महंगाई दिंनाक: 19 Oct 2013 14:18:48 इतने ज्यादा बढ़े गए, दाल दूध के रेट।अब इनसे होती नहीं, आसानी से भेंट।। दाल मसाले हो गए, गायब अब श्रीमान।नहीं किचन में दीखती, पहले वाली शान।। महंगाई ने कर दिया, सब सपनों को चूर।मरने तक को हो गए, कुछ व्यक्ति मजबूर।। घर आये मेहमान जब, सूखे उनके प्राण।दिल को जख्मी कर चुके, महंगाई के बाण।। गुजर बसर होती नहीं, महंगा हर सामान।सरकारें देती नहीं, महंगाई पर ध्यान।। महंगाई का जोर है, आम आदमी त्रस्त।यहां पर तो बस दीखते, अफसर-नेता मस्त।। महंगाई ज्यों बढ़ रही, नहीं बढ़ी है आय।घर चलना मुश्किल हुआ, आंख अंधेरा छाय।। खाना तक मिलता नहीं, अब उनको भरपेट।आसमान छूने लगे, सब चीजों के रेट।।