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– धीरज त्रिपाठी-
भाजपा का विजय रथ रोकने को छद्म निरपेक्षतावादियों के षड्यंत्रों को देखना हो तो उसका लखनऊ से बेहतर उदाहरण दूसरा नहीं हो सकता। भाजपा के शीर्ष पुरुष अटल विहारी वाजपेयी की कर्मभूमि में इस बार की चुनावी स्थिति महाभारत के युद्ध जैसी बन गई है। जैसे हो और जिस तरह हो सब मिलकर भाजपा को रोको। लखनऊ से लड़ रहे भाजपा के राष्ट्रीय अध्यक्ष राजनाथ सिंह को घेरकर उन पर हमला करो। कोई और तरीका सफल होता न दिख रहा हो तो अटल के नाम को लेकर ही ऐसे-ऐसे भ्रम फैलाओ कि अपना काम बन जाए।
वैसे तो समाजवादी पार्टी और बहुजन समाज पार्टी बहुत पहले से कांग्रेस की गोद में बैठी हैं, पर, लखनऊ में तो हद ही हो गई। सपा को लगा कि डेढ़ साल पहले घोषित उसका उम्मीदवार अशोक वाजपेयी कांग्रेस का समीकरण बिगाड़ सकता है तो मुलायम सिंह यादव ने अचानक उम्मीदवार बदल दिया। राजधानी की उत्तर सीट से विधायक अभिषेक मिश्र को चुनाव मैदान में उतारा, यह जानते हुए कि पहली बार के विधायक मिश्र का बीस-पच्चीस दिनों में इतने बड़े चुनाव क्षेत्र में माहौल बना पाना मुश्किल है। मकसद सिर्फ एक कि कांग्रेस उम्मीदवार डा़ रीता बहुगुणा जोशी का रास्ता आसान हो जाए।
बसपा भी पीछे नहीं- बसपा अध्यक्ष मायावती ने यहां नकुल दुबे को चुनाव मैदान में उतारा है। दुबे राजधानी के ग्रामीण क्षेत्र बख्शी का तालाब (महोना) से विधायक रह चुके हैं। मायावती की सरकार में नगर विकास मंत्री रहे। विधानसभा का पिछला चुनाव उन्होंने लखनऊ महानगर की किसी सीट के बजाय ग्रामीण इलाके की सीट बीकेटी से लड़ना पसंद किया, वहां भी वह हार गए। पर, मायावती उनके जरिये लोकसभा का समर जीतना चाहती हैं। इसी से बसपा उम्मीदवार की गंभीरता का अनुमान लगाया जा सकता है। लखनऊ के समीकरण पर नजर दौड़ाएं तो बसपा की कोशिश राजधानी के लगभग एक लाख वंचित वोटों को अपने खेमे में बांधे रखने और लगभग साढ़े तीन लाख ब्राह्मण मतदाताओं में कुछ सेंध लगाकर कांग्रेस की मदद करने से ज्यादा नहीं दिखती। यह बात इनके चुनाव प्रचार के रंगढंग से भी समझ में आ जाती है। दोनों के प्रचार का फोकस भाजपा व राजनाथ सिंह को हराना है।
साजिश नहीं तो और क्या है- दोनों पार्टियां कांग्रेस पर पूरी तरह चुप्पी साधे हैं। इनकी कोशिश भी यही दिखती है कि कांग्रेस निशाने पर इतना न आ जाए कि भाजपा की राह आसान हो जाए। इसलिए इन पार्टियों के भाषणों में तर्क दिए जा रहे हैं कि भाजपा आ गई तो मुसलमानों का रहना मुश्किल हो जाएगा। पर, मुजफ्फरनगर और उत्तर प्रदेश में सौ से ज्यादा दंगों पर दोनों दल के प्रत्याशी चुप्पी साधे हैं। समाजवादी पार्टी की सरकार बनने के बाद लखनऊ में हुए उपद्रव पर भी कांग्रेस व बसपा सपा सरकार पर हमला करने से बच रह हैं तो राजधानी में लूट-हत्या व डकैती की अनगिनत घटनाओं पर भी इनके मुंह से शब्द नहीं निकल रहे हैं। महंगाई का सवाल कांग्रेस के एजेंडे से गायब हो तो बात समझ में आती है। पर, लखनऊ में चुनाव लड़ रहे इन दोनों उम्मीदवारों के प्रचार से भी यह महत्वपूर्ण मुद्दा गायब है।
कांग्रेस का खेल- कांग्रेस तो लखनऊ में अजीबो-गरीब खेल खेल रही है। महंगाई, भ्रष्टाचार, कानूनृ-व्यवस्था मुद्दा न बनने पाए तो पार्टी की प्रत्याशी रीता बहुगुणा जोशी अटल बिहारी वाजपेयी की विरासत को हवा दे रही हैं। वह कह रही हैं कि भाजपा उनका नाम क्यों ले रही है। जैसे भाजपा अपने शीर्ष नेतृत्व का नाम लेकर अपराध कर रही हो। ऐसा लगता है कि रीता की आपत्ति की असली वजह अटल के नाम व प्रभाव का डर है। वह जानती हैं कि लखनऊ में अटल के नाम से भिड़ पाना आसान नहीं। इसलिए वह चुनाव को अटल की छाया से बाहर निकालने का षड्यंत्र कर रही है।
पर, इन बातों का देना होगा जवाब पर, इनमें किसी की साजिश सफल होने वाली नहीं। लखनऊ के लोग सवाल कर रहे हैं कि पेट्रोल को आग लगाने वाली उनकी पार्टी को क्यों वोट दिया जाना चाहिए? महंगाई से जनता की कमर तोड़ने वाली कांग्रेस को उनका समर्थन क्यों मिलना चाहिए? सरकारी दफ्तरों में कामकाज की दुश्वारियां बढ़ाने वाली और भ्रष्टाचार को बढ़ावा देने वाली कांग्रेस किस तरह जनता के वोटों की हकदार है?
कांग्रेस ने लखनऊ के लिए किया क्या है? इनका साथ दे रही सपा और बसपा को वोट क्यों मिलना चाहिए? इन लोगों ने लखनऊ के लोगों के लिए क्या किया है? सिवाय लखनऊ के विकास के लिए अटल बिहारी वाजपेयी द्वारा शुरू की गई योजनाओं में कटौती के।
आप की असलियत- बची आआपा तो वह साफ-सुथरी राजनीति को लेकर कितना प्रतिबद्घ है, इसका अंदाज राजधानी में राजनाथ सिंह के मुकाबले उतारे गए प्रत्याशी से पता चल जाता है। आम आदमी पार्टी राजधानी के मुसलमानों का वोट हासिल करने की हसरत से अभिनेता जावेद जाफरी को नेता बनाने ले आई। मानों लखनऊ के लोग ऐसे लोगों की जमात हो गए जिनका काम सिर्फ तमाशा देखना और ताली बजाना भर है।
भाजपा के वरिष्ठ नेता व राजनाथ सिंह के चुनाव अभियान में जुटे हृदयनारायण दीक्षित कहते हैं कि जिस शहर की जनता देश की राजनीति की दिशा तय करती रही है वह देश की दिशा तय करने वाले चुनाव में मूकदर्शक नहीं रह सकती, उसे विकास और सुशासन की बात करने वालों को दिल्ली की सत्ता में पहुंचाना है।











