मार्क्सवाद का मुखौटा है नेहरूवाद
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2014 के चुनाव परिणामों से वामपंथी खेमे में भगदड़ मची है। अब तक वे स्वयं को भारत का बौद्धिक नेता मानते थे। मार्क्सवादी शब्दावली ही भारत के मीडिया और बौद्धिक विमर्श पर छायी हुई थी। हिन्दुत्व और भारतीय संस्कृति की बात करना प्रतिगामी, प्रतिक्रियावादी व रुढि़वादिता माना जाने लगा था। भारतीय संस्कृति के गौरवगान को राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जोड़ दिया गया था। संघ माने 'फासिस्ट', मुस्लिम विरोधी, मस्तिष्क शून्य सेना, इसलिए संघ को अछूत मान लिया गया। किसी भी बौद्धिक, सामाजिक, राजनैतिक गतिविधि का रिश्ता संघ से जुड़ते ही वह 'अछूत' और त्याज्य बन गया।
इस हिन्दू विरोधी, संघ विरोधी मानसिकता का बीजारोपण स्वतंत्रता के आगमन के समय ही हो चुका था और इस बीजारोपण का श्रेय जाता है पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू को। भारत की स्वतंत्रता के इतिहास की यह सबसे बड़ी विडम्बना है कि जिन हिन्दू भावनाओं का जीवंत प्रतीक बनकर गांधी जी ने भारत को स्वतंत्रता के प्रवेश द्वार तक पहुंचाया था उन्हीं गांधी जी ने 1946 में 18 में से13 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों द्वारा चयनित सरदार पटेल को कांग्रेस के अध्यक्ष पद से वंचित करके जिस नेहरू का नाम एक भी प्रांतीय कांग्रेस कमेटी ने प्रस्तावित नहीं किया था उन नेहरू को कांग्रेस का अध्यक्ष पद सौंप कर उनके लिए प्रधानमंत्री पद पाने का मार्ग प्रशस्त कर दिया था। राष्ट्रभक्त सरदार ने गांधी जी की इच्छा का आदर करते हुए सहर्ष कांग्रेस अध्यक्ष पद अर्थात स्वाधीन भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पद को नेहरू के लिए त्याग दिया था।
गांधी जी के प्रति सरदार का समर्पण पूर्ण था, पर नेहरू ने गांधी जी को केवल सत्ता प्राप्ति की सीढ़ी के रूप में देखा। नेहरू ने बार-बार लिखा कि 'गांधी जी की आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक व्यवस्था मुझे कतई स्वीकार्य नहीं है किंतु मेरे अपने सपनों का भारत बनाने के लिए मुझे पहले सत्ता प्राप्त करना होगी, सत्ता मुझे तभी मिल सकती है जब भारत स्वतंत्र हो, भारत को स्वतंत्र कराने के लिए जिस प्रबल जनांदोलन की आवश्यकता है उसमें योगदान करने की प्रेरणा जनता में जगाने का सामर्थ्य केवल गांधी जी के पास है। इसलिए मुझे गांधी जी के नेतृत्व को स्वीकार करना होगा।' नेहरू जी एक ओर गांधी के प्रति वफादारी का स्वांग रचते रहे, दूसरी ओर कांग्रेस के साथ भीतर व बाहर गांधी के सभी आलोचकों के अपने व्यक्तिगत रिश्ते भी तैयार करते रहे। समाजवादी और कम्युनिस्ट नेहरू को गांधी के विरुद्ध बगावत करने के लिए उकसाते रहे पर यथार्थवादी नेहरू ने गांधी के विरुद्ध खुले विद्रोह का खतरा कभी मोल नहीं लिया। 1939 में सुभाष बाबू ने नेहरू से एक पत्र में साफ-साफ पूछा कि तुम गांधीवाद का विरोध करते हो किंतु जब गांधीवाद से टकराव का अवसर आता है तो तुम पीछे हट जाते हो, ऐसा क्यों? नेहरू ने उत्तर दिया कि मैं समझता हूं कि अभी हम गांधीवाद से टक्कर लेने की स्थिति में नहीं हैं। इसीलिए मैं खुले टकराव से बचता हूं। एक जगह उन्होंने लिखा है कि मेरे समाजवादी और वामपंथी मित्र मुझे गांधी को खुली चुनौती देने के लिए उकसाते रहते हैं पर मैं जानता हूं कि हम सब वामपंथी मिलकर भी भारत की जनता को स्वतंत्रता आंदोलन में सर्वस्व की आहुति देने की प्रेरणा नहीं दे पाते जबकि गांधी जी अकेले यह कर सकते हैं।
