जहर घोलकर अमृत की आस
|
असहाय है लाचार है मजबूर है गंगा,
अब हैसियत से अपनी बहुत दूर है गंगा
कैसी रही क्या हो गई हैरान है गंगा,
शीशे में खुद को देख परेशान है गंगा
मैदान ही मैदान है,मैदान है गंगा,
कुछ ही दिनों की लगता है मेहमान है गंगा
कवि कैलास गौतम की ये पंक्तियां चुभती हैं,रुलाती हैं और आक्रोश भी उत्पन्न कराते हुए उसकी दशा को बयां करती हैं,लेकिन सच्चाई में हकीकत यही है। वह गंगा जो मनुष्य के कल्याण और उसके मोक्ष के लिए पृथ्वी पर अवतरित हुई थी वह स्वयं के उद्धार की पुकार लगा रही है। पूरे उत्तर प्रदेश में गंगा की दुर्दशा को देखा जा सकता है। भारतीय समाज के लिए गंगा मात्र एक नदी न होकर श्रद्धा, आस्था, पवित्रता, भक्ति-मुक्ति एवं एकात्मकता का प्रतीक है। गंगा के दर्शन और स्पर्श से मुक्ति की कामना का भाव भारत के जन-जन के रोम में समाहित है। यदि यह कहा जाए कि गंगा भारतीय स्ंास्कृति एवं एकता की मेरुदण्ड है तो अतिशयोक्ति नहीं होगी। दुनिया के किसी भी स्थान पर नदी के प्रति इतने बड़े समाज का इतना आत्मीय एवं पवित्रता का भाव देखने को नहीं मिलता। गंगा के साथ कुछ ऐसी बातें जुड़ी हैं जो हमारे समाज के बाह्य एवं अन्त:चेतन को युगों -युगों से स्पर्श करती रही हैं। भगीरथ के बिना भारत का अस्तित्व कल्पनातीत है क्योंकि गंगा भारत के हर पहलू को छूती है चाहे वह आध्यात्मिक हो, प्राकृतिक हो, आर्थिक, सांस्कृतिक या फिर भौतिक। यदि गंगा को हटा लें तो भारत को भारत कहना कठिन हो जायेगा। सबसे बड़ी बात ये है कि विश्व का सबसे उपजाऊ भू-भाग हमें गंगा के आशीर्वाद से ही प्राप्त है। प्रत्येक वर्ष गंगा अपने जल से इस भूभाग को तृप्त कर इसे हरा-भरा रखती है,लेकिन इतने महत्व के बाद भी गंगा आज रो रही है। उसकी एक-एक चीख ह्दय में सरकारों के प्रति आक्रोश ही नहीं व्यक्त करती बल्कि बताती है कि भारत के ही कुछ बेटों द्वारा अपनी मां के खिलाफ कितना बड़ा षड्यंत्र किया गया। इनके थोड़े से लालच ने जगत जननी को भी नहीं छोड़ा। लेकिन कहा गया है कि गंगा जितनी करुणामय है उतनी ही कठोर, क्योंकि इसको जिसने भी बांधने और रोकने की कोशिश की उसकी मंशा कभी भी पूरी नहीं हुई। स्वयं शंकर ने भी इसके अवतरण के समय इसको मस्तक पर धारण किया और इसके प्रभाव को अविरल रहने दिया। आज जिस प्रकार गंगा के साथ व्यवहार किया जा रहा है वह मनुष्य के लिए एक सुखद संकेत नहीं है। विशेषज्ञों की मानंे तो गंगा की निर्मलता पर पूरी इच्छाशक्ति के साथ काम किया जाये तो ऐसा नहीं है कि गंगा स्वव्छ नहीं हो सकती।
हरिद्वार
गंगा की दशा और दुर्दशा को समझने के लिए एक बार हरिद्वार पर भी नजर डालनी होगी,क्योंकि गंगा के प्रदूषित होने का दुष्चक्र यहीं शुरू होता है। असल में यहीं से छोटे-बड़े दर्जनों नाले गिरने का सिलसिला भी शुरू हो जाता है,जिनसे प्रतिदिन 60 एम.एल.डी. से ज्यादा गंदा पानी गंगा में प्रवाहित होता है। अकेले कानपुर को दोषी मानने वालों के लिए यह जानना बेहद जरूरी है कि गंगा में पहला बड़ा नाला उत्तरकाशी में गिरता है। उत्तरकाशी यानी भागीरथी के किनारे पड़ने वाला पहला शहर। गंगा की शहरी प्रदूषण से पहली मुलाकात यहीं होती है। बहते को बांधने की सनक ने उत्तरकाशी को बदहाल कर दिया है। जिस भागीरथी से उत्तरकाशी का अस्तित्व है वहीं पर इसको सुरंगों में डालने के अनुचित प्रयास हो रहे हैं। उत्तरकाशी में जो गंगा अपने बहाव की गति से एक कौतूहल पैदा कर देती है वही नरौरा के पास तक आते-आते डरी-सहमी सी लगने लगती है। कणप्रयाग, अलकनन्दा और पिंडर के रास्तों पर बनने वाली सुरंगों और सड़कों का सारा मलबा गंगा में गिराया जाता है। इस मलबे में शामिल बारूद से कितने जलचर नष्ट हो रहे हैं इसका अंदाजा भी नहीं लगाया जा सकता। वहीं ऋषिकेश और हरिद्वार में गंगा में हजारों लीटर गंदा पानी उड़ेल दिया जाता है। हाल ही में नासा ने कुछ चित्र जारी किये थे,जो बताते हैं कि गंगोत्री ग्लेशियर तेजी से सिकुड़ रहा है, लेकिन सवाल है कि जब गंगोत्री में पानी ही नहीं रहेगा तो टिहरी बंाध में पानी कहां से आयेगा? जिसे बनाने के लिए सरकार ने हजारों करोड़ रुपए तो फूंके ही साथ ही पता नहीं कितनी ही चीजों को मिटाकर अविरल धारा को रोक दिया। जिसका परिणाम है कि गंगा आज अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है।
