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पाञ्चजन्य ब्यूरो
राष्ट्र इस समय क्या सोचता है? वह मोदी सरकार को, उसके कामकाज को किस प्रकार देखता है, यह जानने के लिए पाञ्चजन्य-ऑर्गेनाइजर ने एक व्यापक सर्वेक्षण करवाया है।
सर्वेक्षण के शुरू में ही सवाल पूछा गया कि लोग अब मोदी सरकार के बारे में क्या सोचते हैं? वे उससे कितने संतुष्ट हैं? इस बारे में बहस पहले भी चलती आ रही थी, और हमें याद है कि किस प्रकार मोदी की जापान यात्रा के समय से ही विपक्ष ने 'देख लो, अच्छे दिन अभी तक नहीं आए' की रट लगानी शरू कर दी थी। लिहाजा एक परख यह करने की भी की गई कि अच्छे दिन नहीं आए, ऐसा कहने वाले कौन लोग हैं, और सरकार के कामकाज के प्रति उनका उत्तर विषयनिष्ठ है या उनकी राजनीति निष्ठा से प्रेरित है? और किसी भी स्थिति में, उनसे संतुष्ट लोगों की कुल संख्या कितनी है। इस जटिल प्रश्न की तह तक पहुंचने के लिए जरूरी है कि पहले यह देखा जाए कि 'मोदी आएंगे, अच्छे दिन लाएंगे'- ऐसा विश्वास करने वाले कितने लोग थे।
2014 के लोकसभा चुनावों में देश भर में लगभग 31 प्रतिशत मतदाताओं ने भाजपा को वोट दिया था। दूसरे स्थान पर रहने वाली कांग्रेस बहुत पीछे 19़ 3 प्रतिशत पर रही। तीसरा सबसे बड़ा हिस्सा उस कल्पित दल का है, जो अभी बना तो नहीं है, लेकिन कहा गया है कि बनेगा। माने लालू यादव-मुलायम यादव, नीतिश कुमार, शरद यादव आदि का सम्मिलित दल। इसे 7 प्रतिशत मत मिले, जो जाहिर तौर पर उत्तर प्रदेश और बिहार जैसे विशाल राज्यों से हैं। बहुजन समाज पार्टी कोई सीट जीतने में भले ही सफल न रही हो, लेकिन वह अकेले ही 4़ 1 प्रतिशत मत प्राप्त करने में सफल रही है। बहुत महत्वपूर्ण तौर पर 31.़5 प्रतिशत का सबसे बड़ा मतदाता वर्ग उन लोगों का था, जिन्होंने किसी अन्य को या निर्दलीय उम्मीदवारों को वोट दिया था। यह वोट अब किस दिशा में है, यह देखने वाली बात होगी।
अब देखते हैं वर्तमान राजनीतिक स्थिति को। सर्वेक्षण एक अभूतपूर्व स्थिति को सामने रखता है। हमने अभी चर्चा की थी कि लोकतंत्र में राजनीतिक स्थिरता सदनों के आंकड़ों से निर्धारित नहीं होती। वह जनता के सतत् समर्थन से निर्धारित होती है। जब जनता का विश्वास साथ न हो तो प्रचंड बहुमत की सरकार भी कुछ नहीं कर सकती। जनता के बीच आज की राजनीतिक स्थिति क्या है-इस प्रश्न पर देश भर के उत्तरदाताओं का उत्तर उन लोगों को करारा जवाब देता है, जो पिछले वर्ष मोदी सरकार के लिए मिले प्रचंड जनसमर्थन को एक अनायास सफलता, कांग्रेस के कमोंर् का फल, 'हाइटेक' प्रचार की सफलता, और अब हाल में धन बल की सफलता कहकर भारत की जनता के फैसले का मजाक उड़ाते थे। उनको उत्तर सर्वेक्षण ने दिया है। आज भी, जब न रोज रैलियां होती हैं और न घर-घर प्रचार, तब भारतीय जनता पार्टी को प्राप्त जनसमर्थन लगभग उतना ही है, जितना एक वर्ष पहले था। चूंकि एक वर्ष की अवधि कोई ऐसा परिणाम दिखाने के लिहाज से काफी कम होती है, जो छूने से नजर आ सके फिर भी जनसमर्थन का लगभग जस का तस रहना साबित करता है कि न केवल उम्मीदें अपने स्थान पर डटी हुई हैं, बल्कि भविष्य का निर्माण करने के लिए, जब ठोस परिणाम हाथ में होंगे, एक विशाल और ठोस आधार मौजूद है। विपक्ष कहीं से भी सरकार को चुनौती देने की स्थिति में नहीं है। यह परिणाम यह भी बताते हैं कि विपक्ष ने सरकार के खिलाफ जिस तरह का माहौल बनाने की चेष्टा हाल ही में की थी, उसे सुनने के लिए आम जनता तैयार नहीं है, वह अधिकतम अपने ही समर्थकों में वाहवाही लूट सकता है।
