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प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने पूरी तैयारी के बाद कहा था, हमारा संकल्प है 'सबका साथ, सबका विकास'। चंद 'वैचारिक हठयोगी' भले इसका मजाक उड़ाएं, पर विश्व ने इस संकल्प की गंभीरता को समझा है। विश्व बैंक की इस बात की अब अंतरराष्ट्रीय मुद्राकोष ने भी पुष्टि की है कि भारत 2016 तक विकास दर में चीन को पछाड़कर आगे निकल जाएगा। मुद्राकोष की वैश्विक आर्थिक रपट में देश की नई सरकार के सुधारों को उम्मीद जगाने वाला मानते हुए कहा गया है कि इनका कार्यान्वयन अहम होगा। अद्भुत संयोग है कि यह खबर आने के हफ्ताभर पहले अजय विद्युत से एक लम्बी बातचीत में लेखक अमीष त्रिपाठी ने साफ कहा था, 'देखिए, जैसे हालात इस समय हैं, जो आत्मविश्वास युवाओं में दिख रहा है, उसकी बदौलत हम जल्द ही चीन से आगे निकल जाएंगे। 1991 से हमारा देश भी धीरे-धीरे प्रगति की ओर बढ़ने लगा था और इस समय ऐसा माहौल बना है कि हम लोग काफी आगे निकल आए हैं।'
अमीष मूलत: 'धरती पकड़'अंग्रेजी लेखक हैं। अपनी संस्कृति और अध्यात्म में डूबते हैं, रहना और सोचना ठेठ 'हिन्दीवाला'… और कलम चलाते हैं अंग्रेजी में। भगवान शंकर पर उनके तीन उपन्यास आए, एक के बाद एक। धार्मिक घटनाओं को मानवीय जीवन से जोड़ते हुए रोचकता, रहस्य और उत्सुकता का ऐसा तानाबाना तैयार किया कि पूरी दुनिया में धूम मचा दी। उनके दीवानों में फिल्मकार करण जौहर भी हैं और रक्षा मंत्री मनोहर पर्रीकर भी। देश, विकास और सभ्यता को लेकर अमीष की सोच, उन्हीं के शब्दों में।
ल्ल अमीष त्रिपाठी
माम लोगों से मैं यही पूछता हूं कि विकास का मतलब क्या है हमारे लिए! मैं आपको अपने घर का एक उदाहरण बताता हूं जो मुझे बहुत पसंद आया। हमारे घर में जो हमारे बच्चे को जो संभालती है उसका नाम कमल है। मराठी है। पुणे जिले के बहुत छोटे से गांव से आई है। उसके पांच बच्चे हैं। एक लड़का है, चार लड़कियां हैं। वह अकेली महिला है लेकिन उसने अपने पांचों बच्चों को पढ़ाया है। हम उसके बच्चों की पढ़ाई में मदद करते हैं। स्कूल की फीस, कापी-किताबें और हॉस्टल, जहां वे बच्चे रह रहे हैं, इन सबके लिए। मेरा मानना है कि अगर आपको समाज के लिए कुछ दान करना है तो सबसे बढि़या दान यह है कि बच्चों की पढ़ाई के ऊपर खर्चा करो। उनकी दुनिया पूरी बदल जाती है और इससे देश को भी फायदा होता है। उसकी बेटी पुणे में पढ़ रही है, वह हमारे घर आई थी दो-तीन दिन रहने के लिए। मई में उसके कुछ इंटरव्यू थे। जिस तरह से वह हमारे साथ रही मैं बता नहीं सकता हूं कि मुझे वह कितना पसंद आया। वह कृतज्ञ थी कि हम उसकी मदद कर रहे हैं, लेकिन उसमें अभूतपूर्व आत्मविश्वास था। वह हमसे बात कर रही थी कि मैं