विशेष साक्षात्कार : 'हिन्दू कुटुम्ब को जाना , तो देश की जड़ों को जान लिया '
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विशेष साक्षात्कार : 'हिन्दू कुटुम्ब को जाना , तो देश की जड़ों को जान लिया '

Written byArchiveArchive
Mar 24, 2015, 12:00 am IST
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विशेष साक्षात्कार

दिंनाक: 24 Mar 2015 13:18:04

2014 के ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित प्रसिद्ध मराठी लेखक, पद्मश्रीभालचंद्र नेमाडे मराठी साहित्य का एक ऐसा नाम है, जिसने अपनी लेखनी से साठके दशक की धारा ही बदल दी। मराठी साहित्य में तीन पीढि़यों के पाठकों कासर्वाधिक प्यार पाने वाले नेमाडे मातृभाषा के मुखर पैरोकार हैं। वह जड़ोंपर विश्वास रखते हैं और अपनी खरी बातों के लिए जाने जाते हैं। शिक्षा औरभाषा, पाठ्यक्रम में इतिहास के विकृतीकरण, इस देश की सांस्कृतिक पहचान औरराष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा द्वारा पारितमातृभाषा में प्राथमिक शिक्षा के प्रस्ताव जैसे विभिन्न विषयों पर उनसेलंबी बात की पाञ्चजन्य के संपादक हितेश शंकर ने। प्रस्तुत हैं इस वार्ता केप्रमुख अंश।
– पुरानी शिक्षा पद्धति और नई विद्यालयी शिक्षा मेंसबसे ज्यादा चुभने वाली बात आपको क्या लगती है? या कहिए, आज के बाबा कोपोते की पढ़ाई में क्या बात सबसे ज्यादा खटकती है?
आज अंग्रेजी काप्रयोग ज्यादा होता है, यह मुझे बहुत खटकता है। वैसे, मेेरी पोतियां मराठीभाषी विद्यालयों में जाती हैं। मुझे यह अच्छा लगता है कि यहां सब विषयमराठी में पढ़ाये जाते हैं और पांचवीं के बाद अंग्रेजी सिर्फ एक विषय केरूप में रहती है। मैं इसे अच्छा समझता हूं और यह भी मानता हूं कि इसमेंपढ़ने वालों की अंग्रेजी, अंग्रेजी माध्यम वालों से अच्छी रहती है।
-भूख लगने पर जिस भाषा में खाना मांगते हो, जिस भाषा में रोते हो, जिस भाषा मेंसोते हो, सपने देखते हो, उस भाषा में सोचोगे तो आगे तक जाओगे। इस बात मेंकितनी सचाई है?
बिल्कुल सही है यह। यही मानव जाति का इतिहास रहा है।लेकिन जो देश गुलाम रहे या दूसरे कुछ और उनमें ही परभाषा में शिक्षा होतीहै, बाकी कहीं भी ऐसा नहीं है। चीन, जापान और यूरोप में तो आज तक परभाषामें शिक्षा नहीं हुई। यह हमारे लिए एक सबक भी है कि दुनिया मंे सब बच्चे जबअपनी-अपनी भाषा में पढ़ रहे हैं तो हम क्यों परभाषा में पढ़ाएं। पूरे देशमें यह जाल फैल रहा है। वैसे, बिहार और उत्तर प्रदेश से जो लोग महाराष्ट्रआते हैं उनकी हिन्दी अच्छी होती है और उन्हीं के कारण महाराष्ट्र मेंहिन्दी जीवित है। राष्ट्र के तौर पर यह अच्छी बात है।
-अंग्रेजी मेंबोलना, अंग्रेजी में सोचना श्रेष्ठता की बात समझी जाती है। श्रेष्ठ विचारसिर्फ अंग्रेजी में ही आते हैं या भारत का मानस ऐसा बनाया गया?
