निष्काम-निर्मोही पटेल बनाम.सत्ताकामी-वंशवादी नेहरू
August 24, 2026
  • Read Ecopy
  • Circulation
  • Advertise
  • Careers
  • About Us
  • Contact Us
Android appiPhone AppArattai
Panchjanya
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
  • ‌
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • सामाजिक समरसता
      • नागरिक कर्तव्य
      • पर्यावरण
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • अधिक
    • विभाजन-विभीषिका
    • पाञ्चजन्य इवेंट
      • सुशासन संवाद
      • सागर मंथन
      • मुंबई संकल्प
      • अष्टायाम
      • गुरुकुलम
      • साबरमती संवाद
      • आधार इन्फ्रा
    • वेब स्टोरी
    • ऑपरेशन सिंदूर
    • विश्लेषण
    • लव जिहाद
    • खेल
    • मनोरंजन
    • यात्रा
    • स्वास्थ्य
    • धर्म-संस्कृति
    • पर्यावरण
    • बिजनेस
    • साक्षात्कार
    • शिक्षा
    • रक्षा
    • कला-साहित्य
      • पुस्तकें
      • पुस्तक समीक्षा
    • सोशल मीडिया
    • विज्ञान और तकनीक
    • मत अभिमत
    • श्रद्धांजलि
    • संविधान
    • आजादी का अमृत महोत्सव
    • मानस के मोती
    • जनजातीय नायक
    • पॉडकास्ट
    • पत्रिका
    • हमारे लेखक
  • Subscribe
    • Subscribe Print Edition
    • Subscribe Ecopy
    • Read Ecopy
Panchjanya
panchjanya android mobile app
  • होम
  • भारत
  • विश्व
  • संघ @100
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विश्लेषण
  • मत अभिमत
  • रक्षा
  • धर्म-संस्कृति
  • पत्रिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
  • Print Edition
  • Ecopy
होम Archive

निष्काम-निर्मोही पटेल बनाम.सत्ताकामी-वंशवादी नेहरू

Written byArchiveArchive
Jan 25, 2014, 12:00 am IST
inArchive

दिंनाक: 25 Jan 2014 18:22:31

15 दिसम्बर 2013 के अंक में ह्यपटेल निन्दा में जुटे नूरानीह्ण शीर्षक से एक लेख प्रकाशित हुआ था, जिसमें बताया गया था कि कुछ बुद्धिजीवियों के अनुसार नेहरू और पटेल के बीच कोई मतभेद नहीं था। यहां प्रस्तुत आलेख पाञ्चजन्य के 17 जुलाई 2011 के अंक में प्रकाशित हुआ था। लेख में पटेल की राष्ट्रनिष्ठा और नेहरू के सत्ता मोह का विषद् वर्णन किया गया है।

