| दिंनाक: 30 May 2015 13:13:14 |
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डा़ भरत झुनझुनवाला
श्रम तथा रोजगार मंत्रालय द्वारा प्रकाशित वार्षिक रोजगार एवं बेरोजगारी रपट के अनुसार देश मे 4़9 प्रतिशत यानी लगभग 6 करोड़ लोग बेरोजगार थे। यहां बेरोजगारी का आशय उस व्यक्ति की ओर है जो रोजगार ढूंढ़ते चक्कर काटता है और हाथ पर हाथ धरे घर बैठा रहता है। यदि हाई स्कूल पास युवक को रोजगार न मिले और वह साप्ताहिक हाट में सब्जी बेचे अथवा शहर मे रिक्शा चलाए अथवा किसी घर में बर्तन मांजे तो उसे रोजगार युक्त माना जाएगा यद्यपि वास्तव मे वह बेरोजगार है। दूसरे अनुमानों के अनुसार 10 प्रतिशत लोग बेरोजगार हैं। बेरोजगारी की परिभाषा के इस विवाद को छोड़ दें तो भी यह मानना ही पड़ेगा कि समस्या गम्भीर है। लगभग 70 करोड़ श्रमिकों में से मात्र तीन करोड़ को संगठित क्षेत्र में रोजगार उपलब्ध हैं जहां उन्हें साप्ताहिक अवकाश तथा 'प्राविडेन्ट फन्ड' जैसी सुविधाएं उपलब्ध है। इस विकराल समस्या के सामने रोजगार सृजन कछुए की चाल से रंेग रहा है। वित्त मंत्रालय द्वारा प्रकाशित इकोनॉमिक सर्वे के अनुसार वर्ष 2009 से 2012 में प्रतिवर्ष संगठित क्षेत्र में मात्र 5 लाख रोजगार का सृजन हुआ है। हमारे श्रम बाजार में प्रतिवर्ष एक करोड़ युवा प्रवेश कर रहे हैं पुराना बैकलॉग कम से कम 6 करोड़ का है। हम सृजन कर रहे हैं मात्र 5 लाख रोजगार प्रतिवर्ष। शेष रिक्शा चलाकर या ऐसे ही किसी अन्य छिटपुट जरिए से जीवन यापन कर रहे हैं।
पिछले चार वषार्ें मंे हमारी औसत विकास दर 7़7 प्रतिशत पर सम्मानजनक रही है। फिर क्या कारण है कि हम केवल 5 लाख रोजगार प्रतिवर्ष सृजित कर रहे हैं? कारण है कि कंपनियों द्वारा अधिकाधिक मशीनों का उपयोग किया जा रहा है। विकास की प्रक्रिया में ऐसा होता ही है। विकास का अर्थ होता है समृद्घि यानी पूंजी की प्रचुर उपलब्धता। पूंजी अधिक उपलब्ध होने से ब्याज दर कम हो जाती है और कम्पनियों के लिए महंगी ऑटोमैटिक मशीमों में निवेश करना लाभप्रद हो जाता है। दूसरी तरफ विकास की प्रक्रिया में लोगों का जीवन स्तर ऊंचा होता है और वेतन बढ़ते हैं। इससे कंपनियों के लिए श्रमिक को रोेजगार देना घाटे का सौदा होने लगता है। विकास का तार्किक परिणाम बेरोजगारी है।
इस समस्या का समाधान मनरेगा जैसी योजनाओं से नहीं निकल सकता है। कारण कि मनरेगा के लिए राजस्व जुटाने के लिए बड़ी कंपनियों से टैक्स अधिक मात्रा में वसूल करना होगा। ऐसा तब ही संभव है जब ये कंपनियां अधिक उत्पादन करें। इनके द्वारा अधिक उत्पादन ऑटोमैटिक मशीनों से किया जाएगा। ऑटोमैटिक मशीनो के उपयोग से रोजगार का हनन होगा। जितना रोजगार हम मनरेगा से बनाएंगे उससे ज्यादा बेरोजगारी ऑटोमैटिक मशीनों से बढ़ेगी। यही कारण है कि मनरेगा को लागू हुए लगभग 8 वर्ष होने को हैं परन्तु बेरोजगारी पूर्ववत् विद्यमान है। वर्तमान नीतियों के अंतर्गत हम ऊंची विकास दर हासिल कर भी लें तो भी बेरोजगारी की समस्या का समाधान नहीं होगा।