सरकार को क्या करना चाहिए? सर्वेक्षण देश की जनता की सबसे दुखती रग पर हाथ रखता है। यह पूछे जाने पर कि आपकी नजर में देश के सामने सबसे महत्वपूर्ण समस्या क्या है, लगभग एक तिहाई लोगों का कहना था-बेरोजगारी। अगर यह सवाल पहले पूछा जाता, तो शायद पिछले कई दशकों से इसका उत्तर यही होता। लोगों की नजर में दूसरे स्थान पर सबसे बड़ी समस्या है-मुद्रास्फीति। सरल शब्दों में कहा जाए तो लोगों को वस्तुओं की, सेवाओं की कीमत बहुत ज्यादा महसूस हो रही है, उन्हें लगता है कि महंगाई ज्यादा है। तीसरे स्थान पर है भ्रष्टाचार। सरकार के एक साल में भ्रष्टाचार की समस्या पहले या दूसरे स्थान से खिसक कर तीसरे स्थान पर आ गई है, और इसे एक बड़ी उपलब्धि माना जा सकता है। लेकिन जब 18़ 8 प्रतिशत लोगों को यह सबसे बड़ी समस्या नजर आती है, तो जाहिर है कि अभी काफी कुछ किया जाना बाकी है।
कुछ समस्याओं को एक साथ रखकर उनका महायोग करना प्रासंगिक होगा। बेरोजगारी, महंगाई, भ्रष्टाचार, गरीबी, पीने का पानी, खेती और विकास कार्य- 86़ 3 प्रतिशत लोग इन्हीं समस्याओं से उलझे हुए हैं। ये सारी समस्याएं एक दूसरे में गुंथी हुई भी हैं, और आपस में एक दुष्चक्र का निर्माण भी करती हैं। बेरोजगारी है, इसलिए (एक अंश तक) गरीबी है। गरीबी है, इसलिए महंगाई सालती है, इसलिए पीने के पानी, खेती और विकास कायोंर् की समस्याएं हैं। भ्रष्टाचार है, इसलिए विकास कायोंर् की समस्या है। विकास कायोंर् की समस्या है इसलिए बेरोजगारी है। चक्र कहीं से भी टूटना जरूरी है। यह विडंबना कितनी गहरी है, कितनी पुरानी है और इसे उखाड़ फेंकने के लिए कितने प्रयासों की आवश्यकता है, इसका एहसास ये आंकड़े दिलाते हैं।
अच्छी बात यह है कि इनके समाधान के लिए जो मौलिक उपाय हो सकते हैं-'स्किल डेवलपमेंट', 'मेक इन इंडिया', स्वच्छता, स्वास्थ्य, पीने का पानी, शिक्षा, 'स्मार्ट सिटी' इत्यादि, सारे सरकार की शीर्ष प्राथमिकताओं में हैं।
एक बात यहीं से पैदा होती है, और यहीं स्वीकार करनी होगी। अगर किसी समस्या को 86़ 3 प्रतिशत लोग-माने देश की बहुतांश जनता-पूरी गहराई से महसूस करती है, तो उसका समाधान भी पूरे देश को मिलकर ही करना होगा। लोगों को भी और राज्य सरकारों को भी। यहां एक रोचक तथ्य प्रस्तुत करना आवश्यक है। योजना आयोग और वित्त आयोगों पर सरकार के कदमों पर काफी नाक-भौं सिकोड़ी गई थी। लेकिन इन कदमों से देश के वित्तीय ढांचे में अब एक मूलभूत परिवर्तन आ चुका है। करों से जो राजस्व प्राप्त होता है, उसका लगभग आधा-48़ 4 प्रतिशत-अब सीधे राज्यों को दिया जा रहा है। पहले उन्हें सिर्फ 37 प्रतिशत मिलता था। माने अब राज्य सरकारों