भारत मेंइस प्रकार का माहौल स्वतंत्रता के बाद बनाया गया। वैचारिक श्रेष्ठताअंग्रेजी के बिना संभव नहीं यह धारणा मेरी राय में पूरी तरह गलत है। हमारेबच्चों के समय भी अंग्रेजी के प्रति झुकाव था लेकिन आज(पोते) के समय यहमाहौल अधिक हो गया है।
-अंग्रेजी का यह बढ़ता प्रभुत्व आपकी राय में क्या करने वाला है? खतरा क्या है?
यहबहुत खतरनाक और आक्रामक है। आज अंग्रेजी का वैश्विक स्वरूप राक्षसी हैअन्य भाषाओं और विविधताओं को निगलने वाला अंग्रेजी व्याकरण या ताना-बानाबहुत ज्यादा डरावना है। आस्टे्रलिया में 6 सौ के लगभग भाषाएं थीं लेकिन अबयह 30-35 ही बची हैं और यह शायद अगले पचास साल बाद लुप्त हो जाएंगी।इंग्लैंड में सौ साल पहले विभिन्न प्रकार की 6-7 भाषाएं थीं इन सबकोअंग्रेजी ने तबाह कर दिया। स्कॉटिश नहीं बोली जाती, गेलिक नहीं बोली जाती, मैंक्स बंद हो गई। उत्तर पश्चिम यूरोप में केल्टिक बंद हो गई। अभी वेल्श कोकुछ लोगों ने बचा रखा है। अंग्रेजी की बजाय मातृभाषा का प्रयोग करने केलिए डटना ही इससे मुकाबला करने का अकेला तरीका है। आयरलैंडवासियों ने भीआइरिश शुरू कर दी है। कनाडा और अमरीका मेंें कोई 200 भाषाएं थीं इनमें महज 38 ही बची हैं। अब इनमें कोई 4-5 ही बची होंगी। यह स्थिति भारत में होने काडर है इसलिए अंग्रेजी खतरनाक है। भारत में, इसके अलग-अलग प्रांतों में यहअपनी-अपनी मातृभाषा के पक्ष में खड़े होने का वक्त है।
– आप दुनिया घूमे हैं, पढ़े हैं। दुनिया को समझा है, पढ़ाया है। लेकिन एक लेखक के रूपमें अपने विशाल देश को जानने के आपके स्रोत क्या हैं?
देश कितना भी बड़ाहो लेकिन अगर आपने हिन्दू कुटुम्ब को जाना है तो देश की जड़ों को जान लियाहै। क्योंकि पूरे शरीर के विषय में जानने के लिए एक कोशिका बहुत है। हमेंबड़ा गर्व है कि हमारे देश के हर गांव में, हर कुटुम्ब में किसी भी घर मेंया किसी भी राज्य में असम हो या फिर कश्मीर में या अन्य कहीं भी जो संस्कारएक घर में मिलेगा वही दूसरे घर में भी मिलेगा। तो किसी चीज को समझने केलिए हमें बाहर जाने की कोई आवश्यकता नहीं है। हमारे दिमाग के विकास मेंविविधता का बड़ा ही योगदान है। अनेक प्रकार की अलग-अलग चीजों को ग्रहण करनेसे हमारा विकास हुआ है। तरह-तरह का अनाज, अलग-अलग मौसम, भिन्न-भिन्नसब्जियां, हम इस विविधता के साथ बड़े हुए लोग हैं। यह इस राष्ट्र का मूल, इसकी हिन्दू संस्कृति है। यहां चीजों का अंबार है, कुछ भी बेकार नहीं।लेकिन आज चीजें कुछ बदल रही हैं। हम कुछ ही चीजों पर निर्भर होने लगे हैं।यह एकपक्षीय सोच, एक तरह का खाना-पहनना। यह इस भूमि के विविधता संजोने केस्वभाव के विरुद्ध है।
-जैसा कि आपने कहा कि अंग्रेजी की एक राक्षसीप्रवृत्ति है। आस्ट्रेलिया में 300 वनवासी भाषाएं थीं जो अंग्रेजी चट करगई, वैसे ही हमारे पूर्वोत्तर के वनवासी क्षेत्रों में अनेक उनकी अपनीरीति-नीति व सांस्कृतिक परम्पराएं भी थीं। लेकिन उन क्षेत्रों में अंग्रेजीकी वर्णमाला सिखाना और साथ में एक मजहबी किताब पढ़ाना। इससे वनवासी औरजनजातीय समाज अपनी परंपराओं और रीति-नीति से दूर हुआ। इसे आप किस प्रकार देखते हैं।