अगस्त, 1947 को खण्डित भारत ने राजनीतिक स्वतंत्रता तो पा ली,पर उसने अपने को अनेक प्रश्नों से घिरा पाया। वे प्रश्न इतिहास में खोए नहीं हैं, आज भी भारत उनका उत्तर पाने के लिए जूझ रहा है। पहला प्रश्न उसके सामने खड़ा था कि स्वाधीन भारत की संवैधानिक रचना कैसी हो? 9 दिसंबर, 1947 को संविधान सभा के औपचारिक गठन के बाद से ही वह अपने लिये नये संविधान की रचना में जुट गया था। विभाजन की काली छाया में भी वह अपने लिए लोकतांत्रिक रचना पाने को व्याकुल था। आखिर 1857 से 1947 तक उसके लम्बे स्वातंत्र्य संघर्ष की मूल प्रेरणा उसकी लोकतांत्रिक चेतना ही थी। यद्यपि अब इस चेतना की अभिव्यक्ति के लिए दो मॉडल उसके सामने खड़े थे। एक, अंग्रेज शासकों द्वारा आरोपित ब्रिाटिश संसदीय प्रणाली के अंधानुकरण का, और दूसरा, गांधी जी द्वारा पुनरुच्चारित ग्राम पंचायत को आधार बनाकर ऊपर उठने वाला पिरामिडनुमा परंपरागत ढांचा, जिसे नेहरू ने 1936 में प्रकाशित अपनी ह्यआत्मकथाह्ण में सोवियत संघ की अधिनायकवादी रचना की अनुकृति बताया था। यह इतिहासकारों के लिए गंभीर शोध का विषय है कि किस प्रकार गांधी जी की कांग्रेस उनके प्रति निष्ठा का राग अलापते हुए भी क्रमश: ब्रिाटिश संवैधानिक सुधार प्रक्रिया के प्रवाह में खिंचती चली जा रही थी। 1946 में अंतरिम सरकार का अंग बनकर तो वह पूरी तरह इसे किनारे छोड़कर ब्रिाटिश प्रणाली का अंग बन गयी थी। स्वाधीन भारत के नये संविधान की रचना के लिए जन्मी संविधान सभा भी उसी प्रणाली का अंग थी और उससे बाहर निकलकर सोचने में अक्षम थी।
हिन्द स्वराज के शताब्दी वर्ष में गांधी भक्ति का खोखला शब्दाचार करने की बजाय तथाकथित गांधी भक्तों को इतिहास के इस प्रश्न का साहसपूर्वक सामना करना चाहिए कि हिन्द स्वराज में प्रस्तुत स्वाधीन भारत के सभ्यतापरक चित्र और उस चित्र के अनुरूप गांधी जी की व्यक्तिगत एवं आश्रमी जीवनशैली ने भारतीय जनमानस को बड़े पैमाने पर स्पंदित एवं आंदोलित किया था, उन्हें हिन्दू सभ्यता का एकमेव श्रद्घाकेन्द्र बना दिया था, वही गांधी जी आधुनिक तकनालाजी के साथ सभ्यता युद्घ में और ब्रिटिश शासकों के विरुद्घ राजनीतिक कूट युद्घ में लगातार पीछे हटते क्यों दिखायी दे रहे हैं? यहां तक कि 1947 में स्वाधीन भारत के नवनिर्माण का दायित्व उन्होंने उन नेहरू पर छोड़ दिया, जिन्हें न उनका ग्राम स्वराज स्वीकार था और न उनके अहिंसा, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह और सत्य जैसे जीवन मूल्य। दूसरी ओर, जिस संविधान सभा का गठन उनके जीवन काल में हो गया था, उसने 1935 तक विकसित ब्रिटिश संवैधानिक रचना के दायरे में ही स्वयं को कैद कर लिया। अपनी तीन वर्ष लम्बी बहस में या तो उसने गांधी को स्मरण ही नहीं किया, और यदि कभी स्मरण किया भी तो गांधी को अप्रासंगिक ठहराकर ठुकराने के लिए। यह सब होते हुए भी इसे अस्वीकार नहीं किया जा सकता कि 1885 से 1947 तक इंडियन नेशनल कांग्रेस की मुख्य प्रेरणा लोकतंत्र की प्राप्ति ही रही। ब्रिटिश शासकों द्वारा आरोपित एकतंत्रवादी व्यवस्था को कांग्रेस ने पूरी तरह अस्वीकार किया, भले ही वह ब्रिाटिश भक्तों की प्रारंभिक कांग्रेस रही हो अथवा गांधी द्वारा रूपांतरित बाद की कांग्रेस।
पटेल की महानता
यह लोकतांत्रिक आकांक्षा कांग्रेस की संगठनात्मक संरचना में भी लगातार प्रतिबिम्बित होती रही। स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद भी यह संरचना कुछ काल तक बनी रही, यद्यपि नेहरू और पटेल के रूप में दो शक्ति केन्द्र उसके भीतर उभर आये थे। ये दोनों व्यक्तित्व बिल्कुल अलग सांचे में ढले थे। उनकी जीवन प्रेरणा और स्वभाव रचना एक-दूसरे से बिल्कुल अलग थी। किसान परिवार में जन्मे पटेल इंग्लैण्ड में उच्च शिक्षा पाकर भी जीवन के अंत तक जमीन से जुड़े रहे। वे बौद्घिक शब्दाचार से परे, मितभाषी थे, एक कर्मयोगी थे, संगठक थे, योद्घा थे। वे इतिहास में स्थान पाने के लिए उतना व्याकुल नहीं थे, जितना राष्ट्र की स्वतंत्रता और एक सशक्त स्वाभिमानी भारत के निर्माण के लिए। गांधी जी के प्रति एक बार समर्पण भाव जो उन्होंने अपनाया तो अंत तक निभाया। अपने लिए व्यक्तिगत सत्ता की कामना उन्होंने कभी नहीं की। कांग्रेस संगठन पर अपना भारी प्रभाव और नियंत्रण होते हुए भी पटेल ने कांग्रेस अध्यक्ष पद के लिए जोड़-तोड़ नहीं की। 1931 की कराची कांग्रेस के अलावा वे कभी कांग्रेस अध्यक्ष नहीं बने। तीन बार उन्होंने गांधी जी की इच्छा का पालन करते हुए अध्यक्ष पद नेहरू के लिए छोड़ दिया। 1946 में जब पूरे भारत की सत्ता उनके सामने थी, तब 16 में से 13 प्रांतीय कांग्रेस कमेटियों का समर्थन पाने के बाद भी गांधी जी के एक इशारे पर उन्होंने अध्यक्ष पद नेहरू को दे दिया, जबकि एक भी प्रांतीय कमेटी ने उनका नाम प्रस्तावित नहीं किया था। गांधी जी के अंतिम दिनों में यदि सरदार और उनके बीच मतभेद की गंध कहीं-कहीं आती है तो उसके पीछे भी व्यक्तिगत सत्ता का मोह नहीं था, केवल राष्ट्रीय एकता और सशक्त भारत के निर्माण की आकांक्षा थी। अपनी प्रखर निष्काम राष्ट्रनिष्ठा के कारण ही पटेल निजाम हैदराबाद के अन्तरराष्ट्रीय षड्यंत्र को परास्त कर पाये, कश्मीर और तिब्बत के प्रश्नों पर उन्होंने दूरगामी चेतावनी लिखित रूप में दी, जिसे नेहरू ने अनसुना कर दिया। पटेल अपने प्रति कितने निर्मम थे इसका प्रमाण है कि उनके पुत्र दाहया भाई पटेल का नाम कोई नहीं जानता। और उनकी एकमात्र पुत्री मणिबेन पटेल, जिसने अपना परिवार बसाने की बजाय अपना पूरा जीवन अपने पिता की एकनिष्ठ सेवा में बिता दिया, उस मणिबेन को भी उस राष्ट्रनिष्ठ निर्मम पिता ने कभी आगे बढ़ाने की कोशिश नहीं की। आत्मविलोपी निष्काम राष्ट्रभक्ति का ऐसा दूसरा उदाहरण इतिहास में मिलना कठिन ही है।
नाटकबाज नेहरू

