शिक्षा : प्राथमिक स्कूलों में डगमगाता देश का भविष्य
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शिक्षा : प्राथमिक स्कूलों में डगमगाता देश का भविष्य

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Jul 26, 2014, 12:00 am IST
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दिंनाक: 26 Jul 2014 16:28:05

असल में प्राथमिक शिक्षा ही किसी व्यक्ति के जीवन की वह नींव होती है, जिस पर उसके संपूर्णजीवन का भविष्य तय होता है,लेकिन दुख इस बात का है कि शिक्षा का अधिकार अधिनियम-2009, 1अप्रैल,2010 से प्रभावी तौर पर लागू है और इस अधिनियम को लागू हुए चार साल हो गए,लेकिन शिक्षा को लेकर जो हमारा सपना था वो कहीं भी रूप लेता नहीं दिख रहा। हम वहीं खड़े हैं,जहां से चले थे,अगर कुछ बदला है तो वह केवल समय और यही समय आज सवाल पूछ रहा है कि आखिर शिक्षा की दुर्दशा का जिम्मेदार कौन है? चार साल होने के बाद भी प्राथमिक शिक्षा अपने हाल पर रो रही है। दरअसल हमारे समाज में प्रतिभा की समझ नहीं है। सरकार का चाहे पूर्वाग्रह कहें या फिर वोट प्रेम वह योग्य शिक्षकों की व्यवस्था ही नहीं करना चाहती। उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर का एक कारण सपा सरकार का नकल प्रेम है। वह किसी भी नौकरी में मेरिट को आधार बनाती है। इस कारण इसमें उन्हीं का चयन होता है,जिनके ज्यादा नंबर होते हैं और कम नंबर वाले राह तकते रह जाते हैं। नंबर का खेल ये है कि हाईस्कूल और इंटरमीडियट की परीक्षा में खुलेआम नकल होती है। कोई रोक-टोक नहीं। ऊपर से कॉफी चेक करने वालों को अघोषित निर्देश होते हैं कि बच्चों को फेल नहीं करना है। अब जब कॉपी में सब लिखा है तो नंबर देना तो चेक करने वाले की मजबूरी बनती है, जिस कारण नकल करने वालों के नंबर खूब आते हैं और वे ही नौकरी में हाथ मारते हैं। एक तरीके से छात्रों का यह तबका सपा का घोषित वोट बैंक भी है। अब जब ऐसे नकलची शिक्षक बनेंगे तो प्राथमिक शिक्षा का तो बुरा हाल होना तय है। उत्तर प्रदेश में प्राथमिक शिक्षा की हालत ऐसी है कि अधिकतर मध्यवर्ग के लोग अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम या मिशनरी स्कूलों में पढ़ाने का प्रयास करते दिखाई देते हैं और प्राथमिक स्कूल में झांकना तक नहीं चाहते। आखिर प्राथमिक शिक्षा की हालत क्यों खराब है? हमें समझना होगा कि देश की प्राथमिक शिक्षा का स्तर क्या है?

लड़कियों के लिए शौचालय तक नहीं ?
आंकड़े बताते हैं कि देश के 31 प्रतिशत प्राथमिक विद्यालयों में लड़कियों के लिए शौचालय की व्यवस्था नहीं है। मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बेबसाइट पर पड़े आकड़ों पर नजर डालंे तो अभी तक केवल 69 फीसदी विद्यालयों में ही शौचालय की व्यवस्था है। ग्रामीण वातावरण को देखते हुए इस समस्या के कारण अभिभावक लड़कियों को स्कूल जाने से रोक देते हैं, जिससे लड़कियों की पढ़ाई बीच में ही रुक जाती है और वे शिक्षा से वंचित हो जाती हैं। 2013 में यूनीसेफ की टीम ने उ.प्र. के सोनभद्र, चंदोली, भदोही, मिर्जापुर गाजीपुर, मऊ, बांदा सहित कई जिलों का सर्वे किया था। टीम ने इस दौरान पाया कि जहां स्कूल में कुछ स्थान पर शौचालय भी हैं तो वहां साफ-सफाई न के बराबर है,जिसके कारण बीमारी की आशंका से भी लड़कियां शौचालय प्रयोग करने से बचती हैं। ऐसी विषम परिस्थिति में लड़कियों के लिए सामंजस्य बनाना बेहद कठिन होता है।

