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मन अशांत और कड़ा है तो आप मानसिक स्तर से स्वस्थ नहीं हैं। अगर आपकी भावनाओं में रूखापन है तो आप भावनात्मक स्तर पर स्वस्थ नहीं हैं। सम्पूर्ण स्वास्थ्य की स्थिति को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को मानसिक रूप से शांत, स्थिर और भावनात्मक रूप से कोमल होना चाहिए।
श्रीश्री रविशंकर
आज अस्पतालों में कितने बिस्तर लोगों के लिए उपलब्ध हैं, यह शहरीकरण और आर्थिक उन्नति का मापदंड बन गया है जबकि इसके उल्टा होना चाहिए। स्वास्थ्य-सेवा का परम उद्देश्य होना चाहिए कि अस्पतालों की जरूरत ही न पड़े।
आजकल लोग आधा स्वास्थ्य धन कमाने में गंवा देते हैं, फिर सारा धन तन को स्वस्थ करने में लगा देते हैं। इसे हम प्रगति की निशानी कहते हैं। पुराने समय में सीटी स्कैन या एमआरआई नहीं थे, फिर भी उस समय का स्तर आज से कहीं ऊंचा था। लोग दीर्घ और स्वस्थ जीवन जीते थे और सबसे महत्वपूर्ण यह कि अधिक खुशहाल थे।
हमें शहरी स्वास्थ्य सेवा के प्रति समग्र दृष्टिकोण रखना चाहिए। सिर्फ स्वास्थ्य-सेवा की मूल सुविधाओं को उपलब्ध कराने से स्वस्थ समाज का निर्माण नहीं होगा। आज नफरत, लालच, भय की वजह से लोगों के मन में अवसाद और तनाव पैदा हो गया है। शहरी स्वास्थ्य समस्याओं का सबसे बड़ा कारण तनाव है। बड़ी चिंताजनक बात है कि आने वाले दशकों में अवसाद दुनिया की पहले नंबर की बीमारी होगी। तो स्वस्थ होना किसे कहते हैं? अगर आप अन्दर से रूखा महसूस कर रहे हैं तो स्वस्थ नहीं हैं। अगर आपका मन अशांत और कड़ा है तो आप मानसिक स्तर से स्वस्थ नहीं हैं। अगर आपकी भावनाओं में रूखापन है तो आप भावनात्मक स्तर पर स्वस्थ नहीं हैं। सम्पूर्ण स्वास्थ्य की स्थिति को प्राप्त करने के लिए व्यक्ति को मानसिक रूप से शांत, स्थिर और भावनात्मक रूप से कोमल होना चाहिए। लेकिन तेज-रफ्तार जिंदगी में यह स्थिति पाना आसान नहीं है।
हम दंत स्वास्थ्य, शारीरिक स्वास्थ्य पर तो ध्यान देते है, लेकिन मानसिक स्वच्छता के बारे में भूल गए हैं जो सबसे जरूरी है। मानसिक सेहत है- अच्छी ग्रहण शक्ति, अच्छी विश्लेषण शक्ति और अच्छी अभिव्यक्ति। हमारा मन एक डिब्बे की तरह है जिसमें हम चीजें डालते जाते हैं और इसकी स्वच्छता पर ध्यान ही नहीं देते। इस तरह हम तनाव इकठ्ठा किये जा रहे हैं और स्वास्थ्य बर्बाद कर रहे हैं।
अपने तनाव-स्तर को संभालने के दो तरीके हैं। पहला, हम अपना मानसिक और शारीरिक कार्यभार कम कर दें, पर यह नामुमकिन सा लगता है। दूसरा तरीका है कि हम अपना ऊर्जा-स्तर बढ़ा लें। प्राणायाम, ध्यान और योग जैसी मनोशारीरिक क्रियाएं हमारी ऊर्जा और प्राण-स्तर बढ़ाने में अद्भुत परिणाम दे सकती हैं।
हम योगाभ्यास से तनाव और नकारात्मक भावनाओं को निकाल बाहर कर सकते हैं। योग हमारे शारीरिक तंत्र को तनाव मुक्त रखने का आसान तरीका है। ध्यान आत्मा का आहार है। वह हमारे अंदर की संपत्ति उजागर करता है। ध्यान हठी विचार और पूर्वाग्रह के साथ रोजमर्रा की जिंदगी के तनाव भी मिटा देता है। यह निद्रा से सौ गुना अधिक स्फूर्ति देता है क्योंकि यह वर्तमान क्षण में जीने में सहायक है और भूतकाल के क्रोध और भविष्य की चिंता से मुक्त कराता है। योग, प्राणायाम और ध्यान जैसे अभ्यास सिर्फ शारीरिक ही नहीं, बल्कि मानसिक और भावनात्मक स्वास्थ्य भी देते हैं, और यही सच्ची संपत्ति है। ल्ल