इसके विपरीत एक धनी, अंग्रेजीदां, शहरी परिवार में जन्मे नेहरू प्रारंभ से ही अपने स्थान के प्रति जागरूक दिखते हैं। पिछले कुछ वषोंर् में प्रकाशित ह्यसेलेक्टेड वर्क्स आफ नेहरूह्ण की प्रथम श्रृंखला को देखकर स्पष्ट होता है कि 1903 में 14 वर्ष की आयु से ही उन्होंने अपने सब पत्रों की नकल संभालकर रखना शुरू कर दिया था। गांधी जी के प्रति उनकी भावनाओं का विश्लेषण करने पर स्पष्ट हो जाता है कि अपनी व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा की पूर्ति की एक सीढ़ी के रूप में ही उन्होंने गांधी जी का इस्तेमाल किया। गांधी जी के साथ उनके पत्राचार, उनकी आत्मकथा, और ह्यडिस्कवरी आफ इंडियाह्ण जैसी रचनाओं को पढ़ने से स्पष्ट हो जाता है कि उन्हें गांधी जी का जीवन दर्शन, उनके आर्थिक एवं सामाजिक विचार कभी स्वीकार नहीं हुए। उन्होंने बार-बार कहा कि मेरा मस्तिष्क गांधी से बगावत करता है पर गांधी से टक्कर लेने की ताकत मेरे पास नहीं है और गांधी के बिना देश का आजाद होना संभव नहीं है, जबकि मैं अपने सपनों का भारत आजादी मिलने के बाद ही बना सकता हूं। 1928 में गांधी जी ने उन्हें वैचारिक मतभेद के कारण बगावत का झंडा फहराने की लिखित छूट दी, पर वे पीछे हट गये। उल्टे उनके पिता मोतीलाल नेहरू ने उन्हें कांग्रेस अध्यक्ष बनाने का अनुरोध किया। गांधी की कांग्रेस में वंशवादी प्रवृत्ति का यह श्रीगणेश था। 1927 की मद्रास कांग्रेस और 1928 की कलकत्ता कांग्रेस में नेहरू सुभाष बोस के अनुयायी थे, पर 1929 में कांग्रेस अध्यक्ष बनकर उन्होंने सुभाष को अपनी कार्यसमिति में भी नहीं रखा, क्योंकि वे सुभाष को अपना प्रतिद्वंद्वी मान बैठे थे। सुभाष के विरुद्घ नेहरू के षड्यंत्रों को जानने के लिए 1939 का सुभाष-नेहरू गोपनीय पत्राचार, जो नेहरू द्वारा 1959 में प्रकाशित ह्यबंच आफ ओल्ड लैटर्सह्ण में पहली बार प्रकाश में आया, को पढ़ना आवश्यक है। सरदार निष्काम कर्मयोगी थे तो नेहरू बौद्घिकता प्रधान वाक्-शूर थे। उनकी पूरी महानता उनके लेखन और मंचीय नाटकों तक सीमित है। वे अपने को समाजवादी कहते थे किन्तु जब सुभाष ने पूछा कि तुम बोलते तो समाजवाद हो पर तुम्हारा आचरण व्यक्तिवादी है, तुम क्या हो? तो नेहरू का लिखित उत्तर है, ह्यमैं बौद्घिक धरातल पर समाजवादी हूं किन्तु मैं प्रकृति से व्यक्तिवादी हूं।ह्ण अपने इस परस्पर विरोधी आचरण के कारण नेहरू कांग्रेस में कम्युनिज्म के मुखर प्रवक्ता बन गये जिसके कारण आगे चलकर कम्युनिस्टों और समाजवादियों ने उन्हें अपना नेता मान लिया। किन्तु समाजवादी मित्रों के बार-बार आग्रह करने पर भी गांधी जी से टक्कर लेने या उनसे संबंध विच्छेद करने का साहस उन्होंने कभी नहीं दिखाया। इसका स्पष्टीकरण भी उन्होंने सुभाष को एक पत्र में दिया है। वामपंथी गुट का प्रवक्ता बनने का लाभ उन्हें यह हुआ कि वे गाहे-बगाहे कांग्रेस छोड़ो की धमकी देते रहे और इस धमकी से डरकर गांधी जी उन्हें कांग्रेस का अध्यक्ष पद परोसकर उनकी महत्वाकांक्षा को आगे बड़ाते रहे। गांधी- नेहरू