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सोसाई बनाम भारत संघ के मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने इस प्रश्न पर विचार नहीं किया था कि मतांतरण करके ईसाई पंथ अपनाने वाले अनुसूचित जाति के व्यक्ति को अगर मतांतरण के बावजूद अस्पृश्यता सहन करनी पड़ती है, तो क्या वह उस लाभ या संरक्षण का पात्र है, जो अनुसूचित जातियों को संविधान के तहत मिल रहा है। लेकिन सवाल इनसे भी बड़े हैं, जो देश की बदलती परिस्थितियों में जवाब की दरकार रखते हैं। अगर इस्लाम और ईसाई पंथ में भी जातिगत भेदभाव और अस्पृश्यता है, तो फिर इस आधार पर हिंदू धर्म छोड़कर इस्लाम या ईसाइयत अपनाने का औचित्य क्या है? क्या इससे यह माना जाए कि वंचितों द्वारा किया जा रहा मतांतरण ह्यअंत:करण की स्वतंत्रताह्ण पर आधारित नहीं है?
क्या कांग्रेस के इस नजरिये से अवैध मतांतरण (भय, प्रलोभन और झांसेबाजी के आधार पर मतांतरण) को बढ़ावा नहीं मिलेगा, जिसके आरोप पहले से लगते रहे हैं? अनुसूचित जाति और बौद्ध धर्म से जुड़े कई संगठन मतांतरण करके ईसाई और इस्लाम पंथ अपनाने वाले अनुसूचित जाति के व्यक्तियों को अनुसूचित जाति का दर्जा देने के विरोध के पीछे यही तर्क देते हैं कि अस्पृश्यता के कारण ही इन लोगों ने हिंदू धर्म छोड़ा है। जब उन्हें दूसरे पंथों में भी इसी का सामना करना पड़ता है, तो फिर इससे तो यही अच्छा था कि वे हिंदू रहते।
रंगनाथ मिश्र आयोग के सामने कई राज्यों ने इस प्रस्ताव का विरोध किया था। अगर इसे स्वीकार कर लिया जाता है, तो इसके दुरुपयोग की आशंका से भी इनकार नहीं किया जा सकता। यानी जो व्यक्ति इसका पात्र नहीं होगा, वह भी इसका भरपूर लाभ उठाएगा। कुल मिलाकर इससे समाज में अशांति ही पैदा होने वाली है।











