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-प्रकाश सिंह-
अल्पसंख्यकों के देशज निवासियों की स्थिति पर 2012 में आई वैश्विक रपट के अनुसार ह्यदुनिया के प्रत्येक इलाके में अल्पसंख्यकों और देशज लोगों पर मंडरा रहे खतरों में से एक है उन्हें उनकी उस जमीन और उनके प्राकृतिक संसाधनों से बेदखल किये जाने का खतरा , जो उनकी पहचान के लिहाज से अहम है। कई समुदायों का सदियों से अपने इलाके के साथ गहरा नाता रहा है,फिर भी उनकी जमीन पर विकास- खनन,तेल और गैस ,बांध,कृषि व्यवसाय,पर्यटन या संरक्षण के नाम पर कब्जा करके उन्हें बड़ी सुगमता के साथ बाहर का रास्ता दिखाया जाता है। इन स्थानों से उन्हें हिंसात्मक तरीके से बेदखल कर दिया जाता है। इसके बदले उन्हें या तो बहुत कम मुआवजा दिया जाता है या कुछ भी नहीं दिया जाता।ह्ण
भारत में वनवासी समाज की एक बड़ी आबादी है। 2001 के जनसंख्या सर्वेक्षण के वक्त यह 84.33 लाख थी यानी कुल आबादी का 8.2 प्रतिशत।
संवैधानिक और कानूनी सुरक्षा
संविधान में वनवासियों के हितों की रक्षा करने के लिए व्यापक प्रावधान हैं। अनुच्छेद (14) सभी को समान अधिकार और अवसर प्रदान करता है। अनुच्छेद 15 ( 4) में सामाजिक और शैक्षिक रूप से पिछड़े वर्ग/अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजातियों के लोगों के विकास के लिए राज्यों को विशेष अधिकार दिए गए हंै। राज्य सरकार अनुच्छेद 16 (4) के अन्तर्गत पिछड़े वर्ग के नागरिकों के लिए उनके पक्ष में नियुक्तियां और पदों में आरक्षण का प्रावधान कर सकती है। अनुच्छेद (39) में कहा गया है कि राज्य अपने भौतिक संसाधनों को ऐसे लोगों के नियंत्रण में दें जो सबके हित के हों। अनुच्छेद 46 में वर्णित है कि राज्य अनुसूचित जनजातियों के शैक्षिक और आर्थिक हितों को बढ़ावा देने के साथ ही समाज में उनके साथ कोई अन्याय व शोषण न हो, इससे भी उनकी रक्षा करेगा। संविधान की अनुसूची 5 और 6 में वनवासियों की रक्षा के लिए विशेष प्रावधान शामिल किए गए हैं।
इन सभी के अलावा केन्द्र सरकार द्वारा वनवासियों के हितों की रक्षा के लिए भी कई कानून बनाए गए हैं। जिनमें नागरिक अधिकार संरक्षण अधिनियम,1955,अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989, पंचायत (अनुसूचित क्षेत्रों तक विस्तार) अधिनियम, 1996, अनुसूचित जनजातियों और वन के अन्य पारंपरिक वनवासी (मान्यता प्राप्त अधिकार) अधिनियम, 2006, और भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन विधेयक, 2011 साथ ही राज्य सरकारों, ने भी इन सभी विषयों पर कानून पारित किये हुए हंै। ़
वनवासियों के समक्ष समस्याएं
वनवासियों को कई तरह की समस्याओं का सामना करना पड़ता है जिनमें कुछ इस प्रकार हैं़, ग्यारहवीं पंचवर्षीय योजना (2007-2012) में लिखा है-
1-वनवासियों और उनके आर्थिक संसाधनों, जैसे-जमीन,जंगल व अन्यों के बीच बढ़ती दूरी।
2-उनके जीवन यापन के तंत्र का विस्थापन और बेदखलीकरण