संबंधों का अध्याय अभी भी अनसुलझा है। इसका अर्थ यह नहीं कि नेहरू जी में राष्ट्रभक्ति का भाव था ही नहीं, या वे स्वतंत्रता संघर्ष के एक दुर्धर्ष सेनानी नहीं थे, या कि उन्होंने लम्बा काल अंग्रेजों की जेलों में नहीं बिताया। समझना केवल यह है कि राष्ट्रभक्ति और व्यक्तिगत महत्वाकांक्षा में कौन प्रबल था, कौन किसका वाहन था। ऐसा भी नहीं है कि नेहरू जी लोकप्रिय जननेता नहीं थे। यदि लोकप्रियता की कसौटी पर नेहरू और पटेल का तुलनात्मक मूल्यांकन करें तो पटेल अपनी कठोर मुखमुद्रा और नीरस भाषण शैली के कारण गुजरात के बाहर लोकप्रिय नहीं थे जबकि नेहरू अपनी बौद्घिक उड़ान, ताकतवर कलम और मंचीय अभिनय के कारण बुद्घिजीवी वर्ग और आम जनता में समान रूप से लोकप्रिय थे। उनकी यह लोकप्रियता भी गांधी जी को उनकी महत्वाकांक्षा जन्य धमकी के सामने झुकने को मजबूर कर देती थी। पर यह सस्ती लोकप्रियता नेहरू ने जिस सुनियोजित अभिनय कला के द्वारा अर्जित की थी उसका वर्णन उन्होंने आत्म स्वीकृति के दुर्लभ क्षणों में 1937 के अपने अध्यक्षीय जुलूस के बाद ह्यचाणक्यह्ण छद्म नाम से ह्यमार्डन रिव्यूह्ण में प्रकाशित अपने एक लेख में स्वयं किया है।
कांग्रेस का चरित्र परिवर्तन
नेताजी सुभाष के भारत से जाने और 1946 में अंतरिम सरकार में साथ काम करने के बाद से नेहरू ने सरदार को अपना प्रतिद्वंद्वी समझकर काटना आरंभ कर दिया। स्वतंत्रता के बाद साम्प्रदायिक हिंसा के वातावरण में उन्होंने मौलाना आजाद के साथ मिलकर गांधी जी के मन में सरदार के विरुद्घ अविश्वास का जहर पैदा करने में कोई कसर नहीं छोड़ी। गांधी जी की दुर्भाग्यपूर्ण मृत्यु को तो उन्होंने सरदार पटेल की राजनीतिक हत्या का हथियार ही बना लिया। उनकी शह पर नेहरूवादी कांग्रेसियों, कम्युनिस्टों और समाजवादियों ने सरदार पटेल के विरुद्घ जो जहरीला प्रचार किया उससे पटेल जैसा लौहपुरुष भी भीतर से पूरी तरह टूट गया। इसमें तनिक संदेह नहीं कि यदि उस समय पटेल के विरुद्घ जहरीला प्रचार न किया जाता, उनकी गांधीनिष्ठा पर प्रश्नचिन्ह न लगाया गया होता, तो सरदार कुछ वर्ष और जीते। वे स्वाधीन भारत के भटकाव को रोकने का प्रयास करते। फिर भी, जिस समय उनके विरुद्घ नेहरू की शह पर विषाक्त प्रचार चल रहा था, उस समय भी उन्होंने एक मार्मिक पत्र लिखकर अपने जीवन के अंतिम चरण में नेहरू को पूर्ण सहयोग देने का वचन दिया। किन्तु जाने के पहले उन्होंने कांग्रेस के लोकतांत्रिक चरित्र को बनाये रखने के लिए 1950 में कांग्रेस अध्यक्ष के चुनाव में नेहरू के प्रत्याशी के विरुद्घ अपने प्रत्याशी राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन को जिताकर कांग्रेस संगठन में नेहरू की हैसियत का आभास अवश्य करा दिया।
