|
-मोरेश्वर जोशी-
पांच सौ से अधिक साल तक यूरोपीय लोगों ने संसार के कितने ही देशों पर गुलामी लादी, तरह तरह के अत्याचार कर वहां लूट मचाई। विश्व के कई विचारक भले इसे उपनिवेशवाद कहें, लेकिन पूरे यूरोप की यही भावना थी और आज भी है, कि पूरे संसार को लूटने का यह अधिकार उसे इतिहास से ही प्राप्त हुआ है। हर एक देश का इतिहास होता है, उस इतिहास को इतिहासज्ञ की किसी कसौटी से तो गुजरना ही होता है। यूरोप को पूरे विश्व को पांच सौ वर्र्ष तक लूटने का जो इतिहास मिला था, वह उसे बाईिबल की एक काल्पनिक कथा के आधार पर मिला था। उसी काल्पनिक इतिहास का एक हिस्सा था वह झूठ कि ह्यआर्य यूरोप से भारत में आएह्ण।
भारत में यह विषय पिछले अनेक वषोंर् से विवाद का विषय माना गया है, लेकिन यह विषय केवल भारत तक सीमित नहीं है, अपितु अफ्रीका, दक्षिण एशियाई क्षेत्र के अन्य कई देशों, संपूर्ण प्राचीन अमरीका एवं आस्ट्रेलिया का भी इतिहास ह्यआर्य बाहर से यहां आएह्ण
जैसे कल्पित धरातल पर खड़ा है। ह्यब्रेकिंग इंडियाह्ण पुस्तक ने इस विषय को जिस खूबी से उजागर किया है, वैसा इससे पूर्व शायद ही कभी हुआ हो।
विश्व का इतिहास बाईिबल की कथा ह्यनोहा की कहानीह्ण पर आधारित है। यह कहानी है कि, दो हजार वर्ष ईसा पूर्व आए एक महाप्रलय में संपूर्ण विश्व डूब गया था, उसमें एक नाव में नोहा नामक लड़का बचा रहा। उस नाव में उसने और कुछ लोगों को बैठा लिया। इस नोहा नाम के लड़के से उनकी जो बातचीत हुई, उसी को इतिहास माना जाने लगा। हुआ यूं कि उसके तीन लड़कों में से हाम नामक लड़के ने अपने पिता नोहा को शराब के नशे में धुत घर में वस्त्रहीन स्थिति में पडे़ देखा। इस पर वह अपनी हंसी को रोक नहीं पाया। इससे नोहा इतना क्रोधित हुआ कि उसने शाप दिया कि हाम की अगली पीढि़यां काली होंगी, वे दक्षिण की ओर जाएंगी एवं उन्हें नोहा के दूसरे लड़कों, शेम और जेफेत की अगली पीढि़यों की सेवा करनी होगी। यह नोहा आगे साढे़ नौ सौ साल जिया। इस दो लाईन की कहानी को यूरोप का इतिहास माना गया एवं विश्व के सभी काले लोग यानी यूरोपीय लोगों से विपरीत लोगों को हाम की पीढ़ी प्रजा माना गया और यूरोप की गुलामी स्वीकार करना उन्हें इतिहास से मिला अभिशाप माना गया। आगे हाम के दूसरे भाइयों शेम और जेफेत के वंशजों की टोलियां (कोलंबस और वास्को डी गामा से भी सदियों पूर्व) विश्व को जीतने के लिए निकलीं। उनमें से कुछ टोलियां भारत में आइंंर्। उन टोलियों में थे शेम और जेफेत के वंशज यानी गोरे युरोपीय और काले रंग वाले यानी सांवले लोग यानी हाम के वंशज थे।
इतिहास के किसी भी आधार से वंचित इस पूरी तरह से झूठी कथा के सहारे यूरोपीय लोगों ने ह्यसारा जग उनके पूर्वजों की दी हुई जागीर हैह्ण, ऐसा न केवल माना बल्कि उसी के आधार पर पूरे विश्व का इतिहास रच डाला। इसी कारण भारत के हिस्से ह्यआर्य भारत में बाहर से आएह्ण जैसा इतिहास आया। कई जगह देखा गया है कि किसी देश के इतिहास के बारे में दो मत हों। लेकिन हाम के लडके और शेम और जेफेत के लडकों की कहानी पर ही यूरोपीय लोगों ने पूरे विश्व का इतिहास बनाया, यही आज की वस्तुस्थिति है। वास्तव में इसे आसान बनाने के लिए ह्यआर्य बाहर से आएह्ण, जैसी कल्पनाएं रची गईं। यूरोप के अनेक देश, मुख्य रूप से इंग्लैंड, अमरीका और चर्च संगठनों ने इसी विषय को किन्हीं