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मुजफ्फर हुसैन
आप जानते हैं कि मध्य प्रदेश की कानूनी किताबों में आज भी विदेश यात्रा का मुफ्त प्रावधान है? मध्य प्रदेश का कोई भी निवासी यदि लंदन की यात्रा करना चाहता है तो मध्यप्रदेश की सरकार उसका समस्त भार वहन करने के लिए कानूनी रूप से प्रतिबद्ध है। लेकिन 1947 के पश्चात भारत का एक भी नागरिक मिलना कठिन है जो आपको यह कह सके कि उसने इंग्लैण्ड भ्रमण सरकार के पैसों पर किया हो। अब तक तो ऐसा नहीं हुआ है लेकिन कानून का कोई निष्णात इसके लिए अदालत का दरवाजा खटखटाए तब भी उसे मध्य प्रदेश की सरकार एक पैसा देने वाली नहीं है। जब उसे यह सुविधा नहीं मिल रही है तो फिर कानून की किताब में इसके प्रावधान की आवश्यकता क्या है? लेकिन सवाल केवल मुफ्त यात्रा का ही नहीं है इसके अतिरिक्त भी देश में सैकड़ों ऐसे कानून हैं जो इस समय प्रचलित नहीं हैं। उनका तनिक भी उपयोग नहीं होता है। तब एक सामान्य व्यक्ति समझने लगता है कि यदि ऐसा है तो फिर इन कानूनों की आवश्यकता ही क्या है? पर देश अथवा राज्यों में कोई भी नया कानून बनाना कठिन और लम्बी प्रक्रिया है। नया कानून बनाना तो कठिन है ही, लेकिन शोकांतिका यह है कि उससे भी अधिक कठिन है इन अप्रासंगिक कानूनों का रद्द किया जाना। बहुत सारे ऐसे मामले हैं जिनमें कानूनों का नवीनीकरण अत्यंत आवश्यक है लेकिन हमारे विधायकों और कानून के पंडितों ने इस मामले पर कभी अपने विचार व्यक्त नहीं किए।
आजादी के बाद अनेक नए राज्यों का निर्माण हुआ उस समय सरकार और नौकरशाही सक्रिय हुए होते तो कलम के एक झटके में नए राज्य के निर्माण के साथ ही वे समाप्त हो गए होते। अब हालत बुरी है। मोदी सरकार इस पर विचार तो करने लगी है। यह पहली सरकार है जिसने इस दिशा में पहल की है। दो-तीन वषोंर् में ही इस दिशा में सुपरिणाम देखने का अवसर मिलेगा जो यह बतला सकेगा कि वह कहां खड़ा है? मध्य प्रदेश के नागरिकों को इंग्लैण्ड की मुफ्त यात्रा का कानूनी अधिकार 1878 में बने एक कानून से मिला था। यदि सड़क पर पड़े एक नोट को देखकर सरकार को सूचित नहीं किया गया तो आपको जेल का दंड भोगना पड़ सकता है। इसी प्रकार 1934 का एक कानून कहता है कि पतंग बनाने, उसको उड़ाने और उसको बेचने के लिए सरकारी स्वीकृति अनिवार्य है।
सराय अधिनियम 1887 के अनुसार लोग किसी भी होटल में पीने के पानी और शौचालय की सुविधा नि:शुल्क प्राप्त कर सकते हैं। यदि इस कानून में दम होता तो प्रात:काल रेलवे स्टेशनों से लगाकर हर किसी भी खुले स्थान पर यह अभद्र दृश्य क्यों देखने को मिलता? इसलिए जो अंग्रेजों के शासनकाल में चलने वाले कानून और व्यवस्था की मुक्तकंठ से प्रशंसा करते हैं उन्हें इस बात का भान हो जाना चाहिए कि कौवा कहीं का भी हो वह काले रंग का ही होता है। लोग मुफ्त में हम भारतीयों को बदनाम करते हैं।