अब तक नेहरू सरकार और कांग्रेस संगठन एक दूसरे से स्वतंत्र और समकक्ष थे। किन्तु यह स्थिति नेहरू को स्वीकार्य नहीं थी। 1950 में सरदार की मृत्यु के बाद वे अपने को कांग्रेस का सर्वेसर्वा बनाने की कोशिश में लग गये और कांग्रेस कार्यसमिति की नासिक बैठक में उन्होंने राजर्षि पुरुषोत्तम दास टंडन का अध्यक्ष पद से त्यागपत्र दिलाकर स्वयं को अध्यक्ष बनवा लिया। यहां से कांग्रेस का बुनियादी चरित्र परिवर्तन प्रारंभ हो गया। अभी तक कांग्रेस स्वयं को सर्वोपरि मानती थी, सरकार पर अंकुश रखने का मन रखती थी, पर अब सरकार और कांग्रेस दोनों का सूत्र संचालन एक ही व्यक्ति के हाथ में आ गया था, जो कांग्रेस को सरकार का उपकरण बनाने को व्यग्र था। अब सरकार कांग्रेस की ओर नहीं, कांग्रेस सरकार की ओर देखने लगी थी। कांग्रेस सरकार मुखपेक्षी बन गयी थी और सरकार पूरी तरह नेहरू की जेब में थी। यह सत्य है कि उस समय भी कांग्रेस में डा़ राजेन्द्र प्रसाद, चक्रवर्ती राजगोपालाचारी, आचार्य कृपलानी जैसे वरिष्ठ स्वतंत्रता सेनानी जीवित थे। अकेले आचार्य कृपलानी टंडन जी के विरुद्घ अध्यक्ष पद का चुनाव हारने के बाद कांग्रेस से बाहर चले गये थे। विभिन्न राज्यों में भी स्वतंत्रता आंदोलन से निकले कांग्रेसी नेताओं का बाहुल्य था किन्तु नेहरू के शक्तिशाली व्यक्तित्व के सामने वे स्वयं को निष्प्रभ पा रहे थे। इधर, नेहरू की पुत्री इंदिरा गांधी अपने पति फिरोज गांधी (या घैण्डी?) के साथ रहने की बजाय अपने पिता की देखभाल के लिए प्रधानमंत्री आवास में आ गयी थीं। यहीं से वंशवादी उत्तराधिकार की प्रक्रिया आरंभ हो गयी।
वंशवाद की शुरुआत
1959 में नेहरू ने इंदिरा गांधी का कांग्रेस के अध्यक्ष पद पर औपचारिक अभिषेक कर ही दिया और उनके माध्यम से केरल में मुस्लिम लीग और चर्च के साथ गठबंधन करके केरल की निर्वाचित कम्युनिस्ट सरकार को गिरवाया। व्यक्तिगत सत्ताकांक्षा केन्द्रित वंशवादी राजनीति और राष्ट्रनिष्ठ सैद्घांतिक राजनीति में कितना अंतर है, यह उस समय प्रकट हुआ। कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रति सहानुभूति प्रदर्शित करने वाले नेहरू ने नम्बूदिरीपाद की कम्युनिस्ट सरकार के विरुद्घ साम्प्रदायिक तत्वों की सहायता से आंदोलन खड़ा करवाया तो कम्युनिस्टों की भाषा में ह्यफासिस्टह्ण राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक गुरुजी गोलवलकर ने, जो सैद्घांतिक धरातल पर कम्युनिस्ट विचारधारा के प्रबल आलोचक थे, संविधान के अंतर्गत चुनी गयी सरकार के विरुद्घ उस आंदोलन को असंवैधानिक और लोकतंत्र विरोधी करार दिया। पर सत्ताकांक्षा का बंदी वंशवाद अब सब लोकतांत्रिक मर्यादाओं को ढहाता हुआ दौड़ने लगा था। 1962 के चीनी आक्रमण ने पं़ नेहरू को कल्पना के आकाश से धकेलकर यथार्थ की कठोर धरती पर ला पटका था। सत्रह वर्ष तक प्रधानमंत्री की छाया में रहकर और कांग्रेस अध्यक्ष पद पर पहुंचकर इंदिरा गांधी स्वयं को उनका सहज उत्तराधिकारी मान बैठी थीं। नाटे कद के, विनम्र, आज्ञापालक, स्वतंत्रता सेनानी लालबहादुर शास्त्री का प्रधानमंत्री की कुर्सी पर बैठना इंदिरा जी को तनिक भी नहीं रुचा, पर उन्होंने उन्हें संक्रमणकालीन बाधा के रूप में सहन किया। जनवरी, 1966 में ताशकंद में शास्त्री जी की अनपेक्षित मृत्यु आज भी रहस्य बनी हुई है। 