के लिए केन्द्र को कोसने की तुक नहीं रह गई है। इतना ही नहीं, राज्य सरकारों को अब योजनाओं के क्रियान्वयन में अपनी जरूरत के अनुरूप फेरबदल करने के लिए भी ज्यादा गुंजाइश दे दी गई है। व्यवस्था तैयार है, अब बात उम्मीदों से आगे बढ़कर प्रयासों के पाले में है। राज्यों की भागीदारी कितनी आंकड़े गवनेंर्स की एक गंभीर समस्या की तरफ इशारा करते हैं। अगर हम भ्रष्टाचार और कानून-व्यवस्था की समस्याओं को एक साथ रख कर देखें, तो पूर्वी क्षेत्र में 30.़2 प्रतिशत लोग इन्हें सबसे महत्वपूर्ण समस्या मानते हैं। माने ठीक उतने ही लोग, जितने बेरोजगारी को सबसे बड़ी समस्या मानते हैं। क्या इन दोनों समस्याओं का कोई अनन्य संबंध है? निश्चित रूप से है, लेकिन उसकी बारीकियों में जाने के लिए पृथक अध्ययन करना होगा। बहरहाल इस आंकड़े को बाकी आंकड़ों के साथ जोड़कर देखें, तो फिर उसी मूल समस्या की ओर पहुंच जाते हैं- गरीबी है, धन चाहिए।
और बारीकी में जाने के पहले पूछते हैं जनता जनार्दन से। क्या आपको लगता है कि मोदी सरकार के पिछले एक वर्ष में देश की आर्थिक स्थिति सुधरी है? मोदी सरकार को राजनैतिक समर्थन देने वाले भले ही 30-31 प्रतिशत ही हों, लेकिन देश की आर्थिक स्थिति संवारने के लिए उसकी सराहना करने वाले उससे लगभग दो गुना, 62.3 प्रतिशत हैं। 28.4 प्रतिशत को नहीं लगता है कि देश की आर्थिक स्थिति में पिछले एक वर्ष में कोई सुधार हुआ है, जबकि 9.3 प्रतिशत के पास इस सवाल का कोई उत्तर नहीं है।
इसी सवाल का क्षेत्रवार उत्तर देखें, तो आर्थिक क्षेत्र में सरकार के कामकाज से सहमत लोगों के प्रतिशत में, उनके विस्तार में देश भर में कहीं कोई बड़ा उतार-चढ़ाव नहीं है। पूर्वी क्षेत्र का स्तंभ सबसे छोटा (6.3 प्रतिशत) जरूर है, लेकिन वहां भी वह आधे से कहीं अधिक है, और असहमत या निरुत्तर लोगों के प्रतिशत से कई गुना बड़ा है। चालू खाते का घाटा कम होना, देश का विदेशी मुद्रा भंडार ऐतिहासिक ऊंचाई पर पहुंचना, वित्तीय घाटा कम होना, भारतीय रुपए का अपेक्षाकृत स्थिर रहना, खुदरा मुद्रास्फीति कम होना और थोक में मूल्य घटते जाना, सरकार की कई उपलब्धियां इस एहसास को आधार देती हैं। आइए इन आर्थिक सवालों को और गहराई से देखें। हम देख चुके हैं कि कैसे देश की लगभग तिहाई जनता महंगाई और बेरोजगारी को अपनी सबसे बड़ी समस्या मान रही है। अब देखते हैं इन सवालों पर, सरकार के कामकाज पर जनता की राय-
पहला सवाल-क्या आपकी राय में पिछले एक वर्ष में महंगाई कम हुई है? वास्तव में इस सवाल का उत्तर स्वत:सिद्ध है। 2007 से 2013 के बीच, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर, मुद्रास्फीति की औसत दर 10़ 2 प्रतिशत रही थी। पिछले साल मोदी के शपथ ग्रहण समारोह के पहले, अप्रैल 2014 में यह दर 8़ 59 प्रतिशत थी। इस वर्ष, मोदी सरकार का एक वर्ष पूरा होने के पहले ही, अप्रैल 2015 में उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर, मुद्रास्फीति की दर 4़ 87 प्रतिशत थी। माने पिछले साल से आधी। जहां तक थोक महंगाई का सवाल है, उसमें वृद्धि दर कम होते होते मार्च से नकारात्मक हो चुकी है। माने चीजें अब महंगी के बजाए सस्ती से सस्ती होती जा रही हैं। उपभोक्ता मूल्य सूचकांक के आधार पर मुद्रास्फीति की दर में कमी के लिए मोदी सरकार के कई उपाय जिम्मेदार रहे हैं। खाद्य पदाथोंर् के दामों को नियंत्रण में लेने के लिए सरकार ने 50 लाख टन चावल खुले बाजार में जारी करने का फैसला किया।