3-सरकारी अधिकारियों की अनदेखी 4-बढ़ते अत्याचार
5-नियोजित विकास प्रयासों के जरिए अत्यल्प विकास
योजना। दस्तावेज स्वीकार करता है कि सामाजिक-आर्थिक विकास के अभाव, शारीरिक और आर्थिक शोषण,जमीन से बेदखल करना आदि के चलते वनवासी समाज हिंसा से ग्रसित हैं।
माओवादी उग्रवाद – मुख्य आयाम
माओवादी उग्रवाद समाज के सबसे गरीब तबके से सहयोग पाता है जो कई कारणों से आहत महसूस करते हैं और जिनका सरकारी तंत्र से अपने शिकायतों के समाधान के प्रति भरोसा उठ गया है। जनजातीय तबका इन लोगों का एक अहम अंग है। माओवादी उग्रवाद आज देश की आंतरिक सुरक्षा के लिए एक बड़े खतरे के रूप में जाना जाता है।
आज माओवादी आंदोलन के मुख्य पहलू इस प्रकार हैं –
1- एक बड़े भौगोलिक क्षेत्र में उनका फैलाव 2- हिंसा की क्षमता में वृद्घि 3- पूर्वोत्तर में विस्तार 4- अन्य उग्रवादी समूहों के साथ गठजोड़
भौगोलिक विस्तार : 1967 में एक छोटे से गांव से शुरू हुआ यह आंदोलन आज 45 वर्ष के बाद देश के विभिन्न क्षेत्रों में फैल चुका है। वर्तमान में देश भर के लगभग 173 जिले माओवादी हिंसा से प्रभावित हैं जिनमें 26 जिले अत्यधिक प्रभावित हैं। राज्यों की बात करें तो सबसे अधिक प्रभावित राज्यों में हैं, आंध्र प्रदेश, बिहार , छत्तीसगढ़ , झारखंड , महाराष्ट्र , ओडिशा और पश्चिम बंगाल।
हिंसा फैलाने की क्षमता
हिंसा फैलाने में नक्सलवादियों की क्षमता अत्याधुनिक हथियारों के हाथ में आने व आईईडी का उपयोग करने के चलते कई गुना बढ़ गई है। माओवादियों के सशस्त्र प्रकोष्ठ-पीपुल्स लिबरेशन गुरिल्ला आर्मी में लगभग 8600 लोगों की फौज काम कर रही है। साथ ही 38000 लोगों की एक ऐसी फौज भी है जो साधारण हथियारों के साथ क्षेत्र की तमाम जानकारी उपलब्ध कराकर सहयोग करती है।़
पूर्वोत्तर में विस्तार
रपट की मानें तो माओवादी पूर्वोत्तर के क्षेत्रों में अपने जाल को तो फैला ही रहे हैं साथ ही उन क्षेत्रों में सक्रिय विद्रोही संगठनों के साथ भी अपने संबंध स्थापित करने के प्रयास कर रहे हैं। हाल ही में एक संसदीय समिति ने कहा था कि जिस प्रकार माओवादी हिंसा का रास्ता अपना रहे हैं उससे उनके साथ बातचीत का कोई मतलब ही नहीं बनता है। संवेदनशील पूर्वोत्तर राज्यों में माओवादियों का धावा, गंभीर रणनीतिक प्रभाव से भरा हुआ है। समिति का कहना है कि देश के पूर्वोत्तर हिस्सों में वामपंथी उग्रवाद की उपस्थिति सरकार के अनेक प्रयासों को बेकार कर सकती है। अगर यह इसी प्रकार बढ़ता रहा तो इसका एक परिणाम यह होगा कि केंद्र और राज्य सरकारों की सामाजिक – आर्थिक विकास परियोजनाएं सफल नहीं हो पायंेगी।
गठजोड़
