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भारत में सावन की झड़ी के बीच पाकिस्तान से बात करने की बात हवाओं में तिर रही है। बात दोनों देशों के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकारों के बीच होनी है (इन पंक्तियों के लिखे जाने तक सिर्फ टीवी चैनलों पर एजेंडे के कयास भर लगाए जा रहे हैं, मेज पर बात अभी होनी बाकी है)। बात होनी है पाकिस्तान के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज और भारत के सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल के बीच। नई दिल्ली में। राजनीतिक हल्कों और विदेश नीति के अध्येताओं ने अपने मोर्चे कस लिए हैं। विपक्ष में आपसी तकरार चल रही है कि डोवल ने यह बोला तो उसके विरोध में फलां बयान देंगे और अजीज ने वह बोला तो फलां उदाहरण याद दिलाएंगे। कश्मीर की सर्द घाटी रायसीना की पहाड़ी पर बने साउथ ब्लॉक को तक रही है। क्या होगा, क्या कहा जाएगा, क्या मांगा जाएगा, क्या मनवाने की कोशिश की जाएगी, किसे छोड़ देने की तकरीरें होंगी, क्या तर्क गढ़े जाएंगे, क्या सफाइयां पेश होंगी, किन डोसियरों का आदान-प्रदान होगा, आदि आदि।
पाकिस्तान से बात होने की बात निकलने की देर भर है कि चर्चाओं का बाजार गर्म हो जाता है। अब जो बात होनी है उसकी तैयारी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी के उफा (रूस) में सातवें ब्रिक्स शिखर सम्मेलन के दौरे के दौरान 10 जुलाई को पाकिस्तान के प्रधानमंत्री नवाज शरीफ से बातचीत के बाद जारी हुए पांच सूत्रीय संयुक्त वक्तव्य के साथ ही होने लगी थी। हालांकि उस वक्त कई विश्लेषकों और सुरक्षा विशेषज्ञों ने आलोचना की थी कि पाकिस्तान के साथ इस वार्ता का कोई मतलब नहीं था। लेकिन दूसरे पल यह बात भी सुनाई देती थी कि विदेश संबंधों में दूरियां नुकसानदेह होती हैं, कोई किसी का न स्थायी मित्र होता है, न शत्रु। बात यह भी कायदे की लगी। भारत की इस पहल का कई मंचों पर स्वागत हुआ तो कई पर टीका-टिप्पणी। पर बात होगी, यह तय पाया गया। उस संयुक्त वक्तव्य में एक बात गौर करने की थी। वह यह कि पांचों में से एक भी बिन्दु जम्मू-कश्मीर के बारे में नहीं था, जो कि सदा-सर्वदा पाकिस्तान की हर बातचीत में स्थायी टेक रहती है। इसका खामियाजा पाकिस्तानी खेमे को भुगतना पड़ा, अपने मुल्क में जाकर।
उफा से लौटकर सरताज अजीज को क्या-क्या नहीं सुनना पड़ा उस 'चूक' के लिए। पाकिस्तान को अपने इशारों पर चलाने वाली फौज और उसकी भी खैर-ख्वाह आईएसआई और उसके भी आलाकमान हाफिज सईद जैसे कट्टर मुल्लाओं ने अजीज को आड़े हाथों लिया, पूछा कि कैसे भूले कश्मीर। मीडिया में संपादकीयों में अजीज की उस 'गलती' पर उन्हें जमकर कोसा जाने लगा।
इस लानत-मलामत का असर हुआ। तीसरा दिन बीतते न बीतते सरताज अजीज ने इस्लामाबाद में बड़ी मासूम सूरत बनाकर भाषण की आड़ में दिल का दर्द बयां कर दिया। बोल दिया कि 'कश्मीर को कैसे भुलाया जा सकता है? वह तो हमारे दिल के लिए अजीज है, हमारे सोते-जागते वही तो गूंजता है हमारे दिलो-दिमाग में। हम कैसे छोड़ देंं उसे। वहां की लड़ाई के हम साथ साथ हैं।' तनी तलवारें म्यान में लौट आईं। कलेजों में ठंड पड़ गई, यह सोचकर कि हमारी खाद-पानी और ऑक्सीजन की सप्लाई सलामत है। अजीज बाग-बाग हो गए, पिण्डी की महफिलों में रौनक लौट आई।
भारत-पाकिस्तान बातचीत से पहले की पृष्ठभूमि का दूसरा अंक यहां दिल्ली में खेला गया, पाकिस्तान उच्चायोग के लॉन में। 14 अगस्त को। अब थोड़ा उस बाबत बात कर लें।
इस अंक के मुख्य किरदार हैं अब्दुल बासित। भारत में पाकिस्तान के उच्चायुक्त। स्थान-नई दिल्ली के दिल में बना पाकिस्तान उच्चायोग का हरा-भरा लॉन। 