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हमारे संविधान में जब 'इण्डिया दैट इज भारत' लिखा गया, संभवत: तभी से 'इण्डिया' और 'भारत' इन दो संज्ञाओं के बीच अन्तर की नींव पड़ गई थी। उसके बाद कालान्तर में यह अन्तर और अधिक गहरा और गंभीर होता गया। 'इण्डिया' की दृष्टि और दिशा, व्यवहार और जीवनशैली पश्चिम से अधिक प्रभावित है और वह भारत की मूल प्रकृति को न केवल नकारती है, बल्कि दुत्कारती भी है और अपनी सुख-सुविधा के लिए उसे नष्ट-भ्रष्ट करने में भी संकोच नहीं करती। परिणामस्वरूप 'इण्डिया' के हाथों 'भारत' शोषित एवं अपमानित होता रहा है। वैसे तो इण्डिया और भारत के बीच का यह अन्तर सामाजिक, सांस्कृतिक, शैक्षिक, राजनीतिक एवं आर्थिक सभी क्षेत्रों में दिखाई देता है, किन्तु आर्थिक क्षेत्र में तो इस अन्तर का अन्तराल अधिक भयावह एवं दर्दनाक स्वरूप में प्रकट हुआ है। मुश्किल से देश की 20-25 करोड़ जनसंख्या 'इण्डिया' के आगोश में आती है तो 100 करोड़ से अधिक जनसंख्या भारत की छाया में जीती है। स्मरण रहे कि यह विभाजन न तो भौगोलिक आधार पर है और न ही जनांकिकीय आधार पर, यह तो अर्थचिन्तन की दृष्टि के आधार पर है। जो लोग पश्चिम की ही विकास दृष्टि एवं अर्थनीति को अपनाकर या नकल कर देश की प्रगति करना चाहते हैं और जिन्होंने इस कुचक्र का हिस्सा बनकर अपने लिए अधिकाधिक लाभ अर्जित किया है, वे सब 'इण्डिया' के अन्तर्गत आते हैं। इस सोच के लोगों ने नीति-निर्माण केन्द्रों, विद्या एवं अकादमिक संस्थानों, शोध संस्थाओं एवं महत्वपूर्ण वैचारिक केन्द्रों पर कब्जा जमा लिया है।
अन्तरराष्ट्रीय विशेषज्ञता को किराए पर लाकर नीति-निर्माण करना एक चलन बन गया है। विदेशी सोच से प्रभावित ये ऊंचे दाम वाले विशेषज्ञ-परामर्शदाता एवं नीति-निर्माता अपने देश के सामाजिक यथार्थ की चुनौतियों के प्रति सृजनात्मक रुख अपनाने के स्थान पर विद्या के विदेशी केन्द्रों से उधार लिए गए विकास मॉडलों एवं सिद्धान्तों की सहायता से काम करते हैं। इसी में से 'इण्डिया' तो पुष्ट होता है, किन्तु 'भारत' कमजोर होता जाता है। 'इण्डिया' में अनेक करोड़पति एवं खरबपति हैं। इनकी संख्या व सम्पत्ति लगातार बढ़ रही है। 'इण्डिया' से इतर शेष सभी 'भारत' के अन्तर्गत कहे जा सकते हैं। इस 'भारत' में गरीबी-रेखा के नीचे जीवन-यापन करने वाले गरीबी, भुखमरी, बीमारी, बेरोजगारी से त्रस्त लोगों की भरमार है। वस्तुत: यह विभाजन आर्थिक क्षेत्र में दृष्टि, दिशा और दशा के अन्तर को बताने के लिए ही किया गया है। वस्तुत: तो सम्पूर्ण जनसंख्या ही देश का अभिन्न हिस्सा है। वैसे तो किसी भी देश की जनसंख्या का इस प्रकार का विभाजन उचित नहीं कहा जा सकता, किन्तु यहां पर यह विभाजन इसलिए करना पड़ रहा है कि देश की अर्थव्यवस्था में पनप रही दो स्थितियों और इनके बीच पाए जाने वाले अन्तर को दर्शाया जा सके। प्रश्न यह है कि यह अन्तर क्यों पनपा-बढ़ा तथा विकास व अर्थनीति की जो राह हमने पकड़ी क्या वह सही थी? क्या वह 'सर्वसमावेशी' या 'सबका विकास' की राह थी?