बिक्री सिर्फ 20 लाख टन की ही हुई, लेकिन इस खबर ने ही बढ़ती महंगाई के होश ठंडे कर दिए कि सरकार कीमतों को काबू करने के लिए कदम उठाने जा रही है। प्याज की कीमतों को काबू में करना तो और भी टेढ़ी खीर था। कई बार इन कीमतों में परिवर्तन रोजना के स्तर पर हो जाता है। दूसरे प्याज उत्पादकों को कहीं घाटा न हो जाए, यह भी चिंता करनी होती है। सरकार ने अतिसक्रियता से काम किया, और किसी को भी प्याज के आंसू नहीं रोने दिया। न खाने वालों को, न उगाने वालों को। फिर भी, यह प्रश्न जनता से पूछा जाना आवश्यक है। कहीं आंकड़े हवाई तो नहीं हैं? कहीं ऐसा तो नहीं कि उपभोक्ता मूल्य सूचकांक और वास्तविक उपभोक्ता के बीच मंहगाई की एक और परत हो? सरकार का काम जनता को नजर भी आ रहा है, या नहीं? उत्तर बहुत उत्साहवर्धक रहे। 60 प्रतिशत से अधिक लोगों ने माना कि हां, महंगाई कम हुई है। 29 प्रतिशत की राय इसके विपरीत थी, और लगभग 11 प्रतिशत लोगों को समझ में नहीं आ रहा था कि महंगाई कम हुई है या नहीं। बस के सफर में ऊंघने की आदत की चर्चा हम पहले कर चुके हैं।
इसी प्रश्न के उत्तर की क्षेत्रवार स्थिति किसी और दिशा में इशारा करती है। एक देश में, महंगाई और बेरोजगारी की दरों में बहुत ज्यादा अंतर नहीं रह सकता है। फिर भी पूर्वी क्षेत्र से मिले उत्तरों में सिर्फ 27़ 8 प्रतिशत लोग नहीं मानते हैं कि पिछले एक वर्ष में महंगाई कम हुई है। मजेदार बात यह है कि इसी पूर्वी क्षेत्र में 63 प्रतिशत लोगों ने मोदी सरकार के आर्थिक कामकाज को बेहतर माना है और माना है कि पिछले एक साल में देश की आर्थिक स्थिति बेहतर हुई है। फिर महंगाई में कमी के प्रश्न पर उनका उत्तर ऐसा क्यों है? क्या यह किसी राजनैतिक सोच के हावी रहने की ओर संकेत करता है? इसका उत्तर भी सर्वेक्षण से पता चलता है।
इस बार सीधा प्रश्न है- क्या मोदी सरकार के एक वर्ष में रोजगार के अवसरों में वृद्धि हुई है? वास्तव में यह सारी आर्थिक गतिविधियों का अंतिम छोर होता है। उदाहरण के लिए जमीन, बिजली, पानी, टेलीफोन, रहने की व्यवस्था, सड़क आदि सारी अधोसंरचना की जमावट कर चुकने के बाद जाकर नया कारखाना लग पाता है, और रोजगार के नए अवसर इस प्रक्रिया में ही पैदा हो पाते हैं। उनमें वृद्धि होने का अर्थ है, सारी गतिविधियों में तेजी आना, नया काम शुरू होना। इस प्रश्न पर 44़ 3 प्रतिशत लोगों का उत्तर सकारात्मक है। हां, रोजगार के अवसर बढ़े हैं। 42.़2 प्रतिशत लोग इससे सहमत नहीं हैं। 13़ 5 प्रतिशत लोगों को पता नहीं है। इसका एक सरल सा अर्थ यह माना जा सकता है कि इन गतिविधियों को और तेज तो होना ही है, उनका असर अंत तक पहुंचना भी समय साध्य है। निर्णायक है और कितनी अहम है, यह हम सब जानते हैं।
