| दिंनाक: 21 Feb 2015 13:18:20 |
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.वर्ष: 9 अंक: 40 30 अप्रैल,1956
दिल्ली की सार्वजनिक सभा में नेहरू जी ने अपनी ओर से युद्ध विराम रेखा के आधार पर कश्मीर-विभाजन का प्रस्ताव करके, अभी तक की अपनी भूलों में पुन: एक और भारी भूल की वृद्धि की है। स्वतंत्र देश के प्रधानमंत्री के नाते आक्रमणकारियों के सामने इस तरह का हीनतापूर्ण आत्मसमर्पण अत्यंत अशोभनीय है उनकी यह घोषणा नीति और व्यवहार किसी भी कसौटी पर उचित प्रतीत नहीं होती। उनके द्वारा इस प्रकार का देश-भक्ति शून्य प्रस्ताव निसंदेह और खेदजनक है। लज्जास्पद भी है। कश्मीर प्रश्न एक राष्ट्रीय प्रश्न है। ऐसे प्रश्नों पर सदैव दलगत राजनीति से ऊपर उठकर विचार होना चाहिए। इस परंपरा को देश में विकसित करने का उत्तरदायित्व शासकीय दल पर अधिक है। दुर्भाग्य का विषय है कि शासकीय दल की ओर से इन परम्पराओं को विकसित करने की दिशा में योग्य पग नहीं उठाए जा रहे हैं। इतना ही नहीं, समय-समय पर विरोधी दलों के नेताओं की ओर से यदि सहयोगपूर्ण हाथ बढ़ाया भी गया तो शासन ने उसकी सदैव अवहेलना की है। विस्थापित समस्या, पंचवर्षीय योजना तथा कश्मीर का प्रश्न इस उपेक्षा के जीते जागते प्रमाण हैं। कश्मीर प्रश्न पर नेहरू जी द्वारा हुई भूलें, उनके अत्यधिक व्यक्तिवादी दृष्टिकोण की दुष्परिणाम हैं।
भारतीय जनसंघ का ऐतिहासिक जयपुर अधिवेशन
बिक्री-कर एवं कश्मीर-विभाजन का विरोध
कश्मीर विभाजन अमान्य
कश्मीर-संबंधी प्रस्ताव में, जिसे दिल्ली प्रदेश जनसंघ के प्रधान प्रो. बलराज मधोक ने पेश किया, प्रधानमंत्री श्री नेहरू से मांग की गई कि वे कश्मीर-विभाजन के प्रस्ताव को वापस लें और पाक अधिकृत भू-भाग को मुक्त करने के लिए सभी संभव उपाय अपनाएं। श्री केदार साहनी ने, जिन्हें भारत सरकार ने जम्मू जाने का परमिट देने से इंकार किया था, खुले अधिवेशन में प्रस्ताव पर बोलते हुए कहा कि परमिट-पद्धति का कोई औचित्य नहीं। उसका उपयोग जम्मू-कश्मीर में एक दल की तानाशाही स्थापित करने में किया जा रहा है। यदि कांग्रेस अध्यक्ष श्री धेबर भाई नेशनल कांफ्रेन्स का बल बढ़ाने के लिए जम्मू जा सकते हैं तो जनसंघ के कार्यकर्ताओं को वहां जाने से रोकने का क्या औचित्य है?
जनसंघ न चैन लेगा, न लेने देगा
प्रिंसिपल श्री देवप्रसाद घोष ने अपने अध्यक्षीय भाषण में भी कश्मीर-समस्या की विस्तृत चर्चा की और कहा कि जब कश्मीर का एक भाग, जो विधानत: तथा वस्तुत: भारत का अभिन्न अंग बन चुका है, आक्रमणकारी के अधिकार में है, तब तक जनसंघ न ही स्वयं चैन लेगा और न भारत सरकार को ही चैन लेने देगा। नई कार्यसमिति ने अपनी प्रथम बैठक में निश्चय किया कि संपूर्ण देश में 13 मई को 'कश्मीर दिवस' मनाकर प्रधानमंत्री नेहरू के विभाजन प्रस्ताव का तीव्र विरोध किया जाए।
एकात्मक शासन की मांग
स्वीकृत प्रस्तावों में राज्य पुनर्गठन के संबंध में भारत सरकार की अस्थिर तथा सिद्धांतविहीन नीति की आलोचना की गई और बम्बई को महाराष्ट्र में मिलाने, बिहार-बंगाल के कथित एकीकरण के प्रस्ताव को रद्द करने तथा पुनर्गठन आयोग के महापंजाब के प्रस्ताव को पूर्णतया लागू करने की मांग की गई। क्षेत्रीय परिषदों तथा क्षेत्रीय समितियों के निर्माण का विरोध करते हुए कहा गया कि उनसे देश की एकता सुदृढ़ होने के बजाए अधिक दुर्बल होगी। प्रस्ताव में एकात्मक शासन की आवश्यकता पर पुन: जोर दिया गया और राज्य पुनर्गठन विधेयक में निहित चार-मंजिलों की योजना को अनुपयुक्त और अहितकर बताया गया।
जल्दबाजी से जरूरी वैचारिक दृढ़ता : पं. दीनयाल उपाध्याय
निरंतर शीघ्रता में रहने वाले नेताओं के पास सोचने का समय नहीं होता। फलस्वरूप किसी भी प्रश्न के विविध पक्षों को शांति के साथ समझ लेने का अवकाश उनके पास नहीं होता। यह अनुभव अमरीकी लोगों का है। थोड़े अंतर से अन्य लोकतंत्रीय देशों में भी इसी प्रवृत्ति का न्यूनाधिक मात्रा में दर्शन अवश्य होता होगा।
यह प्रवृत्ति यद्यपि सुविधाजनक है, तो भी उचित निर्णय तक पहुंचने के लिए उपयोगी नहीं। कई बार ऐसा दिखाई देता है कि कुछ विचार सदैव एक ही वातावरण में और एक ही संगति में रहते हैं। फलस्वरूव उनके विचारों में दृढ़ता भले ही आती हो, एकांगिता ही अधिक होती है। साधक-बाधक विचार का उनमें अभाव भी होता है। 'कहो तो है, कहो तो नहीं' वाली प्रवृत्ति भले ही उदारता की क्यों न हो, उसमें बेपैंदापन भी होता है। यह सच है कि 'बुद्धे: फलं अनाग्रह:' किंतु इसका अर्थ आग्रह, निर्णय अथवा निश्चय का अभाव नहीं होता। नयी-नयी जानकारी प्राप्त होती है और उसके आधार पर संपूर्ण प्रश्न का पुनर्विचार करने की मानसिक तैयारी अधिक रखनी पड़ती है। किंतु आगे चलकर शायद पुनर्विचार की नौबत आ सकती है, इसलिए आज की उपलब्ध जानकारी के आधार पर निश्चित निर्णय को टालना या असहायता से टालमटोल की नीति को स्वीकारना भी बुद्धिमानी का लक्षण नहीं है। दुराग्रह न हो, पुनर्विचार के लिए तैयारी हो, किंतु प्रत्येक परिस्थिति में अनिर्णय अथवा निश्चय भी न हो। विचारों में दृढ़ता का होना आवश्यक है।
—तत्व जिज्ञासा: खण्ड 1 पृष्ठ 44