14 की सुबह झरती बूंदों में खुद को छतरी से ढांपकर बासित ने अपने मुल्क की 'आजादी' के सरकारी जश्न में तकरीर करते हुए वही बोला जो हर पाकिस्तानी नेता बोल भर पाता है। उच्चायोग के कारिंदों, उनके घर वालों और स्टाफ के अन्य कामगारों के सामने बासित ने कहा, 'मेरा मुल्क कश्मीर में आजादी की जायज लड़ाई लड़ रहे कश्मीरियों का हाथ नहीं छोड़ेगा। जम्मू-कश्मीर के लोगों की उम्मीदों को न अनदेखा किया जा सकता है, न ठंडे बस्ते में डाला जा सकता है।' इतना तो वे बोले कश्मीर के मुट्ठी भर अलगाववादियों को खुश करने को, जो हर शुक्रवार की तकरीर के बाद घाटी में टीवी चैनलों के कैमरों के सामने, खीसें निपोरते हुए पाकिस्तानी, और अब तो आईएसआईएस के भी झंडे लहराते हैं। यह भाषण देते हुए बासित शायद भूल गए कि वे उसी राजधानी दिल्ली में उसी संसद से फर्लांग भर दूर ये बेसिरपैर की बातें उछाल रहे थे जिसने 1994 में सबकी सम्मति से सदन में प्रस्ताव पारित किया हुआ है कि 'जम्मू-कश्मीर भारत का अभिन्न अंग है'। वे शायद यह भी याद न रख पाए कि बस आठ दिन बाद दोनों देशों के सुरक्षा सलाहकारों की बात होने जा रही है। इसी दिल्ली में। बासित ठहरे बासित। उन्होंने कश्मीर घाटी के अलगाववादी हुर्रियत नेताओं को न्योता भेज दिया दिल्ली आने का और सरताज अजीज से मिलने का। ये ही बासित थे जिन्होंने पिछली ईद को इन्हीं अलगाववादी नेताओं को दिल्ली बुलाया था और तब इस्लामाबाद में होने जा रही दोनों देशों के विदेश सचिवों की बातचीत को पलीता लगा दिया था। भारत ने तब बातचीत की मेज से कदम पीछे खींच लिए थे। पाकिस्तान ने तब खूब दुष्प्रचार किया था कि 'हम तो चाहते हैं रिश्ते आगे बढ़ें, भारत वाले मुकर जाते हैं। हम तो मासूम हैं, हुर्रियत वालों को बुलाने की तो पुरानी रस्म रही है।' आदि। खैर, हुर्रियत वालों को बासित ने 23 अगस्त को ही न्योता है। अजीज उनके पुराने अजीज हैं। सो, बात का वक्त भी, बताते हैं, डोवल से मिलने से पहले का मिला है। सैयद अली शाह गिलानी और मीरवायज उनसे कश्मीर के सुहाने मौसम की बात करने तो नहीं जाएंगे। क्या चर्चा होगी, उसके बारे में लिखने की दरकार शायद नहीं है।
पृष्ठभूमि का तीसरा अंक दो स्थानों पर खेला गया। गुरदासपुर में थाने पर हथियारबंद जिहादी चढ़ आए। गोलियों की बौछारों से तीन पुलिस वाले मार दिए, कई घायल कर दिए। वहां से थोड़ी दूर सीमा से अंदर धकेला गया था उन्हें, भारत वालों को छलनी करने को। सीमा पार बैठे उनके आकाओं ने उनको जो करने को कहा था उसकी तामील की गई। दूसरा स्थान था अमरनाथ यात्रा मार्ग के पास उधमपुर। बीएसएफ की बस पर अंधाधंुध गोलियां चलाईं दो आत्मघाती जिहादियों ने। पलटवार में एक ढेर हो गया। एक को जिंदा धर लिया गया। नावेद। पकड़े जाने के बाद बड़े इत्मीनान भरे अंदाज में उसने कहा, 'हिन्दुओं को मारने आया था, मजा आता है उनको मारने में।'उसे भी सीमा पार से यहां धकेला गया था। नावेद ने साफ बताया कि उसे सीमा पार प्रशिक्षण मिला, हथियार मिले, आदेश मिला और उसने भी हुक्म की तामील की। पाकिस्तान में बैठा उसका पिता कबूलने लगा, वह उसका बेटा है।
किस हद तक पाकिस्तान में हाफिज सरीखों ने जहर भर दिया है वहां के बेरोजगार लड़कों में कि पैसा और बंदूक देकर उन्हें इस ओर धकेले जाते ही वे गोलियों की बौछार करने लगते हैं। फिर भी पाकिस्तान मुकरता रहा है कि किसी भी जिहादी हरकत में उसका, माने उसकी सेना और उसकी सरपरस्त आईएसआई का कोई हाथ नहीं है। जबकि पकड़े गए लगभग सभी हत्यारों ने हर बार आईएसआई की साजिशों की तरफ इशारा किया है। ये हैं वे कुछ दृश्य जिनकी छाया में दोनों देशों के सुरक्षा सलाहकार मिलने वाले हैं।अभी प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने दुबई में सत्तर हजार से ज्यादा अनिवासी भारतीयों के सामने आतंकवाद के खात्मे के लिए यूएई के साथ हुए करार की चर्चा करते हुए इशारों-इशारों में पड़ोसी मुल्क को चेताया था कि बाज आ जाओ, आतंक को पोसना बंद करो, नहीं तो मानवता के पक्षधर देश मिलकर मुहिम चलाएंगे।
23 अगस्त को अंतरराष्ट्रीय पर्यवेक्षकों की निगााहें नई दिल्ली पर टिकी होंगी। भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजित डोवल आतंक और उसके पैरोकारों से बखूबी परिचित हैं। वार्ता के बिन्दुओं में क्या-क्या शामिल होगा, कहने की दरकार नहीं। अजीज के सूत्र क्या होंगे, वह पूर्व के अनुभव से आसानी से समझ आता है। भारत जिस पशुता को, जिस मजहबी उन्माद को, जिस आतंकवाद को दशकों से झेलता आ रहा है, उसकी वीभत्सता किसी से छिपी नहीं है। छिपे वे भी नहीं हैं जो इस वीभत्सता का जश्न मनाते हैं। बात करने की बात निकली है तो जाहिर है दूर तक जाएगी। वह दो टूक होगी, होनी ही चाहिए।
आलोक गोस्वामी