बैंक में काम करूंगी, अच्छी नौकरी करूंगी। ऐसा नहीं था कि हम बैठे हैं तो वह खड़ी रहेगी, हिचकेगी। मैं खुद भी इसे अच्छा नहीं मानता। वह सोफे पर बैठी, हमारे साथ। वह यह कतई नहीं मान रही थी कि वह सामाजिक स्तर पर किसी भी तरह से हमसे कम है। और यह अच्छी बात है। क्योंकि आत्मविश्वास सबसे पहला कदम है आगे बढ़ने का। अगर आप मानेंगे कि मैं आगे बढ़ सकता हूं, तभी आप आगे बढ़ेंगे। अब उसकी अच्छी नौकरी भी लग गई है।
ये जो मैंने आपको वाकया बताया, लोगों में यह आत्मविश्वास काफी गहरे तक जा रहा है, छोटे-छोटे गांवों तक में ऐसा है। उन सबको लग रहा है कि अच्छी नौकरी हम सबको मिल सकती है लेकिन उसके लिए काम करना पड़ेगा, पढ़ने-लिखने में मेहनत करनी पड़ेगी। अब ये जो लड़की है अच्छी अंग्रेजी बोल लेती है। पढ़ाई-लिखाई उसकी मराठी में हुई थी लेकिन पुणे में उसने अंग्रेजी सीखी। ऐसा नहीं कि वह अपनी भाषा भूल गई। मराठी वह बहुत अच्छी बोलती है। लेकिन अंग्रेजी भी सीखी क्योंकि उसे मालूम है कि नौकरी के लिए अंग्रेजी की जरूरत पड़ेगी।
यह बदलाव बहुत बड़ी बात है। मैं मानता हूं कि सही विकास तब होता है जब वह नीचे से आता है। जब हर नागरिक सोचता है कि मैं आगे बढूंगा। तभी देश आगे बढ़ता है।
अब राजा नहीं है नेता
मैं राजनीति पर कभी टिप्पणी नहीं करता। हां, लोगों और वातावरण में आए बदलाव पर जरूर बोलता हूं। अब तरीका काफी बदल गया है। सामंती या रजवाड़ों की तरह राजनीति चलाने का दौर अब नहीं रहा। ये मालिक हैं और वोट देने वाली उनकी प्रजा हैं तथा उनकी बात मानेंगे ही, ऐसा अब काफी कम देखने को मिलता है। मैं ऐसे लोगों से भी मिलता हूं जो राजनीति में हैं। वे कह रहे हैं कि अब तो जनता का पूरा व्यवहार बदल गया है। एक जमाने में लोग ऐसा मानते थे कि जो नेता लोग हैं, वे उनके माई-बाप हैं। और जनता उनसे दान मांग रही है। अब पूरा दृश्य बदल गया है। आज जनता हक मांगती है, दान नहीं मांग रही है। अब लोगों का रुख यह है कि मैं आगे बढ़ सकता हूं और आप यह बताइए कि आप मेरे आगे बढ़ने में क्या मदद कर सकते हैं। अब लोग नेता को अपना माई-बाप नहीं समझते हैं, राजा नहीं समझते हैं, अपना भागीदार समझते हैं। यह बहुत बड़ा बदलाव है। हालांकि कुछ राजनेता ऐसे भी हैं जो इस नए माहौल को अभी तक समझ नहीं पाए हैं। वे अभी भी उसी पुराने जमाने में जी रहे हैं कि हम तो राजा हैं, आपके लिए कुछ दान-पुण्य कर देंगे। आप खुश हो जाओ और हमारे पांव पकड़ो। पर अब ये जमाना जा चुका है, इतिहास की बात बन चुका है। यह बहुत अच्छी बात है और देश का आज का मिजाज भी यही है।
क्यों महत्वपूर्ण है सफलता
