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राजधानी में 16 दिसम्बर, 2012 को हुई सामूहिक बलात्कार की घटना में एक नाबालिग भी लिप्त था। उस समय नाबालिगों के खिलाफ सख्त कानून बनाने की देश भर में पुरजोर मांग की गई थी। इस घटना को दो साल पूरे होने जा रहे हैं, लेकिन राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो के आंकड़ों के मुताबिक वर्ष 2013 में नाबालिगों द्वारा छेड़छाड़ और बलात्कार के मामलों में 132 फीसद तक की वृद्धि हुई है। इससे साफ है कि देश में नाबालिगों द्वारा जारी अपराध के मामले थमने का नाम नहीं ले रहे हैं। देखने में आया है कि नाबालिग बार-बार अपराध कर रहे हैं। नाबालिग सुधार गृह से छूटने के बाद दोबारा अपराध करता है और पुलिस उसे फिर से पकड़कर सुधार गृह भेजती है, यह क्रम जारी रहता है।
गत 24 नवम्बर को हत्या के एक मामले की सुनवाई के दौरान भारत के महान्यायवादी मुकुल रोहतगी ने सर्वोच्च न्यायालय को सूचित करते हुए कहा कि केन्द्र सरकार नाबालिगों द्वारा किए जा रहे गंभीर अपराधों की वृद्धि को लेकर चिंतित है। न्यायमूर्ति दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली खंडपीठ ने सरकार से इस विषय पर फैसला करने को कहा है ताकि अपराध के स्वरूप और उम्र के बीच तालमेल हो सके। इस खंडपीठ ने गंभीर अपराधों में किशोरों को सजा नहीं देने के कारण किशोर कानून को बहुत ही उदार बताया था।
कुछ वर्ष पहले दक्षिण दिल्ली के सरोजनी नगर इलाके में भी एक ऐसे ही नाबालिग ने पुलिस को परेशान किया हुआ था जो कि 'फायर गैंग के सरगना' के रूप में जाना जाने लगा था। वह सरकारी कॉलोनियों में सेंधमारी की वारदात करता था और चोरी के बाद मकान में साक्ष्य मिटाने के इरादे से आग भी लगा देता था। पुलिस उस समय उसके अपराध को देखते हुए जल्द से जल्द उसके बालिग होने का इंतजार करती थी। पिछले दिनों दक्षिण-पूर्वी जिले में गोविंदपुरी थाना क्षेत्र के तुगलकाबाद विस्तार स्थित एक सरकारी विद्यालय में नौवीं कक्षा में पढ़ने वाले छात्र की गत 16 सितम्बर को धारदार हथियार से हमला कर हत्या कर दी गई थी। छात्र का शव विद्यालय के पीछे जंगल से बरामद किया गया था। पुलिस ने जांच के दौरान पाया कि हत्या एक नाबालिग द्वारा ही गई थी। जांच में यह भी पाया गया कि यह नाबालिग पहले भी आपराधिक वारदात में लिप्त रह चुका था। नाबालिगों को अब कानून की बारीकी से जानकारी हो चुकी है। उन्हें मालूम है कि अपराध करने पर अधिक से अधिक उन्हें बाल सुधार गृह मंे रखा जाएगा और उससे ज्यादा कुछ नहीं होगा। इसी के चलते नाबालिग कानून से आए दिन खिलवाड़ कर रहे हैं। देखने में आया है कि नाबालिगों द्वारा बार-बार गंभीर अपराध किए जा रहे हैं।
सरकार प्रस्तुत कर चुकी है विधेयक
केन्द्र सरकार ने गत 12 अगस्त को लोकसभा में किशोर न्याय विधेयक प्रस्तुत किया था। विधेयक के कारणों और उद्देश्यों में स्पष्ट किया गया था कि 16 से 18 वर्ष की आयु के नाबालिगों द्वारा अपराध के मामले लगातार बढ़ रहे हैं। राष्ट्रीय अपराध रिकार्ड ब्यूरो का हवाला देते हुए कहा गया था कि 16 दिसम्बर, 2012 को दिल्ली में हुए सामूहिक दुष्कर्म कांड के बाद नाबालिगों द्वारा महिला उत्पीड़न और बलात्कार के मामले, खासकर जघन्य अपराध तेजी से बढ़े हैं। इससे आवश्यकता महसूस की गई कि किशोर न्याय अधिनियम 2000 के तहत मौजूदा व्यवस्था और प्रावधान बाल अपराधियों से निपटने में पूरी तरह से सक्षम नहीं हैं। किशोर न्याय (बच्चों की देखरेख और संरक्षण) विधेयक 2014 को महिला एवं बाल विकास मंत्री मेनका गांधी ने प्रस्तुत किया था जिसमें 2000 में बनाए गए एक कानून को रद्द करने और बच्चों की देखरेख एवं उन्हें सुरक्षा उपलब्ध कराने, उनके पनुर्वास और किशोरों द्वारा अंजाम दिए गए अपराधों की समस्या से निपटने के साथ ही अन्य संबंधित विषयों के लिए भी प्रावधान किए गए थे। विधेयक में यह प्रावधान रखा गया है कि किशोर न्याय बोर्ड को यह