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डॉ. सतीश चन्द्र मित्तल
यद्यपि यह सही है कि महात्मा गांधी भारत के राष्ट्रीय आन्दोलन में कांग्रेस रूपी बैलगाड़ी के दो मजबूत बैल पं. नेहरू तथा सरदार पटेल को मानते थे। सम्भवत: सरदार पटेल गाड़ी को दांयी ओर से खींचते थे तथा पण्डित नेहरू बांयी ओर से। इसके सारथी स्वयं महात्मा गांधी थे। परन्तु दोनों की चाल, दृष्टि तथा लक्ष्य में पूर्णत: एकरूपता, समरसता एवं सहयोग न था। दोनों के पारिवारिक परिवेश, धार्मिक दृष्टि तथा प्रत्यक्ष व्यवहार में भारी अन्तर था। संक्षिप्त में यदि इसका अवलोकन करें तो स्पष्ट हो जाता है।
पारिवारिक परिवेश
नेहरू तथा पटेल के पारिवारिक परिवेश बिल्कुल भिन्न थे। नेहरू के पितामह गंगाधर मुगल शासक बहादुरशाह जफर के काल में एक उच्च पुलिस अधिकारी थे जिन्होंने ने 1857 के महासमर में अंग्रेजी सेना के भय से दिल्ली से आगरा भागकर जान बचाई थी, उसके विपरीत पटेल के पिता झावेर भाई ने इसी महासागर में झांसी की रानी लक्ष्मीबाई की सेना में भाग लेकर देश भक्ति का परिचय दिया था। नेहरू के पिता मोतीलाल नेहरू इलाहाबाद के प्रसिद्ध तथा समृद्धशाली वकील थे। उनकी चारों ओर ख्याति थी जिनके घर में मुगलिया ठाट-बाट तथा अंग्रेजीयत का बोलबाला था। जहां 1890 के दशक में घर के प्रत्येक सदस्य के लिए अंग्रेजी बोलने की अनिवार्यता थी। दूसरी ओर पटेल के भरपूर परिवार की जीविका के लिए केवल दस एकड़ भूमि थी। पं. नेहरू का शिक्षण अंग्रेजी तथा आयरिश ट्यूटरों की देख-रेख में घर पर हुआ था, सरदार पटेल ग्राम की पाठशाला में ही पढ़े थे तथा वे अपने पिता के साथ खेतों में सहायता के लिए जाते थे। उच्च शिक्षा के लिए पं. नेहरू को उनके पिता मोतीलाल वर्ष 1905 में इग्लैण्ड ले गए थे जहां उन्होंने आगामी सात वर्ष अध्ययन किया तथा 1912 ई. में बैरिस्टर बनकर भारत लौटे। सरदार पटेल तथा उनके बड़े भाई विट्ठल भाई पटेल का भी सपना इंग्लैण्ड से बैरिस्टरी की शिक्षा प्राप्त करना था, पर धन का अभाव था। सरदार पटेल में तीन वषोंर् तक कुछ धन इकट्ठा किया, पहले अपने बड़े भाई का सपना पूरा किया। पुन: धन इकट्ठा किया तथा 1910 में इंग्लैण्ड गए। 38 महीने का पाठयक्रम उन्होंने 30 महीने में पूरा किया तथा प्रथम स्थान प्राप्त किया। वर्ष 1913 में वे भारत लौटे। वर्ष 1916 में नेहरू तथा पटेल दोनों का ही प्रथम बार महात्मा गांधी से साक्षात्कार हुआ था। नेहरू जी गांधी के ह्यव्यक्तित्वह्ण से प्रभावित हुए पर ह्यदर्शनह्ण से नहीं। सरदार पटेल सदैव गांधी जी के निर्णय के समर्थक तथा अनुयायी रहे।