इस प्रश्न का उत्तर जानने के लिए हमें पिछले साठ वर्ष की विकास यात्रा एवं अर्थनीति के परिणामों की समीक्षा करना होगा। 1950-51 से प्रारम्भ कर अब तक हमने बारह पंचवर्षीय योजनाएं पूरी कर ली हैं। इस अवधि के दौरान हमने कुछ मात्रा में उपलब्धियां अवश्य हासिल की हैं, किन्तु ज्यादातर तो निराशाजनक चित्र ही दिखाई देता है। 1950-51 की तुलना में 2013-14 में देश की जी़ डी़ पी़ में तो 20 गुना से भी अधिक वृद्धि हुई, किन्तु प्रति व्यक्ति निवल आय में तो 5़ 6 गुना ही वृद्धि हो सकी है। सकल घरेलू पूंजी निर्माण 9़ 3 प्रतिशत से बढ़कर 30़ 4 प्रतिशत और सकल घरेलू बचत 9़ 5 प्रतिशत से बढ़कर 30़ 1 प्रतिशत हो गई। खाद्यान्न का उत्पादन ़50.8 मिलियन टन से बढ़कर 264़ 4 मिलियन टन हो गया। इसके साथ ही कृषि उत्पादन, औद्योगिक उत्पादन, इस्पात, सीमेंट, कोयला, बिजली आदि के उत्पादन में भी अच्छी खासी वृद्धि हुई है। इसके अलावा, शिक्षा व स्वास्थ्य सुविधाओं तथा परिवहन व संचार के माध्यमों में भी वृद्धि दिखाई देती है, किन्तु इन कतिपय उपलब्धियों के बीच देश की वर्तमान अर्थव्यवस्था गहरे व गंभीर संकटों व समस्याओं से ग्रस्त है।
विश्व के अन्य देशों की तुलना में और व्यष्टिगत मापदण्डों (माइक्रो मेसरेज) की दृष्टि से जब हम भारतीय अर्थव्यवस्था की तह और तलहटी में झांककर देखते हैं तो निराशा ही हाथ लगती है, बल्कि कुछ मामलों में तो अत्यंत पीड़ादायक और दारुण दृश्य ही दिखाई देता है। कृषि भारतीय अर्थव्यवस्था का महत्वपूर्ण क्षेत्र है। भारत की कृषि और किसान अनेक समस्याओं से ग्रस्त और त्रस्त है। भारत में खाद्यान्नों की प्रतिदिन प्रतिव्यक्ति उपलब्ध मात्रा 1951 में 395 ग्राम थी, जो बढ़कर 2012 में 511 ग्राम तक ही पहुंच सकी है, इसमें भी दालों की उपलब्ध मात्रा तो 61 ग्राम से घट कर मात्र 42 ग्राम रह गई है। कुछ अन्य आवश्यक वस्तुओं की प्रतिव्यक्ति प्रतिवर्ष उपलब्धता भी काफी कम है। जैसे खाद्य तेल 15.8 किग्रा, वनस्पति 0़.7 किग्रा, चीनी 18़ 7 किग्रा और कपड़ा ़38.5 मीटर। ये सब तो सम्पूर्ण देश का औसत है, इसमें से गरीब के हिस्से में तो बहुत थोड़ा ही आ पाता है।
भारत के योजना आयोग ने जुलाई, 2013 में गरीबी रेखा को पुनर्परिभाषित कर प्रति व्यक्ति उपभोग व्यय शहरी क्षेत्र में 33़ 33 रु. और ग्रामीण क्षेत्र में 27़ 20 रु. को गरीबी-रेखा का आधार बता कर गरीबों के साथ क्रूर मजाक ही किया था। इसके अनुसार भी 2011-12 में 21. 9 प्रतिशत लोग गरीबी-रेखा के नीचे थे। वास्तव में तो भारत में कम से कम 40 से 50 प्रतिशत तक लोग गरीबी रेखा के नीचे जिन्दगी जी रहे हैं। 2010 में दुनिया के निर्धनतम लोगों की 1़ 2 अरब आबादी का 32़ 9 प्रतिशत हिस्सा भारत में था। (आक्सफोर्ड यूनिवर्सिटी के एक अध्ययन के अनुसार) विश्व के अत्यंत निर्धन लोगों में 25 प्रतिशत से अधिक की संख्या भारत के आठ राज्यों में रहती है। बाल मृत्यु दर हमारे यहां सबसे ज्यादा है। इसकी वजह यह है कि हम कुपोषण पर नियंत्रण नहीं कर पा रहे हैं। विश्व के तीन कुपोषित बच्चों में एक भारतीय है। एक लाख प्रसव में मातृ मृत्युदर 178 है। यूनेस्को के अनुसार सरकारी विद्यालयों में बच्चों के सीखने-समझने का स्तर लगातार गिर रहा है। कमजोर वगार्ें के 90 फीसदी बच्चे चार साल की स्कूली पढ़ाई पूरी करने के बावजूद लगभग निरक्षर रहते हैं। 'किसका विकास, किसकी कीमत पर' यह सवाल महत्वपूर्ण बनता जा रहा है।
