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-देबब्रत घोष-
उपरोक्त तीनों घटनाओं ने हाल ही में अखबारों में सुर्खियां बटोरी, लेकिन यह एक बहुत बड़े खतरे का एक छोटा सा हिस्सा मात्र है। ये घटनाएं खबरों में इस वजह से नहीं आईं थीं कि ये किसी बड़ी मुठभेड़ या आतंकी हमले की खबरें थीं बल्कि इसलिए आईं थी कि ये किसी व्यक्ति या समूह की भारत के सीमाओं के अन्दर मौजूद प्रतिबंधित गुटों से जुड़ी गुप्त और खामोश गतिविधियों को बता रही थी। आमतौर पर आतंकी हमलों, माओवादियों द्वारा निर्दोषों की हत्याओं और सैकड़ों आम नागरिकों की जान ले लेने वाले बम विस्फोटों की खबरें ही अखबारों या टेलीविजन चैनलों की सुर्खियां बनती हैं, लेकिन इस तरह के गुप्त अभियान अक्सर अबूझे ही रह जाते हैं, जो न केवल खतरनाक हैं, बल्कि देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए चुनौती भी हैं।
देशभर में फैले ये 'स्लीपर सेल' चाहे वे माओवादियों के लाल गलियारे में हों या उग्रवाद ग्रसित इलाके में अथवा यहीं उपजे इंडियन मुजाहिदीन के संजाल में, बहुत खतरनाक ढंग व तेजी से अपने पंजे फैला रहे हैं। असल में ये भीड़ में छुपे जिहादी आतंकी गतिविधियों को बरपाने से पहले आखिरी खाका खींचने में प्रमुख भूमिका निभाते हैं।
अड्डों के गुप्त संजाल में गुप्त आतंकी अड्डा एक सुप्त इकाई जैसा होता है, जिसमें अड्डे के सदस्य आमतौर पर आतंकी कहर बरपाने या मुठभेड़ों में सीधे भाग नहीं लेते, बल्कि रणनीतिक और दूसरे तरह की मदद उपलब्ध कराते हैं, वें आतंकियों को ठहराने और घुमाने सहित अनेक जानकारी से लेकर विभिन्न चीजों की सुविधा उपलब्ध कराते हैं।
हाल ही में छत्तीसगढ़ और झारखण्ड राज्यों, जहां माओवादी असर काफी ज्यादा है, गुप्त आतंकी अड्डों की गतिविधियों को साफ तौर से देखा। लेकिन ये केवल माओवादियों के मामले में ही नहीं है, इन राज्यों में ह्यसिमीह्ण और ह्यआईएमह्ण की गतिविधियों में बढ़ोतरी पुलिस और सुरक्षा बलों के लिए गंभीर खतरों के तौर पर उभरी हैं। खतरा सिर्फ लाल आतंक का ही नहीं है, बल्कि माओवाद और इस्लामी आतंकवाद का अल कायदा, लश्कर-ए-तैयबा और आईएम के गठजोड़ के झण्डे तले हुए घालमेल ने आतंक के एक नए आयाम को पैदा कर दिया है।
25 दिसम्बर, 2013 को छत्तीसगढ़ में आतंक निरोधी दस्ते ने बिहार के रहने वाले 22 वर्ष के धीरज साव को पकड़ा था, जो रायपुर के ट्रान्सपोर्ट नगर इलाके में सड़क पर खाने-पीने की दुकान चलाता था। उस पर सिमी और आईएम के लिए पैसा एकत्र करने का कथित आरोप था। उसके आस्था के जुड़ाव को देखते हुए कोई भी नहीं सोच सकता था कि वह आईएम के ह्यस्लीपर सेलह्ण के तौर पर काम कर रहा था। लेकिन उसका बैंकों में लेनदेन और बड़ी तादाद में पैसा जमा होने से संदेह हुआ और गुप्तचर एजेंसियां चौकन्नी हो गईं।
रायपुर क्षेत्र के पुलिस महानिरीक्षक जी.पी. सिंह के अनुसार धीरज साव सिमी और आईएम आतंकियों को पैसा भेजने में मध्यस्थ का काम करता था। पूछताछ में उसने यह बात स्वीकार भी की है। आरोपी 2011 में पाकिस्तान से आए किसी खालिद के सम्पर्क में आया था और तब से उसे विभिन्न बैंक खातों से भारी रकम मिलती रही थी, जिसे वह बाद में मंगलौर स्थित आईएम के खाते में जमा कर देता था। इसके लिए उसे बाकायदा कमीशन मिलता था। जांच में पता चला कि साव के तमाम बैंक खातों में अब तक एक करोड़ से ज्यादा पैसा जमा हुआ था।