संजीव सान्याल की किताब है 'द इंडियन रेनेसां।' कई साल पहले निकली थी यह किताब। मैंने पढ़ी थी और मुझे बहुत पसंद आई थी। उन्होंने कहा था कि राजनैतिक तौर पर हमें स्वतंत्रता 1947 में मिली। लेकिन अगर आप मानसिक तौर से देखेंगे तो हमें स्वतंत्रता 1991 में मिली। क्योंकि सैकड़ों साल के बाद भारत एक बार फिर से सफलता का आनंद प्राप्त करने लगा। यह सफलता बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह हमारे आत्मविश्वास को बढ़ाती है।
आप देखिए कि मैं करीब चालीस साल का हूं। और मेरे मां-बाप की जो पीढ़ी है, उस पीढ़ी के ज्यादातर लोगों को अगर आप देखें, तो पाश्चात्य यानी गोरी चमड़ी वाले लोगों से अगर वे मिलते हैं तो वे दो विपरीत ध्रुवों पर चले जाते हैं। या तो वे गर्दन बिल्कुल ही झुका देते हैं या ज्यादा ही अकड़ दिखाने लगते हैं। वे जबरन नफरत पाल लेते हैं। जहां नस्लवाद नहीं है वहां भी उनको नस्लवाद दिख जाता है। ये दोनों प्रतिक्रियाएं, एकदम दब्बू बन गर्दन झुकाना या बेवजह अकड़ दिखाना, असुरक्षा की भावना की प्रतीक हैं। इससे उलट अगर आप आज की पीढ़ी को देखेंगे तो उनके अंदर आत्मविश्वास है। वे अगर पश्चिम के किसी व्यक्ति से मिलते हैं तो नितांत सामान्य होकर वैसे ही बात करते हैं जैसे किसी भारतीय से बात कर रहे हैं या किसी चीनी आदमी से बात कर रहे हैं। कोई असुरक्षा या हीनता का बोध उनके दिमाग में नहीं होता। यह आत्मविश्वास कहां से आया? 1991 के बाद हमने दुनिया में जो कामयाबी हासिल करनी शुरू की थी, ये उसी का नतीजा है।
महिलाएं पूजनीय थीं हमारे लिए… और आज?
मुझे अपनी प्राचीन सभ्यता पर बहुत गर्व है। लेकिन यह भी मानना पड़ेगा कि कुछ गलत बातें हमारे अंदर आ गई हैं। उनके बारे में भी हमें बात करनी पड़ेगी कि उनमें सुधार कैसे लाया जाए। जैसे पुराने जमाने में महिलाओं का बहुत सम्मान था, जिसे आजकल लोग भूल गए हैं। आप ऋग्वेद देखिए जिसमें 30 सुत्र ऐसे हैं जिन्हें ऋषिकाओं ने लिखा है। यानी महिला ऋषि। उस समय समाज में सबसे ऊंचा स्थान ऋषि-मुुनियों का था। महिलाएं भी ऋषि बनती थीं उस जमाने में। उन्हें ऋषिका कहते थे। और आज देखिए, हमारा समाज महिलाओं के साथ कैसा बर्ताव कर रहा है। मैं तो कहूंगा कि हम अपने पूर्वजों का तिरस्कार, अपमान कर रहे हैं ऐसे गलत काम करके। प्राचीन काल में महिलाओं का पूजनीय स्थान केवल लिखा नहीं गया है, वह था। लेकिन इंसान अपने बारे में तब सोच सकता है जब उसके पास आत्मविश्वास हो। जब कोई हीनता और असुरक्षा के भाव में जी रहा हो और आप बोलें कि यह तुम्हें अपने भीतर सुधारना पड़ेगा तो वह कोई सुनने वाला थोड़े ही है। अगर उसमें आत्मविश्वास है तो ही वह सुनने को तैयार होगा कि हां, इसे सुधारना चाहिए, यह गलत बात है।
मेरे लिहाज से तो यह बड़ा अच्छा समय चल रहा है जब हम दुनिया को अपनी सामर्थ्य और क्षमता दिखा सकते हैं। मैं बहुत रोमांचित हूं।











