| दिंनाक: 18 Oct 2014 12:45:35 |
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महाराष्ट्र और हरियाणा विधानसभा चुनाव की गहमागहमियों में रुचि लेने, फैसले की मुहर लगाने के बाद हम भारतीयों के लिए यह त्योहारों में डूबने का वक्त है। राजनीति में किसकी दीवाली कैसी होगी इस पर अखबारों से सोशल मीडिया तक अफसोस की लडि़यां, लांछनों के बम और उलाहनों के रॉकेट दागे जा रहे हैं। मगर पूरे माहौल में सिर्फ राजनीति को सुनना उस अस्थाई बहरेपन जैसा है जो पास ही हुए किसी बड़े धमाके की गूंज से पैदा होता है। कुछ लोगों का कुछ समय सुन्न हुए कानों को सहलाते हुए बीतेगा। धमाके पास हुए हैं। वंश और व्यक्तिपूजन में जुटी टोलियों के पास।
बहरहाल, सारी बमबारी बता रही है कि इन परिणामों से परे लोगों का ध्यान कहीं और खिंचा चला जा रहा है। पांच साल पर आने वाले चुनाव हर वर्ष आने वाले उत्सवों की चमक नहीं ले सकते। इसके उलट राजनीति अपना रंग जमाने के लिए इन मौकों का सहारा ढूंढती दिखती है। यह भारत के सामाजिक स्वभाव की रंगोली है। समाज व्यवहार की ऐसी झलक देता मौका, जब साफ दिखता है कि समाज राजनीति से ऊपर बैठा है। राजनीति को उसकी राह बतलाता अपना कद जतलाता समाज राजनीतिक गलतियों पर चिकोटी काटता है। उपेक्षा करने वालों को उनकी जगह बताता है। माफी मांगने वालों को क्षमा भी कर देता है और अंत में सब एक दूसरे के साथ खड़े दिखते हैं।… मुंह मीठा कीजिए।
अंतर्विरोधों के बाद भी साथ-साथ लड्डू-बरफी साझा करते लोगों की हर 'सेल्फी' का राजनैतिक व्याख्याओं से परे भी एक आयाम है। यह उस भारत की झलक है जो तमाम झगड़े-झंझटों के बावजूद सबको साथ लेकर संगठित शक्ति के साथ आगे बढ़ने का दम रखता है। गलती का दंड देना मगर मन में बात न रखते हुए रावण से भी ज्ञानार्जन के लिए कदम बढ़ाना इस संस्कृति का विधान है। यहां व्यक्ति और व्यवहार के अलावा मंतव्य, कर्म और ज्ञान जांचने की सामाजिक कसौटी ज्यादा अहम है। धमक उसकी होगी जिसकी मंशा साफ होगी। समाज सिर माथे उसे बैठाएगा जिसका श्रम ज्यादा गाढ़ा हो। लामबंदी उसके पीछे होगी जिसे राह का आभास हो, अड़चनों से लड़ने का साहस हो।
यहां परिवार की चमक और साधनों के अभाव में आगे बढ़ने वाले पूजे जाते हैं। श्रीराम के जीवन में और महात्मा बुद्ध के 'अप्प दीपो भव' में दीपावली और इस देश की संस्कृति की चेतना का सार छिपा है। अपने दीपक आप बनना। अतुलनीय श्रम करते हुए, कष्ट सहते हुए, स्वयं को ऐसे आलोकित करना कि 'तम' कटे और बाकियों को भी राह मिल सके। यही उदाहरण इस जमीन को स्वीकार्य है। सो, राजनीतिक समीकरणों की चकरियां चलाने के बजाय पाञ्चजन्य के दीपावली विशेषांक में हमने समाज को प्रेरणा देने वाले कुछ खास व्यक्तित्वों को सामने रखा है। ऐसे श्रम-दीप जिन्होंने मेहनत से अपनी किस्मत की कहानी लिखी और अन्य को भी राह दिखाई। अपने भीतर के राम को जगाने का यह क्षण है। मर्यादा में रहते हुए श्रम से तम काटने के संकल्प का यह पल है। यह घड़ी अपने भीतर के दीपक को बालने की है।
आइए, आज सिर्फ राजनीति तक सीमित ना रहें। प्रेरणा पुंजों के जीवन में झांकें, स्वयं को आलोकित करें और समाज को जितना हो सके प्रकाश बांटें।
दीपावली की शुभकामनाएं।