जब भारत स्वतंत्र हुआ तो यह विश्वास व्यक्त किया गया कि अब समस्त पुराने और अप्रासंगिक कानूनों की होली जला दी जाएगी, लेकिन ऐसा कुछ भी नहीं हुआ। वे हमारी कानूनी पुस्तकों में अब भी अपना सर उठाए हुए हैं। गणतंत्र घोषित हो जाने के बाद हमारे देश का राजकाज हमारे देश के संविधान के अनुसार चलना स्वाभाविक है। संविधान सभा ने और कानून मंत्रालय ने स्वीकृति प्रदान की थी लेकिन औपनिवेशिक काल के ये कानून आज भी विधिशास्त्र के अंग बने हुए हैं। यह समझ से परे है। नए कानून बनाने में तो कठिनाई हो सकती है? लेकिन क्या इन पुराने कानूनों को समाप्त करने में भी कठिनाई हो सकती है? क्या लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में उन्हें पेश करने में भी क्या कठिनाई हो सकती है? लोकसभा और राज्यों की विधानसभाओं में उन्हें पेश करके इन पर मौखिक ध्वनि से सहमति लेकर एक झटके में समाप्त किए जा सकते हैं। लेकिन यह काम भी हमारे आजाद देश की संसद और विधानसभाएं नहीं कर सकी हैं। देश के हर न्यायालय में अधिवक्ता और बार एसोसिएशन होती हैं। वे जिन क्षेत्रों में काम करते हैं उनका यह दायित्व हो जाता है कि वे समय रहते इस गम्भीर मामले को उठाते। कांग्रेस सरकारों को तो यह काम करने के लिए कभी समय ही नहीं मिला लेकिन जब केन्द्र में वाजपेयी जी की सरकार आई तो संसद में इस पर विचार किया गया।
संसद तो बहुत दूर अपने विधानसभा क्षेत्रों में भी इस आवश्यक पहलू पर कभी विचार नहीं हुआ, आज भी नहीं हो रहा है। इसलिए इस देश में नया कानून बनाना और लागू करना ही कठिन नहीं है बल्कि उन पुराने खण्डहरों को ढ़हाना भी उतना ही कठिन है। पिछले दिनों यह समाचार पढ़ने को मिला कि मोदी सरकार ने सभी क्षेत्रों के बेकार पड़े कानूनों के लिए अपने मंत्रियों से आग्रह किया है कि वे इस मामले को निपटाने के लिए तेजी से कार्यवाई करें।
प्रधानमंत्री का आदेश मिलते ही सभी मंत्री इस काम में लग गए हैं यद्यपि अब तक कोई नतीजा तो सामने नहीं आया है, क्योंकि पुराने के स्थान पर नए को अपनाना जितना कठिन है उतना ही कठिन इन पुरानों से अपना पीछा छुड़ाना भी है। पता लगा है कि मोदी सरकार ने इन अप्रासंगिक कानूनों से पीछा छुड़ाने के लिए रामानुजन की अध्यक्षता में एक समिति स्थापित की है। सभी मंत्रालयों से रपट मिलने के पश्चात इस पर कार्यवाही करने का निश्चय किया है। इसमें विलम्ब होना तो निश्चित है, लेकिन सही दिशा में उठाया गया वाजपेयी सरकार का यह पहला कदम था। पाठकों को याद होगा। लम्बे समय के बाद फिर से इस बासी कड़ी में उबाल आया है। वाजपेयी सरकार ने इस सम्बध में जो पहल की थी उसके परिणामस्वरूप 415 कानून रद्द कर दिए गए थे। वाजपेयी सरकार के पश्चात नरेन्द्र मोदी की सरकार ने इस पर विचार करना प्रारम्भ कर दिया है।
कानून का मामला होने से धीमे चलो वाले सिद्धांत को अपनाना अनिवार्य है, लेकिन सरकार की इस नीयत से पता लग गया कि वह इस दिशा में जागरूक है। विधि आयोग भी इस क्षेत्र में सक्रिय हुआ है। उसका कहना है कि यह उसकी अंतरिम रपट है। किश्तों में वह अपनी रपट प्रस्तुत करता रहेगा और चरणबद्ध तरीके से इस मामले को निपटाएगा। अपनी रपट में आयोग का यह भी कहना था कि पिछले वषोंर् में पारित अनेक विनियोग कानून अपना अर्थ खो चुके हैं। क्योंकि कानून बनाने का काम समय की आवश्यकतानुसार होता है। अब यदि उन कानूनों का उपयोग नहीं हो रहा है तो विधि आयोग उससे एक झटके में जनता को राहत दिला सकता है। आवश्यकता इस बात की है कि अदालती कामकाज को भी औपनिवेशिक ढर्रे से मुक्ति दिलाने के लिए सक्रिय होना पड़ेगा।