इस प्रश्न का क्षेत्रवार उत्तर सारी कहानी का खुलासा कर देता है। रोजगार अवसर बढ़ने को लेकर पूर्वी क्षेत्र के लोग ज्यादा संतुष्ट नहीं हैं। वहां उन्हें महंगाई में भी उल्लेखनीय कमी आती महसूस नहीं हुई है, जैसा कि हमने पिछले प्रश्न के उत्तर में देखा है। जबकि बाकी पूरा देश, रोजगार के अवसरों में वृद्धि को बहुसंख्या में महसूस कर रहा है।
यह स्थिति अगले प्रश्न की ओर प्रेरित करती है। नरेन्द्र मोदी के नेतृत्व वाली केन्द्र सरकार के बारे में जनता की राय क्या है? लोग सरकार के कामकाज को कैसा मानते हैं? 55.6 प्रतिशत लोगों की नजर में सरकार का कामकाज बहुत अच्छा है, 25.9 प्रतिशत की नजर में कामकाज औसत है और मात्र 18़ 5 प्रतिशत लोगों की नजर में कामकाज अच्छा नहीं है।
81.5 प्रतिशत लोगों की नजर में अच्छे दिनों की शुरुआत होना साधारण बात नहीं है। लोगों को वित्तीय तौर पर जोड़ना, ब्याज दरों में हल्की कटौती होना, जो नए निवेश से लेकर नए रोजगार तक के लिए सकारात्मक होता है, 'मेक इन इंडिया' को लगातार मिलता समर्थन, विदेशी पूंजी की आवक की नित नई संभावनाएं, विदेशी संबंधों के मोर्चे पर, राष्ट्रीय सुरक्षा के प्रश्नों पर सरकार के कामकाज से पूर्ण संतुष्टि, बिजली की लगभग ठप होती स्थिति में आमूलचूल सुधार, कोयला खदानों और 2 जी के घोटाले की सुइयों को उल्टा घुमाना, नदियों की, घाटों की सफाई में साफ नजर आने वाली प्रगति, पर्यावरण सुरक्षा की दिशा में उल्लेखनीय प्रगति, रक्षा क्षेत्र की अटकी परियोजनाओं में गति लाना-बहुत सारे कारण थे कि लोग अच्छे दिनों को महसूस करें। और वही हुआ भी।
अच्छे दिनों की शुरुआत देश भर में महसूस की जा रही है। दक्षिण भारत और पश्चिमी भारत लगभग अभिभूत हैं। सबसे अहम बात यह है कि कामकाज को खराब कहने वाले न के बराबर ही हैं।
सरकार के कामकाज से संतुष्टि न किसी क्षेत्र तक सीमित है, न वर्ग तक, न आयु वर्ग तक।
अगला प्रश्न सीधे प्रधानमंत्री की अपनी लोकप्रियता का है। प्रधानमंत्री किसी भी अन्य नेता की तुलना में ढाई गुना या उससे ज्यादा लोकप्रिय बने हुए हैं। यह राजनीतिक स्थिरता के लिए तो शुभ संकेत है ही, विभिन्न विकास योजनाओं की निरंतरता को भी पुष्ट करता है।
प्रधानमंत्री की लोकप्रियता का ग्राफ अन्य नेताओं की लोकप्रियता की तुलना, ग्रामीण और शहरी भारत दोनों में बराबरी का अंतर बनाए हुए है। शहरी भारत में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता आधे से अधिक, वास्तव में 55 प्रतिशत पर जा रही है और यह स्वतंत्र भारत के इतिहास में संभवत: अभूतपूर्व स्थिति है।
इसी प्रकार, अगर क्षेत्रवार देखें, तो उत्तर और पश्चिमी भारत में प्रधानमंत्री की लोकप्रियता आधे से अधिक, क्रमश: 54 और 51 प्रतिशत है। राजनीति शास्त्र के अनुसार जब नेतृत्व की राजनीतिक साख, विश्वसनीयता और लोकप्रियता 50 प्रतिशत से अधिक होती है, तो निश्चित रूप जनता उसके विरुद्ध कोई भी बात सुनने के लिए तैयार नहीं होती है। क्या विपक्ष इस बात पर गौर करेगा कि सरकार पर लांछन लगाने के उसके प्रयास उसका ही नुकसान कर रहे हैं?