एक जगह नेहरू ने प्रश्न उठाया कि गांधी में ऐसा क्या है कि वे ही भारतीय समाज को स्पंदित व प्रेरित कर पाते हैं? वे न अच्छे वक्ता हैं, न उनका व्यक्तित्व प्रभावशाली है, न उनके पास सत्ता है, न वैभव है, वे बौद्धिक उड़ानें भी नहीं भरते पर फिर भी उनमें ऐसा क्या है कि उनके आह्वान पर भारत का आम आदमी खड़ा हो जाता है, आजादी के लिए संघर्ष और त्याग के रास्ते पर बढ़ जाता है? नेहरू यह समझ चुके थे कि सत्ता पाने तक उन्हें गांधी जी के पीछे चलना ही होगा। अपने अंतर्द्वंद्व को शब्द रूप देते हुए नेहरू ने जगह-जगह लिखा कि मेरा मस्तिष्क गांधी के विरुद्ध विद्रोह करता है किंतु मेरा दिल उनके पीछे चलने के लिए मजबूर करता है।
नेहरू पर मास्को का प्रभाव
गांधी-नेहरू मतभेदों का आरंभ 1927 में कांग्रेस के मद्रास अधिवेशन में ही हो गया था। नेहरू को सोवियत रूस के किसी मंच ने ब्रुसेल्स में आयोजित एक वामपंथी सम्मेलन में भाग लेने के लिए बुलाया था। वहां से सोवियत कम्युनिस्ट पार्टी ने उनके तथाकथित रूसी क्रांति के वर्षगांठ समारोह के अवसर पर मास्को आने की व्यवस्था की। नेहरू समारोह समाप्त होने के बाद वहां पहुंच पाये और केवल चार दिन मास्को में रहे। पर इन चार दिनों में ही रूसी कम्युनिस्ट पार्टी ने उन पर ऐसा जादू किया कि वह मार्क्सवादी विचारधारा में रंगकर भारत वापस लौटे, सीधे मद्रास अधिवेशन में पहुंचे और वहां उन्होंने ताजी-ताजी खायी मार्क्सवादी शब्दावली का वमन कर डाला। गांधी जी को नेहरू के इस त्वरित वैचारिक परिवर्तन से बहुत चोट लगी। गांधी जी ने 17 जनवरी, 1928 को नेहरू को पत्र लिखा कि, 'तुम्हारे और मेरे विचारों में इतना अंतर है, इसकी मुझे कल्पना नहीं थी। मुझे लगता है कि तुम्हें अपने विचारों को दबाना नहीं चाहिए और यदि तुम्हें मुझसे कोई स्वतंत्रता चाहिए तो मैं तुम्हें मेरे प्रति पूर्ण समर्पण एवं निष्ठा से आजाद करता हूं। तुम्हें अपने विचारों को लेकर मेरे विरुद्ध खुला युद्ध छेड़ देना चाहिए। तुम्हारे और मेरे बीच वैचारिक दूरी इतनी अधिक है कि उसमें कोई मिलनबिन्दु मुझे दिखायी नहीं देता। तुम्हारे जैसे बहादुर और वफादार कामरेड को खोने का मुझे दुख तो होगा। किंतु अपने जीवन लक्ष्य पर बढ़ने के लिए ऐसी कामरेडशिप का बलिदान करना पड़ता है।… इसके लिए मैं तुम्हें एक सम्मानजनक रास्ता सुझाता हूं। तुम अपने वैचारिक मतभेदों का उल्लेख करते हुए मुझे एक पत्र लिखो। मैं उसे यंग इंडिया में अपने संक्षिप्त उत्तर के साथ छाप दूंगा। इस प्रकार तुम मेरे विरुद्ध विद्रोह की पताका फहरा सकोगे।'
गांधी जी के इस पत्र को पाकर नेहरू सन्न रह गये। गांधी के विरुद्ध बगावत का झंडा फहराने का अर्थ होता राजनीतिक आत्महत्या अत: नेहरू ने अपने कदम पीछे खींच लिये। उसी समय उनके पिता मोतीलाल नेहरू ने गांधी जी को पत्र लिखा कि क्यों न अगले वर्ष के लिए युवा जवाहरलाल को कांग्रेस अध्यक्ष बनाया जाए। गांधी जी को उनका यह सुझाव रुचा, इसका कारण यह हो सकता है कि पिछले कलकत्ता अधिवेशन में सुभाष बाबू ने उनके सामने गंभीर चुनौती प्रस्तुत कर दी थी। गांधी जी ने