सामाजिक-आर्थिक जातीय जनगणना (2011) में भारत की गरीबी के बारे में बहुत ही चिंताजनक तथ्यों के बारे में प्रकाश डाला गया है। इसके अनुसार 31़ 2 प्रतिशत ग्रामीण जनसंख्या इतनी गरीब है कि उसके पास अपनी न्यूनतम आवश्यकताओं को पूरा करने लायक भी आय नहीं है। 75 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों की मासिक आय 5000 रुपए से कम है। 51.8 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों में कमाने वालों की आय इतनी कम है कि वे मुश्किल से ही शारीरिक श्रमिक या अस्थायी श्रमिक के रूप में काम करके अपनी रसोई का चूल्हा जला पाते हैं। ग्रामीण जनसंख्या में 38 प्रतिशत भूमिहीन हैं। लगभग 56 प्रतिशत ग्रामीण परिवारों के पास भूमि या अन्य कोई सम्पत्ति नहीं है।
नैशनल सैम्पल सर्वे की ताजा रपट के अनुसार देश में गरीब और अमीर के बीच की खाई तेजी से चौड़ी होती जा रही है। शहरों के सबसे सम्पन्न 10 प्रतिशत लोगों की औसत सम्पत्ति 14़ 6 करोड़ रु़ है, जबकि सबसे गरीब 10 प्रतिशत की महज 291 रु़ है। अर्थात् शहरी अमीरों के पास गरीबों के मुकाबले 5 लाख गुना ज्यादा धन-दौलत है। गांवों में सबसे अमीर 10 प्रतिशत लोगों की औसत सम्पत्ति 5़ 7 करोड़ रु़ है, जबकि सबसे गरीब 10 प्रतिशत की 2507 रु़ है। इस प्रकार यह अनुपात 1 और 23000 का है। गांवों की एक तिहाई और शहरों की एक चौथाई आबादी कर्ज के भारी बोझ तले दबी है। 90 प्रतिशत किसानों के पास 2 हेक्टेयर से कम और एक तिहाई के पास 0.4 हेक्टेयर जमीन है।
640 करोड़ रु़ (यानि 10 करोड़ डॉलर) से ज्यादा वित्तीय सम्पदा वाले लोगों की संख्या देश में 2013 में 284, थी जो बढ़कर 2014 में 928 हो गई। अर्थात् सवा तीन गुना से भी ज्यादा। विश्व में 2013 में सुपर अमीरों की संख्या के मामले में हम 13वें नम्बर पर थे, 2014 में हम चौथे नम्बर पर आ गए। 20 करोड़ लोग ऐसे हैं जिनके पास जायदाद के नाम पर एक भी पैसा नहीं है। इस प्रकार, पिछले वषोंर् के दौरान देश में अरबपतियों की संख्या में अवश्य वृद्धि हुई है, किन्तु इसने आय व धन के केन्द्रीयकरण में वृद्धि की है तथा अमीर एवं गरीब के बीच विषमता की खाई को और अधिक चौड़ा कर दिया है। अनुमान है कि न्यूनतम आय और अधिकतम आय वालों के बीच 90 लाख गुने तक का अन्तर है।
देश की 34 प्रतिशत क्रयशक्ति केवल 10 प्रतिशत लोगों के हाथों में केन्द्रित है। वैश्विक दृष्टि से भी स्थिति चिंताजनक ही है। विश्व में 80 सर्वाधिक अमीर लोगों की सम्पदा 51 प्रतिशत लोगों की सम्पदा के बराबर है और यदि यही प्रवृत्ति बनी रही तो बहुत शीघ्र ही 1 प्रतिशत लोगों की सम्पदा शेष 99 प्रतिशत लोगों की सम्पदा के बराबर होगी।
कापार्ेरेट विकास और आम आदमी के हित के बीच टकराव उभर रहा है। यह भी याद रखना चाहिए कि करोड़ों कुपोषित, अशिक्षित, कमजोर लोगों के साथ भारत विकसित नहीं हो सकता। हम उन्हें पीछे छोड़कर आगे नहीं बढ़ सकते।