हमें अर्थव्यवस्था को दो क्षेत्रों में विभाजित कर देना चाहिए। एक 'विकास क्षेत्र' तथा दूसरा 'रोजगार क्षेत्र'। विकास क्षेत्र में पेट्रोलियम, स्टील, रेल जैसे पूंजी सघन उद्योगों को रखना चाहिए। इन क्षेत्रों में रोजगार सृजन की संभावनाएं कम होती हैं। रिफाइनरी में बाल्टियों से पेट्रोल को शोधित नहीं किया जा सकता है। इस क्षेत्र मे पूंजी के प्रचुर उपयोग की छूट देनी चाहिए। यहां लक्ष्य अधिकाधिक मात्रा में सस्ता उत्पादन होना चाहिए जिससे हम विश्व बाजार में अपना रुतबा स्थापित कर सकें। 'रोजगार क्षे़त्र' में बिलकुल अलग नीति लागू करने की जरूरत है। जैसे बुनाई को लें। पावरलूम पर भारी मात्रा में टैक्स लगा दिया जाए तो मशीन से बना कपड़ा महंगा हो जाएगा। फलस्वरूप हैन्डलूम सहज ही सस्ता पड़ने लगेगा। करोड़ों लोगों को हैन्डलूम से कपड़ा बुनने मे रोजगार मिल जाएगा। मनरेगा की जरूरत ही नहीं रह जाएगी। अथवा किसानों पर टैक्स लगा दंे तो कटाई में करोड़ांे रोजगार उत्पन्न हो जाएंगे। लेकिन ट्यूबवेल पर टैक्स लगाना उचित नहीं होगा चूंकि 500 फीट की गहराई से रहट से पानी निकालना संभव ही नहीं है। सरकार को चाहिए कि नीति आयोग को कहे कि देश में उपलब्ध तमाम तकनीकों का रोजगार ऑडिट करंे। देखें कि किन तकनीको पर न्यून टैक्स लगाने से ज्यादा संख्या में रोजगार उत्पन्न हो सकते हैं। यह भी देखें कि एक साल में दो करोड़ रोजगार सृजित करने के लिए कितनी तकनीकों पर कितना टैक्स लगाना होगा। तदनुसार टैक्स लगा दें तो एक पंथ दो काज हासिल हो जाएंगे। टैक्स की वसूली होगी, रोजगार सृजित होंगे और मनरेगा पर किए जाने वाले खर्च की बचत होगी सो अलग।
समस्या वर्ल्ड ट्रेड आर्गनाइजेशन के स्तर पर उत्पन्न होगी। भारत में पावरलूम पर टैक्स लगाने से हमारे घरेलू बाजार में कपड़ा महंगा हो जाएगा। फलस्वरूप पावरलूम से चीन में बना सस्ता कपड़ा प्रवेश करेगा। ऐसा हुआ तो हमें दोहरा नुकसान होगा। हमारा हैन्डलूम उद्योग बंद हो जाएगा चूंकि चीन का सस्ता कपड़ा बाजार में उपलब्ध होगा। हमारा पावरलूम उद्योग भी बंद हो जाएगा चूंकि हमने उस पर भारी टैक्स लगा दिया है। अत: जरूरी होगा कि साथ-2 पावरलूम से बने कपड़े पर भारी मात्रा में आयात कर लगाया जाए। ऐसा करने के लिए डब्ल्यूटीओ संधि में संशोधन भी आवश्यक हो सकता है। परन्तु हमारी कर्मठ सरकार के लिए इसे हासिल करना कठिन नहीं है।
रोजगार की समस्या का किसी भी देश के पास समाधान नही है। सब देश सस्ता माल बनाने की होड़ में बेरोजगारी बढ़ाते जा रहे हैं जैसे सभी को सम्मोहित कर दिया गया हो। ऐसे में मुख्यधारा का अनुसरण करते हुए सबके साथ नरक में जाने से उत्तम होगा कि हम स्वर्ग पहुंचने का अपना अलग रास्ता बनाएं। ल्ल