प्रस्ताव रखा कि औपनिवेशिक स्वराज्य की मांग करने वाली मोतीलाल नेहरू रिपोर्ट को अधिवेशन ज्यों का त्यों स्वीकार कर ले। सुभाष बाबू ने संशोधन प्रस्तुत किया कि कांग्रेस अपना लक्ष्य औपनिवेशिक के बजाए पूर्ण स्वराज्य घोषित करे। सुभाष का यह संशोधन गांधी जी के प्रभावशाली विरोध के बावजूद बहुत थोड़े अंतर से परास्त हुआ। किंतु उसमें निहित संदेश बहुत स्पष्ट था। पूर्ण स्वराज्य के प्रश्न पर तब तक जवाहर लाल, सुभाष के समर्थक थे। अगले अधिवेशन का अध्यक्ष पद देकर उन्हें सुभाष से अलग किया जा सकता था। मोतीलाल नेहरू का पत्र कांग्रेस में वंशवाद का आरंभ-बिन्दु था।
सुभाष स्वराज्य और अहिंसा के प्रश्न पर गांधी जी से भिन्न मत रखते हैं, किंतु उनका जीवन दर्शन और संस्कार भारतीय संस्कृति में पूर्णतया रच-पगे थे। उन्हें सत्ता का तनिक मोह नहीं था। वे संन्यस्तवृत्ति के थे, अत: वे गांधी जी की विचारधारा के अधिक निकट थे, किंतु वे स्वतंत्रचेता नि:स्पृह व्यक्ति थे। इसका परिचय कुछ महीनों बाद मिला। गांधी जी ने कलकत्ता अधिवेशन में ब्रिटिश सरकार को अल्टीमेटम दिया था कि यदि एक वर्ष में औपनिवेशिक स्वराज्य की घोषणा नहीं हुई तो कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य का लक्ष्य अपना लेगी। अल्टीमेटम की अवधि पूर्ण होते देख वायसराय इर्विन भागे-भागे इंग्लैंड गये और वहां से एक घोषणा पत्र लेकर लौटे जिसमें बहुत गोलमोल भाषा में औपनिवेशिक स्वराज्य देने का आश्वासन था। इस घोषणा पत्र का स्वागत करने के लिए मोतीलाल नेहरू ने दिल्ली में कांग्रेसी व नरम दलीय नेताओं की एक बैठक बुलायी और वायसराय की घोषणा का स्वागत करने के लिए एक संयुक्त वक्तव्य तैयार किया जिस पर गांधी जी सहित सब नेताओं ने हस्ताक्षर कर दिये, केवल सुभाष बोस और जवाहर लाल नेहरू ने हस्ताक्षर नहीं किये। सुभाष बाबू तो दबाव से बचने के लिए तुरंत कलकक्ता वापस चले गये पर गांधी जी जवाहरलाल के हस्ताक्षर पाने में सफल हो गये। इसके लिए गांधी जी ने एक ही युक्ति का सहारा लिया। उन्होंने जवाहरलाल को कहा कि कांग्रेस के अन्य सभी नेताओं के हस्ताक्षर जिस वक्तव्य पर हों उस पर कांग्रेस का भावी अध्यक्ष हस्ताक्षर न करे इसका अर्थ होगा कि उसका उन नेताओं पर विश्वास नहीं है। ऐसी स्थिति में क्या उसका अध्यक्ष पद लेना उचित होगा? नेहरू के सामने संकट था कि या तो वे हस्ताक्षर करें या अध्यक्ष पद का त्याग करें। उन्होंने हस्ताक्षर करके अपना अध्यक्ष पद बचा लिया। इस प्रकार वे लाहौर अधिवेशन के अध्यक्ष ब्
ाने, जहां कांग्रेस ने पूर्ण स्वराज्य के लक्ष्य की घोषणा की। किंतु नेहरू की कार्यसमिति में सुभाष का नाम नहीं रखा गया।
नेहरू ने चार दिन मास्को में रहकर मार्क्सवाद की विचारधारा को पूरी तरह हृदयंगम कर लिया था, इस पर वे अंत तक डटे रहे। जबकि गांधी जी को यह विचारधारा स्वीकार्य नहीं थी। गांधी जी की छत्रछाया को बनाये रखने के लिए नेहरू ने चापलूसी की भाषा का सहारा लिया। समाजवादी नेता स्व. मधु लिमये ने 'महात्मा गांधी एवं जवाहरलाल नेहरू' शीर्षक से चार खंडों में एक शोध ग्रंथ प्रकाशित किया जिसमें उन्होंने अनेक स्थलों पर गांधी के प्रति नेहरू की दोगली नीति के प्रमाण दिये हैं। नेहरू अपनी जेल डायरी में गांधी और कांग्रेस के अन्य वरिष्ठ नेताओं के प्रति जिस आलोचनात्मक भाषा का प्रयोग करते हैं, बाहरी पत्र व्यवहार में उससे बिल्कुल उलट भाषा लिखते हैं। गांधी जी के प्रति उनकी चापलूस भरी भाषा के जो उदाहरण मधु लिमये की पुस्तक में मिलते हैं वे बहुत हास्यास्पद हैं।