माओवादियों का अन्य उग्रवादी संगठनों के साथ गठजोड़ समस्या को और बढ़ा रहा है। वे लिट्टे, उल्फा व अन्य संगठनों के लड़ाकों से अत्याधुनिक हथियार चलाने का प्रशिक्षण प्राप्त कर रहे हैं। इसके अलावा , भारत की कम्युनिस्ट पार्टी (माओवादी) के नेपाल की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ नजदीकी रिश्ते हैं। पाकिस्तान की खुफिया एजेंसी आईएसआई भी माओवादियों तक पहुंचने की कोशिश में लगी रहती है। आज छत्तीसगढ़ देश का सबसे ज्यादा माओवाद प्रभावित राज्य है। राज्य सरकार ने माओवादियों के प्रभाव को समाप्त करने के लिए ह्यऑपरेशन ग्रीन हंटह्य शुरू किया था जिसके तहत माओवादियों को भारी हानि उठानी पड़ी। बौखलाए माओवादियों ने एक बड़ी घटना को अंजाम देते हुए 6 अप्रैल 2010 को दंतेवाड़ा जिले में 75 सीआरपीएफ जवानों की हत्या कर दी थी।
झारखंड में हिंसा की सबसे ज्यादा घटनाएं देखी गई हैं। राज्यों में उच्चतम मात्रा में फैला भ्रष्टाचार नक्सल समस्या का प्रमुख कारण है साथ ही राजनीतिक नेतृत्व इस समस्या का सामना करने के लिए तैयार नहीं है। बिहार के भी हालात अच्छे नहीं हैं। ओडिशा प्रशासन की लचर कार्यप्रणाली माओवादियों को प्रदेश में फैलने के लिए मदद कर रही है। महाराष्ट्र का गढ़चिरौली जिला माओवादी गतिविधियों से बुरी तरह प्रभावित है। पश्चिम बंगाल में ममता बनर्जी सरकार का माओवादियों के प्रति कभी नरम तो कभी गर्म रवैया रहा है लेकिन अब उनका माओवादियों से मोहभंग हो गया है। उन्होंने सुरक्षाबलों को पूरी तन्मयता के साथ उनसे मुकाबला करने के लिए कहा है।
कुछ समय से माओवादियों के शीर्ष नेतृत्व में काफी उदासीनता आई है। पोलित ब्यूरो के कुल 16 सदस्यों में 7 हिरासत में हैं,जबकि 2 मारे जा चुके हैं। कुल 39 सदस्यीय केंद्रीय समिति में 18 सदस्य मारे गए हैं और पांच को निष्प्रभावी कर दिया है साथ ही 13 हिरासत में हैं। गृह मंत्रालय के आंकड़ों के अनुसार 2011 में 1760 और 2012 में 1415 घटनायें घटित हुईं जो कि 2011 से कम है। 2011 में 142 और 2012 में 114 सुरक्षा बलों की हिंसा में मृत्यु हुई है। माओवादी हिंसा में मारे गए नागरिकों की संख्या में भी गिरावट हुई है। 2011 में 469 और 2012 में 301 रही है। इन आकड़ों को देखकर संतोष नहीं होता है क्योंकि सरकार की नीतियां स्पष्ट नहीं हैं साथ ही राज्य और केन्द्र के बीच जो ताल-मेल होना चाहिए वह नहीं है। क्योंकि प्रत्येक मुख्यमंत्री ने माओवादी खतरे को एक अलग प्रकार से लिया है और खुद की नीतियां बनाकर सिर्फ खनापूर्ति ही की है।
माओवादी इस बीच खुद को फिर से संगठित करने के प्रयास में लगे हुए हैं। उन्होंने दण्डकारण्य में बी.सी.टी.सी. नाम से एक प्रशिक्षण केन्द्र बनाया है जिसमें वह वनवासियों को विज्ञान,सैनिकों जैसी दक्षता, गणित व सामाजिक ज्ञान से संबंधित सभी प्रकार के प्रशिक्षण प्राप्त कराते हैं। गृह राज्य मंत्री ने 6 मई 2013 को लोकसभा में बताया कि माओवादी झारखंड और छत्तीसगढ़ में हथगोले व अन्य अत्याधुनिक हथियारों को खुद निर्मित कर रहे हैं।