घटना से पहले, नवम्बर-दिसम्बर 2013 में रायपुर में स्थानीय स्तर पर आईएम और परोक्ष रूप से अल कायदा से जुड़े सिमी के 16 आतंकियों की गिरफ्तारी से पता चला कि छत्तीसगढ़ के विभिन्न जिलों में एक नहीं अनेक ह्यस्लीपर सेलह्ण सक्रिय हैं। ऐसे ही कुछ अड्डों की खोजबीन और गिरफ्तारी में बोधगया और पटना बम धमाकों से जुड़े आईएम आतंकियों का पता चला था, जिनके नाम थे हैदर अली उर्फ अब्दुल्ला, नुमान अंसारी, तौफीक अंसारी और मुजीबुल्ला। इनको घटना के फौरन बाद गुप्त अड्डों के सदस्यों द्वारा रायपुर में एक रात के लिए ठहराया गया था। इसी के बाद भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार और गुजरात के मुख्यमंत्री नरेन्द्र मोदी की जान को रायपुर में आतंकी खतरे का खुलासा हुआ था।
रायपुर शहर का कोई भी व्यक्ति कल्पना भी नहीं कर सकता था कि एक अध्यापक या एक प्रोपर्टी डीलर या एक मैकेनिक जो उनके घर के पीछे ही रहता है, आतंक के खामोश खेल से जुड़ा होगा, क्योंकि छत्तीसगढ़ में साम्प्रदायिक सौहार्द है, इसलिए आईएम के आतंकियों ने छत्तीसगढ़ को छुपने के लिए सही जगह माना और वहां से अपनी गुपचुप गतिविधियों को अंजाम देना प्रारंभ किया। यह कहना था छत्तीसगढ़ के समाज अर्थ विज्ञानी विवेक जोगलेकर का। सेन्टर फॉर लैण्ड वारफेयर स्टडीज के निदेशक मेजर जनरल ध्रुव कटोच का मानना है कि इन गुप्त अड्डों को ध्वस्त करने के लिए स्थानीय पुलिस केन्द्रीय एजेंसी या सुरक्षा बल से ज्यादा असरदार साबित हो सकती है।
नक्सलवादी अभियानों के मामले में, इन ह्यस्लीपर सेलह्ण की गतिविधियां अब केवल माओवादी प्रभाव वाले इलाकों तक सीमित नहीं रह गई हैं,क्योंकि उन्होंने अपनी पहुंच शहरी केन्द्रों तक बढ़ा ली है। जैसे, 25 अगस्त 2013 को छत्तीसगढ़ पुलिस ने नक्सलियों को उस वक्त गिरफ्तार किया जब वे रायपुर के ऊंचे दर्जे के शंकर नगर इलाके से माओवादियों के लिए विस्फोटक ले जा रहे थे।
इसी तरह मई 2011 में महाराष्ट्र एटीएस ने नक्सलवादियों के एक ह्यस्लीपर सेलह्ण के संजाल का पता लगाकर पुणे से 5 सदस्यों को गिरफ्तार किया था, जो कथित तौर पर माओवादियों के समर्थक थे। एटीएस का दावा था कि ये लोग उन परेशान किसानों का फायदा उठा रहे थे जो एसईजेड के तहत अपनी जमीन खो चुके थे और पश्चिमी महाराष्ट्र में एक इलाका समिति का गठन कर रहे थे।
सीमा सुरक्षा बल के पूर्व प्रमुख प्रकाश सिंह वामपंथी उग्रवाद के पीछे सामाजिक आर्थिक कारण गिनाते हैं, जो वनवासियों के अधिकारों के उल्लंघन से उपजे हैं।
आतंकी संजाल 'स्लीपर सेल' की भूमिका और गतिविधियों को हाल की एक अमरीकी रपट- 'जिहादी हिंसा : भारतीय चुनौती' से समझा जा सकता है, कि यह इस बात को रेखांकित करती है कि भारतीय जिहादी अभियान एक आंतरिक सुरक्षा से जुड़ा मुद्दा है, जिसके बाह्य आयाम हैं। इसमें कहा गया है कि आईएम एक सुनियोजित संगठन नहीं है बल्कि एक अपेक्षाकृत संजाल है जिसमें सिमी और आपराधिक माफिया के कगार पर बैठे जिहादी तत्व जुड़े हैं।











