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ज्ञानेन्द्र नाथ बरतरिया
एक राज्य। एक पार्टी, जिसका उस राज्य में जनाधार का न तो कोई लंबा-चौड़ा इतिहास था, न लंबी-चौड़ी कहानी। वह राज्य भी कोई अलग-थलग सा नहीं, बल्कि देश का राजनीतिक माहौल निर्धारित करने वाला अग्रणी राज्य। तमाम मसले। मुकाबले में भावुकतापूर्ण बातें, गहरी पैठी जातिवादी राजनीति, स्वाथोंर् पर खरीदी गई निष्ठाओं का विस्तृत जाल और कदम-कदम पर धोखाधड़ी की पूरी संभावना। बात हरियाणा की है। हरियाणा के चुनाव मैदान में भारतीय जनता पार्टी पहली बार सरकार बनाने के इरादे से उतरी थी। और 1977 के जनता पार्टी के उदाहरण को छोड़ दें, तो भारत के चुनावी इतिहास का यह पहला ऐसा अवसर था, जिसमें कोई पार्टी सरकार बनाने के इरादे से पहली बार चुनाव लड़ी हो और पूरी तरह सफल रही हो। पिछले विधानसभा चुनाव में भारतीय जनता पार्टी को मात्र चार सीटें मिल सकी थीं। राज्य की राजनीति का दो दलों- कांग्रेस और इंडियन नेशनल लोकदल (इनेलो) के बीच लगभग ध्रुवीकरण हो चुका था। यही ध्रुवीकरण इन दोनों दलों के लिए अभिशाप भी साबित हुआ।
पहले एक कोशिश हरियाणा की राजनीति को समझने की करते हैं। जो हरियाणा पहले देश की राजनीति को बड़े पैमाने पर प्रभावित किया करता था, वही हरियाणा पिछले दस वर्ष से देश में व्याप्त भ्रष्टाचार का अग्रणी, बल्कि पथ-प्रदर्शक राज्य बना हुआ था। राबर्ट वाड्रा के जमीन सौदों-घोटालों का नुस्खा ईजाद चाहे जहां हुआ हो, उसे अमली जामा हरियाणा में ही पहनाया गया। राजनीति का अनुवाद तिकड़म हो चुका था और राजनीतिक तिकड़म का अनुवाद भ्रष्टाचार हो चुका था। ऐसा नहीं है कि महाराष्ट्र वगैरह बाकी राज्य इसमें पीछे रह गए थे, लेकिन हरियाणा निस्संदेह बहुत आगे निकल चुका था। उदाहरण कई हैं, लेकिन संक्षेप में, हरियाणा की तिकड़मछाप राजनीति का स्तर यह था कि यहां कई बार सरकार विरोधी आंदोलन, जिनमें 'पटरी उखाड़ो-स्टेशन जलाओ' कार्यक्रम भी आयोजित किए जाते थे, जो खुद सरकार के इशारे पर पैदा किए गए माने जाते थे। फिर तय पटकथा के अनुसार सेना बुलाई जाती थी और पटकथा के ही अनुरूप समझौते हो जाते थे। कोई पूछने वाला नहीं था कि पुलिस ने एक डंडा भी क्यों नहीं फटकारा। हत्या-बलात्कार, भ्रष्टाचार और दलबदल से लेकर हर अपराध के लिए दंडनीयता का पैमाना राजनीतिक सुविधा थी। हां, ईमानदारी जरूर एक गंभीर और दंडनीय अपराध थी। पराकाष्ठा यह थी कि सत्ता जनता को गाजर-मूली समझ बैठी थी। उसका विश्वास था कि चुनाव आएंगे, तो कोई और बखेड़ा खड़ा करके जीत लिए जाएंगे। लेकिन चुनाव जब हुए तो जनता ने सत्ता को ही गाजर-मूली साबित कर दिया। सत्ता की पटकथा में कहीं कोई नुक्स नहीं था। कहानी बिल्कुल अचूक रची गई थी, लेकिन कहानी सिर्फ एक जगह मात खा रही थी- उसके पास मोदी तूफान का कोई जवाब नहीं था। और मोदी तूफान सबसे पहले जिन खंभों को उखाड़ता है, वे भ्रष्टाचार के बचाव के लिए तैनात किए गए होते हैं। दूसरी कतार होती है जातिवाद के बचाव के लिए तराशे गए खंभों की, वे भी ढह गए। तीसरी कतार होती है निहित स्वाथोंर् की राजनीति की, उनका भी वही हश्र हुआ। जब भ्रष्टाचार, जातिवाद और निहित स्वाथोंर् की राजनीति के बड़े-बड़े स्तंभ ढह गए, तो सत्ता कहां तक बचती?