मैंने कई बार मुखर होकर कहा है कि पूर्वोत्तर के लोगों कोउनकी ही भाषा में प्राथमिक शिक्षा मिलनी चाहिए। रही बात अंग्रेजी के साथईसाईकरण की, तो जो लोग सेवा की आड़ में कुछ और कर रहे हंै, उस पर रोक लगनीचाहिए। क्योंकि ये दोनों साथ नहीं हो सकते।
-मदर टेरेसा ने स्वयं टाइमपत्रिका से बात करते हुए कहा था कि मैं प्रेम से ईसाईकरण करती हूं। उनकीऐसी 'सेवा' पर भारत ही नहीं विश्व में भी सवाल उठे। तो ऐसी सेवा को आप क्यामानते हैं? साहित्यकार के तौर पर आपको क्या लगता है कि इस चुनौती से कैसेनिपटा जा सकता है?
सेवा करना अच्छी बात है। यीशू ने कहा कि सेवा करो, नकि यह कहा कि सबको कन्वर्ट करो। अगर इस प्रकार का कुछ हो रहा है तो कहीं नकहीं इसके पीछे कुछ हमारी अपनी भी कमजोरी है। अगर समाज को मिशनरियों केचंगुल से बचाना है तो लोगों को इसके विषय में जागरूक करना होगा। यही इसकाएक उपाय है। आज यह बहुत जरूरी है। हमारी प्राथमिक शिक्षा में इस प्रकार कीचीजों को जोड़ना चाहिए और बच्चों के माता-पिता को समझना चाहिए कि मिशनरियोंकी शिक्षा और भारत की शिक्षा में बड़ा अंतर है। इस कार्य को करते ही दूधका दूध और पानी का पानी हो जायेगा।
-आपके अनुसार भिन्नता में एकता केलिए स्थान की संस्कृति कहीं है तो भारत में है। ऐसे में आईएसआईएस याईसाईकरण की खबरें, लोगों को एक रंग में रंगने की सनक को आप कैसे देखते हैं?
यहहमारी हिन्दू व्यवस्था के लिए खतरनाक बात है कि हम एक कुछ माने। हमने कभीएक चीज, एक देवता,एक ग्रन्थ नहीं माना। तो हमारे लिए यह गलत है और इसप्रकार की चीजों को समर्थन तो दूर, हम सहन भी नहीं कर सकते। क्योंकि हमविविधताओं को मानने वाले हैं और इसको आज तक भलीभांति संभलाते आ रहे हैंजिससे आजतक इसका संतुलन स्थापित है।
-आपने कहा कि गलत चीजों को हम सहननहीं कर सकते। परन्तु हिन्दू के बारे में एक पर्याय शब्द गढ़ा गया किहिन्दू सब सहन कर सकता है, सहिष्णु है। कुछ भी कहो या करो यह सहन करता रहेगा?
यह हमारी कमजोरी है। गुप्तकाल तक हिन्दू सशक्त था और इसका कोई भीकुछ बिगाड़ने वाला नहीं था। उसके बाद हिन्दू जात-पात में बंटा और बंटताचला गया। हमने उन हिन्दुओं को अंगीकार नहीं किया जो जबरन या किसी विघटनकारीपरिस्थिति के चलते हिन्दू समाज से दूर हुए थे। यह बहुत बड़ी गलती रही। जिसप्रकार शिवाजी महाराज खुलेआम जो हिन्दू किसी कारणवश किसी अन्य मत-पंथ मेंचले जाते थे, लेकिन सुध आने पर जैसे ही वे घर वापसी करते थे शिवाजी उनकोउसी सम्मान के साथ वापस लाते थे। लेकिन उनके बाद यह बंद हो गया। इससे हमकमजोर हुए। सहोदर घर लौटते हैं तो उन्हें हमें सम्मान देना चाहिए। अस्वीकारऔर तिरस्कार की सामाजिक बेडि़यां तोड़नी चाहिएं।
-यदि कहा जाये कि मातृभूमि की शक्ति मातृभाषा है। इस तर्क के आप पक्षधर हैं?
