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में नैतिक मूल्यों का समावेश जरूरी

Written byArchiveArchive
May 30, 2015, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 30 May 2015 13:17:59

लोकेन्द्र सिंह
शिक्षा के अभाव से कितनी समस्याएं और विसंगतियां उत्पन्न होती हैं, यह किसी से छिपा नहीं है। विशेषकर मूल्यहीन शिक्षा व्यवस्था के कारण तो कई प्रकार की नई समस्याएं जन्म ले लेती हैं। अपनी बौद्घिक और तर्कक्षमता से दुनिया पर विजय प्राप्त करने वाले युवा संन्यासी स्वामी विवेकानन्द तो यहां तक कहते हैं- 'यदि शिक्षा से सम्पन्न राष्ट्र होता तो आज हम पराभूत मन:स्थिति में न आए होते।' इस देश का सबसे अधिक नुकसान शिक्षा के अभाव के कारण ही हुआ है। भारत के संदर्भ में शिक्षा का अभाव ही एकमात्र चुनौती नहीं है बल्कि उचित शिक्षा का अभाव ज्यादा गंभीर मसला है। इस बात से किसी को इनकार नहीं है कि एक समर्थ राष्ट्र के निर्माण में शिक्षा व्यवस्था की सबसे महत्वपूर्ण भूमिका होती है। यह कहना ज्यादा उचित होगा कि राष्ट्र निर्माण में शिक्षा पहली और अनिवार्य आवश्यकता है। लेकिन, यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि भारत को कैसी शिक्षा की आवश्यकता है? सब लोग पढ़ना-लिखना सीख लें, अंगूठे की जगह हस्ताक्षर करना सीख लें, केवल इतना भर शिक्षा का उद्देश्य होना चाहिए क्या? मनुष्य अपने हित-अहित के संबंध में जागरूक हो जाए, उसे इतना शिक्षित करने मात्र से काम चलेगा क्या? अच्छे-भले मनुष्य को पैसा कमाने की मशीन बना देना, शिक्षा है क्या? अच्छी नौकरी पाने के योग्य हो जाना, अपने अधिकारों के प्रति जागरूक हो जाना, किताबें पढ़ना-लिखना सीख लेना ही शिक्षा और शिक्षा का उद्देश्य नहीं है, तो भला क्या है?
आखिर शिक्षा क्या है और उसका उद्देश्य क्या होना चाहिए? हमें इस प्रश्न का उत्तर युवा हृदय सम्राट स्वामी विवेकानन्द के चिन्तन में खोजना चाहिए। स्वामीजी बार-बार कहते थे- 'अपनी अंतरात्मा को प्रकट करने के लिए तैयार करना ही शिक्षा है।' अंतरात्मा के प्रति समर्पण से ही विश्व बंधुत्व का भाव जागृत होता है। इससे अपनी माटी के प्रति, समाज के प्रति और परिवेश के प्रति समर्पण का भाव भी जागृत होता है। यदि आज का विद्यार्थी यह सब सीख गया तो बाकी सब तो सीख ही जाएगा। शिक्षा के क्या उद्देश्य होने चाहिएं, इस संबंध में स्वामीजी कहते हैं कि हमारे राष्ट्र का जो उद्देश्य हो वही हमारी शिक्षा का भी उद्देश्य होना चाहिए। हमारी शिक्षा व्यवस्था ऐसी हो जो प्रत्येक विद्यार्थी को राष्ट्रीय दायित्व का बोध कराए। महज रुपये कमाने की कला नहीं बल्कि जीवन जीने की कला सिखाए। विद्यार्थी स्कूल-कॉलेज में जीवन मूल्य भी सीखे। सही मायने में तभी वह शिक्षित होगा। लेकिन, बड़ी विद्रूप स्थिति है कि वर्तमान भारतीय शिक्षा व्यवस्था में 'भारतीयता' की झलक कहीं भी देखने को नहीं मिलती है। विद्यार्थियों को न भारतीय इतिहास से अवगत कराया जा रहा है, न परंपराओं से और न ही उसे राष्ट्रीय दायित्व के बोध से अवगत कराया जा रहा है। आज का विद्यार्थी विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में शिक्षा प्राप्त कर डॉक्टर, इंजीनियर, नौकरशाह और शिक्षक तो बन रहा है लेकिन जिम्मेदार नागरिक नहीं बन पा रहा है। उसकी सोच में भारतीयता कहीं नहीं झलकती है। राष्ट्र की सेवा का चिंतन भी नहीं है। शिक्षित होकर वह समाज में अपनी भूमिका भी नहीं पहचान पा रहा है। उसका शिक्षित होना सिर्फ उसके व्यक्तिगत लाभ तक ही सीमित रह गया है। समाज को आगे बढ़ाने में उसकी शिक्षा का कोई योगदान नजर आता नहीं। क्योंकि, जो शिक्षा उसने प्राप्त की है, उससे वह न तो समाज के प्रति अपनी जिम्मेदारियां सीखा है और न ही उसे राष्ट्रीय दायित्व का बोध हुआ है। सही मायने में तो उसे शिक्षा का अर्थ भी ठीक प्रकार से स्पष्ट नहीं हो सका है। विद्यालय, महाविद्यालय और विश्वविद्यालय में विद्यार्थी को सिखाया ही नहीं जा रहा है कि मनुष्य के जीवनमूल्य क्या हैं? राष्ट्र के प्रति उसकी क्या जिम्मेदारियां हैं? शिक्षा प्राप्त कर वह कुछ बने जरूर लेकिन उस भूमिका में रहते हुए देश के प्रति, समाज के प्रति और अपने परिवेश के प्रति अपनी जिम्मेदारियों को             कैसे निभाए?
