पाञ्चजन्यके पन्नों से
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वर्ष: 8 अंक: 43 20 जून ,1955
'यह नीति एक महान एवं स्वतंत्र राष्ट्र को शोभा नहीं देती। फिर भी हमारा विश्वास है कि गोवा-स्वातंत्र्य युद्ध में ढिलाई नहीं आवेगी। जनसंघ इस विषय में अन्य संस्थाओं को पूर्ण सहयोग दे रहा है। हम स्वर्गीय डॉ.मुखर्जी के शहीद दिवस 23 जून को अपना जत्था गोवा में प्रवेश करा रहे हैं।'भारतीय जनसंघ के अघ्यक्ष पंडित डोगरा ने विगत 12 जून को दिल्ली प्रदेश जनसंघ सम्मेलन का उद्घाटन करते हुए विचार व्यक्त किये। उन्होने अपने भाषण में कहा :-
गोवा तथा अन्य पुर्तगाली बस्तियों के विषय में सरकार की नीति दुर्बल तथा अयथार्थवादी रही है। यह कहना ठीक है कि हम शक्ति प्रयोग नहीं करेंगे। किन्तु प्रश्न तो यह है कि ऐसी समस्या को सुलझाने के लिए आप क्या करेंगे,जो दिन प्रतिदिन जटिल और खतरनाक होती जा रही हो? प्रधानमंत्री श्री नेहरू की इस विलम्बपूर्ण घोषणा द्वारा,कि भारतीय सत्याग्रही अपने बन्धुओं की मान रक्षा के हेतू,गोवा जा सकते हैं स्थिति में विशेष परिवर्तन नहीं आया है। उस घोषणा का तात्पर्य केवल इतना ही है भारतीय जनता चाहे तो स्वयं जाकर पुर्तगालियों की गोली का निशाना बने पंरतु भारत सरकार इस विषय में कुछ न करेगी। इस विशाल देश की राजधानी होने के नाते दिल्ली को सौभाग्य प्राप्त है कि वह देश के विभिन्न तत्वों का प्रतिनिधित्व करती है,यहां सभी प्रदेशों के नागरिक निवास करते हैं। दिल्ली को हमारे महान राष्ट्र के भिन्न-भिन्न पंथों,सम्प्रदायों एवं भाषा का पवित्र संगम बनना चाहिए:
इस पवित्र उद्ेदश्य के लिए यह आवश्यक है कि दिल्ली को स्वार्थ एवं संकीर्ण भाषावादियों एवं प्रांतवादियों के कुचक्रों से मुक्त रखा जाय। जनसंघ का मत है कि एक देश के भुखंडों में पृथक-पृथक विधानमंडलों तथा मंत्रिमंडलों के निर्माण से ही यह भाषा सबंधी,प्रान्तीयता एवं सांप्रादायिकता की समस्यायें उठ खड़ी हुई हैं। …
लौहवरण का अन्त हो
रूस,चीन तथा तत्सम्बन्धी देशों में आजकल व्यवस्थित शासन प्रणाली के संबंध में जो विचार विकसित हो रहे हैं वे इस बात के द्योतक हैं कि विश्व की प्रमुख संघर्षपूर्ण समस्याओं का हल तब तक नहीं निकल सकता जब तक कि 'लौहवरण' का अन्त नहीं होता। चर्चिल की तीक्ष्ण दृष्टि ने इस सत्य को 1947 में ही देख लिया था तथा उसे फाल्टन के भाषण में प्रगट भी किया था। वर्तमान युग में रूसी सीमाओं के अन्तर्गत विकसित हुई कम्युनिस्ट प्रणाली की भयंकरता को श्री चर्चिल से अधिक अच्छी प्रकार से किसी ने नहीं समझ पाया है। यह सभ्यता के विरुद्ध है। यह धर्म विरोधी है। यह मत पूंजीवादियों द्वारा प्रचारित घृणात्मक प्रचार का परिणाम नहीं है क्योंकि लेखक के पास किसी भी प्रकार की पूंजी नहीं है तथा भविष्य में उसे प्राप्त होने की भी कोई आशा नहीं है। वह केवल लेखनी के सहारे अपना जीवन यापन करता है।
मार्क्स के घातक विचार
कार्ल मार्क्स का कथन है कि मानसिक स्वातन्त्र्य नाम की कोई वस्तु नहीं होती,वह तो केवल आर्थिक परिस्थितियों का प्रतिबिम्ब मात्र है जोकि व्यक्ति के चारों ओर व्याप्त भौतिक वातावरण का एक बहुत बड़ा भाग होता है। अंतिम समय में उसने विचार व्यक्त किए कि राजनीति में 'उदार परंपराओं के स्वातंत्र्य' का कोई स्थान नहीं, वह केवल सामंतवादी सनक है।