बेरोजगारी घटने का नाम नहीं ले रही है। एन.एस.एस.ओ. के 66 वें राउंड के अनुसार 2009-10 में बेरोजगारी दर 6.6 प्रतिशत थी। इसमें पुरुष बेरोजगारी दर 6.1 प्रतिशत और महिला बेरोजगारी दर 8.2 प्रतिशत थी। ग्रामीण क्षेत्र में बेरोजगारी दर (6.8) प्रतिशत और शहरी क्षेत्र (5.8 प्रतिशत) की तुलना में अधिक थी। इस सर्वेक्षण में कुल बेरोजगार लोगों की संख्या 28 मिलियन बताई गई थी। रोजगार कार्यालयों के रजिस्टर में दर्ज नामों के अनुसार 2010 के अंत में 38़ 9 मिलियन लोग बेरोजगार थे। हम यह भी जानते हैं कि सभी बेरोजगार लोग रोजगार कार्यालयों के रजिस्टर में अपना नाम दर्ज नहीं करा पाते हैं। अत: भारत में बेरोजगारी के वास्तविक आंकड़े इन आकड़ों से कहीं ज्यादा हैं। इसके अलावा मौसमी बेरोजगारी, अस्थायी बेरोजगारी, प्रछन्न बेरोजगारी, अल्परोजगार जैसी समस्याएं और अधिक गहराती जा रही है। बेतहाशा बढ़ती महंगाई ने साधारण जनता, विशेषकर गरीब वर्ग के लोगों का दर्द और अधिक बढ़ा दिया है। ऐसा लगता है कि देश में भूख, बीमारी, बेरोजगारी, गरीबी और विषमता का एक दुष्चक्र बन गया है। आज भी देश में 300 मिलियन से अधिक लोग भुखमरी, अशिक्षा और बीमारी से छुटकारा नहीं पा सके हैं। 150 मिलियन लोगों को स्वच्छ पीने का पानी, 250 मिलियन लोगों को चिकित्सा सुविधाएं और 630 मिलियन लोगों को स्वीकार्य सैनिटेशन सुविधाएं उपलब्ध नहीं हैं। मानव विकास सूचकांक की दृष्टि से भी 2011 में भारत का 134 वां स्थान था।
बड़ी मात्रा में पानी, रासायनिक उर्वरकों एवं कीटनाशकों के प्रयोग पर आधारित नई कृषि पद्धतियों ने देश में जल प्लावन एवं क्षार की समस्याएं खड़ी कर दी हंै। भूमि, जल एवं वायु प्रदूषण काफी बढ़ता जा रहा है। इसके अलावा देश में ऊर्जा संकट एवं जल संकट भी दिनोंदिन गहराता जा रहा है। अशिक्षित एवं बीमार लोगों की संख्या भी विश्व में सबसे ज्यादा भारत में ही है। स्वास्थ्य एवं शिक्षा के स्तर एवं सुविधाओं को किसी भी दृष्टि से संतोषजनक नहीं माना जा सकता। देश में विदेशी कम्पनियों एवं विदेशी निवेश का हस्तक्षेप बढ़ता जा रहा है। विदेशी निवेश को आकर्षित करने के प्रयत्न तो करने होते हैं, किन्तु इस संबंध में विदेशी निवेश के अनुपात, शर्तों एवं क्षेत्रों के चुनाव में पर्याप्त सतर्कता बरती जानी चाहिए। विश्व का अनुभव है कि अविवेकपूर्ण विदेशी निवेश बहुधा देश की अर्थव्यवस्था को पंगु बना देता है। साथ ही विदेशी कर्ज का बोझ सह पाना भी कठिन होता जा रहा है। वैश्वीकरण के नाम पर भारतीय अर्थव्यवस्था को विदेशी कम्पनियों, विदेशी निवेश और विदेशी ऋण के माध्यम से पराश्रित बना देने की नीति अन्ततोगत्वा आत्मघाती ही साबित होगी। इन सबके ऊपर पर्यावरण एवं प्रदूषण का संकट भी गहराता जा रहा है।
इन समस्याओं का मुख्य कारण वर्तमान अर्थचिंतन एवं दोषपूर्ण विकास मॉडल है। विकास की वर्तमान परिभाषा एवं माप दोनों ही गलत एवं भ्रमपूर्ण हैं। यह विकास मॉडल कार्टेजियन-न्यूटोनियन दर्शन पर आधारित खण्डित यांत्रिक विश्व दृष्टि में से उपजा है जो संचय, साम्राज्यवाद और शोषण की अंधी दौड़ का मुख्य कारण है। इसके अलावा यह प्रतियोगिता और संघर्ष को संतुलन और प्रगति का आधार मानता है और प्रकृति को मनुष्य की दासी के रूप में स्वीकार करता है। इसमें वस्तुओं एवं सेवाओं का ज्यादा से ज्यादा उपभोग कर अपने रहन-सहन स्तर में वृद्धि को ही जीवन का लक्ष्य माना गया है। यह अर्थ-काम केन्द्रित चिंतन है और इस भोगवादी जीवनशैली के कारण ही अमरीका से प्रारंभ वित्तीय संकट ने समूची दुनिया को ग्रस्त कर लिया है। इसके अलावा, यह उपभोग की सतत वर्धमान आकांक्षा व लालसा को पूरा करने के लिए उत्पादन वृद्धि पर जोर देता है। उत्पादन