वर्तमान परिदृश्य को देखकर आज सभी माता-पिता, शिक्षक, समाजसेवी, राष्ट्रसेवी और विद्यार्थी भी शिक्षा व्यवस्था में मौलिक परिवर्तन की बात कर रहे हैं। सब मूल्यपरक शिक्षा की आवश्यकता महसूस कर रहे हैं। यह बात और अधिक गंभीर हो जाती है, जब शिक्षा मंत्रालय नई शिक्षा नीति तैयार करने की दिशा में आगे बढ़ रहा है। नैतिक शिक्षा के समावेश की बात जोर-शोर से उठाई जा रही है। खासकर उसे विद्यालयीन स्तर पर अनिवार्य करने की मांग उठाई जा रही है। देश के कई शिक्षाविद् पाठ्यक्रम में नैतिक शिक्षा को शामिल करने की दिशा में मंथन कर रहे हैं। केन्द्र में ऐसे राजनीतिक दल की सशक्त सरकार है, जिसे सांस्कृतिक मूल्यों का हामी माना जाता है। इसलिए उम्मीद की जा रही है कि शिक्षा नीति में आमूलचूल परिवर्तन होगा। हालांकि, सरकार के इस कदम के विरोध में कुछ सुगबुगाहट शुरू हो गई है। देश में ऐसे भी कुछ दल, संगठन और संस्थाएं हैं, जिनकी आस्था नैतिक मूल्यों में नहीं हैं। वे नहीं चाहते कि हमारी शिक्षा नीति भारतीय संस्कृति के अनुरूप बने। विद्यार्थी संस्कारित हों, इस बात की भी चिंता उन्हें नहीं हैं। जैसे ही सरकार इस दिशा में कुछ ठोस प्रयास करेगी तो ये दल, संगठन और संस्थाएं झंडा उठाकर खड़े हो जाएंगे और जोर-जोर से चिल्लाएंगे कि शिक्षा का भगवाकरण किया जा रहा है। शिक्षा का 'कचराकरण' किया जा रहा था, तब ये संभवत: आनंदित हो रहे थे। कुछ तो सुनियोजित ढंग से शिक्षा के वामपंथीकरण में लगे भी रहे हैं, इसके पर्याप्त प्रमाण उपलब्ध हैं। अब शिक्षा में भारतीय विचारों का समावेश किया जाना है तो उन्हें कष्ट होना स्वाभाविक है। लेकिन, भारत के बेहतर भविष्य के लिए यह जरूरी है कि शिक्षा संस्थानों से अपनी पढ़ाई पूरी कर निकलने वाला विद्यार्थी अपने राष्ट्र से परिचित हो, अपनी परंपराओं से परिचित हो, सामाजिक संस्कारों का बोध उसे हो। समाज में दिख रहीं तमाम तरह की समस्याओं का बहुत बड़ा कारण कहीं न कहीं नैतिक मूल्यों की गिरावट है। नैतिक मूल्यों की गिरावट का सबसे बड़ा कारण मूल्य आधारित शिक्षा का अभाव है। समाज के पतन को रोकने के लिए मूल्यपरक शिक्षा की आवश्यकता है। ऐसे में 'शिक्षा का भगवाकरण' का जुमला उछालने वालों की बेतुकी बातों पर कान न धरते हुए सरकार को अपना काम राष्ट्र के उद्देश्य को ध्यान में रखते हुए करना चाहिए। बौद्घिक जगत, मीडियाकर्मियों, शिक्षाविदों को नई शिक्षा नीति का समर्थन करना चाहिए। अखबारों-पत्रिकाओं में आलेख लिखकर, सेमिनार आयोजित कर, संविमर्श के माध्यम से मूल्यपरक शिक्षा के समर्थन में सकारात्मक वातावरण तैयार करना चाहिए। यदि सरकार नैतिक मूल्यों के समावेश से बचती है तो बौद्घिक नेतृत्व को सरकार पर दबाव बनाना चाहिए कि अब मूल्यहीन और दिग्भ्रमित शिक्षा नीति  नहीं चाहिए।
शिक्षा में नैतिक मूल्यों के समावेश की इच्छा मात्र राष्ट्रवादी विचारधारा का प्रतिनिधित्व करने वाली नई सरकार की नहीं है बल्कि शिक्षा के संबंध में स्वामी विवेकानन्द के विचार हों, महात्मा गांधी की दृष्टि हो या फिर कोठारी और राधाकृष्णन आयोग की रपट में दिए गए दिशा-निर्देश, सबका यही मत है कि शिक्षा में नैतिक मूल्यों की गिरावट ठीक नहीं, शिक्षा में नैतिक मूल्यों का समावेश जरूरी है। मूल्य आधारित शिक्षा व्यवस्था प्रत्येक राष्ट्र के लिए आवश्यक है। सभी प्रकार की शिक्षा का मूलभूत उद्देश्य यही होना चाहिए कि अच्छे व्यक्ति का निर्माण हो, जो समाज-राष्ट्र के प्रति सम्मान रखकर पूरा जीवन व्यतीत करे। राष्ट्रहित को ध्यान में रखकर अपनी भूमिका का निर्वहन करने वाला व्यक्ति हो। लेकिन, इसे विडंबना ही कहेंगे कि सांस्कृतिक राष्ट्र की शिक्षा व्यवस्था से ही नैतिक मूल्य बाहर हो गए हैं। भारत को विश्व का नेतृत्व करना है तो मूल्यपरक शिक्षा उसके लिए अनिवार्य है। बिना मूल्य के शिक्षा, शिक्षा नहीं बल्कि महज सूचनाओं और जानकारियों का पुलिंदा है।
लेखक- माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय, भोपाल में पदस्थ हैं।

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