घटनाओं एवं वषोंर् का रूप देकर अनेक विश्वविद्यालयों, संस्थाओं एवं उनके नियंत्रण वाले अनेक देशों की सरकारों की मदद से इसे इतिहास का रूप दे दिया। इसीलिए विश्व के कई देशों के अधिकृत इतिहास और स्कूली पाठ्यक्रम का वह हिस्सा बना। ऐसे बेबुनियाद इतिहास के कारण हमारा क्या नुकसान हुआ, इसका हम विचार कर सकते हैं। हमसे अधिक गंभीर परिणामे एवं उससे होने वाले अनगिनत अत्याचार के कारण विश्व के अनेक देशों के लोगों के घाव अभी भी हरे हैं। विश्व के अनेक देशों की लूट एवं अत्याचार और अफ्रीका के संदर्भ में यही हुआ है। कम से कम तीन सौ वर्ष तक वहां जबरदस्त बंधुआ मजदूरी करने वाले गुलाम बनाए जाते रहे थे। वहां प्रतिकार होता तो उनके विरुद्घ शस्त्रों का प्रयोग कर उन्हें कब्जे में ले लिया जाता था। उस वक्त जितने गुलाम बने उनकी आज तक आंकी गई संख्या दो करोड़ है। इसमें भी नरसंहार का आंकड़ा स्वाभाविक रूप से अधिक होगा, ऐसा आज माना जा रहा है। यही चीज आस्ट्रेलिया एवं प्राचीन अमरीका में घटित हुई। उसे केवल खूनी कहना उचित नहीं होगा, महानरसंहार शब्द भी अपर्याप्त है।
जहां तक भारत का प्रश्न है, ब्रिटिशों द्वारा की गई प्लासी की लूट एवं मराठा साम्राज्य में की गई लूट की जो थोड़ी जानकारी उपलब्ध हैे, वह कुछ लाख करोड़ रुपयों की है। एक लूट के सहारे ब्रिटिशों ने ब्रिटन का औद्योगिकरण किया एवं दूसरी लूट के सहारे सेना को आधुनिक बनाया। बाकी लूट का हिसाब अभी उजागर नहीं हुआ है। यह संदर्भ देने का कारण यही है कि जेफेत और शेम के वंशजों को मिले अधिकार के आधार पर काले हाम के वंशजों की लूट विश्व के दो सौ देशों में पांच सौ वर्ष तक चलती रही थी। आज भी वह जारी है। यूरोप में जो मान्यता है कि नोहा की अनुमति से यह सब चलता है, इस बारे में जो इतिहास उपलब्ध है, वह पांच सौ वर्ष तक संसार को लूटने वाले यूरोपीय देशों के इतिहासकारों ने ही लिखा है। चाहे जितना भी मानें कि उन्होंने ये बिना किसी पूर्वाग्रह से लिखा है, फिर भी एक बात तो तय है कि आज वह संपूर्ण इतिहास फिर से लिखे जाने की आवश्यकता है।
'आयोंर् को भारत मे भेजने' वाला इतिहास यूरोपीय लोगों ने किस संस्था से कैसे लिखवाया, इसका भी इतिहास उपलब्ध है। अगर सन् 1950 को विश्व के अनेक देषों के यूरोपीय लोगों की जकड से मुक्त होने का मध्य वर्ष माना जाए, तो उसके पहले पांच वर्ष एवं बाद के पांच वर्ष पूरे विश्व को स्वतंत्रता की रोषनी देखने का अनुभव मिला। फिर भी पिछले साठ वर्ष में यूरोपीय देश एवं यूरोपीय नींव पर खडे अमरीकी देशों का ही विश्व के अर्थतंत्र पर वर्चस्व है। यद्यपि पिछले साठ वर्ष में भारत सहित अनेक देशों ने अपने इतिहास का पुनर्लेखन शुरू किया है। ह्यब्रेकिंग इंडियाह्ण पुस्तक ने इस प्रक्रिया को अनेक स्थानों पर गतिमान बनाया है। यह प्रक्रिया जितनी अधिक प्रभावी होगी, उसी अनुपात में शेम और जेफेत का अधिकार प्राप्त होने वालों के भी कुछ मुद्दे सामने आएंगे। लेकिन अब उनका सामना तो करना ही होगा।
भारत को स्वतंत्रता मिलने के बाद यहां की सरकारों को अपना अस्तित्व टिकाने रखने हेतु शेम और जेफेत की बाहें पकड़ने वालों पर निर्भर रहना पड रहा है। लेकिन वह कल्पित इतिहास धूमिल होने के लिए जितना समय लगेगा, वह उतना ही उन महासत्ताओं को यहां सत्ता जमाने का फिर से अवसर देने जैसा होगा।