शिक्षकों की भारी कमी
जब विद्यालयों में शिक्षक ही नहीं होंगे तो बच्चों को पढ़ायेगा कौन और कौन अभिभावक ऐसी स्थिति में अपने बच्चों का यहां दाखिला करवायेगा। गिरते शिक्षा स्तर का प्रमुख कारण शिक्षकों की कमी है। आंकडे़ चौंकाने वाले हैं,क्योंकि देश में कहीं-कहीं तो 200 बच्चों पर 1 शिक्षक ही तैनात है और कहीं-कहीं तो पूरा का पूरा विद्यालय शिक्षामित्र के सहारे ही चलता है। ज्ञात हो कि इस समय देश में 13.62 लाख प्राथमिक विद्यालय हैं। परन्तु इनमें कुल 41 लाख शिक्षक ही तैनात हैं,जबकि देश में अनुमानित 19.88 करोड़ बच्चे प्राथमिक और उच्च प्राथमिक विद्यालयों में पढ़ रहे हैं । साथ ही पूरे देश में करीब 1.5 लाख विद्याालयों में 12 लाख से भी ज्यादा पद खाली पड़े हैं। इस कारण करीब 1 करोड़ से ज्यादा बच्चे विद्याालयों से बाहर हैं। प्रतिभाशाली शिक्षकों के अभाव का ही परिणाम है कि उत्तर प्रदेश सहित कई प्रदेशांे के बच्चों के सीखने,पढ़ने व समझने के स्तर में बराबर गिरावट हो रही है। इन विद्यालयों के कक्षा छ: तक के बच्चे ठीक से जोड़-घटाना और गुणा-भाग तक नहीं कर पाते हैं। इन परिस्थितियों में समझा जा सकता है कि प्राथमिक शिक्षा की ढांचागत गुणवत्ता,शिक्षण-प्रशिक्षण तथा शिक्षा की गारन्टी जैसे लक्ष्यांे की वास्तविक दशा का हश्र क्या हो सकता है।

संचार प्रौद्योगिकी की हालत
मानव संसाधन विकास मंत्रालय की बेबसाइट पर इसे लेकर आंकड़े तो ढेर सारे पड़े हैं पर वे हकीकत से कोसों दूर हैं। प्राथमिक विद्यालयों के बच्चे इस क्रान्ति से कितने परिचित हैं इसे लेकर मन डगमगाने लगता है। केन्द्र सरकार द्वारा कुछ शहरी क्षेत्रों के विद्यालयों के लिए कम्प्यूटर आए भी हैं तो वे स्कूल में न होकर ग्राम प्रधान या फिर हेडमास्टर साहब के घर की शोभा बढ़ाते हैं और धोखे से स्कूल में पहुंच भी गए तो भाषा शिक्षक की अनुपलब्धता एवं विजली न आने के कारण धूल ही फांकते रहते हैं ।

मध्याह्न भोजन से चौपट होती पढ़ाई !
सरकार ने यह योजना इसलिए चलाई थी कि गरीब बच्चों को पोषकतत्व युक्त भोजन मिलेगा, जिससे उनके शारीरिक एवं मानसिक विकास में वृद्धि होगी। पर हकीकत में इस योजना से नुकसान ज्यादा हो रहा है। असल में सरकार बच्चों के शारीरिक एवं मानसिक विकास के लिए प्राथमिक व उच्च प्राथमिक बच्चे के लिए 100 से 150 ग्राम प्रतिदिन मीनू के अनुसार भोजन की व्यवस्था करती है, लेकिन जब पाञ्चजन्य ने इस बारे अध्यापकों से इस योजना पर राय जानी तो उन सभी का मानना है कि यह योजना पूरी तरह से दलाली और भ्रष्टाचारियों के चुंगुल में फंसी है और इससे बच्चों की पढ़ाई पूरी तरह बर्बाद हो रही है। बच्चे पढ़ने के लिए कम सिर्फ भोजन के समय खाने में ज्यादा रुचि दिखाते हैं। ज्यादातर विद्यालयों में तैनात एक दो अध्यापक पल्स पोलियो, जनगणना, चुनाव जैसे तमाम गैर शैक्षिक कार्यों में लगे रहते हैं और बाकी समय बच्चों के मध्याह्न भोजन में। खाना बनाने के लिए सरकार द्वारा बच्चों के हिसाब से कार्य करने वालों की व्यवस्था की गई है पर हकीकत में इतना सारा काम किसी एक के वश की बात नहीं। लिहाजा बच्चे भी इसमें हाथ बंटाते रहते हैं। असल में यह योजना विद्यालयों में भ्रष्टाचार का एक जरिया है। स्कूलों को मिलने वाला राशन खाद्य निगम या कोटेदार उपलब्ध कराता है। कोटेदार और प्रधानाध्यापक की इसमें सांठगांठ रहती है और पहले तो राशन में ही घोटालेबाजी होती है तथा दूसरी ओर भोजन में अन्य सामान बनाने से लेकर अन्य चीजों का पैसा ग्राम प्रधान के 'कनवर्जन कास्ट' के तहत भुगतान होता है,जो स्कूल का प्रधानाध्यापक चेक बनाकर देता है। अब यहां भी ग्राम प्रधान और प्रधानाध्यापक के बीच जमकर बंदरबांट होती है। ऐसे हालात में पढ़ाई कहीं गुम सी होती जा रही है।

