष्ट्र को नुकसान पहुंचाना स्थगित कर देते हैं। लेकिन तब भी वे संधि का पालन करेंगे ही, ऐसा तय नहीं रहता। इतिहास में अनेकों बार संधि का उल्लंघन हुआ है।
अभी हाल ही में दिल्ली पुलिस की विशेष शाखा ने खापलांग गुट के 'नेशनल सोशलिस्ट काउंसिल ऑफ नागालैंड' के एक आतंकी नगमसिनलंग पनमई (49 वर्ष) को गिरफ्तार किया है जिसने स्वीकार किया कि वह मार्च 2015 में म्यांमार में खापलांग से मिलने गया था, जिसके बाद ही मणिपुर के चंदेल जिले में सेना के ट्रक को निशाना बनाया गया था। उसने खुलासा किया है कि बर्मा मूल के खापलांग का विद्रोही गुट भारत विरोधी गतिविधियों में लिप्त है।
वर्तमान समझौते का अकारण विरोध
समझौते से पूवार्ेत्तर के आम लोगों का भविष्य सुधेरगा, आने वाली पीढ़ी का बचपन संवरेगा, भारत की 'लुक ईस्ट नीति' सफल होगी, चीन को मुंहतोड़ जवाब मिलेगा, पूर्व के देशों के साथ व्यापार को बढ़ावा मिलेगा (क्योंकि पूवार्ेत्तर हमारा पूर्व का व्यापार द्वार है), भारत के सांस्कृतिक सम्राट राजा खारवेल की भांति सांस्कृतिक समरसता बनेगी और शेष भारत में नक्सली या अन्य प्रकार की हिंसा पर रोक लगेगी। और भी कई समस्याओं का समाधान इस समझौते से संभव है। इस अवसर पर असम, अरुणाचल और मणिपुर के मुख्यमंत्रियों का विरोध केवल कांग्रेस आलाकमान के दबाव का परिणाम है, क्योंकि संसद में उनकी स्थिति कमजोर है।
पूवार्ेत्तर अपार संभावनाओं से भरा क्षेत्र है। इस समझौते के बाद यहां विकास को निश्चित ही गति मिलेगी। इसलिए जिन तीन मुख्यमंत्रियों ने अपनी आशंका जताई है, उन्हें अपनी शंका समाधान के लिए समझौते के सार्वजनिक होने तक का धैर्य धरना चाहिए, क्योंकि दबाव में उनके द्वारा शुरू किया गया विरोध, उनके राज्यों के लोगों को उकसाने का काम करेगा। आमजन को कांग्रेस-भाजपा की राजनीति से मतलब नहीं है। वह केवल इतना समझता है कि उसकी जमीन विद्रोहियों को दे दी गयी है और कोई भी नागरिक नहीं चाहता कि उसकी मातृभूमि का बंटवारा कर दिया जाये। यदि जमीन पाने का यही मापदंड है तो भविष्य में हर राज्य में नए-नए विद्रोही गुट किसी ना किसी 'लैंड' की मांग करते दिखाई देंगे। दार्जिलिंग में गोरखालैंड, असम में बोडोलैंड, मेघालय में गारोलैंड, खासीलैंड, मणिपुर में कूकीलैंड और अरुणाचल के चीन सीमा पर न्यू चाइनालैंड। विपक्षी दलों की संकुचित सोच क्षण भर में भारत के कई खंड होने के रास्ते खोल देगी।
यह शरारत क्यों?