तूफान के बाद के इस नजारे को आप चाहे जिस भी दृष्टि से देखें, तूफान के निशान हर कदम पर मिलेंगे। सुविधानुसार आप कह सकते हैं कि यह तो दस वर्ष से चल रही सत्ता की विरोधी लहर थी। ठीक है, और ऐसा कहना बहुत सुविधाजनक भी होता है, क्योंकि इसके लिए किसी तर्क और तुक की आवश्यकता नहीं रह जाती है। सिर्फ कैलेंडर ही एक तर्क होता है। इसी तरह सुविधानुसार आप कह सकते हैं कि यह कांग्रेस में मची भगदड़ का परिणाम था। यह भी अपेक्षाकृत सुविधाजनक होता है, क्योंकि इसमें कम से कम आधा दोष पार्टी छोड़ने वालों को दिया जा सकता है। सबसे कम सुविधाजनक ढंग से इन चुनाव परिणामों को भ्रष्टाचार के आरोपों का परिणाम कहा जा सकता है। और अंतिम तर्क के रूप में कहा जा सकता है कि वह तो नई नवेली मौसमी पार्टियों की जातिवाद फैलाने और वोट काटने में असफलता के कारण कांग्रेस को हारना पड़ा। वैसे अधिकृत तौर पर कांग्रेस ने जिस तर्क का आविष्कार किया है वह मात्र दस वर्ष से चल रही सत्ता और डेरा सच्चा सौदा द्वारा भाजपा को दिए गए समर्थन का है। इनेलो के पतन की कथा थोड़ी भिन्न जरूर है, लेकिन बस थोड़ी सी।
वैसे सत्ता कई राज्यों में दस वर्ष से भी ज्यादा समय चली है और डेरा सच्चा सौदा ने लोकसभा चुनाव में किसी का साथ नहीं दिया था, जब परिणाम हरियाणा में कांग्रेस के लिए और भी नकारात्मक रहे थे। इस विधानसभा चुनाव में सावित्री जिंदल, दुष्यंत चौटाला, कैप्टन अजय यादव, गोपाल कांडा, विनोद शर्मा, अशोक अरोड़ा, और अरविंद शर्मा जैसे बड़े और स्थापित नेताओं को हार का मुंह देखना पड़ा। तिहाड़ से स्वास्थ्यगत कारणों से जमानत पर रिहा होने के बाद ओमप्रकाश चौटाला की भावनात्मक अपील का भी कोई असर नहीं हुआ। ले-देकर बात डेरा सच्चा सौदा द्वारा भाजपा को समर्थन देने पर अटकाई जा सकती है। लेकिन वास्तव में यह मात्र एक बाहरी कारण था। मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने तो ऐसे बाहरी कारणों की झड़ी लगा दी थी। अंतिम क्षणों में जाट समुदाय के लिए आरक्षण की घोषणा की गई, शहीद जवानों की विधवाओं के लिए पेंशन बढ़ाई गई, कई फैसले सुनाए गए, जो चुनाव के बाद लागू किए जाने थे, जैसे आगे की तारीखों के चेक, हालांकि खाता वह तारीख आने के ही पहले बंद हो गया। खिलाडि़यों के लिए भारी-भरकम इनामों की घोषणा की गई, इतने भारी कि उनसे खुश होकर राहुल गांधी ने हरियाणा में 'जय पहलवान' के नए नारे का आविष्कार कर डाला। अलग गुरुद्वारा प्रबंधक कमेटी बनाने का दाव खेला गया। इनमें से कोई भी दाव कुछ हासिल नहीं करा सका।
लेकिन सवाल यह नहीं है कि कांग्रेस अपनी हार को किस रूप में देखती है। सवाल इन चुनावों के अर्थ का है। वास्तव में ये चुनाव किसी क्रांति से कम नहीं थे। आप गौर से देखें, तो राजनीति के लगभग सारे परम्परागत हथकंडे इस चुनाव में ध्वस्त हुए। हरियाणा की सबसे स्थापित परम्परागत राजनीति-यानी दलबदल- भी नाकाम रही। दूसरी पार्टियों से आकर भाजपा के टिकट पर चुनाव लड़ने वाले कई बड़े नेता भी विधानसभा चुनाव में खेत रहे। जातिवाद की तो वह दुर्दशा हुई कि जातिवादी राजनीति में ही जीने वाले नेताओं और दलों को बात सुनने वाले तक नहीं मिल सके।