सर्वेक्षण में जनता ने प्रधानमंत्री की पाकिस्तान के प्रति नीति पर भी पूरी संतुष्टि जताई है। सिर्फ नीति पर ही नहीं, उसके परिणामों पर भी। प्रश्न है कि, क्या आपको लगता है कि केन्द्र में मोदी सरकार बनने के बाद से आतंकवाद का खतरा कम हुआ है? 62 प्रतिशत लोगों का उत्तर आता है-हां।
जब इसी उत्तर को क्षेत्रवार देखते हैं तो पाते हैं कि दक्षिण भारत अब स्वयं को आतंकवाद से काफी हद तक सुरक्षित महसूस करने लगा है, जहां तमाम कट्टरपंथी संगठनों के अड्डे रहे होने की खबरें आती रही हैं। अड्डे अभी भी हो सकते हैं, लेकिन अंतर यह है कि अब उनकी धरपकड़ तेज होने से लोग संतुष्ट महसूस करने लगे हैं। नक्सली संगठन अभी नेस्तोनाबूद नहीं हुए हैं, और यह इन उत्तरों का यह एक बड़ा पहलू हो सकता है। पाकिस्तान प्रायोजित आतंकवाद पर भारत 'कड़ी निंदा' वाले युग से आगे निकल आया है, और यह सर्वेक्षण उसकी पुष्टि करता है।
अब सर्वेक्षण का यक्ष प्रश्न। 'मेक इन इंडिया' को लेकर आम लोग क्या सोचते हैं? वास्तव में 'मेक इन इंडिया' से कई दृष्टिकोणात्मक सवाल जुड़ते हैं-इससे किसका हित जुड़ता है? क्या यह आय के वितरण की असमानताओं को कम करने में कारगर होगा? क्या यह गांवों से शहरों की ओर पलायन के लिए बाध्य बेरोजगारों की विशाल संख्या के लिए उम्मीदों की किरण भी है? वास्तव में ये सारे प्रश्न गंभीर शोध से जुड़ते हैं, लेकिन जहां तक जनता के दृष्टिकोण की बात है, एक विशाल बहुमत, वास्तव में सरकार के कामकाज को बहुत अच्छा मानने वाले 81.5 प्रतिशत और देश की आर्थिक स्थिति में पिछले एक वर्ष में सुधार आने पर मुहर लगाने वाले 62.3 प्रतिशत लोगों के बाद 77.4 लोगों का मानना है कि 'मेक इन इंडिया' देश के आम लोगों के हित में है।
अब इसी प्रश्न की क्षेत्रवार मीमांसा करें। देश के हर कोने से, 65 प्रतिशत से ज्यादा लोग 'मेक इन इंडिया' से अपनी अपेक्षाएं और अपना विश्वास जोड़े हुए हैं। इससे बाकी बातों के अलावा, इस बात की भी पुष्टि होती है कि मोदी सरकार के सबका साथ-सबका विकास के नारे पर देश विश्वास करता है।
वहीं भूमि अधिग्रहण संशोधन विधेयक पर सरकार जनता तक अपनी बात ठीक ढंग से नहीं रख सकी है। पश्चिमी भारत के 57़ 3 प्रतिशत उत्तरदाताओं की राय है कि इस पर विपक्ष का विरोध जायज नहीं है। लेकिन 19़ 6 प्रतिशत अनिश्चित लोगों के साथ, इस विधेयक पर जनता की राय काफी बंटी हुई है, और फिलहाल विपक्ष से सहमत लोगों की संख्या लगभग 11 प्रतिशत अधिक है। हालांकि यह जानना दिलचस्प है कि विपक्ष को सही मानने वाले अधिकतर लोगों को यही पता कि इस विधेयक पर विपक्ष की आपत्ति आखिर है क्या!