कन्नौज का नाम आते ही सबसे पहले इत्र की खुशबू आने लगती है। लेकिन समय के साथ अब यह खुशबू इत्र की नहीं बल्कि बदबूदार रसायनों की रह गई है। इन रसायनों ने जहां इत्र के कारोबार पर असर डाला वहीं इसके दुष्प्रभाव से गंगा भी नहीं बच सकी है।
इत्र बनाने में अब रसायन का प्रयोग होता है जिसके बाद उसके अपशिष्ट को स्थान -स्थान पर गंगा में गिरा दिया जाता है। तो दूसरी ओर गंगा का गला घोंटने पर उतारू रामगंगा एवं काली नदी अपने साथ जहर युक्त पानी लेकर गंगा के घाव को हरा करने का काम कर देती है। कारखानों से रसायन का पानी रामगंगा में मिलने से इसका पानी काला हो गया है। वहीं काली नदी अपने नाम के अनुसार काला जहर लेकर चलती है।
गौरतलब है कि नैनीताल के उदगम स्थल से रामगंगा 650 किमी. से ज्यादा यात्रा करके जिले की सीमा को राजेपुर ब्लाक में छपरी गंाव में स्पर्श करती है। इस बीच कई औद्योगिक इकाइयों का प्रदूषित जल इसमें मिलते-मिलते इसका पानी जहर बन जाता है। वहीं काली नदी मुजफ्फरनगर की झावरी झील से निकलते हुए मेरठ,बुलन्दशहर होते हुए जिले के पखना व सराय अगहत के पास प्रवेश करती है। कुल 470 से ज्यादा किमी. का रास्ता तय करने के बाद काली नदी इतनी प्रदूषित हो जाती है कोई भी इस नदी के पास नहीं जाना चाहता। बरसात के दिनों को छोड़कर अन्य दिनों यह अपने नाम के अनुरूप ही जहर युक्त रहती है।
यहां डरी-सहमी नजर आई गंगा
शाम के चार बज रहे थे । हम उस बिठूर में थे जहां कभी रानी लक्ष्मीबाई का बचपन बीता था। रानी अक्सर बचपन में गंगा किनारे आया करती थीं और गंगा मां का आशीर्वाद लिया करती थीं। यह नाना जी एवं तांत्याटोपे जैसे महान लोगों की धरती रही हैं । बिठूर का अपना स्वयं का इतिहास है। गंंगा के छोर पर बसा यह कस्बा इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि स्वतंत्रता संग्राम की अपने साथ अनगिनत यादें लिए हुए है। साथ ही वाराणसी के बाद यहीं पर सबसे अधिक 42 घाट हैं। बिठूर से कानपुर की दूरी महज 22 किमी. है। मन हुआ कि इन घाटों को देखा जाये। हम ब्रह्मा घाट पहुंचे और देखा कि वह गंगा जो हिमालय से निकलते समय अपने साथ अथाह जल लेकर वेग से निकलती है वही गंगा यहां डरी-सहमी और लाचार है। पानी की यहां इतनी कमी है कि नाव तक चलना मुश्किल है। स्थान-स्थान पर गंगा में धार के बीच में जगह खाली पड़ी हुई है। देखने से ऐसा लगता है जैसे कोई रुका हुआ तालाब हो। इस बारे में केवट शैलेश शुक्ला से पूछा तो वे कहते हैं ' गंगा के संरक्षण की वकालत तो पता नहीं कौन-कौन करता है। पर जमीनी स्तर पर कुछ नहीं होता। इस घाट पर आए दिन कोई न कोई अधिकारी और नेता आते रहते हैं लेकिन सिर्फ दिखावे के लिए। पानी की कमी इतनी है कि इसमें नाव तक चलना मुश्किल है। जिससे कोई भी नाव की सवारी नहीं करता। इसी कारण हमें परिवार चलाने के लिए दोजून की रोटी तक के लाले हैं।'वास्तविकता में देखने में आया कि समाज ने गंगा को मैला ढोने वाला नाला समझ लिया है। वे सोचते हैं कि गंगा तो तारने के लिए ही आई है तो जो इच्छा हो उसके साथ करो वह सब सहन कर लेगी। यही हाल इस कस्बे का है यहां भी कस्बे के लोगों ने इसको नाला समझ लिया है और इसी के चलते लक्ष्मण घाट, मुदाराघाट, शुक्लाघाट, भरावर घाट के नीचे,डाक बंगले के पास,टण्डन बगीचे के पास,पुराना बिठूर,श्मसान घाट के पास,कलवारी घाट के पास खुलेआम नालों से शहर का प्रदूषित जल और मल सीधे गंगा में गिराया जाता है। खुलेआम गंगा में गिरते सीवर के नालों पर घाट पर ही रहने वाले शिवदीन कहते हैं 'ब्रह्मा घाट के मंदिर का महीने का लाखों रुपए का ठेका उठता है लेकिन इस पैसे का पांच फीसदी रु. भी इन घाटों की स्वच्छता पर खर्च नहीं किया जाता। सब कुछ बंदरबांट कर लिया जाता है।'
-वाराणसी से लौटकर अश्वनी कुमार मिश्र
इन्हे भी पढ़ें :- |
राष्ट्रीय अभियान |
महादेव की नगरी में गंगा का महा दु:ख |
जाह्नवी की जान के प्यासे कनपुरिये |