Share
Tweet
SendShareSend
Subscribe Panchjanya YouTube Channel
Download Panchjanya mobile apps: Google Play Store  / App Store

संबंधित समाचार

अजय राय, कांग्रेस नेता

सावन के महीने में अयोध्या में अजय राय का मछली भोज, भाजपा बोली- सनातन धर्म का अपमान ही कांग्रेस की पहचान

पंजाब में सभी 117 सीटों पर अकेले विधानसभा चुनाव लड़ेगी भाजपा : बीएल संतोष

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका से लुढ़का शेयर बाजार, निवेशकों को लगी 1.13 लाख करोड़ की चपत

गणेश जी की प्रतिमा पर अंडे फेंके जाने की घटना का नितेश राणे ने किया कड़ा विरोध

गणपति प्रतिमा के आगमन पर फेंके अंडे, नितेश राणे बोले – ‘जिहादियों को मिट्टी में मिला देंगे’

सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण

‘लोक कल्याण की कामना ही लोकतंत्र का सत्य ‘

‘सिखों का नरसंहार करने वाला सज्जन कुमार, कांग्रेस का रोल मॉडल?’भड़के HS Phoolka

Load More

ताज़ा समाचार

अजय राय, कांग्रेस नेता

सावन के महीने में अयोध्या में अजय राय का मछली भोज, भाजपा बोली- सनातन धर्म का अपमान ही कांग्रेस की पहचान

पंजाब में सभी 117 सीटों पर अकेले विधानसभा चुनाव लड़ेगी भाजपा : बीएल संतोष

पश्चिम एशिया में तनाव बढ़ने की आशंका से लुढ़का शेयर बाजार, निवेशकों को लगी 1.13 लाख करोड़ की चपत

