| दिंनाक: 03 May 2014 14:49:43 |
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हिन्दुत्व मानव के लिए एक सर्वश्रेष्ठ जीवन पद्धति है। एक अदभुत दर्शन है,आदर्श संस्कृति है और महान सभ्यता है। वास्तव में हिन्दू के पास गर्व के लिए इतना कुछ है, जितना विश्व में अन्य किसी के पास नहीं है। आवश्यकता केवल यह है कि उसे हिन्दुत्व की श्रेष्ठता का पूर्ण ज्ञान हो। लेखक डॉ.ओमप्रकाश पहूजा की पुस्तक ह्यवयम् हिन्दव:ह्ण में हिन्दू गौरव के ऐसे ही कुछ स्वर्ण कणों को पुस्तक में संजोया गया है। लेखक ने हिन्दुस्थान की विशेषताओं को शब्द रूप देते हुए लिखा है- ह्यविश्व में यही एक ऐसा देश है, जहां की पृथ्वी को माता माना जाता है। जन्म से यह भूमि हमें मां जैसा प्यार और स्नेह देती है।ह्ण खंड ह्यहिन्दू का घर-घर भारतह्ण में लेखक लिखते हैं कि भारत की मिट्टी के प्रत्येक रज-कण को असंख्य ऋषियों,मुनियों और संतों ने घोर तपस्या कर इतना पवित्र कर दिया कि विश्व का कोई भी प्राणी इसे मस्तक पर धारण कर अपने आप को धन्य कर लेता है। सनातन से भारत भूमि देव भूमि कहलाती है। शुरू से हमारे घरों में बच्चों को यह गीत सिखाया जाता है-
चंदन है इस देश की माटी,
तपोभूमि हर गांव है।
हर बाला देवी की प्रतिमा,
बच्चा-बच्चा राम है।।
ह्यमानव संस्कृति का विकासह्ण अध्याय में भारत के पुरातन शिक्षा केन्द्रों का जिक्र किया गया है और यह बताने का प्रयास किया गया है कि यही हिन्दुस्थान कभी सम्पूर्ण विश्व का गुरु हुआ करता था। नालन्दा जैसा विश्वविद्यालय जहां विश्व के कोने-कोने से शिक्षार्थी शिक्षा ग्रहण करने आते थे। इसमें 2000 शिक्षक व 10000 छात्रों को शिक्षा दी जाती थी। लेकिन आज कुछ लोगों की कारगुजारियों के चलते इस गौरवशाली इतिहास को भुला दिया गया है।
हम सभी को जानना चाहिए कि हिन्दू धर्म से ही ईसाइयों ने प्रेरणा ली। शौपनहावर, शेगेल, शीलिंग और कजिन आदि पाश्चात्य विद्वानों ने माना है कि प्लेटो, सुकरात और प्लेटिनस आदि ग्रीक विद्वानों को हिन्दुस्थान के वेदान्त, सांख्य, बौद्ध मत व उपनिषद और श्रीमदभगवदगीता से प्रेरणा मिली।
शौपनहावर ने लिखा है-ह्यइस पूरे संसार में वेदान्त के समान विकसित धर्म अथवा तत्वज्ञान नहीं है। वेदान्त मेरे जीवन का प्राण है। मेरी मृत्यु के बाद यह मुझे सुख देगा।ह्ण सदैव से ही हिन्दुओं के इतिहास को तोड़-मरोड़ कर पेश किया गया। इसी को देखकर रा.स्व.संघ के द्वितीय सरसंघचालक श्री माधवराव सदाशिवराव गोलवलकर ने कहा था ह्यकिसी भी देश के इतिहास के काल वहां के राष्ट्र पुरुषों के नाम से जाने जाते हैं। राजाओं के वेश में बैठे अपहरणकर्ताओं और तानाशाहों के नाम से नहीं।ह्ण कुल मिलाकर यह पुस्तक पठनीय है।
अश्वनी कुमार मिश्र