वृद्धि के लिए दो प्रकार के काम किए जाते हैं- (क) प्राकृतिक साधनों का भरपूर शोषण, और (ख) मशीन चालित उर्जा भक्षी टेक्नोलाजी पर आधारित बड़े-बड़े उद्योगों वाले उत्पादन तंत्र का निर्माण। इसके परिणामस्वरूप पर्यावरण हृास, गरीबी, असमानता, बेरोजगारी और ऊर्जा संकट जैसी समस्याएं उत्पन्न हो गई हैं। इस मॉडल में पूंजी-निवेश को विकास का प्रधान प्रेरक कारक माना गया है और सामाजिक, सांस्कृतिक, मानवीय कारकों को स्थिर माना गया है। इससे कई देश विकास के चक्कर में कर्र्ज-जाल में फंस गए हैं। इस तकनीकी-आर्थिक चिंतन की सबसे बड़ी कमजोरी यह है कि यह सीमित साधनों से असीमित प्रगति कर लेना चाहता है। वर्तमान विकास मॉडल शोषणकारी है। इसने हर स्तर पर एक इकाई द्वारा दूसरी इकाई के शोषण की प्रक्रिया को जन्म दिया है। यह किसी दूसरे की असहायता व कमजोरी का फायदा उठाकर अपनी प्रगति कर लेने के दृष्टिकोण पर आधारित है।
वैश्विक धरातल पर भी विकास के साम्यवादी एवं पूंजीवादी दोनों मॉडल असफल हो गए हैं। विश्व में औद्योगिक क्रांति का प्रारंभ पूंजीवादी प्रणाली के साथ हुआ, किंतु कालान्तर में यह शोषण का दर्शन बनकर रह गई और 1929-32 की महामंदी ने तो इसे नाकारा ही साबित कर दिया। इसके विपरीत मार्क्स के दर्शन पर आधारित साम्यवादी प्रणाली ने प्रेरणा और पहल की समस्याएं उत्पन्न कर दीं। यह प्रणाली भी सोवियत यूनियन और उसके सहयोगी राज्यों के पतन के साथ शीघ्र ही समाप्त प्राय: हो गई। आज चीन साम्यवाद की बजाय बाजार अर्थव्यवस्था के काफी कुछ निकट आ गया है। अत: आज तो विभिन्न रूपों एवं प्रकारों से विश्व में बाजारवाद ही चल रहा है, किंतु हर क्षण वह अनेक कठिनाइयों व समस्याओं से ग्रस्त भी होता जा रहा है। 2008 में अमरीका से प्रारंभ हुई वैश्विक मंदी और वैश्विक वित्तीय संकट अब समूचे विश्व में फैल गया है। अमरीका और यूरोप के अधिकांश देश कर्ज में डूबे हैं, बैंक दिवालिया हो गए हैं, बेरोजगारी बढ़ती जा रही है। स्पेन, पुर्तगाल, इटली और ग्रीस जैसे देशों ने तो समूची यूरोपीय अर्थव्यवस्था की स्थिरता के लिए ही संकट पैदा कर दिया है। इस प्रकार इस वैश्विक आर्थिक संकट ने स्वतंत्र एवं अनियंत्रित बाजारों वाले उन्मुक्त पूंजीवादी दर्शन के खोखलेपन को जग जाहिर कर दिया है।
प्रसिद्ध अर्थशास्त्री कौशिक बसु के अनुसार जिस प्रकार पूर्ण सरकारी नियंत्रण वाला साम्यवादी मॉडल फेल हो गया है, उसी प्रकार अब बाजार आधारित खुली अर्थव्यवस्था का मॉडल भी फेल हो गया है। अमरीका और पश्चिमी यूरोपीय देशों में लागू इस मॉडल से गरीबों और अमीरों के बीच की खाई और चौड़ी हुई है। बसु के अनुसार भविष्य में विश्व बैंक 'ईज ऑफ डूइंग बिजनेस' (व्यवसाय के अनुकूल माहौल) के बजाय 'ईज ऑफ लिविंग लाइफ' (जीवन के अनुकूल माहौल) सूचकांक बनाएगा और इसके आधार पर दुनियाभर के देशों की वरीयता सूची तैयार की जाएगी। सूची से तय होगा कि आम आदमी के जीवन-यापन की बेहतर सुविधाएं किस देश में हैं। वैश्वीकरण की आंधी और बाजार के मोह में जकड़ी दुनिया के अधिकांश देशों के करोड़ों कंगाल लोग पीढ़ी दर पीढ़ी गरीबी का दंश झेल रहे हैं। पैसे के बल पर मुट्ठी भर लोगों ने भोजन, शिक्षा और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं पर कब्जा कर लिया है। हवा और पानी तक की तिजारत हो रही है।