नेहरू तथा पटेल की राष्ट्र निर्णय की दृष्टि भी भिन्न थी। नेहरू भारतीय ग्रामों की गंदगी तथा पिछड़ेपन से कुपित थे तथा भारत का सुन्दर चमकदार यूरोप के शहरों की भांति परिवर्तन चाहते थे, पटेल शहर की गंदगी से परेशान थे तथा गांधी जी की भांति आदर्श ग्राम की कल्पना करते थे। एक बार पटेल ने कहा था, ह्यमैंने कला या विज्ञान के विशाल गगन में ऊंची उड़ान नहीं भरी। मेरा काम तो कच्ची झोंपडि़यों में गरीब किसानों के खेतों की उसर भूमि और शहर के गन्दे मकानों में हुआ है।ह्ण नेहरू जी अपने को अन्तरराष्ट्रीय समाजवादी कहलाने के इच्छुक रहे, परन्तु न सोवियत रूस न साम्राज्यवादी चीन ने उन्हें समाजवादी माना। रूस को प्रसिद्ध विद्वान प्रो. आर. सलोवास्की ने नेहरू को ह्यव्यक्ति परक समाजवादीह्ण कहा है जो भारत की सबसे बड़ी बुर्जुआ पार्टी का नायक रहे। प्रसिद्ध इतिहासकार औरष्ट मार्टिशन ने उन्हें मार्क्स का समर्थक कहा (देखें मार्टिशन की पुस्तक जवाहरलाल नेहरू एण्ड हिज पालिटिक्स न्यूज मास्को, 1989) परन्तु नेहरू के व्यक्तित्व को पेचीदा, उलझन तथा अर्न्तद्वन्द से पूर्ण, अस्थिर तथा विवादास्पद माना है। सरदार पटेल किसी वाद या इज्म के चक्कर में न पड़े थे, और यदि उन्हें किसी इज्म के साथ जोड़ना हो तो वह था ह्यपेट्रोयोरिज्मह्ण यानी देशभक्ति।
धार्मिक चिन्तन में अन्तर
पं. नेहरू तथा पटेल दोनों गांधी जी के अनुयायी थे परन्तु धार्मिक मामले में पं. नेहरू, गांधी जी के विचारों से भिन्न थे। गांधी जी अपने को हिन्दू कहलाने का गौरव का अनुभव करते, इसके अभाव में मृत्यु तक का आलिंगन करने को उत्सुक तथा हिन्दू धर्म को अपने श्रेष्ठ कायोंर् का प्रेरक तथा मार्गदर्शन मानते थे। इसके विपरीत पं. नेहरू को अपने जीवन में हिन्दुत्व, हिन्दू धर्म तथा हिन्दू संस्कृति से जरा भी लगाव न था। सच तो यह है कि जब गांधी जी अपने भाषणों तथा वार्तालापों में बीच-बीच में ह्यईश्वरह्ण शब्द का उच्चारण करते तो नेहरू इससे क्षुब्ध होते थे। पं. नेहरू के जीवन लेखक माइकेल ब्रीचर ने माना है कि हिन्दू होकर भी उनका जीवन हिन्दुत्व से कटा था। (देखें नेहरू एव पालिटिक्ल बायोग्राफी (1959) पृ. 31
पंडित नेहरू ने धर्म के बारे में अपनी ह्यआत्मकथाह्ण में लिखा है कि भारत में तथा अन्यत्र भी धर्म या कम से कम संगठित धर्म को देखकर मुझे अत्यन्त घृणा होती है और मैंने इसकी भर्त्सना की है तथा इसको पूर्णत: नष्ट करने की इच्छा की है। ऐसा प्रतीत होता है कि इसने प्राय: सदैव अन्धविश्वास, प्रतिक्रिया, शोषण, मतान्धता और विशेष हितों को ही प्रश्रय दिया है।ह्ण
नेहरू ने यह भी चाहा कि सामाजिक नियमों में, विवाह में, उत्तराधिकार के नियमों में, दीवानी और फौजदारी फैसलों में, तथा अन्य प्रकार की बातें धार्मिक विश्वासों से स्वतंत्रत रहें।ह्ण
