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वे बरसों से बूंद-बूंद पानी के लिए संघर्ष करते आए थे, पानी की कमी को अपनी नियति मान चुके थे। महाराष्ट्र के सूखा प्रभावित 12000 गांवों में धुलिया जिले के शिरपुर तालुका के भी कई गांव शामिल थे। पर आज यहां के लोगों ने इतना पानी संचित किया है कि अगले दो बरस भी बारिश न आए तो भी खेतों को पानी की कमी नहीं होगी। यह कोई चमत्कार नहीं बल्कि उस भूगर्भशास्त्री के प्रयासों का नतीजा है जिसने जल संरक्षण के परंपरागत तरीकों का उपयोग कर एक सूखाग्रस्त क्षेत्र की तकदीर बदल दी। गांव के लोग भूगर्भशास्त्री सुरेश खानापुरकर को प्यार से पानी वाले बाबा कहते हैं। 55 गावों को जल संकट से उबारकर संघ के इस स्वयंसेवक ने सिद्ध कर दिया है कि संघ का हर कार्यकर्ता एक सेवा प्रकल्प की भांति कार्य कर सकता है।
महाराष्ट्र के बारह जिले पिछले कई बरस से जल संकट से जूझ रहे हैं। इन्हें राज्य सरकार ने सूखाग्रस्त घोषित कर दिया है। शिरपुर भी उन्हीं में से एक है। इस क्षेत्र में महज 6 से 7 मिमि वर्षा होती है जिससे खेती तो दूर रोजमर्रा की पानी की जरूरतें भी पूरी नहीं हो पातीं। अफली, पान्डे, बोरखेड़ा जैसे शिरपुर तालुका के सभी गांव पानी को लेकर खुद को असहाय महसूस करते थे। दिसंबर से जून तक महिलाओं को दूर दूर से पानी ढो-ढोकर लाना पड़ता था। इलाके से लगने वाली ताप्ती एल्युमीनियम पट्टी1990 में ही सूख गयी थी। समस्या की विकटता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि कई गांवों के कुएं पिछले बीस बरस से सूखे पड़े थे। 2007 में यदि सुरेश यहां न आते तो शायद अब भी ये गांव पानी के लिए तरस रहे होते। अंजार बंजला के किसान संतोष जाटी की मानें तो वे सब जल संकट को नियति का प्रकोप मान पूरी तरह से निराश हो चुके थे। बारिश के पानी को रोककर खुद के लिए प्रयोग किया जा सकता है इसकी उन्हें कल्पना भी न थी । भूगर्भशास्त्री होने के कारण सुरेश ये जानते थे शिरपुर की समस्या कम वर्षा की नहीं बल्कि जल स्त्रोंतांे के सही उपयोग न हो पाने की है, जिसे जलसंरक्षण से ठीक किया जा सकता है। स्थानीय विधायक अंबरीश पटेल पानी बचाने के लिए काफी समय से वाटर कन्जरवेशन प्रोजेक्ट पर कार्य कर रहे थे पर वे सब ऊंट के मुंह में जीरा साबित हो रहे थे। अक्तूबर 2007 में सुरेश जी के इस प्रोजेक्ट का जिम्मा संभालने के बाद उन्होंने वह कर दिखाया जिसकी कल्पना किसी ने नहीं की थी। इस भूगर्भशास्त्री ने बारिश का पानी रोककर उसे जमीन में सोखने की सीधी सी संकल्पना पर कार्य आरंभ किया।
यहां अरुणावती नदी पानी का मुख्य स्त्रोत है, जिसके किनारों व नालों के समीप जल संचयन का कार्य आरंभ किया गया। ़इसके लिए क्षेत्र के नालों के करीब सोलह किलोमीटर लंबे प्रवाह को चालीस व पचास फीट गहरा व चौड़ा किया गया। इन नालों में पानी रोकने के लिए छोटे छोटे लगभग 80 बांध बांधे गए हैं। इतना ही नहीं जमीन के नीचे पानी का स्तर बढ़ाने के लिए 78 कुओं को पानी से फिर से भरा गया। इसके लिए करीब 29 किलोमीटर सकरी नहरें और नालियां बनाई गई हैं। इसके अलावा कई खेतों में खेत तालाब भी खोदे गए हैं। इस महती कार्य में जो धन खर्च हुआ उसका बहुत बड़ा हिस्सा अंबरीश पटेल ने अपनी व्यक्तिगत मिल से मिल रहे लाभ की राशि से उपलब्ध कराया। जल संरक्षण के इस कार्य में गांव के लोगों ने भी खुले दिल से सहयोग दिया। सुरेश बताते हैं, स्वैछिक श्रमदान के साथ ही गांव के कई किसानों ने खुशी-खुशी अपनी जमीन से नहरें बनाने की इजाजत भी उन्हें दी। वे बताते हैं कि सिर्फ नदी व नाले गहरे करने से काम नहीं चलता, यह भी देखना पड़ता है कि वहां के पत्थर पानी सोख सकते हैं या नहीं। इसे उन्होंने 'एन्जियोप्लास्टी इन वाटर कन्जरवेशन' नाम दिया है जिसका उपयोग पूरे देश में किया जा सकता है।
इस बार शिरपुर के गांवों में 14000, हेक्येटेयर में 70 फीसदी बुवाई जुलाई में ही की जा चुकी थी जबकि शेष महाराष्ट्र में तब तक महज 20 प्रतिशत बुवाई ही की गई थी। इसका मतलब ये था कि अब तक सूखे की मार झेलते आए यहां के किसान अब खेती के लिए मानसून पर निर्भर नहीं रहे। इतना ही नहीं, बेहतर जल निकासी के बगैर न फलने वाले कपास के तीन-तीन फीट ऊंचे पौधे जुलाई में ही यहां देखे जा सकते हैं।
यह कोई चमत्कार नहीं बल्कि जल संरक्षण के परंपरागत तरीकों को अपनाकर सुनियोजित ढंग से एक पूरे तालुके को सूखे से निजात दिलाने के मानवीय प्रयासों की गाथा है, जिसने अकाल से जूझ रहे शिरपुर को नंदनवन बना दिया है। -विजयलक्ष्मी सिंह