विकास की ललक में इस विकास मॉडल पर चलने वाले देशों ने न केवल अपने लिए , बल्कि समूचे प्राणिमात्र के लिए ही अस्तित्व का संकट खड़ा कर दिया है। जल प्रदूषण, वायु प्रदूषण एवं मृदा प्रदूषण के कारण हमारे चारों ओर प्रदूषित वातावरण का घेरा गहरा होता जा रहा है। वैश्विक तपन व जलवायु परिवर्तन जैसी घटनाओं के कारण समूची पृथ्वी का अस्तित्व ही संकट में पड़ता जा रहा है। वास्तव में तो वर्तमान विकास मॉडल न व्यवहारक्षम है और न ही धारणक्षम (टिकाऊ) है। मानव विकास रपट, 1996 ने इसे रोजगार विहीन विकास, निष्ठुर विकास, मूक विकास, जड़हीन विकास और भविष्यहीन विकास कहा है। इसके अलावा, मनुष्य के नैतिक एवं मानवीय मूल्यों में हो रही सतत गिरावट, पारिवारिक व सामाजिक विघटन के कारण हम इस विकास को संस्कारहीन विकास भी कह सकते हैं।
इस प्रकार वर्तमान अर्थचिंतन एवं अर्थतंत्र निरपेक्ष, निष्ठुर, निरंकुश एवं नकारात्मक हैं। वर्तमान व्यवस्था भेदकारी, भौतिकतावादी, जड़वादी एवं भोगवादी जीवनशैली को बढ़ावा देने वाली है। परिणामस्वरूप समस्याएं सुलझने की बजाय और अधिक उलझती ही जा रही हैं। ऐसी स्थिति में हमें एक नए विकास-पथ को तलाशना और अपनाना होगा। खण्डित यांत्रिक विश्व दृष्टि के स्थान पर हमें सर्वकश एकात्म विश्व दृष्टि को स्वीकारना होगा। इस दृष्टिकोण के अनुसार मनुष्य की आर्थिक व अन्य समस्याएं एक-दूसरे से पूर्णतया अलग-थलग नहीं होतीं, वरन् वे परस्पर जुड़ी-गुंथी हुईं, परस्पर निर्भर एवं परस्पराश्रित होती हैं। अत: इनका समाधान भी समग्रता में से ही प्राप्त करना होगा। इस एकात्म विश्व दृष्टि के प्रकाश में हमें भारतीय अर्थव्यवस्था की प्रकृति, प्रवृति, संस्कृति, परिस्थिति, परिवेश, सवालों, समस्याओं व संसाधनों के अनुरूप विकास की समग्र, सार्थक एवं व्यावहारिक संरचना बनाने का प्रयास करना चाहिए। धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष की पुरुषार्थ चतुष्ट्य के आधार पर हमें धर्म (अर्थात् नैतिकता ) आधारित अर्थ और काम (अर्थात् अर्थार्जन और उपभोग के क्रियाकलाप) की रचना को विकसित करना होगा। इस रचना के माध्यम से 'सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय, सर्वभूतहितेरत:' तथा समग्र सामाजिक सुख के उद्देश्य को प्राप्त करने के लिए सबको रोजगार, सबकी मूलभूत आवश्यकताओं की पूर्ति, सबको स्वास्थ्य, सबको समाजोपयोगी संस्कारक्षम शिक्षा के समान अवसर और सामाजिक न्याय के साथ सतत प्रगति के अवसर एवं स्थिति निर्माण का काम करना होगा। दीनदयाल जी के अनुसार हमें हर पेट को रोटी, हर हाथ को काम और हर खेत को पानी प्रदान कर सकने वाली योजना, व्यवस्था, अर्थरचना व अर्थनीति बनानी चाहिए।
ग्राम संकुल (10-15 गांवों का समूह) और परिवार व्यवस्था को आधार बनाकर स्वदेशी व सहभागिता पर आधारित स्वावलंबी विक्रेन्द्रित अर्थतंत्र निर्माण करने की दिशा में प्रयास हो। इस दृष्टि से जल संग्रह व प्रबंधन, भूमि संरक्षण, वन प्रबंधन व संवर्धन, जैविक खेती, गो संरक्षण व संवर्धन, पंचगव्य के उपयोग, वैकल्पिक ऊर्जा, भारत की स्वास्थ्य परंपरा व चिकित्सा पद्धति, आयुर्वेद, योग, जैवविविधता, हर्बल सम्पदा आदि के समुचित उपयोग की योजना बने। विशेषकर भारत में जमीन, जल, जंगल, जानवर और जैवविविधता पर ध्यान दे सकने वाली व्यवस्था, रचना एवं नीति बने। साथ ही, भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं, सामुदायिक