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विद्या एवं ज्ञान के केन्द्र के रूप में पूरे विश्वभर में विख्यात रहा नालंदा विश्वविद्यालय पुन: 800 साल बाद अपने नए शैक्षणिक सत्र के साथ 1 सितंबर, 2014 से प्रारम्भ हो गया है। इस लक्ष्य तक पहुंचने में भारत के पूर्व राष्ट्रपति डॉ. अब्दुल कलाम, नोवेल पुरस्कार विजेता अमर्त्य सेन, सिंगापुर के विदेश मंत्री जार्ज यो समेत कई देशों के विद्वत जनों की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। केन्द्र सरकार ने इस विश्वविद्यालय को 2700 करोड़ की राशि अनुदान के रूप में दी है। विश्वविद्यालय का परिसर 455 एकड़ में फैला हुआ है।
इस नए शैक्षणिक सत्र के प्रथम दिन इस विश्वविद्यालय में नामाकंन पाने वाले 15 छात्रों में से 9 उपस्थित हुए जिनमें जापान के यकीरो नाकामोरा, भूटान के नावांग, फरीदाबाद के अरुण गांधी, झारखंड के लूबना खान और रंजीत कुमार, आन्ध्र प्रदेश की ज्योतिमय कन्डूला, हरियाणा के असी अलावत,कर्नाटक के डैनियल और कोलकाता के सनाह सलाह शामिल थे। इस विश्वविद्याालय में कुल 7 विषयों को पढ़ाने की योजना है पर वर्तमान में दो विषयों-स्कूल ऑफ एन्वायरन्मेंट एंड इकोलॉजिकल स्टडीज और स्कूल ऑफ हिस्टोरिकल स्टडीज संकायों की पढ़ाई शुरू हो पाई है। विश्वविद्यालय के शैक्षणिक सत्र के प्रथम दिन 6 अध्यापकों ने योगदान दिया जिनमें दिल्ली के मिहिर देव एवं सोमनाथ बंद्योपाध्याय, कैलीफोर्निया के सैमुएल राइट,मलेशिया के यिन केर, कोलकाता के कश्यपक घनी व श्रवण मुखर्जी शामिल थे।
सातवीं शताब्दी के पूर्वार्द्ध में भारत भ्रमण करने वाले चीनी यात्री ह्वेनसांग ने इस विश्वविद्यालय की भूरि-भूरि प्रशंसा की है। नालंदा महाविहार ने, विश्वविद्यालय के रूप में पांचवीं और छठी शताब्दी में विशेष कीर्ति अर्जित कर ली थी। वास्तव में नालंदा विहार अन्तरराष्ट्रीय ख्याति प्राप्त विश्वविद्यालय था। इस विश्वविद्यालय में भारत के ही नहीं बल्कि सुदूर तिब्बत,चीन, मंगोलिया, तुर्की, कोरिया, जावा और लंका से अनेकानेक विद्यार्थी और विद्वान आते रहते थे। यद्यपि विश्वविद्यालय में सभी प्रकार की शिक्षा दी जाती थी तथापि बौद्ध धर्म की महायान शाखा का अध्ययन-अध्यापन विशेष रूप से होता था।
विश्वविद्यालय में हस्तलिखित ग्रन्थों का एक विशाल पुस्तकालय जो तीन विशाल भवनों में,जिनमें से एक नौ खंडों (मंजिलों)का था, स्थापित था। आज के किसी भी भारतीय विश्वविद्यालय को यह श्रेय प्राप्त नहीं है। इस महान केन्द्र का कब और कैसे विनाश हुआ इसका निश्चयपूर्वक ज्ञात नहीं है किन्तु ध्वंसावशेषों के अध्ययन से प्रतीत होता है कि एक भयंकर अग्निकांड इसका कारण था। ल्ल
कुछ बोलते तथ्य :-
भारतीय संसद द्वारा नालंदा विश्वविद्यालय अधिनियम पारित कर यह अस्तित्व में आया। इस विश्वविद्यालय का चेयरमैन नोवेल पुरस्कार प्राप्त अर्थशास्त्री अमर्त्य सेन को बनाया गया है। विभिन्न देशों के शिक्षाविद भी इसकी संचालन समिति के सदस्य हैं।
इसका निर्माण छठी शताब्दी में गुप्त काल में हुआ था।
विश्वविद्यालय में निम्न विषयों की पढ़ाई होगी-
ऐतिहासिक अध्ययन, पारिस्थितिकी एवं पर्यावरण अध्ययन, बौद्ध अध्ययन,भाषा, विज्ञान और साहित्य, अन्तरराष्ट्रीय संबंध और शान्ति अध्ययन,सूचना विज्ञान एवं प्रौद्योगिकी, अर्थशास्त्र एवं प्रबंधन
-2006 में पूर्व राष्ट्रपति डॉ.अब्दुल कलाम ने बिहार राज्य विधानसभा को संबोधित करते हुए इसे पुनर्जीवित करने का प्रस्ताव रखा था। राज्य सरकार ने इस कार्य को तेजी से अमल में लाते हुए भारत सरकार से परामर्श लिया और राज्य में इसके लिए भूमि अधिग्रहण की व्यवस्था की।