पेयजल व बैठने की व्यवस्था तक नहीं
यूनीसेफ की रपट बताती है कि देश के 30 फीसदी से अधिक विद्यालयों में पेयजल की व्यवस्था ही नहीं है। साथ ही 40 से 60 फीसदी विद्यालयों में खेल के मैदान तक नहीं हैं। पिछले दिनों देश की शीर्ष अदालत के सामने केन्द्र में रही कांग्रेस सरकार खुद बता चुकी है कि देश में अब भी लगभग 1800 से अधिक स्कूल टेंट और पेड़ों के नीचे चल रहे हैं। 24 हजार विद्यालयों में पक्के भवन नहीं हैं, जो बच्चे पढ़ने के लिए आते भी हैं वे घर से 'बोरी या टाट पट्टी' लेकर आते हैं। ऐसे में समझा जा सकता है कि हमारे देश के प्राथमिक विद्यालयों का स्तर क्या है और ऐसे में किन परिस्थितियों में पढ़ाई होती होगी दिन में तारे देखने जैसा है।

निजी विद्यालयों की ओर बढ़ता मध्यवर्ग
प्राथमिक शिक्षा की गिरती साख का ही परिणाम है कि शिक्षा का निजीकरण हो रहा है। इसका परिणाम है कि ग्रामीण क्षेत्रों में जो असहाय एवं वंचित-गरीब वर्ग है वह इससे बेदखल होने को मजबूर है। जिनके पास पैसा और सभी प्रकार से समृद्ध हैं वे अपने बच्चों को अंग्रेजी माध्यम और मिशनरी स्कूलों में पढ़ा रहे हैं पर जिनके पास पैसा नहीं है उनके नौनिहाल पढ़ाई छोड़कर खेत-खलिहान में धान लगाने और पिपरमिंट लगाने में अपने पढ़ाई-लिखाई के दिनों को जाया कर रहे हैं। इसका परिणाम यह हो रहा है कि गरीब-अमीर के शैक्षणिक स्तर में गहरी विषमता उत्पन्न हो रही है। यूनेस्को की जिस रपट में कहा गया है कि दुनिया में सबसे ज्यादा वयस्क निरक्षर भारत में हैं, वह उस सच की ओर ध्यान दिलाती है, जिस पर राज्य सरकारें परदा डाले रहती हैं। इनकी शिक्षा की उदासीनता और ठोस नीति न होने से यह खाई दिनो-दिन चौड़ी होती जा रही है।

अपने समाज की सच्चाई
प्राथमिक विद्यालयों की शिक्षा की बद से बदतर हालत के लिए कुछ हदतक हमारा समाज भी जिम्मेदार है। इसे दुर्भाग्य ही कहेंगे कि देश के अधिकतर अभिभावक मौजूदा दौर को देखते हुए अपने बच्चों को तो अंग्रेजी माध्यम या फिर मिशनरी स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं,लेकिन ठीक इसके विपरीत अभिभावक स्वयं प्राथमिक स्कूल में पढ़ाना चाहते हैं। इसके पीछे कारण है, क्योंकि प्राथमिक स्कूल में पढ़ाई के अलावा और सभी कार्य होते हैं और आप दबाव वाले हैं तो घर बैठ कर सरकारी पैसों पर मौज कर सकते हैं। बच्चों को वे यहां इसलिए नहीं पढ़ाते क्योंकि यहां पढ़ाई न के बराबर होती है। ऐसे में वे अपने बच्चों को जो बनाना चाहते हैं वह इन परिस्थितियों में रहकर बना नहीं सकते। क्योंकि अंगे्रजी एवं मिशनरी स्कल में शिक्षा का जो अत्याधुनिक रूप है उसके सामने गावों की प्राथमिक शिक्षा कहीं भी नहीं टिकती।
गांव-गाव तेजी से फैलती अंग्रेजी व मिशनरी शिक्षा के सामने सरकारी प्राथमिक शिक्षा की हालत देखते ही बनती है। शिक्षा का अधिकार व मध्याह्न भोजन की योजना के बाद भी हम सही ढंग से खड़े नहीं हो पा रहे हैं। यदि हमारी विद्यालयी शिक्षा की यह दशा है तो शिक्षा के समग्र स्तर पर उत्कृष्टता की उम्मीद कैसे की जा सकती है? सरकारी विद्यालयों से मिशनरी व अंग्रेजी माध्यम के विद्यालयों में बच्चों का लगातार पलायन देश में बुनियादी सरकारी शिक्षा की दरकती दीवारों का साफ संकेत दे रही है। इस सच से इंकार नहीं किया जा सकता कि मध्याह़्न भोजन, वेशभूषा, साइकिल, पुस्तकों के लालच में कुछ प्रवेश तो बढ़ सकते हैं लेकिन हकीकत में प्राथमिक शिक्षा की दशा कुछ और ही है।