भावना, साझेदारी व भागीदारी से काम करने की वृत्ति, मितव्ययी प्रवृत्ति, इच्छा परिमाण पर आधारित सीमित- संयमित, सदाचारी उपभोगशैली व जीवनशैली तथा समता-समरसता को बल प्रदान कर सकने वाली संस्थाओं व परम्पराओं का देश के विकास में योगदान प्राप्त कर सकने वाली रचना बनाने की आवश्यकता है। इसमें सहायक हो सकने वाले सामाजिक आचरण के मानदंडो, जीवनमूल्यों, अर्थतंत्र, अर्थव्यवहार एवं आर्थिक नीतियों का निर्माण करना होगा।
श्यामाचरण दूबे ने 'विकास का समाजशास्त्र' में कहा था, 'सफलता का पैमाना, व्यक्ति अपने लिए या अपने परिवार के लिए क्या कर सका है, के बदले वह समाज के लिए क्या कर सका है, यह होना चाहिए।'
धारणक्षम विकास का एक पहलू यह भी होना चाहिए कि धारणक्षम उपभोग, उत्पादन और आर्थिक प्रणाली भी हो- हमें अपने तंत्र को चलाने के लिए दूसरों का शोषण न करना पड़े और दूसरों पर लाचारगी जैसी निर्भरता भी न हो। हमें भूख, भय, भ्रष्टाचार, प्रदूषण और प्रदर्शन से मुक्त समाज व्यवस्था बनानी है। स्वदेशी, स्वावलम्बन एवं स्वतंत्रता के आधार पर एक समृद्ध, समर्थ, स्वाभिमानी एवं संस्कारक्षम सामाजिक-आर्थिक- राजनीतिक रचना करनी होगी।
भारत की जलवायु, मिट्टी, कृषि जोत का आकार, उपलब्ध पशुधन, स्थानीय संसाधनों, कौशल व आवश्यकताओं को ध्यान में रख कर बीज, खाद, कृषि-उपकरण, सिंचाई के साधन, विपणन, वित्तीय एवं शोध संस्थानों के तंत्र का निर्माण करना होगा। इस दृष्टि से दीनदयाल जी की परिकल्पना की अदेवमात्रिका कृषि (अर्थात् लघु एवं समुचित सिंचाई व्यवस्था वाली कृषि) व्यवस्था के बारे में गंभीर व सार्थक प्रयास
करने होंगे।
लघु उद्यमियों, शिल्पकारों, ग्राहक संस्थाओं के बीच नेटवकिंर्ग के नए प्रकारों व व्यवस्थाओं को विकसित करना होगा ताकि उत्पादन व वितरण की फिजूलखर्ची एवं केन्द्रीकरण व विषमता की प्रवृत्ति को रोका जा सकें और सबके लिए सस्ती व अच्छी वस्तुएं प्रदान की जा सकें। इसके साथ समुदाय-आधारित उत्पादन व बिक्री तंत्र के निर्माण को भी प्रोत्साहित करना होगा। भारी व बड़े उद्योगों के स्थान पर लघु, कुटीर, कृषि-आधारित ग्रामोद्योग को प्राथमिकता दी जाए और इनके निवेश, ऋण, संरचनात्मक सुविधाओं, तकनोलजी, प्रशिक्षण, विपणन एवं वित्तीय व्यवस्थाओं का उपयुक्त तंत्र बने और तद्नुरूप नीति निर्धारण हो। दीनदयाल जी की 'अपरमात्रिक उद्योग नीति' की संकल्पना को स्वीकार कर देश की उद्योग नीति बने। यह स्वावलंबन से कुछ अधिक उत्पादन वाली नीति होगी। यह सबको काम, विकेन्द्रीकरण, पारंपरिक कारीगरों व शिल्पकारों की पोषक, कृषि व ग्राम व्यवस्था की पूरक, गांवों से प्रतिभा पलायन रोकने वाली, मानवमूल्यों के अनुरूप, यंत्र-प्रधान न होकर श्रम-प्रधान वाली उद्योग नीति होगी।
आज के विकास एवं व्यवस्था के संकट के मूल में भ्रष्ट, भोगवादी एवं दोषपूर्ण जीवनशैली ही है। अत: हमें सामाजिक आचरण के मानदण्डों एवं जीवनमूल्यों में सम्यक् परिवर्तन कर सीमित, संयमित, सदाचारी जीवनशैली एवं उपभोग शैली को विकसित करने की ओर ध्यान देना होगा। अब यह बात लगभग सब स्वीकार करने लगे हैं कि धारणक्षम उपभोग-शैली के बिना धारणक्षम विकास के उद्देश्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता है। भारत के सन्दर्भ में इस बात का भी ध्यान रखना है कि हमें अपने उपभोग में