इन कारणों से जनता पर अनेक प्रकार के करों का बोझ भी लद जाना एक स्वाभाविक बात है। इसलिए यदि इस दिशा में तेजी से प्रगति होती है तो जनता को कानून के क्षेत्र में आर्थिक बोझ से भी मुक्ति मिल सकती है। भारत में प्रशासनिक आधार पर ऐसे अनेक छिद्र हैं जिनसे महंगाई टपककर जनता तक पहुंचती है। कानून सरल हो, प्रासंगिक हो और साथ ही जनता के लिए कम व्यय का हो तभी आम जनता सुख भोग सकती है। सरकार की इस नीयत से पता लगता है कि व्यर्थ की बातों को यदि समाप्त कर दिया जाएगा तो जनता को उसका आर्थिक लाभ भी मिलेगा। कानून को जनता द्वारा पहचाना जाना अनिवार्य है जिससे महंगाई का शिकंजा कसता है। अदालतों में काले कोट ही जीवित नहीं हैं बल्कि महंगाई की भूल-भुलैया में भी गरीब को भटकना पड़ता है।
उच्च न्यायालयों के फैसले अधिकांश रूप से तो अंग्रेजी में होते हैं इसलिए बेचारा सामान्य व्यक्ति उसकी असलियत से कोसों दूर रहता है। आज हिन्दी को राष्ट्रभाषा बने वर्षों हो गए हैं लेकिन अनेक राज्यों में न तो उनकी राजभाषा को और न ही राष्ट्रभाषा को स्थान मिला है इसलिए सामान्य व्यक्ति को यह पता ही नहीं होता है कि वह कहां खड़ा है? अंग्रेजी आज भी असंख्य अधिकारियों और न्यायाधीशों के लिए सोने का अंडा देने वाली मुर्गी बनी हुई है। किसी देहाती की गाय को कोई भिन्न-भिन्न कारणों से उठाता जाए तब भी उसे यह पता नहीं चलता है कि उसे प्राप्त करने के लिए वह कहां जाए? यदि थाने में और न्यायालय में जाता है तो बेचारा गाय का मालिक असहाय हो जाता है। येन-केन प्रकारेण वहां दलाल और उन निर्दोष जानवरों को काटने वाला ही सफल हो जाता है। इसलिए कानून सरल ही नहीं होना चाहिए बल्कि वह एक आम भारतीय की समझ का भी होना चाहिए। फैसले यदि राज्य भाषा में लिखकर दिए जाएं तो उससे अंग्रेजी पढ़े-लिखे लोगों का आतंक टूटेगा।
हमारी अदालतों का सभी सम्मान करना चाहते हैं, लेकिन जब न्याय देने वाले की वह भाषा ही नहीं समझता है तो क्या किया जाए? इसलिए राष्ट्रभाषा हिन्दी के साथ राज्यों की भाषा का उपयोग होगा तो न्याय सबको समझ आने लगेगा। गरीब और गंवार देहाती भी अपने अच्छे और बुरे के भाव से परिचित होगा। न्यायाधीश महोदय राज्य भाषा से परहेज करते हैं इस कारण तमिलनाडु मदुराई खण्डपीठ के वकीलों ने कई दिन तक धरना दिया था। पाठकों को याद होगा कि चैन्नै में एक न्यायाधीश को धोती धारण किए होने के कारण एक समारोह में शामिल होने से रोक दिया गया था। इसका नतीजा यह आया कि तमिलनाडु सरकार ने एक कानून लाकर उनके परिधान सम्बंधी इस व्यवहार पर रोक लगा दी। आजादी के इतने वषोंर् के पश्चात भी एक विधेयक लाकर कुछ विशेष स्थानों पर कुछ विशेष परिधानों पर रोक लगा दी।
तमिलनाडु में सरकार, प्रशासन, अध्ययन और अदालती कामकाज में आज भी जो अंग्रेजियत का वर्चस्व है उससे मुक्ति दिलाने का प्रयत्न नहीं किया गया, कौन करेगा यह सब? इसलिए समय की मांग के अनुसार न्यायालय और न्याय की भाषा पर खुले दिल से चर्चा होकर कोई कानून बनेगा तो जनता कानून का अधिक सम्मान करेगी और भारतीय जीवन व्यवहार में लोकतंत्र और स्वदेशी रवैये का बोलबाला होगा। न्याय अच्छा वह है जो सबको एक जैसा मिले और रोग कैंसर में बदले उससे पहले आम जनता का छुटकारा हो सके। सीधे, सरल और जनता की भाषा में बनाए जाने वाले नियम और कानून अब पूरी ताकत से लागू होने चाहिए, नहीं तो कल की तरह आने वाले कल में भी यही सवाल उठेगा कि कानून का लाभ किसे? आम जनता की भाषा ही कानून की रक्षा कर सकेगी।