अधिकार रहेगा कि वह 16 वर्ष से बड़ी आयु के नाबालिग को बाल सुधार गृह में भेजे या उसके विरुद्ध नियमित न्यायालय में मुकदमा चलाया जाए। अभी किशोर को गंभीर से गंभीर अपराध करने पर भी अधिकतम तीन वर्ष तक बाल सुधार गृह में रखने का प्रावधान है, लेकिन संशोधन के बाद गंभीर अपराध करने पर किशोर को सात वर्ष या उससे अधिक की सजा का प्रावधान रहेगा। किसी भी सूरत में जघन्य अपराध करने वाले नाबालिग को फांसी या आजीवन कारावास की सजा नहीं दी जाएगी, भले ही उसके खिलाफ बाल किशोर अधिनियम या भारतीय दंड संहिता के प्रावधानों के तहत मुकदमा चलाया जाए। -राहुल शर्मा
दंड निश्चित ही मिलना चाहिए
गंभीर अपराध करने पर नाबालिग को छोड़ा नहीं जाना चाहिए क्योंकि बार-बार अपराध करने वालों के सुधरने की संभावना नहीं रहती है। आयुसीमा का लाभ उठाकर नाबालिग अपराध करते हैं जिसका नुकसान समाज को उठाना पड़ता है। मेरा मानना है कि नाबालिग को अपराध के अनुपात में दंड मिलना चाहिए। अपराध की राह पर चलने वाले बहुत ही कम लोग होते हैं, जो कि अपना आचरण बदलते हों। यदि हम विदेशों के कानून को देखें तो वहां सख्त सजा का प्रावधान है।
-नवीन कुमार जग्गी, वरिष्ठ अधिवक्ता, सर्वोच्च न्यायालय एवं अन्तरराष्ट्रीय अध्यक्ष,बालकन जी बारी इंटरनेशनल।
नाबालिग अपराध को लेकर लगाई थी याचिका
सर्वोच्च न्यायालय में 'एडवोकेट ऑन रिकार्ड' विवेक नारायण शर्मा ने 16 दिसम्बर की घटना के बाद सर्वोच्च न्यायालय में याचिका दायर की थी, उनसे बातचीत के प्रमुख अंश प्रस्तुत हैं:
16 दिसम्बर, 2012 को दिल्ली में हुए सामूहिक बलात्कार कांड के बाद आपने सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष नाबालिगों द्वारा गंभीर अपराध करने पर कानून में सुधार के संबंध में क्या याचिका दायर की थी?
सामूहिक दुष्कर्म मामले में जब एक नाबालिग भी लिप्त मिला तो पीडि़ता के माता-पिता समेत पूरे समाज ने 'जुवनाइल जस्टिस एक्ट' के कानून में बदलाव की आवाज उठाई थी। हमने 6 जनवरी, 2013 को याचिका के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय से अनुरोध किया था कि यदि नाबालिग गंभीर अपराध करता है तो वर्तमान कानून उसके लिए पर्याप्त नहीं है क्योंकि गंभीर से गंभीर अपराध करने पर मात्र तीन साल तक उसे सुधार गृह में रखे जाने की व्यवस्था नाकाफी है। हमारा मत था कि नाबालिग यदि बार-बार अपनी आयुसीमा का लाभ उठाकर अपराध करता है तो वह भविष्य में समाज के लिए घातक सिद्ध हो सकता है। याचिका में कहा गया था कि नाबालिग से अपराधी संगठित अपराध को अंजाम दिलवा रहे हैं, जो कि समाज के लिए एक चुनौती बनता जा रहा है। ऐसे में यदि नाबालिग गंभीर अपराध करता है तो उसे ध्यान में रखते हुए कानून में परिवर्तन करना आवश्यक है।
क्या आप मानते हैं कि नाबालिग आज कानून के दांवपेंच जान चुके हैं?
इसमें दो राय नहीं हैं कि आज टीवी, मीडिया के माध्यम से नाबालिग कानून की बखूबी जानकारी रखते है। यही वजह है कि वे निर्भय होकर बार-बाकर कानून तोड़ते हैं और संगठित अपराध कराने वाले उनका बखूबी इस्तेमाल करते हैं। नये कानून के तहत जब गंभीर अपराध करने पर नाबालिग को नियमित न्यायालय की कार्रवाई का सामना करना पड़ेगा तो निश्चित ही वह बार-बार कानून तोड़ने की हिम्मत नहीं कर सकेगा। भारतीय दंड संहिता के तहत सजा मिलने का डर नाबालिग अपराध में कमी लाएगा।
कई बार नाबालिगों के जन्म की तिथि को लेकर भी विवाद उठते रहते हैं, क्या आप मानते हैं कि आयु प्रमाणपत्र में भी हेराफेरी हो सकती है?
इस विषय को भी सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष रखा गया था कि देश के विभिन्न राज्यों में आसानी से जन्मतिथि के प्रमाणपत्र तैयार करा लिए जाते हैं जिससे कि पुलिस व बाल न्यायालय उन्हीं कागजों को सही मान लेते हैं, लेकिन यदि पुलिस अपनी जांच पुख्ता तरीके से करे तो जन्मतिथि के प्रमाणपत्र की मदद लेकर बालिग-नाबालिग का चोला नहीं पहन सकेंगे।