गणेश जी की प्रतिमा पर अंडे फेंके जाने की घटना का नितेश राणे ने किया कड़ा विरोध

गणपति प्रतिमा के आगमन पर फेंके अंडे, नितेश राणे बोले – ‘जिहादियों को मिट्टी में मिला देंगे’

सिद्धपीठ श्रीहनुमन्निवास के पीठाधीश्वर आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण

‘लोक कल्याण की कामना ही लोकतंत्र का सत्य ‘

‘सिखों का नरसंहार करने वाला सज्जन कुमार, कांग्रेस का रोल मॉडल?’भड़के HS Phoolka

गांव के अखाड़े से Olympic Podium तक… भारत की खेल क्रांति की पूरी कहानी

लखनऊ में छात्रों से मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार का संवाद, छात्रों को दी लोकतंत्र में भागीदारी की सीख

वंदे मातरम पर BJP का कांग्रेस को सीधा संदेश- ‘राष्ट्रगीत का सम्मान सर्वोपरि’, हरदा को भी सुनाई खरी-खरी

प्रतीकात्मक तस्वीर

रुद्रपुर में SIR बैठक के बाद हंगामा! BJP-कांग्रेस में तीखी नोकझोंक, कलेक्ट्रेट में धरने पर बैठे भाजपा नेता

Load More
  • Privacy
  • Terms
  • Cookie Policy
  • Refund and Cancellation
  • Delivery and Shipping

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies

  • Search Panchjanya
  • होम
  • भारत
    • अंडमान और निकोबार द्वीप
    • दादरा और नगर हवेली एवं दमन और दीव
    • अरूणाचल प्रदेश
    • असम
    • आंध्र प्रदेश
    • उत्तराखंड
    • उत्तर प्रदेश
    • ओडिशा
    • कर्नाटक
    • केरल
    • गुजरात
    • गोवा
    • चण्‍डीगढ़
    • छत्तीसगढ़
    • जम्‍मू एवं कश्‍मीर
    • झारखण्‍ड
    • तमिलनाडु
    • तेलंगाना
    • त्रिपुरा
    • दिल्ली
    • नागालैण्‍ड
    • पंजाब
    • पश्चिम बंगाल
    • पुडुचेरी
    • बिहार
    • मणिपुर
    • मध्य प्रदेश
    • महाराष्ट्र
    • मिजोरम
    • मेघालय
    • राजस्थान
    • लक्षद्वीप
    • लद्दाख
    • सिक्किम
    • हरियाणा
    • हिमाचल प्रदेश
  • विश्व
  • संघ @100
    • संघ को जानें
    • पंच परिवर्तन
      • स्वदेशी
      • सामाजिक समरसता
      • कुटुम्ब प्रबोधन
      • पर्यावरण
      • नागरिक कर्तव्य
    • संघ गीत
  • सम्पादकीय
  • काम की खबरें
  • स्वदेशी
  • जीवनशैली
  • विभाजन-विभीषिका
  • पाञ्चजन्य इवेंट
    • सुशासन संवाद
    • सागर मंथन
    • मुंबई संकल्प
    • अष्टायाम
    • गुरुकुलम
    • साबरमती संवाद
    • आधार इन्फ्रा
  • वेब स्टोरी
  • ऑपरेशन सिंदूर
  • विश्लेषण
  • लव जिहाद
  • खेल
  • मनोरंजन
  • यात्रा
  • स्वास्थ्य
  • धर्म-संस्कृति
  • पर्यावरण
  • बिजनेस
  • साक्षात्कार
  • शिक्षा
  • रक्षा
  • कला-साहित्य
    • पुस्तकें
    • पुस्तक समीक्षा
  • सोशल मीडिया
  • विज्ञान और तकनीक
  • मत अभिमत
  • श्रद्धांजलि
  • संविधान
  • आजादी का अमृत महोत्सव
  • पॉडकास्ट
  • पत्रिका
  • हमारे लेखक
  • Read Ecopy
  • प्रसार विभाग – Circulation
  • About Us
  • Contact Us
  • Careers @ BPDL
  • Advertise
  • Privacy Policy

© Bharat Prakashan (Delhi) Limited.
Tech-enabled by Ananthapuri Technologies