सरकार के साथ समझौता हो चुका है, तब भी एनएससीएन (आई-एम) सचिव थुइन्गालेंग मुइवा द्वारा 14 अगस्त को नागालैंड में दीमापुर के हेबरन शिविर में 'नागा स्वतंत्रता दिवस' मनाना स्वयं को भारत से अलग स्वतंत्र राष्ट्र जताना ही है, जिसमें अरुणाचल, असम, मणिपुर और बर्मा (म्यांमार) में रहने वाले 3000 से अधिक नागा नेताओं और समर्थकों की उपस्थिति केवल एक जश्न नहीं बल्कि भारतीय संप्रभुता को चुनौती जैसी है। इसमें नागालैंड के पड़ोसी, कांग्रेस शासित तीनों प्रदेश भी बाधा खड़ी करेंगे क्योंकि ग्रेटर नागालिम समस्या का समाधान किसी भी सरकार के लिए बहुत बड़ी उपलब्धि होगी। लेकिन शांतिवार्ता सफल हुई तो संभव है अगले वर्ष से विद्रोही नागा भी भारतीय स्वतंत्रता दिवस मनाएं।
ग्रेटर नागालिम और एक प्रश्न
सन् 1988 में इस गुट के नेताओं के द्वारा स्वतंत्रता के बदले स्वायतता की बात की जाने लगी थी। लेकिन नागा विद्रोही इस बात को लेकर एक मत है कि एक अलग नागालिम नामक राज्य का गठन किया जाये, जिसको अधिक से अधिक स्वायत्तता प्रदान की जाये। यही एक बात समस्या के समाधान में बाधा रही है। ग्रेटर नागालिम का मतलब है असम, मणिपुर, अरुणाचल प्रदेश के नागा क्षेत्रों के साथ म्यांमार का बहुत बड़ा भू-भाग। जिस नागालैंड का नक्शा आज16527 वर्ग कि़ मी. है, वह लगभग 1,20,000 वर्ग कि़ मी. का हो जायेगा।
वैश्वीकरण के युग में एक प्रश्न कि मणिपुर, असम या अरुणाचल में नागा बहुल इलाकों को नागा भूमि में मिलाकर नागाओं के लिए ग्रेटर नागालिम की मांग क्यों? पड़ोसी प्रदेशों में रह कर भी नागा जनजातियों का विकास समान रूप से संभव है। कम से कम भारत, दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र इस की पूरी स्वतंत्रता देता है।
पूवार्ेत्तर में अलगाववाद का प्रमुख कारण चर्च
जैसा कि ऊपर लिख गया है, पूवार्ेत्तर क्षेत्र के टुकड़े करा कर भारतीय गणराज्य से बाहर जनजातीय आधार पर कई स्वतंत्र देश बनाना ही अंग्रेजों की नीति थी। जैसा कि यूरोप, अफ्रीका और रूस में हो चुका है, एक जाति को (जो कन्वर्जन के बाद ईसाई बन चुकी है) वहां की दूसरी जाति (जिसने ईसाई मत स्वीकार नहींं किया और अपने मूल धर्म का पालन कर रही है) से लड़ाना। और इस प्रकार गैर-ईसाइयों का खात्मा करना, जैसा कि अफ्रीका के छोटे से देश कोंगो और पूरे अफ्रीका में हुआ। स्कूल, छात्रावास, अनाथालय, अस्पताल, वृद्धाश्रम के माध्यम से सेवा कार्य, मत प्रचार, इनके नौकरीशुदा प्रचारक-प्रचारिकाओं के माध्यम से हर घर में बाइबिल, प्रत्येक रविवार चर्च में जाना अनिवार्य होना, अपनी तनख्वाह का कुछ प्रतिशत चर्च को दान देना, ये ईसाइयत फैलाने के तौर-तरीके हैं। इसके बाद जो ईसाई नहीं बने, उनका पलायन या खून खराबा गुपचुप और शांत तरीकों से कराया जाता है। जैसे कोंगो में हुए नरसंहार का दुनिया को कारण बताया गया, एक वनवासी जनजाति की दूसरी वनवासी जनजाति के साथ लड़ाई। जबकि सच्चाई यह है कि जो लोग ईसाई मत स्वीकार कर चुके थे उनके पास लड़ने के लिए अच्छे हथियार थे।