वृद्धि तो अवश्य करनी है, किन्तु विश्व के अमीर देशों के लोगों की उपभोग शैली की नकल करने की कतई आवश्यकता नहीं है। इस उपभोग शैली में इस बात की चिंता अवश्य की जानी चाहिए कि देश के सभी लोगों को भोजन, कपड़ा, मकान, शिक्षा और स्वास्थ्य से सम्बंधित आधारभूत् ा आवश्यकताओं को पूरा करने के लिए वस्तुएं व सेवाएं उपलब्ध हो सकें। भारत की सामाजिक-सांस्कृतिक संस्थाओं, सामुदायिक भावना, साझेदारी व भागीदारी से काम करने की वृत्ति, मितव्ययी प्रवृत्ति तथा समता-समरसता को बल प्रदान करने वाली संस्थाओं व परम्पराओं का देश के सर्वतोमुखी विकास में योग्य योगदान हो सके। इस दृष्टि से अधिक प्रभावी रचना बनाने की आवश्यकता है। इसमें सहायक हो सकने वाले सामाजिक आचरण के मानदण्डों जीवनमूल्यों, अर्थतंत्र, अर्थव्यवहार एवं आर्थिक नीतियों का निर्माण करना होगा। व्यक्तिगत, पारिवारिक एवं सामुदायिक एवं सभी स्तरों पर अर्थायाम को व्यावहारिक रूप देने की दृष्टि से रचना, परम्परा एवं नीतिगत परिवर्तन करने होंगे।
घुमावदार अपव्ययी उत्पादन प्रक्रिया के स्थान पर विकेन्द्रित मितव्ययी उत्पादन प्रक्रिया की दिशा में सक्रिय पहल की जानी चाहिए। विकास-केन्द्रित रोजगार के स्थान पर रोजगार-केन्द्रित विकास की रणनीति बनानी होगी। इसके आधार पर ही हम अपनी समस्त उत्पादन व निवेश की योजनाएं व कार्यक्रम बनाएं। आर्थिक नीतियों के मूल्यांकन एवं संसाधनों के आबंटन की दृष्टि से प्राथमिकता के महत्वपूर्ण क्षेत्र हैं- कृषि (विशेषकर सीमांत व छोटे किसान), लघु उद्यम (विशेषकर अति लघु एवं ग्रामोद्योग), स्वनियोजित असंगठित क्षेत्र, खुदरा व्यापार व व्यापारी, मजदूर, हस्तशिल्प व शिल्पकार आम ग्राहक आदि।
प्रकृति के प्रति मातृत्व एवं देवभावयुक्त दृष्टि रखकर मानव हितैषी, पर्यावरण पोषक, भारतीय परिस्थितियों के लिए उपयुक्त टेक्नोलाजी बनानी व अपनानी होगी। यह एक ऐसी टेक्नोलाजी हो जो पूंजी के प्रयोग, उत्पादन लागत और ऊर्जा के 'इन्पुट' को न्यूनतम कर सके, आयातों पर बहुत आधिक निर्भर न हो, निर्यात क्षमता को बढ़ा सके, पर्यावरण को शुद्ध बनाये रख सके, स्थानीय साधनों, कौशल का कुशलतम प्रयोग कर सके, और आम जनता की आम वस्तुओं का उत्पादन कर सके। इस दृष्टि से दोनों दिशाओं में एक साथ प्रयास करने होंगे- (अ) देश में पहले से उपलब्ध परम्परागत टेक्नोलाजी में सुधार कर उसे युगानुकूल बनाना और (आ) आधुनिक टेक्नोलाजी को देशानुकूल बनाना।
भारतीय अर्थव्यवस्था के संदर्भ में विभिन्न नीतियों के निर्माण एवं क्रियान्वयन की मुख्य कसौटियां हैं गरीबी, विषमता एवं बेरोजगारी को कम करना, कम ऊर्जा एवं कम पूंजी पर आधारित उत्पादन- तंत्र का निर्माण करना, तथा खाद्य सुरक्षा, स्वदेशी, विकेंद्रीकरण एवं पर्यावरण संतुलन को सुनिश्चित करना। देश की समस्त आर्थिक नीतियों व योजनाओं की दृष्टि व दिशा गरीब-हितचिन्तक, गरीबोन्मुखी अन्त्योदय आधारित बनी रहे। वे अमीर-नियंत्रित अमीर-केन्द्रित व अमीर हितपोषक की दिशा में न भटकने पाए। इस दृष्टि से पर्याप्त सतर्कता बरतना आवश्यक है। इन सब बातों को ध्यान में रखकर वर्तमान में प्रचलित अनर्थकारी आर्थिक नीतियों को बदलकर भारत की प्रकृति और संस्कृति के अनुरूप विकास के नए मॉडल लागू करके ही हम भारत का सर्वतोमुखी कल्याण कर सकते हैं। यह समय की चुनौती भी है और आह्वान भी।