यह एक व्यापक प्रश्न बनता है। सरकार ने अनेक योजनाएं शुरू की हैं। कई के परिणाम भी नजर आने लगे हैं, लेकिन क्या सरकार अपनी बात जनता तक ठीक ढंग से पहुंचा भी रही है? लिहाजा अगला प्रश्न है कि क्या आप प्रधानमंत्री जन-धन योजना के बारे में जानते हैं? सरकार इस सवाल पर भी खरी उतरती नजर आती है। 78 प्रतिशत लोग सरकार की इस योजना के बारे में जानते हैं, भले ही इतने लोग सरकार को, प्रधानमंत्री को या भारतीय जनता पार्टी को समर्थन न देते हों, लेकिन सरकार अपनी योजना उन तक पहुंचाने में सफल रही है।
एक बार फिर इसी कसौटी पर सरकार की अन्य योजनाओं को परखें। प्रश्न है कि आप मोदी सरकार की कितनी योजनाओं के बारे में जानते हैं? आखिर जनता तक जानकारी न होने पर सरकार का काम कैसे आगे बढ़ेगा? इसके उत्तर में मिला सबसे महत्वपूर्ण आंकड़ा है 1़ 4 प्रतिशत का। संख्या के लिहाज से बेहद सूक्ष्म, लेकिन ये वे लोग हैं, जो मोदी सरकार की तीस से ज्यादा योजनाओं के बारे में जानते हैं। नि:संदेह इसे सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल किया जाना चाहिए। 9़ 3 प्रतिशत का दावा है कि वे सरकार की एक भी योजना के बारे में नहीं जानते हैं। उनके और तीस से ज्यादा योजनाओं के बारे में जानने वाले इन डेढ़ प्रतिशत लोगों के बीच, जागरूकता के विभिन्न स्तर हैं। लगभग दो प्रतिशत लोगों को मोदी सरकार की बीस से तीस योजनाओं के बारे में पता है। 3़8 प्रतिशत लोग मोदी सरकार की 10 से 20 योजनाओं के बारे में जानते हैं। और बेहद विशाल बहुमत 72़ 8 प्रतिशत उन लोगों का है, जिन्हें मोदी सरकार की 1 से 5 योजनाओं के बारे में जानकारी है।
सरकार जो भी कर रही है, जनता को उसकी जानकारी रहना एक बड़ी उपलब्धि है, यही सरकार की सामाजिक पूंजी भी है। जब अधिकांश लोगों को मोदी सरकार की अधिकांश योजनाओं के बारे में पता है, तो एक स्वाभाविक प्रश्न उठता है कि लोगों के दृष्टिकोण में सरकार की सबसे अच्छी योजना कौन सी है?