बिल्कुल पक्षधर हूं। ऐसा ही है।
-क्या विविधताओं वाले इस देश में शिक्षा की भाषा और पाठ्यक्रम एक जैसा होना चाहिए? आप क्या कहते हैं?
मेरामानना है कि अपने-अपने प्रदेशों के मुताबिक पाठ्यक्रम होना चाहिए। अगर आपगोवा के निवासी हैं तो पुर्तगाली और उत्तर हिन्दुस्थानी हों तो मंगोलों केविषय में पता होना चाहिए कि यह कैसे आए, फिर यहां कैसे किन तरीकों काप्रयोग करके लोगों को ईसाई बनाया गया, यह सब इस राज्य के लोगों को पढ़ायाजाना चाहिए। ऐसे ही अलग-अलग राज्यों का जो इतिहास, भूगोल है उसे पढ़ायाजाना चाहिए। आज के पाठ्यक्रम में जो होना चाहिए वह होता ही नहीं है। इसकीबजाय जो निरर्थक होता है वह प्रमुखता से पढ़ाया जाता है। जैसे, इंग्लैंडमें संसद कैसे चलती है, हिटलर ने क्या किया… यह हमारे लिए काम की बातनहीं हैं। काम की बातें यह हैं कि हमारे देश के अच्छे-अच्छे लोगों ने क्याकिया। यह पाठ्यक्रमों में पढ़ाना चाहिए।
-एक राय यह भी है कि कुछतथाकथित शिक्षाविदों ने हमारे इतिहास को ग्लानिपूर्ण बनाने का प्रयास किया।वे हमेशा बाहर की शिक्षा, बाहर की बोली, बाहर की चीजों से आकृष्ट हुए।उन्होंने यहां के विषय में एक हीनता का भाव दर्शाया। आपको लगता है ऐसा कुछहुआ है?
स्पष्ट कहें तो प्राथमिक स्तर से लेकर उच्च स्तर तक जो भीइतिहास पढ़ाया जाता है वह पूरी तरह से झूठा लिखा हुआ लगता है। इसमें सच नके बराबर है। इसलिए क्योंकि इनके जो स्रोत हैं वह एक तो बाहरी होते हैं, उन्हें यहां की समझ नहीं होती है। आपने जिसके बारे में भी लिखा है वह भाषाभी आपको आनी ही चाहिए। पर ऐसा कम ही होता है। इसलिए हमारे यहां इतिहास गलतहै और यही पढ़ाया जाता रहा है।
-आपको कभी लगा कि इसमें भी राजनीतिक इच्छाशक्ति की कमी रही?
राजनीतिकइच्छाशक्ति की बहुत कमी है। हमारे यहां। सबसे गलत बात है कि आज तक हम एकभाषा नहीं कर सके। संस्कृत इतनी उत्कृष्ट और बड़ी भाषा थी वह भी लगभगसमाप्त होने पर आ गई है। दूसरी जो राष्ट्रभाषा चाहिए थी वह भी हम नहीं लासके। इसी कारण अंग्रेजी बढ़ रही है। यही प्रमुख विफलता है।
-संस्कृति केबारे में कुछ लोग आत्ममुग्धता की स्थिति तक जाते हैं और कुछ इसे सिरे सेखारिज करते हैं। जब आप जड़ों तक जाते हैं तो किन्हें आक्रान्ता गिनते हैं?
हमइतिहास देखें तो पाते हैं कि यहां आक्रमण होते आए हैं। ग्रीक, शक, पुर्तगाली, मुगल, अंग्रेज यह सब आक्रान्ता ही थे। और जो भी ऐसे लोग यहां आएउनका मूल्यांकन कर ही उन्हें जाना जा सकता है कि इन लोगों ने यहां क्याकिया। अधिकतर आक्रान्ताओं ने यहां आकर लोगों को बांटा और दिग्भ्रमित किया।हमारे यहां अधिक नुकसान अंग्रेजों ने किया। यहां उन्होंने जात-पात मेंबांटना शुरू कर दिया। हमारे यहां जो मुसलमान भी हुए वे पहले खुद को मुसलमाननहीं कहते थे। वह अपने को पंजाबी, खटीक, जुलाहा कहते थे। उनसे पूछा जाताथा कि आप का पंथ क्या है तो उन्हें इसके बारे में कुछ पता ही नहीं होता था।धर्म को पहले कर्म से जोड़ते थे, जैसे- यह काम पिता का नहीं है, बच्चे कानही है। अलग होने पर भी खुद को एक मानने के कारण हम अखंड रहे।