जनसरोकार से जुड़े प्राथमिक शिक्षा

प्राथमिक शिक्षा के गिरते स्तर पर राष्ट्रीय शैक्षिक अनुसंधान और प्रशिक्षण परिषद(एनसीईआरटी) के पूर्व निदेशक जे.एस.राजपूत ने पाञ्चजन्य से बात करते हुए कहा कि अनेक योजनाओं के बावजूद प्राथमिक स्कूल के बच्चों का स्तर लगातार घट रहा है। सरकारी आंकड़े यह जरूर बताते हैं कि समय-समय पर इन विद्यालयों में बच्चों की संख्या में बढ़ोतरी तो होती है, लेकिन गुणवत्ता क्या है,उसपर चुप्पी साध लेते हैं। शिक्षा का अधिकार कानून को चार साल गुजर जाने के बाद भी वह पूरी तरह से असफल रहा है। शिक्षा में फैलते भ्रष्टाचार की हालत यह है कि हरियाणा और म. प्र. के भूतपूर्व मंत्री जेल में हैं। यह हालत किसी एक प्रदेश की नहीं है,अपितु अधिकतर प्रदेशों में ऐसे लोगों का बोलबाला है। ऐसे में जब बड़े-बड़े लोग भ्रष्टाचार में संलिप्त होंगे तो छोटे अधिकारियों से क्या उम्मीद रखी जाए। मेरा मानना है कि अगर उच्च पद पर आसीन राजनेता एवं शिक्षा विभाग के अधिकारी ईमानदार हैं तो निश्चित रूप से शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार होगा और भ्रष्टाचार पर लगाम कसेगी। साथ ही अगर सरकार को प्राथमिक विद्यालयों की स्थिति सुधारनी है तो वह स्थानीय स्तर पर जनता का सहयोग ले और उन्हें बताए कि स्कूल उनका है और उन्हें ही संभालना है। सरकार द्वारा इन विद्यालयों को पर्याप्त धन मुहैया कराया जाए। प्रतिदिन निरीक्षण की व्यवस्था हो एवं शिक्षा के नाम पर लोकलुभावन योजनाओं के द्वारा छात्रों को बरगलाया न जाए।
पहले सीटैट, अब किनारा
केंद्रीय प्रशासनिक पंचाट (कैट) ने केन्द्र व दिल्ली सरकार से शिक्षक नियुक्ति में सीटैट की अनिवार्यता में छूट देने का निर्देश दिया है। इस आदेश का मतलब साफ है कि कि अब सीटैट के बगैर भी आप शिक्षक बन सकते हैं । लेकिन सवाल इस बात का है कि अभी कुछ वर्ष पूर्व सरकार ने शिक्षक बनने के लिए इस परीक्षा को आधार बनाया और इसी के चलते देश के राज्यों में अध्यापक पात्रता परीक्षा की शुरुआत हुई। राज्य सरकारें इसी परीक्षा को आधार बनाकर शिक्षकों की नियुक्त कर रहीं हैं। ऐसे में आगे चलकर राज्यों में भी टेट परीक्षा समाप्त करने की मांग उठेगी। ऐसे में इसको उत्तीर्ण करने वाले स्वयं को ठगा महसूस करेंगे और बाकी उम्मीद करेंगे।

गुरूजी को फुरसत हो तब न!

मध्याह्न भोजन कैसे बनना है,उसके लिए सब्जी लाना,गैस-तेल-लकड़ी-कंडे का इंतजाम कराना।
बच्चों की पुस्तकों को बांटना,छात्रवृत्ति के लिए खाता खुलवाना,स्कूल ड्रेस बांटना।
वोटर लिस्ट का काम,जनगणना कार्य ,पल्स पोलियो दवा पिलवाना,चुनाव डयूटी करना जैसे अनेकों कार्य।

28,635 फ२
करोड़ है वर्ष 2014-15 में सर्वशिक्षा अभियान
का बजट
30 %विद्यालयों में शौचालय नहीं हैं लड़कियों के लिए
12 लाख से ज्यादा शिक्षकों की कमी
1 करोड़ बच्चे अभी भी स्कूली शिक्षा से वंचित

-अश्वनी कुमार मिश्र

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