सर्वाधिक 47़ 8 प्रतिशत लोग स्वच्छ भारत मिशन को, 31़ 7 प्रतिशत लोग जनधन योजना को, लगभग 10 प्रतिशत लोग 'मेक इन इंडिया' को और 3़ 2 प्रतिशत लोग सुकन्या समृद्धि योजना को सरकार की सबसे अच्छी योजना मानते हैं। निर्मल गंगा मिशन के प्रति उदासीनता इसके प्रति जागरूकता प्रयासों को तेज करने की आवश्यकता निश्चित तौर पर जताती है। दूसरी तरफ स्वच्छ भारत मिशन को ग्रामीण भारत के 55़ 9 प्रतिशत वर्ग ने स्वीकार किया और सराहा है, और सिर्फ इस आंकड़े को सरकार की सबसे बड़ी उपलब्धियों में शामिल किया जाना चाहिए।
और अब सबसे बड़ा आंकड़ा। शायद ही किसी योजना को इस कदर सहमति और समर्थन किसी लोकतांत्रिक देश में कभी मिला हो। 86़ 9 प्रतिशत लोग स्वच्छ भारत मिशन का समर्थन करते हैं, उसे सकारात्मक मानते हैं। इस मिशन का असर कितनी दूरी तक होना है, इसकी चर्चा करने का यह उपयुक्त अवसर न हो, लेकिन इस मिशन को मिला समर्थन व्यापक अच्छे दिनों की ओर इशारा जरूर कर रहा है। मजेदार बात यह है कि जो पूर्वी क्षेत्र इस सर्वेक्षण में आमतौर पर, या ज्यादातर सवालों पर बाकी क्षेत्रों की तुलना में फिसड्डी नजर आता रहा है, वह स्वच्छ भारत मिशन की आवश्यकता का समर्थन करने में पूरे देश में सबसे आगे है। वहां 95़ 9 यानी लगभग 96 प्रतिशत लोग इसे सकारात्मक और आवश्यक मानते हैं।
अब बात की जाए रक्षा क्षेत्र की। एक विषय, जो उतना सरल नहीं है, जितना सरल उसे समझ लिया जाता है। लेकिन सर्वेक्षण जनता के दृष्टिकोण के बारे में है और जनता के दृष्टिकोण के अनुसार, 67़ 8 प्रतिशत लोगों की राय में मोदी सरकार के एक साल के भीतर भारत की प्रतिरक्षा स्थिति मजबूत हुई है। इससे इनकार करने की स्थिति संभवत: तर्कहीन है, क्योंकि साफ तौर पर इनकार करने वाले 10़ 5 प्रतिशत लोगों की तुलना में 21.8 प्रतिशत लोग इस बारे में अनिश्चितता व्यक्त करते हैं।
रोंगटे खड़े कर देने वाले आंकड़े। दैनंदिन राजनीति से परे जाकर सोचने के लिए बाध्य कर देने वाले आंकड़े। जीवनस्य सारम् यौवनम् और देश भर में 18 से लेकर 50 वर्ष की आयु के लोगों में 31 प्रतिशत से अधिक लोग बेरोजगारी की समस्या को देश की सबसे महत्वपूर्ण समस्या के रूप में महसूस कर रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में तो स्थिति और भी गंभीर है, जहां कृषि के अलावा कोई रोजगार नहीं रह गया है और कृषि क्षेत्र न ज्यादा रोजगार देने की स्थिति में है, न अपनी समस्याओं से आगे निकल पा रहा है। ये आंकड़े गवाही देते हैं कि देश में कृषि और औद्योगिक क्षेत्रों में कुछ रोजगारपरक क्रांतिकारी परिवर्तन लाना कितना आवश्यक हो चुका है। उत्तरदाताओं की राय की 'रिवर्स इंजीनियरिंग' करें तो हम पाते हैं कि कृषि क्षेत्र की समस्याएं, विकास कायोंर् की समस्याएं, कानून-व्यवस्था की समस्याएं देश के पूर्वी राज्यों में सबसे गहराई से महसूस की जा रही हैं। बेरोजगारी को सबसे महत्वपूर्ण समस्या मानने वालों का आंकड़ा हालांकि पश्चिमी क्षेत्र में 41 प्रतिशत को पार कर रहा है, लेकिन पूर्वी क्षेत्र में भी यह 30 प्रतिशत को पार कर चुका है।
ऐसे हुआ सर्वेक्षण
सर्वेक्षण में सभी आर्थिक वगोंर्, ग्रामीण और शहरी वगोंर्, सभी आयु वगोंर्, सभी रोजगार वगोंर् और सभी स्तर की शिक्षा प्राप्त वगोंर् को शामिल किया गया, जबकि समष्टि विश्लेषण में सभी वगोंर् को यथेष्ट भार दिया गया है।
प्रत्येक क्षेत्र के पृथक विषय भी उठाए गए और उन पर भी उत्तरदाताओं की राय ली गई है। यह सर्वेक्षण लोकसारथी फाउंडेशन ने 1 मई 2015 से 10 मई 2015 के बीच किया है। इसमें 5142 उत्तरदाताओं की राय ली गई है।