– आपातकाल के बाद संविधान में शब्द जोड़ा गया सेकुलरिज्म। इस शब्द ने कितना नुकसान किया इस देश का?
मैंसेकुलर शब्द, इसकी व्याख्या और विचार के बहुत ही खिलाफ हूं। मैं इसका मतलबही नहीं समझता। इस संस्कृति में मैं पहले से जैसा था मुझे वैसा ही रहनाचाहिए। बुद्धिजीवियों से आग्रह है कि हमें विदेशी शब्द मत ओढ़ाइए, बांटनेवाले अर्थ मत समझाइए।
-यानी, जिन्होंने यह शब्द गढ़ा, उन्होंने इसे किसी खास मंतव्य से गढ़ा?
येकम बुद्धि के लोग थे। ऐसे लोगों ने इंग्लैंड में जो शिक्षा पाई और वहां केलोगों के विषय में पढ़ा तो उन्हें लगा कि यह बड़े लोग हैं। लेकिन जोइंग्लैंड गए उन्हें यह पता ही नहीं था कि हमारे यहां कपिल, पतंजलि, पाणिनीऔर कणाद ऋषि भी हुए हैं। जिस मैकाले की बात वे करते हैं उसे खुद उसके हीदेश में पागल तक कहा गया। भारत में ऐसी गलत शिक्षा लाने का काम ईस्ट इंडियाकंपनी का रहा और उसने यहां शिक्षा में जो चाहा वह भरा। जबकि हमारे यहांसभी विषयों की शिक्षाओं का उच्च से उच्च भंडार है।
– आपने कहा किपीछे जाएं तो भारतीय ज्ञान का खजाना खुलता है। पिछले दिनों दिल्ली मेंविश्व वेद सम्मेलन हुआ जहां यह बात हुई भी। किन्तु मीडिया के एक हिस्से मेंइस कार्यक्रम की खिल्ली उड़ायी गई?
मैं ऐसे मीडिया द्वारा परोसी गईचीजों को पढ़ता ही नहीं हूं, यही उनको मेरा जवाब है। मैंने कहा कि अंग्रेजीमाध्यम के विद्यालय बंद करने चाहिएं तो कुछ ने कहा कि ये अंग्रेजी कोहटाना चाहते हैं। पर मैंने ऐसा नहीं कहा। हमने कहा कि माध्यम मातृभाषा हीहो। लेकिन जानबूझकर यह मीडिया उन चीजों को बढ़ाता है क्योंकि उनके लिएअंग्रेजी ही पेट भरने का साधन है।
-हाल में नागपुर में हुई रा.स्व.संघकी अखिल भारतीय प्रतिनिधि सभा ने प्रस्ताव पारित किया है कि प्राथमिकशिक्षा मातृ भाषा में हो। आपका क्या कहना है?
यह बहुत ही अच्छी और आनन्दकी बात है। मैं रा.स्व. संघ के इस प्रस्ताव का पूरा समर्थन करता हूं। संभवहुआ तो मैं इसका प्रचार भी करूंगा, जबकि यह मेरा काम नहीं है। इस प्रस्तावको सभी जगह लागू करना चाहिए। इससे जो नई पीढ़ी आ रही है उसका दिमाग अच्छाहोगा क्योंकि इससे देश की व्यवस्था बचेगी।
-आपकी राय में इस देश को एकसूत्र में बांधने वाली बात क्या है? आपने अपनी पुस्तक का शीर्षक हिन्दू ही क्यों सोचा?
हमारीहिन्दू संस्कृति ही सबको एक रख सकती है। क्योंकि यही एक संस्कृति है जोसर्वसमावेशक है और किसी में भेद नहीं करती जो भी संस्कृति यहां है उसे मैंहिन्दू समझता हूं। यहां सब लोग हिन्दू ही हैं। मुसलमान भी खुद को हिन्दूसमझते हैं। अकबर, औरंगजेब आदि भी अपने को हिन्दू ही समझते थे।हिन्दू-मुसलमान के बीच जो खाई आयी उसके सूत्रधार अंग्रेज हैं।
-विश्व में एक नई खिलाफत की स्थापना, आईएसआईएस का बढ़ता प्रभाव इन सब को आप कैसे देखते हैं?