समय-समय पर योजना आयोग अत्यधिक नक्सली हिंसा से प्रभावित क्षेत्रों के सामाजिक और आर्थिक समस्या को पहचानते हुए उनके विकास के लिए अनुदान देता है, लेकिन दुर्भाग्य से भ्रष्टाचार के कारण इस अनुदान का लाभ नीचे के क्षेत्रों में नहीं पहुंच रहा है जहां गरीबों की संख्या ज्यादा है। केन्द्रीय मंत्री जयराम रमेश ने कहा था कि हम सिर्फ विनाशकारी विचारधारा का मुकाबला नहीं कर रहे हैं, वे लोग भी हमारी अपनी असंवेदनशीलता और उपेक्षा का भी सामना कर रहे हैं।
समाधान का रास्ता
माओवादी समस्या के समाधान लिए एक समग्र दृष्टिकोण की आवश्यकता है। योजना आयोग के विशेष समूह ने 2008 को अपनी बहुमूल्य रपट ह्यचरमपंथी प्रभावित क्षेत्रों में विकास की चुनौतियांह्य में आर्थिक विकास योजना की कुछ खामियां गिनाईं। इसमें कहा गया था- ह्यआजादी के बाद से विकास का जो स्वरूप अपनाया गया उसने समाज के हाशिये पर पड़े वर्गों में व्याप्त असंतोष को और बढ़ा दिया है़.़.़.़.़.़.़.़.़.़विकास के इस स्वरूप का लाभ असंतुलित रूप से गरीबों का हक मार के प्रभावी वर्गों ने कब्जा लिया है,जिसका सबसे ज्यादा खामियाजा गरीबों को उठाना पड़ा है। इन समुदायों की जरूरतों के प्रति असंवेदी विकास ने अकसर स्थानांतरण किया है। खास तौर से जनजातियों के मामलों में इसकी वजह से उनके सामाजिक संगठन,सांस्कृतिक पहचान और संसाधन आधार बर्बाद हो गए तथा कई तरह के संघर्ष पैदा हुये। इसकी वजह से वे दोहन की चपेट में आसानी के साथ आते चले गए। आजादी के बाद से जनजातियों का एक बड़े पैमाने पर विस्थापन हुआ। इसके पीछे की वजह रही विकास परियोजनायें जैसे- स्टील इकाइयां,उर्वरक कारखानें, एस ई जेड इकाई से कितने लोग प्रभावित हुए इसका कोई आधिकारिक आंकड़ा नहीं है, लेकिन गैर आधिकारिक अध्ययनों में यह आंकड़ा 1947 से 2004 के बीच 6 करोड़ अंाका गया है। जनजातीय समुदाय भारत की कुल आबादी का 8 प्रतिशत है लेकिन ऐसा माना जाता है कि विस्थापित लोगों की संख्या 40 प्रतिशत है। दूसरे शब्दों में वे ही हैं जिन्हें विस्थापन का दंश झेलना पड़ा है।
निम्नलिखित बिन्दुओं पर सरकार को तत्काल कार्र्रवाई करनी होगी।
1- वनवासियों का सेठ-साहूकार,व्यापारी व बिचौलियों द्वारा जो शोषण किया जाता है उससे उनकी रक्षा की जानी चाहिए । 2- भूमि अधिग्रहण अधिनियम, 1894 व वन अधिनियम , 1927 , वन (संरक्षण ) अधिनियम, 1980 , कोयला क्षेत्रों ( अधिग्रहण और विकास) अधिनियम, 1957, राष्ट्रीय खनिज नीति, 1993 में आवश्यक संशोधन हों ताकि वनवासियों के साथ हो रहे अन्याय रूकें व उनके हित संरक्षित हों। 3-जहां तक संभव हो विस्थापन से बचा जाना चाहिए, लेकिन अगर फिर भी विस्थापन की स्थिति बनती है तो उनको बसने के लिए वैकल्पिक स्थान दिया जाए। 4-अनुसूचित जनजाति और अन्य परंपरागत वनवासी ( वन अधिकारों की मान्यता) अधिनियम 2006 को तत्काल प्रदेशों में लागू करना चाहिए। 5-भूमि अधिग्रहण, पुनर्वास और पुनर्स्थापन विधेयक, 2011 को कड़ाई से लागू किया जाना चाहिए। (लेखक सीमा सुरक्षा बल के पूर्व महानिदेशक हैं।)