ह्यआत्माह्ण के बारे में उनका विश्वास था, ह्यकोई वस्तु आत्मा है या मृत्यु के पश्चात इसका कोई अस्त्वि रहता या नहीं, मैं नहीं मानता।ह्ण इसका महत्व इस प्रश्न में है कि मुझे इससे जरा भी परेशानी नहीं होती।ह्ण(देखें डिस्कवरी आफ इंडियाह्ण पृ. 15-16)
ह्यईश्वरह्ण के अस्तित्व के बारे पं. नेहरू ने लिखा है ह्ययदि ईश्वर का अस्तित्व है तो यह उपयुक्त होगा कि हम उसकी ओर देखे नहीं और न ही उस पर आश्वस्त हों। पराशक्ति तत्वों पर आधारित होना (हमें) उस ओर ले सकता है या ले गया है, जिससे व्यक्ति काआत्म विश्वास खत्म हो जाता है तथा उसकी अपनी सृजनात्मक योग्यता क्षीण हो जाती है (देखें, ह्यसेमिंग्स आफ नेहरू)ह्णद हिन्दुस्तान टाइम्स (27 मई, 1965)
पं. नेहरू के धर्म के सन्दर्भ में विचार कार्ल मार्क्स के सदृश्य थे, जो ह्यधर्म को अफीम की पुडि़या ह्ण मानता था (देखें गिल्मप्सेज आफ द वर्ल्ड हिस्ट्री पृ. 37, 84-85, 4, 503) पंडित नेहरू ने धर्म को राजनीति तथा साम्राज्यवाद की चेरी मानते हुए ऐतिहासिक सन्दर्भ में लिखा, सामान्यत: धर्म मनुष्य को अन्धेरे में रखता है। सोचने की दृष्टि कम करता है। दूसरों के प्रति क्रूर तथा असहिष्णु बनाता है। हजारों लोग मारे जाते हैं। इसके नाम पर अनेक अपराध किए जाते हैं। धर्म, राजनीति तथा साम्राज्यवाद की दासी बन जाता है। सभी युग के शासक इसे जनता पर नियन्त्रण के रूप में अपनाते हैं तथा सामाजिक व्यवस्था में एक दैवीय शस्त्र के रूप में रखते हैं।
पं. नेहरू ने अपने भाषणों क ी प्रगति के लिए धर्म को, सामाजिक ढांचे एवं संस्थाओं से अलग रखने को कहा है। धर्म के राजनीति में प्रयोग को नैतिक अव्यमूलन कहा तथा मस्तिष्क को रूढि़वादी बनाने वाला कहा (देखें, नेहरू स्पीचेज, भाग तीन, पृ. 4321 पं. नेहरू ने महात्मा गांधी को लिखे पत्रों में धर्म की कटु आलोचना की (देखें, नेहरू के पत्र, दिनांक 7 मार्च, 933 व 5 मई, 1933)
संंक्षिप्त में पंडित नेहरू पाश्चात्य शब्दावली में अपने को पूर्णत: सेकुलर मानते थे, विश्व प्रसिद्ध नास्तिकों के विचारक तथा अमरीकी लेखक रिचर्ड डिकोन्स ने पं. नेहरू को ह्यनास्तिकह्ण माना है जो अमरीका के प्रारम्भिक राष्ट्राध्यक्षों की भांति नास्तिक कहलाने की बजाय सेकुलरिज्ट कहलाना ज्यादा, पसंद करते थे। (देखंे, रिचर्ड डिकोन्स, ह्यद गॉड डिल्युसनह्ण2007 पृ. 67।
जहां तक सरदार पटेल का सम्बन्ध है, उनका धर्म के सन्दर्भ में कोई विवाद नहीं है। वे अपने माता-पिता की भांति स्वामी नारायण के वैष्णव मत को मानते थे। उनकी हिन्दू धर्म, संस्कृति तथा हिन्दुत्व के प्रति पूर्ण श्रद्धा तथा आस्था थी। उन्हीं के प्रयासों से सोमनाथ का जीर्णोंद्धार किया गया था तथा पं. नेहरू के विरोध होने पर वे देश के राष्ट्रपति डॉ. राजेन्द्र प्रसाद को वहां ले गए थे।