जिनलोगों ने उन्हें पाला है उन्हें खामियाजा भुगतना होगा। मैं नहीं समझता कियह वैश्विक समस्या है। हमारे यहां इस तरीके की हिंसा की जगह नहीं है। अगरइस प्रकार का कुछ होता है तो हमारे यहां प्रतिकार भी होता है। हां यह अलगबात है हम ही उनके आने का वातावरण तैयार करें तो फिर अलग बात है। यहांअच्छी चीजें ज्यादा हैं इसलिए यहां गलत चीजें नहीं बढ़ेंगी।
– आज भूमण्डलीकरण की बात होती है, आप देशीकरण की बात करते हैं। लोग कहेंगे कि क्या पुराने जमाने की बात कर रहे हैं?
जितनाभी भूमण्डलीकरण हो जाए उसमें भी आपका एक गांव का बाजार, दुकान रहेगा। यहीहमारे लिए बहुत होगा क्योंकि हम बाहरी दुकानों का क्या करेंगे? अपनासंभालना और आगे बढ़ाना जरूरी है। साहित्य का भी देशीकरण हो। हम दूसरीशताब्दी से ही नॉवेल लिख रहे हैं। हम लोगों की स्मृतियां सदियों से लिख रहेहैं। लेकिन दु:ख इस बात का है कि फ्रांस, जर्मनी में अच्छी नॉवेल आई, अमरीका में आई और भी अन्य देशों मंे नॉवेल आई पर भारत में एक भी अच्छी नहींआईं। फणीश्वरनाथ रेणु, प्रेमचंद को छोड़ दें तो और इस बारे में कुछ अधिकनहीं आया।
-हिन्दी द्वारा अन्य भारतीय भाषाओं के शब्दों को अपनाने मेंसंकोच और क्लिष्ट शब्दों से चिपके रहने की शुद्धतावादी बहस को आप कैसेदेखते हैं?
इसने बड़ा नुकसान किया। स्वतंत्रता के बाद हिन्दी ही हमारीराष्ट्रभाषा होनी चाहिए थी। हमारी सभी राज्यों की भाषाएं अंदर से एक ही हैं।
-अभी अंग्रेजी के विषय में कहते हैं कि यह बाजार के हिसाब से चलतीहै। पढ़ने वाले सीमित हैं। परन्तु हिन्दी पट्टी और बाकी सब में पढ़ने कीगुंजाइश बढ़ रही है। आपको लगता है कि बाकी भाषाओं में जो विपुल साहित्य रचागया है उसको हिन्दी के जरिये मुख्य धारा में आना चाहिए?
बिल्कुल आनाचाहिए। यह बहुत ही आसान है। हिन्दी तो हर स्थान पर पढ़ी जाती है। हिन्दी तोएक तरीके से वैश्विक भाषा है और लोगों के लिए यह अजब नहीं है। हिन्दी मेंसाहित्य आए और समाज जुड़े तो यह सेकुलरिज्म से बहुत बड़ा काम हो सकता है।जो संस्कृत के बाद हमारी परंपरा खंडित हुई है उसे हिन्दी ही अखंड कर सकतीहै।
-हिन्दू संस्कृति का प्रसार अगर होता है तो क्या सेकुलरिज्म के मुकाबले यह ज्यादा फायदेमंद होगा?
हां बिलकुल यह फायदेमंद होगा और यह हमारे इतिहास और लोगों के लिए भी अच्छा होगा।

 

 

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18 अगस्त पंचांग: सिंह राशि में सूर्य, तुला में चंद्रमा; जानें ग्रह स्थिति और लग्नारंभ का समय

कार्यक्रम में पुष्कर सिंह धामी के साथ सम्मानित बुजुर्ग और अन्य वरिष्ठ जन

‘नई पीढ़ी को बताएं विभाजन की पीड़ा’

मुख्यमंत्री, योगी आदित्यनाथ

2017 के पहले सपाई हड़प लेते थे गरीबों का राशन कार्ड, अब 15 करोड़ लोगों को निरंतर निःशुल्क मिल रहा राशनः CM योगी

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