एक के बाद एक प्रमाण
नेहरू इस अभिनय कला में बहुत पारंगत थे। 1937 में लखनऊ अधिवेशन में उनकी अध्यक्षीय शोभायात्रा का वर्णन करते हुए उन्होंने कलकत्ता के प्रसिद्ध अंग्रेजी मासिक 'माडर्न रिव्यू' में चाणक्य (छद्म नाम) नाम से एक लेख लिखा जिसमें उन्होंने अपनी बदलती अभिनय मुद्राओं का सजीव चित्रण किया है और इन बनावटी मुद्राओं का जनता पर जो असर हो रहा था वह भी बताया है। अत: नेहरूवाद को समझने के लिए नेहरू का मूल स्वभाव, संस्कारगत प्रवृत्तियों और विचारधारा को जानना आवश्यक है।
स्व. सीताराम गोयल नामक मनीषी ने 1961 में अंग्रेजी साप्ताहिक आर्गेनाइजर में एक लेखमाला 'इन डिफेंस आफ कृष्णामेनन' शीर्षक से आरंभ की थी जो 1963 में इसी शीर्षक के साथ पुस्तक रूप में प्रकाशित हुई। 1993 में उस पुस्तक का दूसरा संस्करण, 'जेनेसिस एंड ग्रोथ ऑफ नेहरूइज्म' शीर्षक से प्रकाशित हुआ। इस पुस्तक में उन्होंने नेहरू के अपने लेखन के आधार पर सिद्ध किया है कि मास्को यात्रा के बाद नेहरू पूरी तरह मार्क्सवादी हो गये थे। 1929 में उन्होंने सोवियत रूस प्रकाशित की, 1934 में ग्लिमसेेज ऑफ वर्ल्ड हिस्ट्री (विश्व इतिहास की झलक), 1936 में एन आटो बायोग्राफी (एक आत्मकथा), 1941 में यूनिटी ऑफ इंडिया (भारत की एकता) तथा 1946 में डिस्कवरी ऑफ इंडिया (भारत की खोज) प्रकाशित की। इन सभी पुस्तकों में से उद्धरण देकर सीताराम जी ने बताया है कि नेहरू स्वयं को मार्क्सवाद का कट्टर अनुयायी मानते थे। सीताराम जी के कथन की पुष्टि कम्युनिस्ट नेता स्व. पी.सी.जोशी ने भी की है। कामरेड जोशी लिखते हैं कि नेहरू पर कामरेड रजनी पामे दत्त का गहरा प्रभाव था और उनके 1937 के अध्यक्षीय भाषण के लेख में रजनी पामे दत्त की बड़ी भूमिका थी।
मार्क्सवाद के प्रति यह अंध भक्ति हिन्दू एवं भारतीय संस्कृति विरोध के रूप में प्रगट हुई। वैसे भी नेहरू ने कभी कहा था कि वे जन्म से हिन्दू हैं, सभ्यता से मुस्लिम हैं और बौद्धिक संस्कारों व जीवनशैली से यूरोपीय हैं। उन्होंने यह भी माना था कि वे स्वयं को भारत में एक अजनबी पाते हैं और अजनबी की तरह ही भारत को देखते हैं। गांधी जी की छत्रछाया में और अपनी अभिनयकला से उन्होंने भारी लोकप्रियता अर्जित की। स्वतंत्र भारत के पहले प्रधानमंत्री बनकर उन्होंने भारत के सार्वजनिक जीवन में मार्क्सवादी शब्दावली को स्थापित किया। हिन्दू एवं संघ के प्रति उनके मन में वितृष्णा का भाव बहुत पहले से विद्यमान था। वे संघ की शक्ति वृद्धि से बहुत पहले से चिन्तित थे और संघ पर प्रहार करने का अवसर ढूंढ रहे थे। संघ पर प्रतिबंध लगाने के लिए गांधी हत्या को उन्होंने बहाना बनाया। अपने सत्रह वर्ष के प्रधानमंत्री काल में कम्युनिस्ट पार्टी को संरक्षण देने और संघ को लांछित व दबाने का उन्होंने पूरा प्रयास किया। नेहरू के कारण ही मार्क्सवादी भाषा का प्रचलन बहुत व्यापक हो गया। इसीलिए 2014 के चुनाव परिणामों को मार्क्सवादी शब्दावली से प्रभावित मीडिया व बुद्धिजीवी नेहरूवाद की पराजय के रूप में देख रहे हैं। नेहरूवाद और नेहरू-नीति गहन शोध की मांग करती है। देवेन्द्र स्वरूप