पूवार्ेत्तर में ग्रेटर नागालिम बनाने के बाद का चित्र भी इसी तरह का होगा। उदाहरण के लिए मणिपुर चारों तरफ पहाडि़यों से घिरा है, बीच में घाटी है, जिसमें पूर्वी और पश्चिमी इम्फाल, थोउबाल और बिष्णुपुर जिले आते हैं, जिनमें रहने वाले मूल मणिपुरीवासी मैतेई और वैष्णव हैं। बाकी जिले पहाड़ी हैं और इन पहाड़ी जिलों में नागा बहुलता है, कहीं कहीं कूकी भी हैंं। अब जब ग्रेटर नागालैंड बन जायेगा तब अफ्रीका की तरह यहां भी घाटी में रहने वाले मूल निवासियों पर ईसाइयत अपनाने का दबाव होगा और कन्वर्जन की अनुपस्थिति में खून-खराबा यानी मूल प्रजातियों का पलायन या विनाश। असल में यही है ईसाई आतंकवाद। हमारे यहां पूवार्ेत्तर का भाग चर्च के इसी दीर्घकालिक षड्यंत्र का शिकार है। हमें इस चुनौती से निपटना है, जो सैकड़ों वर्ष पहले शुरू हुई थी।
एनएससीएन का गठन नागाओं ने नहीं किया, यह तो ईसाई मत स्वीकार कर चुके पूर्व नागा लोगों से चर्च ने करवाया। पूर्व नागा इसलिए कहा कि ईसाई मत में कोई जनजाति नहीं होती, केवल ईसाई होते हैं। इसमें काबुई नागा जैसी मूल नागा जनजातियां शामिल नहीं हैं, वे आज भी अपनी परम्परा को जिंदा रखे हुए हैं।
समझौते से संभावित लाभ
मोदी सरकार के साथ हुए इस शांति समझौते ने पिछले 40 वषार्ें के भारत सरकार और इस अलगाववादी संगठन के बीच बार-बार होते संघर्षविराम को शांतिवार्ता के मंच तक पहुंचाया है। एनएससीएन (आई-एम)आतंक की जड़ है, अब उसी संगठन के साथ शांतिवार्ता की सफल शुरुआत से अन्य गुटों, विशेषकर खापलांग गुट पर भी शांतिवार्ता में शामिल होने के लिए दबाव बनेगा अन्यथा वह कमजोर पड़ेगा। इसके दो कारण होंगे- पहला कि उसका प्रभाव बर्मा में है, दूसरा नागालैंड की आम जनता इस समस्या से निजात चाहती है और वह उसी संगठन का साथ देगी जो समाधान की दिशा में कदम बढ़ाएगा।
यदि नॉन-टेरिटोरियल रिजोल्यूशन फ्रेमवर्क एग्रीमेंट इस समझौते का हिस्सा है तो विरोध जता रहे तीनों राज्यों की अपनी क्षेत्रीय सीमाएं और संप्रभुता कायम रहेगी, पर साथ ही उन्हें अपने नागा बहुल इलाकों में विकास के लिए अधिक स्वायत्तता और सुविधाएं उपलब्ध करानी होंगी।
पूवार्ेत्तर भारत प्राकृतिक, सांस्कृतिक और ऐतिहासिक रूप से अत्यंत समृद्ध है। शिक्षा और रोजगार वे दो क्षेत्र हैं जो पूवार्ेत्तर के विकास के लिए आवश्यक हैं। इस समझौते की सफलता के फलस्वरूप सबसे तेज विकास शिक्षा और रोजगार की दिशा में होगा। जैसी कि घोषणा हो चुकी है, मणिपुर में खेल विश्वविद्यालय की स्थापना होगी। पूवार्ेत्तर में एम्स अस्पताल खुलेगा, आईटीआई संस्थानों की संख्या बढ़ेगी। 'स्किल डेवलेपमेंट' की सोच से व्यावसायिक शिक्षा का दायरा बढे़गा। औद्योगिक घरानों को इंजीनियर, कारीगर, श्रमिक, यहां तक कि कुछ को कच्चा माल भी वहीं से उपलब्ध होगा।अब तक पूंजीपति केवल इस कारण पूवार्ेत्तर में निवेश नहीं कर पाते थे कि उद्योग लगाने का जितना बजट होता था, उसके अनुसार (प्रतिशत में) भारी रकम उन्हें भूमिगत गुटों को घूस के रूप में उद्योग शुरू करने के पहले देनी होती थी। इस समझौते ने पंूजीपतियों को पूवार्ेत्तर भारत में निवेश करने का हौसला दिया है। पूंजीनिवेश होगा, नए उद्योग और कारखाने लगेंगे, पूवार्ेत्तर के लोगों को रोजगार मिलेगा। इससे पूवार्ेत्तर के लोगों का पलायन रुकेगा। पलायन रुकेगा तो संस्कृति बची रहेगी। समझौते के बाद अपने वक्तव्य में प्रधानमंत्री ने कहा था-नागाओं का साहस और प्रतिबद्धता प्रसिद्ध है, ऐसे में उनकी विशिष्ट संस्कृति और इतिहास को मान्यता देना, भारत की सांस्कृतिक समरसता और एकता को ही दर्शाएगा और दशकों लम्बी इस लड़ाई का अंत होगा।
गुलशन कुमार गुप्ता (लेखक पूवार्ेत्तर भारत में विषय के शोधार्थी हैं)