तमाम धनपति चुनाव हार गए। जो नेता बाहुबल और चुनावी तिकड़मों के लिए जाने जाते थे, वे न अपने चहेतों को जिता सके, न अपने भाई-बंधुओं को। जनता जाहिर तौर पर एक साफ स्लेट पर एक साफ इबारत चाहती थी। भाजपा ने किसी भी तरह के जात-पात के भेदाभेद से परे, स्वच्छ राजनीति की राह पकड़ी थी। उसने बूथ स्तर तक संगठन को चुस्त किया था, कार्यकर्ताओं ने पूरे जतन से काम किया था।
इसके साथ ही मोदी की जबरदस्त लहर थी। स्थापित परम्परागत राजनीति की निराशा के मुकाबले मोदी एक आशापुंज की तरह आए और हरियाणा ने उन पर विश्वास किया। कहानी यहां खत्म नहीं होती। परम्परागत राजनीति जवाबी वार करने के लिए उस क्षण से खार खाए बैठी है, जब मतगणना पूरी भी नहीं हुई थी। यानी उम्मीदों का, विश्वास का और उम्मीदों के पूरा होने का दबाव जरा भी कम हुआ, तो वही फसाद फिर हावी होने की चेष्टा करेगा।
दूसरी बात, जिसे रेखांकित किया जाना जरूरी है, वह यह है कि जब उम्मीदों का ज्वार लहर में बदलता है, तो उसमें अपेक्षाएं सामान्य से कहीं ज्यादा होती हैं।
भाजपा अगर परम्परागत राजनीति के जवाबी वार की जरा भी चिंता किए बिना जनापेक्षाओं की चिंता करने पर ध्यान दे, तो जाति, धन और बाहुबल की ट्रेडमार्क वाली हरियाणा की राजनीति पांच वर्ष में हमेशा के लिए दफन हो सकती है।
चारों खाने चित भ्रष्टाचार
हरियाणा और महाराष्ट्र में मुख्य विपक्षी दल लायक भी नहीं रही कांग्रेस। यह भाजपा का कांग्रेस मुक्त भारत की तरफ एक और कदम है। —अमित शाह, राष्ट्रीय अध्यक्ष, भाजपा
हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस ने क्रमश: दो और तीन बार सरकार का गठन किया है। हम आशा करते हैं कि नई सरकार अपने वादे पूरे करेगी। —सोनिया गांधी, राष्ट्रीय अध्यक्ष, कांग्रेस
यह जनादेश है। मैं इसे स्वीकार करता हूं। नई सरकार को मेरी शुभकामनाएं। उम्मीद है कि नई सरकार हरियाणा में विकास की रफ्तार को धीमा नहीं पड़ने देगी।
—भूपेन्द्र सिंह हुड्डा,
निवर्तमान मुख्यमंत्री, हरियाणा
बादली
भाजपा किसान मोर्चा के अध्यक्ष ओमप्रकाश धनखड़ ने निर्दलीय प्रत्याशी कुलदीप वत्स को हराकर यह सीट जीत ली।
एलनाबाद
अभय सिंह चौटाला ने भाजपा के पवन बेनीवाल को हराया।
महेन्द्रगढ़
प्रदेश भाजपा अध्यक्ष रामविलास शर्मा ने कांग्रेस के धन सिंह राव को हराया।
उचाना कला
इस सीट से सांसद एवं पूर्व मुख्यमंत्री ओमप्रकाश चौटाला के पौत्र दुष्यंत चौटाला भाजपा प्रत्याशी प्रेमलता से हारे।
हिसार
भाजपा के कमल गुप्ता ने पूर्व सांसद नवीन जिंदल की मां सावित्री जिंदल को हराया।
अंबाला
पूर्व केन्द्रीय मंत्री विनोद शर्मा यहां भाजपा के असीम गोयल से हारे।
रेवाड़ी
निवर्तमान मंत्री अजय सिंह यादव यहां तीसरे स्थान पर रहे, जबकि यहां से भाजपा के रणधीर कपरीवास विजयी रहे।
सांपला-किलोई
निवर्तमान मुख्यमंत्री भूपेन्द्र सिंह हुड्डा ने इनेलो के सतीश कुमार नंदलाल को हराकर अपनी सीट बचा ली।
आदमपुर
पूर्व मुख्यमंत्री भजनलाल के बेटे कुलदीप विश्नोईने इनेलो के कुलबीर सिंह बेनीवाल को हरा दिया।
राई
कांग्रेस के जय तीरथ ने तीन मतों से इनेलो के इन्द्रजीत को पटखनी दी।
हरियाणा विधानसभा चुनाव 2014
कुल सीट : 90
भाजपा 47
इनेलो 19
कांग्रेस 15
हजकां (बीएल) 02
अन्य 07











